उत्तर काण्ड अध्याय 11

धनद (कुबेर) द्वारा रावण को लंका का त्याग

रावण के अत्याचारों से पीड़ित होकर कुबेर उसे लंका छोड़ने का आदेश देते हैं। रावण क्रोधित होकर लंका पर अधिकार जमाने की योजना बनाता है।

विवरण

रावण ने ब्रह्मा के वरदान से अहंकारी होकर अपने भाई कुबेर से लंका छीनने का प्रयास किया। कुबेर ने उसे समझाया कि लंका उन्हें ब्रह्मा से प्राप्त हुई है, परंतु रावण नहीं माना। अंततः कुबेर ने रावण को लंका छोड़ने का आदेश दिया, जिससे दोनों भाइयों में वैर बढ़ा। यह सर्ग रावण के बढ़ते अहंकार और उसके परिणामों की भूमिका प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ११

(धनद (कुबेर) द्वारा रावण को लंका का त्याग)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ एकादशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किए और अहंकारी हो गया। उसने अपने भाई कुबेर से लंका छीनने का निश्चय किया। यह सर्ग उसी संघर्ष के आरंभ का वर्णन करता है।

📜 श्लोक १-५ : रावण का कुबेर के पास दूत भेजना
रावणः क्रोधताम्राक्षः कुबेरं प्रति दूतकम् ।
प्रेषयामास दुर्धर्षं लङ्केश्वरमचोदयत् ॥
त्वं ममादेशतः स्थानं त्यज शैलेन्द्रनिर्मितम् ।
नो चेद्युद्धेन ते सार्धं भविता नात्र संशयः ॥
🔹 पदच्छेद : रावणः = रावण; क्रोधताम्राक्षः = क्रोध से लाल आँखों वाला; कुबेरम् = कुबेर के पास; प्रति = को; दूतकम् = दूत; प्रेषयामास = भेजा; दुर्धर्षम् = दुर्धर्ष; लङ्केश्वरम् = लंकेश्वर को; अचोदयत् = उकसाया; त्वम् = तू; ममादेशतः = मेरे आदेश से; स्थानम् = स्थान; त्यज = त्याग दे; शैलेन्द्रनिर्मितम् = पर्वतराज से निर्मित (लंका); नो चेत् = नहीं तो; युद्धेन = युद्ध से; ते सार्धम् = तेरे साथ; भविता = होगा; न अत्र संशयः = इसमें संशय नहीं।
📖 भावार्थ : रावण ने क्रोध से लाल आँखें करके कुबेर के पास एक दूत भेजा। उसने दूत के माध्यम से कहा, “हे कुबेर! तुम मेरे आदेश से इस सुन्दर लंका को छोड़ दो, जो पर्वतराज से निर्मित है। यदि नहीं छोड़ोगे तो मैं तुमसे युद्ध करूँगा – इसमें कोई संशय नहीं।” रावण का यह आदेश उसके बढ़ते अहंकार और बल के मद को दर्शाता है। वह अब किसी को भी अपने समक्ष खड़ा नहीं देखना चाहता, यहाँ तक कि अपने बड़े भाई कुबेर को भी नहीं। रावण की इस धमकी से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह केवल बाहरी शत्रुओं से ही नहीं, बल्कि अपने ही परिवार से भी संघर्ष करने को तैयार है। इस प्रकार का अहंकार ही अंततः उसके पतन का कारण बनता है। रावण के इस व्यवहार से यह शिक्षा मिलती है कि धन, बल और वैभव के अहंकार में व्यक्ति अपने हितैषियों को भी भूल जाता है, जो उसके विनाश का मार्ग प्रशस्त करता है।
📜 श्लोक ६-१० : कुबेर का उत्तर और समझाना
कुबेरः प्रहसन्वाक्यं रावणं प्रति दूतकम् ।
उवाच मृदुना सार्धं धर्मार्थसहितं वचः ॥
भ्राता ममासि दशग्रीव मा गमः क्रोधवश्यताम् ।
ब्रह्मदत्तेयमा लङ्का न त्याज्या पूर्वकर्मणा ॥
🔹 पदच्छेद : कुबेरः = कुबेर; प्रहसन् = हँसते हुए; वाक्यम् = वचन; रावणम् = रावण के; प्रति = प्रति; दूतकम् = दूत से; उवाच = बोले; मृदुना = कोमल; सार्धम् = सहित; धर्मार्थसहितम् = धर्म और अर्थ से युक्त; वचः = वचन; भ्राता = भाई; ममासि = मेरे हो; दशग्रीव = दशग्रीव; मा गमः = मत जा; क्रोधवश्यताम् = क्रोध के वश में; ब्रह्मदत्ता = ब्रह्मा द्वारा दी गई; इयम् = यह; लङ्का = लंका; न त्याज्या = त्याज्य नहीं है; पूर्वकर्मणा = पूर्व कर्मों से।
📖 भावार्थ : कुबेर ने रावण के दूत को देखकर हल्की मुस्कान के साथ धर्म और अर्थ से युक्त कोमल वचन कहे। उन्होंने कहा, “हे दशग्रीव! तुम मेरे भाई हो। क्रोध के वश में मत जाओ। यह लंका ब्रह्मा जी द्वारा मुझे मेरे पूर्व कर्मों के फलस्वरूप दी गई है, इसलिए इसे छोड़ना उचित नहीं है।” कुबेर ने रावण को भाई कहकर संबोधित किया और उसे धर्म का मार्ग दिखाया। वे जानते थे कि रावण बलशाली है, परंतु उन्होंने युद्ध से बचने का प्रयास किया। कुबेर का यह उत्तर उनके धैर्य, शालीनता और धर्मपरायणता को प्रदर्शित करता है। वे चाहते थे कि रावण समझ जाए कि बलपूर्वक किसी वस्तु को छीनना अनुचित है, खासकर जब वह ब्रह्मा के वरदान से प्राप्त हो। कुबेर का यह व्यवहार एक आदर्श बड़े भाई का उदाहरण है, जो छोटे भाई के अहंकार को शांत करने का प्रयास करता है, न कि उसे और भड़काने का।
📜 श्लोक ११-१५ : रावण का क्रोध और लंका पर अधिकार
तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधाद्दूतवाक्यं न मृष्यते ।
स्वयमेवागतः शीघ्रं लङ्कामभिययौ बली ॥
कुबेरस्तु निरीक्ष्यैनं त्यक्त्वा लङ्कां गतः शिवाम् ।
कैलासं प्रति धर्मात्मा रावणाय ददौ पुरीम् ॥
🔹 पदच्छेद : तत् = वह; श्रुत्वा = सुनकर; रावणः = रावण; क्रोधात् = क्रोध से; दूतवाक्यम् = दूत के वचन; न मृष्यते = नहीं सहन करता; स्वयम् एव = स्वयं ही; आगतः = आया; शीघ्रम् = शीघ्र; लङ्काम् = लंका पर; अभिययौ = चढ़ाई कर दी; बली = बलवान; कुबेरः तु = कुबेर ने; निरीक्ष्य = देखकर; एनम् = इस (रावण) को; त्यक्त्वा = त्यागकर; लङ्काम् = लंका; गतः = चले गए; शिवाम् = कल्याणकारी; कैलासम् = कैलाश; प्रति = की ओर; धर्मात्मा = धर्मात्मा; रावणाय = रावण को; ददौ = दे दी; पुरीम् = पुरी (लंका)।
📖 भावार्थ : जब रावण ने दूत के मुख से कुबेर का उत्तर सुना, तो वह अत्यधिक क्रोधित हो गया। उसने कुबेर की बातों को अपना अपमान समझा और स्वयं ही विशाल सेना लेकर लंका पर आक्रमण कर दिया। उसके अहंकार ने उसे अंधा कर दिया था, वह यह नहीं समझ पा रहा था कि बलपूर्वक धर्म का उल्लंघन करना विनाशकारी हो सकता है। कुबेर ने जब रावण को आते देखा, तो उन्होंने युद्ध न करके धर्म का मार्ग अपनाया। वे लंका छोड़कर अपने निवास कैलाश पर्वत की ओर चले गए, और इस प्रकार लंका रावण के अधिकार में आ गई। कुबेर का यह त्याग उनकी महानता को दर्शाता है – उन्होंने संघर्ष से बचकर शांति को प्राथमिकता दी, यह जानते हुए कि रावण का अहंकार ही उसके पतन का कारण बनेगा। रावण की यह विजय उसके अहंकार को और बढ़ाती है, और वह तीनों लोकों में आतंक मचाने के लिए उद्धत हो जाता है। यह सर्ग रावण के अधर्मी कार्यों की शुरुआत का प्रतीक है, जो अंततः उसके विनाश की ओर ले जाता है।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

इस सर्ग में रावण और कुबेर के बीच भाईचारे का टूटना और रावण के अहंकार का उदय दिखाया गया है। कुबेर का धैर्य और धर्मपरायणता एक आदर्श शासक के गुण हैं, जबकि रावण का बलपूर्वक लंका पर अधिकार करना उसके अधर्मी स्वभाव को उजागर करता है। यह सर्ग यह शिक्षा देता है कि अहंकार और अन्याय अंततः विनाश का कारण बनते हैं, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकादशः सर्गः ॥
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