उत्तर काण्ड अध्याय 108

वाल्मीकि द्वारा सीता को राम के सामने लाना

वाल्मीकि ऋषि सीता और लव-कुश को लेकर राम के दरबार में आते हैं। वे सीता की शुद्धता की घोषणा करते हैं और राम से उन्हें स्वीकार करने का आग्रह करते हैं। सीता का पुनर्मिलन होता है, परन्तु संशय के बादल अभी शेष हैं।

विवरण

वाल्मीकि ऋषि अपने वचन के अनुसार अगले दिन सीता और लव-कुश के साथ अयोध्या नरेश राम के दरबार में पधारते हैं। उनके आगमन से सभी राजा और ऋषि-मुनि अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। वाल्मीकि सीता की शुद्धता का प्रमाण देते हुए राम से कहते हैं कि सीता सर्वथा निर्दोष हैं, उन्होंने जीवनभर तपस्या की है और पुत्रों का पालन किया है। वे राम से अनुरोध करते हैं कि वे सीता को पुनः अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें। राम सीता को देखकर भावुक हो जाते हैं, किन्तु लोकापवाद का भय अभी भी उनके मन में बना हुआ है। वे सीता से कहते हैं कि वे सदा शुद्ध थीं, किन्तु राजधर्म के कारण उन्हें यह परीक्षा देनी पड़ी। सीता राम के इस व्यवहार से क्षुब्ध होती हैं और अन्तिम प्रमाण देने का निश्चय करती हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०८

(वाल्मीकि द्वारा सीता को राम के सामने लाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : वाल्मीकि ऋषि सीता और लव-कुश को साथ लेकर राम के दरबार में आते हैं। वे सीता की शुद्धता प्रमाणित करते हैं, किन्तु राम के मन में अब भी लोकापवाद का भय है। यह सर्ग अन्तिम मिलन और उसके परिणाम का सूत्रपात करता है।

🌟 वाल्मीकि का आगमन और स्वागत (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-८ ॥
ततः प्रभाते विमले वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः।
सीतया सह पुत्राभ्यां ययौ रामस्य सन्निधिम्॥
तमापतन्तं मुनिवर्यमासाद्य रामः सलक्ष्मणः समभिपूज्य।
उवाच वाक्यं मधुरं सुस्निग्धं स्वागतं ते महर्षेऽद्य कुशलं चिरात्॥
वाल्मीकिः प्राह राजेन्द्र राम सत्यपराक्रम।
इयं ते महिषी सीता पुत्रौ च तव लवकुशौ॥
मया पालितौ धर्मेण तपसा भावितौ चिरम्।
शुद्धेयं धर्मपत्नी ते निर्मला च पतिव्रता॥
रामः श्रुत्वा तु तद्वाक्यं ननन्द प्रीतमानसः।
उत्थाय चासनात्तूर्णं परिष्वज्य च तौ सुतौ॥
सीतां च ददृशे दीनां तापसीवेषधारिणीम्।
अश्रुपूर्णेक्षणो भूत्वा कृच्छ्रात्संज्ञामवाप्तवान्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रभात में; विमले = निर्मल; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; मुनिपुङ्गवः = मुनिश्रेष्ठ; सीतया = सीता के साथ; सह = सहित; पुत्राभ्याम् = पुत्रों के साथ; ययौ = गए; रामस्य = राम के; सन्निधिम् = समीप; तम् = उन; आपतन्तम् = आते हुए; मुनिवर्यम् = मुनिवर को; आसाद्य = पाकर; रामः = राम; सलक्ष्मणः = लक्ष्मण सहित; समभिपूज्य = पूजन करके; उवाच = बोले; वाक्यम् = वचन; मधुरम् = मधुर; सुस्निग्धम् = अत्यन्त स्नेहपूर्ण; स्वागतम् = स्वागत; ते = आपका; महर्षे = महर्षे; अद्य = आज; कुशलम् = कुशल; चिरात् = बहुत दिनों बाद; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; प्राह = बोले; राजेन्द्र = राजेन्द्र; राम = हे राम; सत्यपराक्रम = सत्यपराक्रमी; इयम् = यह; ते = आपकी; महिषी = महिषी; सीता = सीता; पुत्रौ = पुत्र; च = और; तव = आपके; लवकुशौ = लव-कुश; मया = मेरे द्वारा; पालितौ = पालित; धर्मेण = धर्मपूर्वक; तपसा = तपस्या से; भावितौ = भावित; चिरम् = चिरकाल; शुद्धा = शुद्ध; इयम् = यह; धर्मपत्नी = धर्मपत्नी; ते = आपकी; निर्मला = निर्मल; च = और; पतिव्रता = पतिव्रता; रामः = राम; श्रुत्वा = सुनकर; तु = तो; तद्वाक्यम् = उस वचन को; ननन्द = आनन्दित हुए; प्रीतमानसः = प्रीतमना; उत्थाय = उठकर; च = और; आसनात् = आसन से; तूर्णम् = शीघ्र; परिष्वज्य = गले लगाकर; च = और; तौ = उन; सुतौ = पुत्रों को; सीताम् = सीता को; च = और; ददृशे = देखा; दीनाम् = दीन; तापसीवेषधारिणीम् = तपस्विनी वेश धारण किए हुए; अश्रुपूर्णेक्षणः = अश्रुपूरित नेत्र वाले; भूत्वा = होकर; कृच्छ्रात् = कठिनाई से; संज्ञाम् = होश; अवाप्तवान् = प्राप्त किया।
📖 भावार्थ : अगले दिन प्रभातकाल में मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि सीता और उनके पुत्रों के साथ राम के दरबार में आए। उन्हें आते देख राम और लक्ष्मण ने उनका पूजन किया और मधुर वाणी में कहा: "महर्षे! आपका स्वागत है। बहुत दिनों बाद आपके दर्शन हुए, कुशल तो है?" वाल्मीकि ने कहा: "हे राजेन्द्र! हे सत्यपराक्रमी राम! यह आपकी महिषी सीता हैं और ये आपके पुत्र लव-कुश हैं। इन्हें मैंने धर्मपूर्वक पाला है, तपस्या से इनका लालन-पालन किया है। यह आपकी धर्मपत्नी शुद्ध, निर्मल और पतिव्रता हैं।" राम ने यह सुना तो उनका मन आनन्दित हुआ। वे शीघ्र ही आसन से उठे और पुत्रों को गले लगा लिया। फिर सीता को देखा, जो तपस्विनी वेश में दीन खड़ी थीं। उनकी आँखें अश्रुपूरित हो गईं, और कठिनाई से उन्हें होश आया।
॥ श्लोक ९-१५ ॥
ततः सभ्याः समुत्थाय मुनिं तं पर्यपूजयन्।
ऋषयो राजानश्चैव सीतां चैव यशस्विनीम्॥
वाल्मीकिः पुनरेवेदं रामं वचनमब्रवीत्।
त्वया त्यक्ता तु या देवी लोकापवादशङ्कया॥
सेयं शुद्धा महाभागा तपसा द्योतितप्रभा।
प्रतिगृहाण धर्मेण पत्नीं त्वं रघुनन्दन॥
न ह्यस्याः सदृशी काचित्पृथिव्यां पतिव्रता।
एनां प्रत्यक्षतः कृत्वा लोकाः सत्यं वदन्तु वै॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम्।
जानामि सीतां शुद्धां च निर्मलां च पतिव्रताम्॥
तथापि लोकवादो मे भयं जनयते महत्।
राजधर्मः सदा रक्ष्यो लोकापवादभीरुणा॥
📖 भावार्थ : तब सभा में उपस्थित सभी ऋषि और राजा उठ खड़े हुए और उन्होंने वाल्मीकि तथा यशस्विनी सीता का पूजन किया। वाल्मीकि ने पुनः राम से कहा: "हे रघुनन्दन! जिस देवी को आपने लोकापवाद के भय से त्याग दिया था, वे यही हैं, शुद्ध और महाभागा, जिनकी प्रभा तपस्या से देदीप्यमान है। अब धर्मपूर्वक इन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लीजिए। पृथ्वी पर इनके समान पतिव्रता अन्य कोई नहीं है। इनके सामने साक्षात् करके सभी लोग सत्य ही कहें।" राम ने कहा: "हे मुनिपुङ्गव! मैं जानता हूँ कि सीता शुद्ध, निर्मल और पतिव्रता हैं। फिर भी लोकवाद मुझमें बड़ा भय उत्पन्न करता है। राजधर्म की सदा रक्षा करनी चाहिए, विशेषकर उस राजा को जो लोकापवाद से डरता है।"

😢 सीता का क्षोभ और अन्तिम निर्णय (श्लोक १६-३०)

॥ श्लोक १६-२२ ॥
सीता श्रुत्वा तु रामस्य वचनं लोकशङ्कितम्।
दुःखेन महताविष्टा बाष्पपूर्णेक्षणाऽभवत्॥
उवाच चेदं धर्मज्ञा वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम्।
भगवन् श्रोतुमिच्छामि धर्मं सत्यं सनातनम्॥
यदि मे धर्मपत्नीत्वं रामस्य सत्यवादिनः।
सत्येनैव प्रमाणेन लोके ख्यातिं गमिष्यति॥
ततः सीता कृताञ्जलिः प्रोवाचेदं महीपतीन्।
यदि मे पातिव्रत्यं च रामे भक्तिश्च केवला॥
तदा मां धारयेद्देवी पृथिवी माता मम।
एवमुक्त्वा नरव्याघ्रान् सीता पद्मदलेक्षणा॥
प्राञ्जलिः प्रययौ स्थानं पृथिव्याः सत्यवादिनी।
ततः प्रभा समुत्पन्ना दिव्या रत्नमयी शुभा॥
📖 भावार्थ : सीता ने राम के उन वचनों को सुना, जो लोक के संशय से भरे थे। वे अत्यन्त दुःख से व्याकुल हो गईं, उनके नेत्रों में आँसू भर आए। तब धर्मज्ञा सीता ने मुनिपुङ्गव वाल्मीकि से कहा: "हे भगवन्! मैं सनातन धर्म और सत्य को सुनना चाहती हूँ। यदि मेरा धर्मपत्नीत्व सत्यवादी राम के लिए है, तो सत्य ही मेरे प्रमाण के रूप में लोक में ख्याति पाए।" फिर सीता ने हाथ जोड़कर सभी राजाओं से कहा: "यदि मेरा राम में पातिव्रत्य और केवल भक्ति सत्य है, तो मेरी माता पृथ्वी देवी मुझे धारण करें।" ऐसा कहकर कमलनयनी सीता, जो सत्यवादिनी थीं, ने पृथ्वी के एक स्थान की ओर प्रस्थान किया। तब वहाँ से एक दिव्य, रत्नमयी, शुभ ज्योति प्रकट हुई।
॥ श्लोक २३-३० ॥
सिंहासनं महार्हं तु धारितं पन्नगैः शुभैः।
तस्मिन्स्थिता महाभागा सीता भूमितलाच्युता॥
उवाच चेदं रामाय शृणु राजीवलोचन।
नाहं त्यक्ता त्वया राजन् स्वयमेव गतिं गता॥
जन्म मे धारयेद्देवी पृथिवी माता मम।
राम त्वं च महाबाहो राजधर्मे व्यवस्थितः॥
इत्युक्त्वा सा विवेशोर्वीं सीता पद्मदलेक्षणा।
तामन्तर्धिं गतां दृष्ट्वा रामः शोकपरिप्लुतः॥
रुरोद दुःखसंतप्तो हा सीतेति वदन्मुहुः।
लक्ष्मणश्च भरतश्च शत्रुघ्नश्च महाबलः॥
हा मातर्हा कथं त्यक्ता सीतेति करुणं वदन्।
वाल्मीकिः प्राह रामं तु मा शुचः पुरुषर्षभ॥
इयं गता परां सिद्धिं धर्मेणैव न संशयः॥
📖 भावार्थ : वहाँ एक उत्तम सिंहासन प्रकट हुआ, जिसे शुभ नागों ने धारण किया था। उस पर स्थित होकर महाभागा सीता, जो पृथ्वीतल से अलग हो गई थीं, राम से बोलीं: "हे राजीवलोचन! सुनो। मैंने तुम्हारे द्वारा त्यागी नहीं जा रही, बल्कि स्वयं ही अपनी गति को प्राप्त हो रही हूँ। मेरी माता पृथ्वी देवी मुझे धारण कर रही हैं। हे महाबाहो राम! तुम राजधर्म में स्थित रहो।" ऐसा कहकर कमलनयनी सीता पृथ्वी में समा गईं। उन्हें इस प्रकार अन्तर्धान होते देख राम शोक से व्याकुल हो गए। वे दुःख से संतप्त होकर बार-बार "हा सीते!" कहकर रोने लगे। लक्ष्मण, भरत और महाबली शत्रुघ्न भी "हा मातः! सीता कैसे त्याग दी गई?" कहकर करुण विलाप करने लगे। तब वाल्मीकि ने राम से कहा: "हे पुरुषर्षभ! शोक मत करो। ये परम सिद्धि को प्राप्त हुई हैं, धर्म के मार्ग से ही, इसमें कोई संशय नहीं।"

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌍 सीता का पृथ्वी में समाना

सीता का पृथ्वी में समाना यह प्रतीक है कि सत्य और शुद्धता की कोई सीमा नहीं होती। वे धरती की पुत्री थीं, और जब उनकी शुद्धता पर पुनः संशय किया गया, तो वे अपने मूल में लीन हो गईं। यह घटना रामायण की सर्वाधिक मार्मिक एवं दुःखद घटनाओं में से एक है।

⚖️ राजधर्म की पीड़ा

राम को यहाँ राजधर्म का पालन करते हुए भी असीम वैयक्तिक पीड़ा झेलनी पड़ती है। वे जानते हैं कि सीता शुद्ध हैं, फिर भी लोकापवाद के भय से उन्हें सीता को स्वीकार करने में संकोच होता है। यह एक आदर्श राजा की विडम्बना है कि उसे अपनी प्रजा की राय का सम्मान करते हुए निजी सुखों का त्याग करना पड़ता है।

🙏 सीता का आत्मसम्मान

सीता का पृथ्वी में समाने का निर्णय उनके आत्मसम्मान और स्वाभिमान को दर्शाता है। वे बार-बार अग्नि परीक्षा और निर्वासन के बाद भी जब पुनः संशय का सामना करती हैं, तो वे स्वयं को सिद्ध करने के लिए अन्तिम प्रमाण देती हैं। उनका यह कदम स्त्री-शक्ति और आत्म-सम्मान का प्रतीक है।

📜 वाल्मीकि की भूमिका

वाल्मीकि इस पूरे प्रकरण में धर्म के साक्षात् प्रतिनिधि हैं। वे सीता की शुद्धता की घोषणा करते हैं, फिर भी राम के राजधर्म के समक्ष उनका कहना अप्रभावी रहता है। यह दर्शाता है कि कभी-कभी धर्म के मार्गदर्शक भी लोकव्यवहार के समक्ष असहाय हो जाते हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सत्य और शुद्धता का अन्ततः विजय होता है, चाहे वह कितनी भी कठिन परिस्थितियों में क्यों न हो। सीता का पृथ्वी में समाना यह सिद्ध करता है कि आत्मसम्मान और धर्म की रक्षा के लिए किसी भी बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे अष्टाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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