राम द्वारा सीता को बुलाने का आदेश
लव-कुश के गायन और सुमन्त्र के समाचार के बाद राम सीता को बुलाने का आदेश देते हैं। वे वाल्मीकि आश्रम से सीता को लाने के लिए दूत भेजते हैं, किन्तु सीता की शुद्धता को लेकर मन में संशय और पश्चाताप भी उठता है।
विवरण
सुमन्त्र के द्वारा सीता और लव-कुश के वाल्मीकि आश्रम में निवास की सूचना पाकर राम अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं। वे सीता के प्रति अपने प्रेम और उनके परित्याग के कारण उत्पन्न पश्चाताप से ग्रस्त हो जाते हैं। राजधर्म और निजी भावनाओं के द्वन्द्व में वे सीता को बुलाने का आदेश तो देते हैं, लेकिन उनकी शुद्धता को लेकर लोकापवाद का भय भी सताता है। वे वाल्मीकि ऋषि के पास दूत भेजकर सीता को ससम्मान अयोध्या लाने का निवेदन करते हैं। साथ ही, वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सीता के पुनः आगमन पर लोक उन्हें स्वीकार करे। यह सर्ग राम के मानसिक द्वन्द्व, राजधर्म के प्रति उनकी निष्ठा और सीता के प्रति अटूट प्रेम का मार्मिक चित्रण करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०७
(राम द्वारा सीता को बुलाने का आदेश)
🔆 प्रस्तावना : लव-कुश के रामायण गायन और सुमन्त्र के समाचार के बाद राम को ज्ञात होता है कि सीता वाल्मीकि आश्रम में पुत्रों सहित रह रही हैं। वे सीता को बुलाने का आदेश देते हैं, किन्तु उनके मन में राजधर्म और लोकापवाद का भय भी सताता है।
📰 सुमन्त्र का समाचार और राम की प्रतिक्रिया (श्लोक १-१२)
प्रणम्य शिरसा भूमौ न्यवेदयत तत्त्वतः॥
यथा दृष्टा मया देवी सीता पद्मदलेक्षणा।
वाल्मीकेराश्रमे पुण्ये तापसीवेषधारिणी॥
तया सह कुमारौ तौ लवकुशौ महाबलौ।
वाल्मीकिना महात्मना पालितौ धर्मचारिणा॥
सा च मां प्राह राजेन्द्र पुत्रौ मे लवकुशौ स्मृतौ।
रामस्योरसि जातौ तौ वाल्मीकेः पालितौ सदा॥
एतच्छ्रुत्वा तु रामस्य हृदयं समकम्पत।
अश्रुपूर्णेक्षणो भूत्वा लक्ष्मणं प्रत्यभाषत॥
हा सीते विनते नित्यं धर्मज्ञे सत्यवादिनि।
त्वया हीनं जगत्सर्वं शून्यं पश्यामि लक्ष्मण॥
धिक् च मे राज्यमैश्वर्यं धिक् च मे जीवितं सुखम्॥
यस्याः कृते मया त्यक्ता धर्मलोकभयान्नृप।
सैवाद्य वर्तते दूरे कथं शान्तिर्भवेन्मम॥
लक्ष्मणः प्राह धर्मात्मन् राजधर्ममनुस्मर।
लोकापवादभीतेन त्यक्ता सा धर्मतः किल॥
इदानीं श्रूयते देवी पुत्राभ्यां सह संस्थिता।
तामानय महाबाहो यदि त्वं कर्तुमिच्छसि॥
रामः प्राह महातेजा लक्ष्मणं प्रियदर्शनम्।
सत्यं वदसि धर्मज्ञ राजधर्ममनुस्मरन्॥
तथापि मे मनो दीनं सीतां विना सुदुःखितम्।
गच्छ लक्ष्मण तूर्णं त्वं वाल्मीकेराश्रमं प्रति॥
आनय त्वरितां सीतां समेतां पुत्रपौत्रकैः।
पूजयित्वा यथान्यायं मुनिं तं प्रणिपत्य च॥
⚖️ राम का मानसिक द्वन्द्व और आदेश (श्लोक १३-२६)
किमहं प्रष्टुमर्हामि वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम्॥
कथं सीता परित्यक्ता पुनरानीयतामिति।
लोकापवादभीतेन कृतं कर्म सुदुष्करम्॥
रामः प्राह महाबाहो वाल्मीकिर्मुनिसत्तमः।
सर्वज्ञः सर्वधर्मज्ञः सत्यवादी जितेन्द्रियः॥
स एव जानते सर्वं यथावृत्तं यथाक्रमम्।
तस्मै निवेद्य धर्मात्मा सीतां देहि ममान्तिके॥
लक्ष्मणस्तु तथेत्युक्त्वा प्रययौ त्वरितस्तदा।
वाल्मीकेराश्रमं पुण्यं गङ्गाकूले मनोहरे॥
तत्रापश्यन्मुनिवरं वाल्मीकिं जितमन्यवम्।
उपास्यमानं मुनिभिः शिष्यैश्च विनयान्वितैः॥
स दृष्ट्वा लक्ष्मणं प्राप्तं प्रत्युत्थायाभ्यपूजयत्।
अर्घ्यपाद्यैः फलैश्चैव कुशलं चाप्रुणोत्प्रियम्॥
उवाच रामवचनं यथावदनुपूर्वशः॥
भगवन् राघवः श्रीमान् सीतां पुत्रैः समन्विताम्।
आनेतुमिच्छते तूर्णं त्वत्प्रसादात्सुमध्यमाम्॥
वाल्मीकिः प्राह धर्मात्मा श्रुत्वा तद्वचनं तदा।
साधु साधु महाबाहो गच्छ त्वं येन राघवः॥
अहमप्यागमिष्यामि श्वोभूते रामसन्निधिम्।
सीतया सह पुत्राभ्यां यदि रामो दिदृक्षते॥
लक्ष्मणः प्रतिपूज्यैव मुनिं तं प्रत्युपागमत्।
रामाय सर्वमाख्यातं यथावृत्तं यथाक्रमम्॥
रामः प्रीतमनाः श्रुत्वा प्रभाते कृतकृत्यवत्।
प्रतीक्षांचक्रे मुनिवरं सीतया सह पुत्रकैः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
💔 राजधर्म और व्यक्तिगत प्रेम का द्वन्द्व
राम के सामने सबसे बड़ा द्वन्द्व यह है कि एक ओर वे एक आदर्श राजा हैं, जिन्हें लोकापवाद का ध्यान रखना है, तो दूसरी ओर वे सीता के पति हैं, जो उनसे अलग होने की वेदना सह रहे हैं। यह सर्ग उस द्वन्द्व को बड़ी मार्मिकता से चित्रित करता है। राम का सीता को बुलाने का आदेश इस बात का प्रतीक है कि धर्म के प्रति निष्ठा रखते हुए भी मानवीय भावनाएँ दब नहीं पातीं।
🕊️ वाल्मीकि की मध्यस्थता
वाल्मीकि का यहाँ मध्यस्थ के रूप में आना दर्शाता है कि ऋषि समाज में धर्म और न्याय के प्रतीक होते हैं। राम उनके निर्णय को अन्तिम मानते हैं। यह राजा और ऋषि के आदर्श सम्बन्ध को भी दर्शाता है – राजा ऋषियों के मार्गदर्शन में ही धर्म का पालन करता है।
👨👩👦👦 पितृत्व का उदय
राम ने लव-कुश को देखा तो उनमें पितृत्व का भाव उमड़ा। यद्यपि उन्होंने पुत्रों को पाला नहीं था, फिर भी उनके रूप और गुणों ने राम के हृदय को स्पर्श कर लिया। यह प्राकृतिक पितृत्व का अद्भुत उदाहरण है।
🌊 लोकापवाद का भय
राम बार-बार लोकापवाद का उल्लेख करते हैं। यह दर्शाता है कि एक राजा के लिए लोकमत कितना महत्त्वपूर्ण होता है। राम सदैव लोकमत के अनुसार चलना चाहते हैं, चाहे व्यक्तिगत रूप से उन्हें कितनी ही पीड़ा क्यों न हो।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कठोर से कठोर निर्णय लेने के बाद भी मानवीय भावनाएँ जीवित रहती हैं। सच्चा धर्म वही है जो व्यक्तिगत सुख-दुःख से ऊपर उठकर लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त करे, किन्तु पारिवारिक बन्धनों की उपेक्षा न करे।