उत्तर काण्ड अध्याय 109

सीता का पृथ्वी में समा जाना

सीता के पृथ्वी में समाने का मार्मिक वर्णन। वे पृथ्वी माता से प्रार्थना करती हैं कि यदि वे पतिव्रता हैं तो उन्हें स्थान दें। पृथ्वी फटती है और सीता उसमें समा जाती हैं, सभी शोकमग्न हो जाते हैं।

विवरण

जब सीता ने राम के मुख से लोकापवाद की बात सुनी और वाल्मीकि के आश्वासन के बावजूद राम के मन में संशय देखा, तो उन्होंने अन्तिम सत्य प्रकट करने का निर्णय लिया। उन्होंने पृथ्वी माता का आवाहन किया और कहा कि यदि वे जीवनभर राम के प्रति पतिव्रता रहीं और उनके मन में कभी किसी अन्य पुरुष का विचार नहीं आया, तो पृथ्वी उन्हें अपने गर्भ में स्थान दे। यह कहते ही पृथ्वी फट गई, एक दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ और पृथ्वी देवी ने सीता को अपने पास बैठा लिया। सीता वहीं अन्तर्धान हो गईं। सारा दरबार स्तब्ध रह गया। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सभी ऋषि-मुनि शोकविह्वल हो गए। राम करुण विलाप करने लगे, किन्तु वाल्मीकि ने उन्हें धैर्य बँधाया और कहा कि सीता ने अपनी शुद्धता सिद्ध कर दी है, उनकी गति सिद्धि है। यह सर्ग सीता के पृथ्वी में समाने की घटना का साक्षात् वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०९

(सीता का पृथ्वी में समा जाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : जब राम पुनः सीता की शुद्धता पर संशय प्रकट करते हैं, तब सीता पृथ्वी माता से प्रार्थना करती हैं कि यदि वे सती हैं तो उन्हें अपने गर्भ में स्थान दें। पृथ्वी फटती है और सीता उसमें समा जाती हैं। सम्पूर्ण सभा शोक-विह्वल हो जाती है।

🙏 सीता का पृथ्वी माता को साक्षी मानना (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-७ ॥
ततः सीता महाभागा रामस्य वचनं श्रुत्वा।
बाष्पपूर्णेक्षणा दीना कृताञ्जलिरुपस्थिता॥
उवाच चेदं धर्मज्ञा सत्यव्रतपरायणा।
यदि मे पातिव्रत्यं च रामे भक्तिश्च केवला॥
तदा मां धारयेद्देवी पृथिवी माता मम।
इत्युक्त्वा प्रययौ स्थानं पृथिव्याः सत्यवादिनी॥
ततः प्रभा समुत्पन्ना दिव्या रत्नमयी शुभा।
सिंहासनं महार्हं तु धारितं पन्नगैः शुभैः॥
तस्मिन्स्थिता महाभागा सीता भूमितलाच्युता।
उवाच चेदं रामाय शृणु राजीवलोचन॥
नाहं त्यक्ता त्वया राजन् स्वयमेव गतिं गता।
जन्म मे धारयेद्देवी पृथिवी माता मम॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सीता = सीता; महाभागा = महाभागा; रामस्य = राम के; वचनम् = वचन; श्रुत्वा = सुनकर; बाष्पपूर्णेक्षणा = अश्रुपूरित नेत्रों वाली; दीना = दीन; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़े; उपस्थिता = उपस्थित हुई; उवाच = बोली; च = और; इदम् = यह; धर्मज्ञा = धर्मज्ञा; सत्यव्रतपरायणा = सत्यव्रतपरायणा; यदि = यदि; मे = मेरा; पातिव्रत्यम् = पातिव्रत्य; च = और; रामे = राम में; भक्तिः = भक्ति; च = और; केवला = केवल; तदा = तो; माम् = मुझे; धारयेत् = धारण करें; देवी = देवी; पृथिवी = पृथ्वी; माता = माता; मम = मेरी; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; प्रययौ = गई; स्थानम् = स्थान पर; पृथिव्याः = पृथ्वी के; सत्यवादिनी = सत्यवादिनी; ततः = तब; प्रभा = ज्योति; समुत्पन्ना = प्रकट हुई; दिव्या = दिव्य; रत्नमयी = रत्नमय; शुभा = शुभ; सिंहासनम् = सिंहासन; महार्हम् = महामूल्य; तु = तो; धारितम् = धारण किया हुआ; पन्नगैः = नागों द्वारा; शुभैः = शुभ; तस्मिन् = उस पर; स्थिता = स्थित; महाभागा = महाभागा; सीता = सीता; भूमितलात् = भूमितल से; अच्युता = अलग; उवाच = बोली; च = और; इदम् = यह; रामाय = राम से; शृणु = सुनो; राजीवलोचन = राजीवलोचन; न = नहीं; अहम् = मैं; त्यक्ता = त्यागी गई; त्वया = तुम्हारे द्वारा; राजन् = हे राजन्; स्वयम् = स्वयं; एव = ही; गतिम् = गति को; गता = प्राप्त हुई; जन्म = जन्म; मे = मेरा; धारयेत् = धारण करें; देवी = देवी; पृथिवी = पृथ्वी; माता = माता; मम = मेरी।
📖 भावार्थ : तब महाभागा सीता ने राम के वचन सुनकर, अश्रुपूरित नेत्रों से, दीन होकर हाथ जोड़े और बोलीं: "यदि मैं राम के प्रति पतिव्रता हूँ और मेरी भक्ति केवल राम में है, तो मेरी माता पृथ्वी देवी मुझे धारण करें।" ऐसा कहकर सत्यवादिनी सीता पृथ्वी के एक स्थान पर गईं। तब वहाँ से एक दिव्य, रत्नमय, शुभ ज्योति प्रकट हुई। एक महामूल्यवान सिंहासन, जिसे शुभ नागों ने धारण किया था, प्रकट हुआ। उस पर स्थित होकर महाभागा सीता, जो अब भूमितल से अलग हो चुकी थीं, राम से बोलीं: "हे राजीवलोचन! सुनो। मैं तुम्हारे द्वारा त्यागी नहीं जा रही, बल्कि स्वयं ही अपनी गति को प्राप्त हो रही हूँ। मेरी माता पृथ्वी देवी मुझे जन्म देने वाली हैं, इसलिए वे मुझे धारण कर रही हैं।"
॥ श्लोक ८-१२ ॥
राम त्वं च महाबाहो राजधर्मे व्यवस्थितः।
लोकापवादभीतेन त्यक्ता चाहं त्वया पुरा॥
इदानीं पुनरेवं त्वं लोकवादभयाकुलः।
मां न ग्रहीतुमिच्छसि त्वद्भक्तां पतिव्रताम्॥
तस्मादहं गमिष्यामि यत्र मे मातृमन्दिरम्।
पृथिव्यां सुखमास्स्व त्वं पुत्राभ्यां सह राघव॥
इत्युक्त्वा सा विवेशोर्वीं सीता पद्मदलेक्षणा।
तामन्तर्धिं गतां दृष्ट्वा रामः शोकपरिप्लुतः॥
📖 भावार्थ : "हे महाबाहो राम! तुम राजधर्म में स्थित हो। लोकापवाद के भय से तुमने पहले मुझे त्याग दिया था। अब भी उसी लोकवाद के भय से तुम मुझे, जो तुम्हारी भक्त और पतिव्रता हूँ, स्वीकार नहीं करना चाहते। इसलिए मैं अब अपनी माता के घर (पृथ्वी) में जा रही हूँ। हे राघव! तुम पुत्रों के साथ पृथ्वी पर सुखपूर्वक रहो।" ऐसा कहकर कमलनयनी सीता पृथ्वी में समा गईं। उन्हें अन्तर्धान होते देख राम शोक से व्याकुल हो गए।

😭 सभा में शोक और विस्मय (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
तामन्तर्धिं गतां दृष्ट्वा सीतां पद्मदलेक्षणाम्।
रुरोद दुःखसंतप्तो हा सीतेति वदन्मुहुः॥
लक्ष्मणश्च भरतश्च शत्रुघ्नश्च महाबलः।
हा मातर्हा कथं त्यक्ता सीतेति करुणं वदन्॥
सर्वे ते मुनयो राज्ञो देवाः सर्षिगणास्तथा।
विस्मयं परमं जग्मुः शोकं च जनमेजय॥
ततो वाल्मीकिरागम्य रामं शोकपरिप्लुतम्।
उवाच परमोदारो धैर्यमालम्ब्य राघव॥
मा शुचः पुरुषव्याघ्र सीता परमसिद्धिगा।
धर्मेण विधिना चैव त्वया त्यक्ता न संशयः॥
इयं गता परां सिद्धिं धर्मेणैव न संशयः।
तस्मात्त्वं धैर्यमालम्ब्य पालयस्व महीमिमाम्॥
📖 भावार्थ : कमलनयनी सीता को अन्तर्धान होते देख राम दुःख से संतप्त होकर बार-बार "हा सीते!" कहकर रोने लगे। लक्ष्मण, भरत और महाबली शत्रुघ्न भी "हा मातः! सीता कैसे त्याग दी गई?" कहकर करुण विलाप करने लगे। वहाँ उपस्थित सभी मुनि, राजा, देवता और ऋषिगण अत्यन्त विस्मित हुए और शोक से भर गए। तब परमोदार वाल्मीकि आए और शोकाकुल राम से धैर्य धारण करते हुए बोले: "हे पुरुषव्याघ्र! शोक मत करो। सीता परम सिद्धि को प्राप्त हुई हैं। उन्होंने धर्म और विधि से ही त्याग किया, इसमें कोई संशय नहीं। वे परम सिद्धि को प्राप्त हुई हैं, निःसंदेह धर्म के मार्ग से। अतः तुम धैर्य धारण करो और इस पृथ्वी का पालन करो।"
॥ श्लोक १९-२५ ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम्।
भगवन् ज्ञायतां सर्वं यथावृत्तं यथाक्रमम्॥
कथं मे सीतया त्यागः कथं च धरणीगता।
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेन मुनिसत्तम॥
वाल्मीकिः प्राह रामं तु शृणु राजीवलोचन।
सीता तु तव धर्मेण पतिव्रता पतिव्रता॥
लोकापवादभीतेन त्यक्ता त्वं यदि वा न वा।
सेयं सत्येन धर्मेण गता सिद्धिं न संशयः॥
तस्मात्त्वं धैर्यमालम्ब्य राजधर्मे व्यवस्थितः।
पालयस्व प्रजाः सर्वा धर्मेण सह बान्धवैः॥
इत्युक्त्वा स मुनिः सर्वान् समाश्वास्य सभासदः।
ययौ स्वमाश्रमं पुण्यं ध्यानयोगपरायणः॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा राम ने वाल्मीकि से कहा: "हे भगवन्! आप सब कुछ जानते हैं, यथावृत्त और यथाक्रम। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरे द्वारा सीता का त्याग कैसे हुआ और वे पृथ्वी में कैसे समाईं? हे मुनिसत्तम! मैं तत्त्व से यह जानना चाहता हूँ।" वाल्मीकि ने कहा: "हे राजीवलोचन! सुनो। सीता तुम्हारी धर्मपत्नी, पतिव्रता थीं। लोकापवाद के भय से तुमने उनका त्याग किया या नहीं, यह तो तुम जानो। किन्तु वे सत्य और धर्म के द्वारा सिद्धि को प्राप्त हुई हैं, इसमें संशय नहीं। अतः तुम धैर्य धारण करो, राजधर्म में स्थित रहो और अपने बन्धुओं के साथ धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करो।" ऐसा कहकर मुनि ने सभा के सभी सदस्यों को सान्त्वना दी और ध्यानयोग में लीन होकर अपने पुण्य आश्रम को लौट गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌏 पृथ्वी का गर्भ – मातृत्व और शुद्धता का प्रतीक

सीता का पृथ्वी में समाना यह संकेत करता है कि सत्य और शुद्धता अन्ततः अपने मूल स्रोत में विलीन हो जाती है। पृथ्वी उनकी माता है, और वे उसी की गोद में लौट जाती हैं। यह घटना यह भी दर्शाती है कि स्त्री की शुद्धता की अन्तिम परीक्षा भी उसे संतोष नहीं दे सकी, क्योंकि लोक की दृष्टि में वह सदा संशयग्रस्त रहेगी।

⚡ राम का शोक और असहायता

राम, जो स्वयं भगवान थे, यहाँ अत्यन्त मानवीय भावनाओं से ग्रस्त हैं। वे सीता के वियोग में रोते हैं, किन्तु राजधर्म के कारण कुछ नहीं कर सकते। यह राम के चरित्र की गहनता को दर्शाता है – वे धर्म के प्रति इतने समर्पित हैं कि व्यक्तिगत सुखों का बलिदान कर देते हैं, फिर चाहे वह कितना ही पीड़ादायक हो।

🧘 वाल्मीकि की सान्त्वना

वाल्मीकि यहाँ धैर्य और ज्ञान के प्रतीक हैं। वे राम को सान्त्वना देते हुए भी उनके राजधर्म की याद दिलाते हैं। वे सीता की सिद्धि को स्वीकार करते हैं, किन्तु राम को पुनः कर्तव्यपथ पर लौटने की प्रेरणा देते हैं।

📖 सीता का आत्म-बलिदान

सीता ने स्वेच्छा से पृथ्वी में समाने का मार्ग चुना। यह उनके आत्मसम्मान और सत्य के प्रति अडिग निष्ठा का प्रतीक है। वे बार-बार परीक्षा देने से इन्कार करती हैं और अन्तिम प्रमाण देकर ही शान्त होती हैं। यह स्त्री-शक्ति का अद्भुत उदाहरण है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य की अन्ततः विजय होती है, चाहे उसे सिद्ध करने के लिए कितने ही बड़े बलिदान क्यों न करने पड़ें। सीता का पृथ्वी में समाना यह सिद्ध करता है कि आत्मसम्मान और सत्य के मार्ग पर चलने वाला कभी पराजित नहीं होता।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे नवाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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