उत्तर काण्ड अध्याय 106

लव-कुश द्वारा रामायण का गायन

राम के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर लव और कुश वाल्मीकि रचित रामायण का गायन करते हैं। राम मंत्रमुग्ध होकर अपनी कथा सुनते हैं और कुशल किशोरों को पहचानने का प्रयास करते हैं।

विवरण

अश्वमेध यज्ञ के दौरान राम के दरबार में अनेक ऋषि-मुनि और राजा एकत्र होते हैं। वाल्मीकि आश्रम के दो किशोर लव और कुश, जो सीता के पुत्र हैं, सुन्दर स्वर में वाल्मीकि रचित रामायण का गायन प्रारम्भ करते हैं। वे राम के जीवन की घटनाओं का वर्णन करते हैं – बाल्यकाल, विश्वामित्र यज्ञ रक्षा, सीता स्वयंवर, वनवास, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, वानर सेना, रावण वध, और अयोध्या वापसी। राम अपनी ही कथा सुनकर अत्यन्त विस्मित और भावुक हो जाते हैं। वे इन दो युवकों की कला और ज्ञान से प्रभावित होते हैं, परन्तु उन्हें यह नहीं पता होता कि ये उनके अपने पुत्र हैं। सभी श्रोता मन्त्रमुग्ध होकर इस गायन को सुनते हैं। यह सर्ग रामायण के अन्तिम भाग का एक मार्मिक प्रसंग है, जहाँ राम अपने पुत्रों से अनजाने में अपनी ही कथा सुनते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०६

(लव-कुश द्वारा रामायण का गायन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षष्ठाधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर वाल्मीकि आश्रम के दो किशोर – लव और कुश – दरबार में आते हैं और मधुर कण्ठ से रामायण का गायन करते हैं। राम मोहित होकर अपनी ही कथा सुनते हैं, पर उन्हें यह नहीं पता कि ये गायक उनके पुत्र हैं।

🐴 अश्वमेध यज्ञ का आयोजन (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो रामो महातेजा यज्ञाय कृतनिश्चयः।
आहूय सुहृदः सर्वान् ऋषींश्च वेदपारगान्॥
अश्वमेधस्य यज्ञस्य दीक्षां स्वीकृत्य धर्मवित्।
विधिवत्समभारम्भं चकार स महामतिः॥
तस्मिन्यज्ञे समेतास्तु राजानो ब्राह्मणैः सह।
द्रष्टुकामा महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम्॥
ऋषयो देवताश्चैव गन्धर्वाप्सरसां गणाः।
समाजग्मुर्मुदा युक्ता रामस्य यज्ञमुत्तमम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; यज्ञाय = यज्ञ के लिए; कृतनिश्चयः = दृढ़ निश्चय करके; आहूय = बुलाकर; सुहृदः = मित्रों को; सर्वान् = सभी; ऋषीन् = ऋषियों को; च = और; वेदपारगान् = वेद पारंगत; अश्वमेधस्य = अश्वमेध; यज्ञस्य = यज्ञ की; दीक्षाम् = दीक्षा; स्वीकृत्य = ग्रहण कर; धर्मवित् = धर्मज्ञ; विधिवत् = विधिपूर्वक; समभारम्भम् = आरम्भ; चकार = किया; सः = उन्होंने; महामतिः = महामति; तस्मिन् = उस; यज्ञे = यज्ञ में; समेताः = एकत्र हुए; तु = तो; राजानः = राजा; ब्राह्मणैः = ब्राह्मणों के साथ; सह = सहित; द्रष्टुकामाः = देखने की इच्छा वाले; महात्मानम् = महात्मा; रामम् = राम को; सत्यपराक्रमम् = सत्य पराक्रमी; ऋषयः = ऋषि; देवताः = देवता; च = और; एव = ही; गन्धर्वाप्सरसाम् = गन्धर्व और अप्सराओं के; गणाः = समूह; समाजग्मुः = आए; मुदा = प्रसन्नता से; युक्ताः = सहित; रामस्य = राम के; यज्ञम् = यज्ञ में; उत्तमम् = उत्तम।
📖 भावार्थ : उसके बाद महातेजस्वी राम ने अश्वमेध यज्ञ का दृढ़ निश्चय किया। उन्होंने सभी मित्रों और वेदपारंगत ऋषियों को बुलाया। धर्मज्ञ राम ने अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ग्रहण कर विधिपूर्वक उसका आरम्भ किया। उस यज्ञ में अनेक राजा और ब्राह्मण सत्यपराक्रमी महात्मा राम के दर्शन की इच्छा से एकत्र हुए। ऋषि-देवता तथा गन्धर्व-अप्सराओं के समूह भी प्रसन्नतापूर्वक राम के उत्तम यज्ञ में आए। राम के यश और धर्मपरायणता से आकृष्ट होकर समस्त लोकों के प्राणी इस यज्ञ में सम्मिलित हुए। यह यज्ञ इतना भव्य था कि स्वयं देवता भी इसे देखने आए। राम ने सभी का यथोचित सत्कार किया और यज्ञ की सभी व्यवस्थाएँ सुचारु रूप से चल रही थीं।
॥ श्लोक ५-८ ॥
ततः कस्मिंश्चिदहनि वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः।
प्रेषयामास तनयौ लवकुशौ महामती॥
सुशिष्यौ सुव्रतौ दान्तौ वेदवेदाङ्गपारगौ।
रामायणमितिहासं गायन्तौ मधुरं तदा॥
तौ राजद्वारमासाद्य सुमधुरस्वरौ युवाम्।
गान्धर्वं योगमास्थाय तत्र गातुं प्रचक्रतुः॥
तयोः श्रुत्वा तु गान्धर्वं सर्वे राजसमागमाः।
विस्मयं परमं जग्मुर्मुनयश्च तपोधनाः॥
📖 भावार्थ : तब किसी एक दिन महामुनि वाल्मीकि ने अपने दो पुत्रों लव और कुश को, जो महामति थे, यज्ञशाला में भेजा। वे सुशिष्य, सुव्रती, संयमी और वेद-वेदांग के पारंगत थे। उन्होंने रामायण नामक इतिहास को मधुर स्वर में गाना प्रारम्भ किया। वे दोनों युवक राजद्वार पर आए और अत्यन्त मधुर स्वर में गान्धर्व योग (संगीत की विधा) से उस गीत को गाने लगे। उनका गान सुनकर वहाँ उपस्थित सभी राजा और तपोधन मुनि अत्यन्त विस्मित हुए। उनके स्वर में ऐसी मादकता थी कि श्रोता मन्त्रमुग्ध हो गए। गान की लय, ताल और भावों ने सबको मोहित कर लिया। राम भी इस अद्भुत गायन को सुनकर मोहित हो गए और उन्होंने इन दोनों युवकों की ओर ध्यान दिया।

🎤 लव-कुश का रामायण गायन (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१३ ॥
तौ गायन्तौ महात्मानौ रामचरितमुत्तमम्।
रामस्य जन्म काकुत्स्थं सीतायाश्च विवाहनम्॥
रामस्य धार्मिकं राज्यं वनवासं च दुःखदम्।
सीताया हरणं घोरं रावणेन दुरात्मना॥
सुग्रीवेण समागमं वालिनश्च वधं तथा।
समुद्रस्य च लङ्घनं लङ्कायाश्च प्रवेशनम्॥
रावणस्य वधं घोरं विभीषणस्य राज्यदम्।
रामस्य राज्यप्राप्तिं च सीतायाः शुद्धिकारणम्॥
एवं सर्वं समाख्यातं रामायणमनुत्तमम्।
तौ गायन्तौ महात्मानौ सर्वलोकमनोहरम्॥
📖 भावार्थ : वे दोनों महात्मा रामचरित का गान कर रहे थे – राम का जन्म, काकुत्स्थ वंश, सीता के साथ विवाह, राम का धार्मिक राज्याभिषेक, फिर दुःखद वनवास, दुरात्मा रावण द्वारा सीता का घोर हरण, सुग्रीव से मित्रता, वाली का वध, समुद्र लंघन, लंका में प्रवेश, रावण का घोर वध, विभीषण को राज्य देना, राम की अयोध्या वापसी और राज्यप्राप्ति, तथा सीता के शुद्धि का कारण – इस प्रकार समस्त रामायण का सुन्दर वर्णन। वे दोनों महात्मा उस अनुत्तम रामायण को सर्वलोक मनोहर रीति से गा रहे थे। उनके गायन में राम के जीवन की प्रत्येक घटना इतनी सजीव हो उठी कि श्रोता स्वयं को उन घटनाओं के बीच पाते थे। राम ने जब अपने वनवास और सीता के हरण का वर्णन सुना तो उनकी आँखें भर आईं, और जब रावण वध का प्रसंग आया तो उनके मुख पर गर्व की झलक दिखी।
॥ श्लोक १४-२० ॥
रामस्तु श्रुत्वा गान्धर्वं विस्मितोऽभून्नृपोत्तमः।
काव्यस्य रचनां दिव्यां वाल्मीकेः सुमहात्मनः॥
तौ दृष्ट्वा मुनिपुत्रौ च कुशलौ गीतकर्मणि।
बभूव परमप्रीतो ददौ रत्नान्यनेकशः॥
उवाच च महातेजा लवकुशौ तपोधनौ।
कस्येदं काव्यमाख्यातं केन वा रचितं महत्॥
तावूचतुर्मुनिसुतौ भगवता वाल्मीकिना।
रचितं राघवं काव्यं त्वच्चरित्रं महात्मना॥
श्रुत्वा रामस्तु तद्वाक्यं परं विस्मयमागतः।
पप्रच्छ च पुनस्तौ तु वाल्मीकेः चाश्रमं प्रति॥
कुत्रास्ते भगवानद्य वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः।
द्रष्टुमिच्छामि तं द्रष्टुं गन्तुमिच्छामि सत्वरम्॥
📖 भावार्थ : राम ने वह गान्धर्व संगीत सुनकर अत्यन्त विस्मय का अनुभव किया। वे उस दिव्य काव्य की रचना पर मुग्ध थे, जो महात्मा वाल्मीकि ने की थी। उन मुनिपुत्रों को गायन में इतना कुशल देखकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें अनेक रत्न उपहार में दिए। फिर महातेजस्वी राम ने लव और कुश से पूछा: "यह किसका काव्य है? किस महान व्यक्ति ने इसकी रचना की?" तब मुनिपुत्रों ने उत्तर दिया: "हे राघव! यह काव्य भगवान वाल्मीकि द्वारा रचित है, और यह आपके चरित्र पर आधारित है।" यह सुनकर राम अत्यधिक आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने पुनः पूछा: "वह भगवान वाल्मीकि आज कहाँ हैं? मैं उनके दर्शन करना चाहता हूँ, शीघ्र ही उनके पास जाना चाहता हूँ।"

💬 राम का संवाद और भावुकता (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
एतच्छ्रुत्वा वचो रामः परं हर्षसमन्वितः।
तौ किशोरौ परिष्वज्य स्नेहेन महता युतः॥
अङ्कमारोपयामास प्रीतिपरिप्लुतेक्षणः।
तयोर्मुखं च संप्रेक्ष्य सीतामन्वस्मरत्प्रभुः॥
चिन्तयामास रामस्तु कस्यैतौ मुनिदारकौ।
यदा सीतापरित्यागो वाल्मीकेराश्रमे स्थिता॥
तदा स्मरति रामस्तु सीतां शुद्धां पतिव्रताम्।
तौ च दृष्ट्वा कुमारौ च रूपयौवनशालिनौ॥
लक्ष्मणं चाब्रवीद्रामो भरतं च महाबलम्।
शत्रुघ्नं च महातेजाः पश्यतैतौ मुनीश्वरौ॥
अनयो रूपसम्पत्तिर्मम सीतासमुद्भवा।
प्रतिभाति महाबाहो सत्यं वच्मि न संशयः॥
📖 भावार्थ : राम ने यह वचन सुनकर अत्यधिक हर्षित होकर उन दोनों किशोरों को स्नेह से गले लगाया और अपनी गोद में बिठा लिया। उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बह रहे थे। उन दोनों के मुख देखकर राम को सीता की याद आ गई। वे सोचने लगे: "ये मुनिकुमार किसके पुत्र हैं?" जब उन्होंने सीता के परित्याग और वाल्मीकि आश्रम में निवास का स्मरण किया, तो उन्हें सीता की शुद्धता और पतिव्रता धर्म याद आया। उन दोनों कुमारों को रूप और यौवन से सम्पन्न देखकर राम ने लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न से कहा: "हे महाबाहो! देखो इन मुनीश्वरों को। इनकी रूपसम्पत्ति मुझे सीता से उत्पन्न प्रतीत होती है। मैं सत्य कह रहा हूँ, इसमें कोई संशय नहीं।"
॥ श्लोक २८-३५ ॥
ततः सुमन्त्रमाहूय रामो वचनमब्रवीत्।
गच्छ सुमन्त्र जानीहि वाल्मीकेराश्रमं प्रति॥
किमेषां मुनिपुत्राणां माता वसति तापसी।
का चेयं योषितां श्रेष्ठा यस्यैतौ मुनिदारकौ॥
सुमन्त्रो गत्वा त्वरितं वाल्मीकेराश्रमं प्रति।
ददर्श तापसीं कान्तां सीतां पद्मदलेक्षणाम्॥
सा च तं प्राह राजेन्द्र पुत्रौ मे लवकुशौ स्मृतौ।
रामस्योरसि जातौ तौ वाल्मीकेः पालितौ सदा॥
सुमन्त्रः प्रत्युपागम्य रामायाचष्ट तत्त्वतः।
सीता तत्र महाभागा पुत्राभ्यां सह संस्थिता॥
तच्छ्रुत्वा राघवः श्रीमान् विस्मयोत्फुल्ललोचनः।
प्रेषयामास त्वरितं वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम्॥
📖 भावार्थ : तब राम ने सुमन्त्र को बुलाकर कहा: "हे सुमन्त्र! जाओ, वाल्मीकि आश्रम में जाकर पता करो कि इन मुनिपुत्रों की माता कौन सी तपस्विनी है? कौन सी योषिता इनकी जननी है?" सुमन्त्र शीघ्र ही वाल्मीकि आश्रम गए और वहाँ उन्होंने कमलनयनी सीता को देखा, जो तापसी वेश में थीं। सीता ने उनसे कहा: "हे राजेन्द्र! ये लव और कुश मेरे पुत्र हैं। ये राम के ही पुत्र हैं, वाल्मीकि जी ने इनका पालन किया है।" सुमन्त्र वापस आए और राम को सब कुछ यथार्थ बताया: "सीता वहाँ महाभागा के रूप में अपने दोनों पुत्रों के साथ रह रही हैं।" यह सुनकर श्रीराम के नेत्र विस्मय से खिल उठे। उन्होंने तुरन्त वाल्मीकि मुनि को बुलवाने की व्यवस्था की।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🎭 आत्मकथा का श्रवण

राम का अपने जीवन की कथा को अपने ही पुत्रों से सुनना अत्यन्त मार्मिक है। यह घटना यह दर्शाती है कि महापुरुष भी अपने जीवन की घटनाओं को जब काव्य या गीत के रूप में सुनते हैं, तो वे भावुक हो जाते हैं। राम का सीता को याद करना और पुत्रों के प्रति आकर्षण पितृत्व के स्वाभाविक भाव को प्रदर्शित करता है।

📜 वाल्मीकि रामायण की उत्पत्ति

इस सर्ग से हमें ज्ञात होता है कि वाल्मीकि रामायण की रचना हो चुकी थी और उसे लव-कुश द्वारा सर्वप्रथम सार्वजनिक रूप से गाया गया। यही कारण है कि आज भी रामायण को लव-कुश के गायन के रूप में स्मरण किया जाता है। यह काव्य परम्परा और मौखिक प्रसारण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

👪 पितृत्व का अहसास

राम का लव-कुश को देखकर सीता का स्मरण करना और उनमें अपने रूप की झलक पाना पितृत्व के गहरे बन्धन को दर्शाता है। यद्यपि राम ने सीता का परित्याग किया था, किन्तु उनके हृदय में सीता के प्रति प्रेम और पुत्रों के प्रति मोह सहज ही उभर आता है।

🎨 कला का सम्मान

राम ने अज्ञात किशोरों की कला की सराहना की और उन्हें पुरस्कृत किया। यह दर्शाता है कि एक आदर्श राजा के लिए कला और संस्कृति का संरक्षण कितना महत्त्वपूर्ण है। राम ने बिना यह जाने कि वे उनके पुत्र हैं, उनकी प्रतिभा को पहचाना और सम्मान दिया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची कला और प्रतिभा को पहचानना चाहिए, चाहे वह किसी की भी हो। साथ ही, यह भी कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, पारिवारिक बन्धन अटूट होते हैं – राम ने बिना जाने ही अपने पुत्रों के प्रति स्नेह दिखाया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे षष्ठाधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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