उत्तर काण्ड अध्याय 105

वाल्मीकि द्वारा लव-कुश को रामायण गाने की आज्ञा

वाल्मीकि ऋषि लव और कुश को सम्पूर्ण रामायण कथा सिखाते हैं और उन्हें अयोध्या में राम के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर वहाँ जाकर इसे गाने का आदेश देते हैं।

विवरण

इस सर्ग में वाल्मीकि ऋषि, जिन्होंने रामायण की रचना की थी, अपने शिष्यों लव और कुश – जो राम के पुत्र हैं – को सम्पूर्ण रामायण कथा का गान सिखाते हैं। वे उन्हें अयोध्या भेजते हैं, जहाँ अश्वमेध यज्ञ चल रहा है। लव और कुश वीणा के साथ मधुर कंठ से रामायण गाते हैं। राम और सभा में उपस्थित लोग उनके गान से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। राम उन्हें पहचान नहीं पाते, लेकिन उनकी कला से प्रभावित होकर उन्हें पुरस्कृत करते हैं। यह सर्ग रामायण के गान और राम द्वारा अपने पुत्रों से पहली मुलाकात की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०५

(वाल्मीकि द्वारा लव-कुश को रामायण गाने की आज्ञा)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अब अगस्त्य मुनि राम को लव और कुश के जन्म और उनके द्वारा रामायण गाने की कथा सुनाते हैं। वाल्मीकि ऋषि ने रामायण की रचना की और उसे लव-कुश को सिखाकर अयोध्या भेजा, जहाँ वे राम के सामने गाते हैं।

🏕️ वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच –
शृणु राम महाबाहो लवकुशसमुद्भवम्।
यथा वाल्मीकिना प्रोक्तं गीतं ताभ्यां महात्मभिः॥
सीता तु वनवासं वै कुर्वती पतिव्रता।
वाल्मीकेराश्रमे रम्ये प्रसूता यमजौ सुतौ॥
लवश्च कुशश्च महात्मानौ तेजसा संयुतौ।
वाल्मीकिना समं तत्र वर्धितौ तपसा सह॥
वाल्मीकिः परमप्रीतस्ताभ्यां शिष्याभ्यमन्वहम्।
रामायणमिति ख्यातं चक्रे काव्यमनुत्तमम्॥
ताभ्यामध्यापयामास सर्वं रामायणं मुनिः।
स्वरसंपन्नया वाचा गीतं ताभ्यां सुशोभनम्॥
🔹 पदच्छेद : अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; शृणु = सुनो; राम = हे राम; महाबाहो = महाबाहु; लवकुशसमुद्भवम् = लव-कुश का जन्म; यथा = जैसे; वाल्मीकिना = वाल्मीकि ने; प्रोक्तम् = कहा; गीतम् = गाया; ताभ्याम् = उन दोनों ने; महात्मभिः = महात्माओं ने; सीता = सीता; तु = तो; वनवासम् = वनवास; वै = निश्चय; कुर्वती = करती हुई; पतिव्रता = पतिव्रता; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमे = आश्रम में; रम्ये = रम्य; प्रसूता = जन्म दिया; यमजौ = जुड़वाँ; सुतौ = पुत्रों को; लवः = लव; च = और; कुशः = कुश; च = और; महात्मानौ = महात्मा; तेजसा = तेज से; संयुतौ = युक्त; वाल्मीकिना = वाल्मीकि के साथ; समम् = समान; तत्र = वहाँ; वर्धितौ = पाले गए; तपसा = तप से; सह = सहित; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; परमप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न; ताभ्याम् = उन दोनों; शिष्याभ्याम् = शिष्यों से; अन्वहम् = प्रतिदिन; रामायणम् = रामायण; इति = इस नाम से; ख्यातम् = प्रसिद्ध; चक्रे = रची; काव्यम् = काव्य; अनुत्तमम् = उत्तम; ताभ्याम् = उन दोनों को; अध्यापयामास = पढ़ाया; सर्वम् = सम्पूर्ण; रामायणम् = रामायण; मुनिः = मुनि; स्वरसंपन्नया = स्वरसम्पन्न; वाचा = वाणी से; गीतम् = गाया; ताभ्याम् = उन दोनों ने; सुशोभनम् = अत्यन्त सुन्दर।
📖 भावार्थ : अगस्त्य मुनि ने कहा: हे महाबाहो राम! अब मैं तुम्हें लव और कुश के जन्म की कथा सुनाता हूँ, जैसे वाल्मीकि ने उन्हें सिखाया और उन्होंने गाया। सीता, जो पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए वनवास कर रही थीं, ने वाल्मीकि के रम्य आश्रम में जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया। लव और कुश नामक ये दोनों महात्मा बालक अत्यन्त तेजस्वी थे। वाल्मीकि ने उन्हीं के साथ तपस्या करते हुए उनका पालन-पोषण किया। वाल्मीकि अत्यन्त प्रसन्न होकर उन दोनों शिष्यों के साथ प्रतिदिन रहते थे। उन्होंने रामायण नामक अनुत्तम काव्य की रचना की। फिर उन मुनि ने उन दोनों को सम्पूर्ण रामायण पढ़ाया। लव और कुश ने स्वरसम्पन्न वाणी से उसका अत्यन्त सुन्दर गान किया। यह वर्णन दर्शाता है कि वाल्मीकि ने सीता के पुत्रों को अपना शिष्य बनाया और उन्हें रामायण सिखाई। यह बालक स्वाभाविक रूप से तेजस्वी थे और उनकी वाणी मधुर थी।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ते धारयन्तौ तेजस्विनौ रामायणकथां शुभाम्।
वाल्मीकिना सह नित्यं जपन्तौ सुसमाहितौ॥
एकदा तौ महात्मानौ वाल्मीकिः परमप्रभुः।
उवाच प्रीतमनसा रामायणविशारदौ॥
अयोध्यायां महाराजो रामो राज्यं प्रशास्ति वै।
अश्वमेधो महायज्ञस्तस्य वर्तति साम्प्रतम्॥
तत्र गत्वा महाभागौ गायतं रामायणं शुभम्।
यथाक्रमं यथावृत्तं रामस्य चरितं महत्॥
प्रीतिं च जनयिष्येथे रामस्य विदितात्मनः।
सर्वेषां च द्विजातीनां ये तत्र समुपागताः॥
🔹 पदच्छेद : ते = वे; धारयन्तौ = धारण करते हुए; तेजस्विनौ = तेजस्वी; रामायणकथाम् = रामायण कथा; शुभाम् = शुभ; वाल्मीकिना = वाल्मीकि के साथ; सह = सहित; नित्यम् = नित्य; जपन्तौ = जप करते हुए; सुसमाहितौ = ध्यान में लीन; एकदा = एक दिन; तौ = उन दोनों; महात्मानौ = महात्माओं को; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; परमप्रभुः = परम प्रभु; उवाच = बोले; प्रीतमनसा = प्रसन्न मन से; रामायणविशारदौ = रामायण में निपुण; अयोध्यायाम् = अयोध्या में; महाराजः = महाराज; रामः = राम; राज्यम् = राज्य; प्रशास्ति = शासन करते हैं; वै = निश्चय; अश्वमेधः = अश्वमेध; महायज्ञः = महान यज्ञ; तस्य = उनका; वर्तति = चल रहा है; साम्प्रतम् = अब; तत्र = वहाँ; गत्वा = जाकर; महाभागौ = हे महाभाग; गायतम् = गाओ; रामायणम् = रामायण; शुभम् = शुभ; यथाक्रमम् = क्रमानुसार; यथावृत्तम् = यथावृत्त; रामस्य = राम का; चरितम् = चरित्र; महत् = महान; प्रीतिम् = प्रसन्नता; च = और; जनयिष्येथे = उत्पन्न करोगे; रामस्य = राम की; विदितात्मनः = ज्ञानी; सर्वेषाम् = सब की; च = और; द्विजातीनाम् = द्विजों की; ये = जो; तत्र = वहाँ; समुपागताः = आए हैं।
📖 भावार्थ : वे दोनों तेजस्वी बालक नित्य वाल्मीकि के साथ रहकर उस शुभ रामायण कथा का जाप करते थे, ध्यान में लीन रहते थे। एक दिन परम प्रभु वाल्मीकि ने उन दोनों महात्माओं से, जो रामायण में निपुण हो चुके थे, प्रसन्न मन से कहा: अयोध्या में महाराज राम राज्य शासन कर रहे हैं। उनका अश्वमेध महायज्ञ अभी चल रहा है। हे महाभागो! तुम वहाँ जाकर इस शुभ रामायण को गाओ, क्रमानुसार और यथावृत्त राम के महान चरित्र का गान करो। तुम ज्ञानी राम और वहाँ उपस्थित सभी द्विजों को प्रसन्न करोगे। यह वाल्मीकि का आदेश था, जो लव-कुश को अयोध्या भेजने का कारण बना। उन्होंने अपने शिष्यों को राम के दरबार में जाकर उनकी ही कथा सुनाने का निर्देश दिया। यह अत्यन्त सुन्दर संयोग है कि राम अपने ही पुत्रों से अपनी कथा सुनेंगे, बिना उन्हें पहचाने।

🎤 लव-कुश का अयोध्या प्रस्थान और गान (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
तथेति तौ प्रतिज्ञाय गुरोर्वचनमुत्तमम्।
अयोध्यां प्रययौ वीरौ रामायणविशारदौ॥
तौ गत्वा यज्ञभूमिं तु ददृशाते महाजनम्।
ऋषीन्राज्ञः समागतांस्तत्र तत्र महामतिः॥
तौ तु वीणासमायुक्तौ मधुरस्वरभाषिणौ।
गायन्तौ रामचरितं सर्वलोकमनोहरम्॥
रामः शुश्राव तद्गीतं सभायां समुपस्थितः।
विस्मयं परमं गत्वा पप्रच्छ परिचारकान्॥
काव्यं केन कृतं ब्रह्मन्के गायन्ति च सुस्वरम्।
आनयध्वं द्रुतं तांस्तु द्रष्टुमिच्छामि तत्त्वतः॥
🔹 पदच्छेद : तथा = वैसे; इति = कहकर; तौ = वे दोनों; प्रतिज्ञाय = स्वीकार कर; गुरोः = गुरु का; वचनम् = वचन; उत्तमम् = उत्तम; अयोध्याम् = अयोध्या; प्रययौ = गए; वीरौ = वीर; रामायणविशारदौ = रामायण में निपुण; तौ = वे; गत्वा = जाकर; यज्ञभूमिम् = यज्ञभूमि; तु = तो; ददृशाते = देखा; महाजनम् = बहुत से लोग; ऋषीन् = ऋषियों को; राज्ञः = राजाओं को; समागतान् = आए हुए; तत्र तत्र = वहाँ वहाँ; महामतिः = महामति; तौ = वे; तु = तो; वीणासमायुक्तौ = वीणा सहित; मधुरस्वरभाषिणौ = मधुर स्वर बोलने वाले; गायन्तौ = गाते हुए; रामचरितम् = रामचरित; सर्वलोकमनोहरम् = सब लोकों को मनोहर; रामः = राम; शुश्राव = सुना; तत् = उस; गीतम् = गीत को; सभायाम् = सभा में; समुपस्थितः = उपस्थित; विस्मयम् = आश्चर्य; परमम् = परम; गत्वा = प्राप्त कर; पप्रच्छ = पूछा; परिचारकान् = सेवकों से; काव्यम् = काव्य; केन = किसने; कृतम् = रचा; ब्रह्मन् = हे ब्रह्मन्; के = कौन; गायन्ति = गाते हैं; च = और; सुस्वरम् = सुन्दर स्वर में; आनयध्वम् = लाओ; द्रुतम् = शीघ्र; तान् = उनको; तु = तो; द्रष्टुम् = देखना; इच्छामि = चाहता हूँ; तत्त्वतः = तत्त्व से।
📖 भावार्थ : लव और कुश ने गुरु के उत्तम वचन को स्वीकार किया और तथास्तु कहकर अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। वे दोनों रामायण में निपुण वीर थे। यज्ञभूमि में पहुँचकर उन्होंने वहाँ एकत्रित महाजनों, ऋषियों और राजाओं को देखा। वे वीणा के साथ मधुर स्वर में रामचरित का गान करने लगे, जो सब लोगों के मन को मोहित कर रहा था। राम सभा में उपस्थित थे, उन्होंने वह गीत सुना और अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने सेवकों से पूछा: हे ब्रह्मन्! यह काव्य किसने रचा है? और ये कौन सुन्दर स्वर में गा रहे हैं? उन्हें शीघ्र मेरे पास लाओ, मैं उनसे मिलना चाहता हूँ। यह दृश्य अत्यन्त मार्मिक है। राम अपने ही जीवन की कथा सुन रहे हैं, जो उनके अपने पुत्र गा रहे हैं, किन्तु वे उन्हें नहीं पहचानते। काव्य की मधुरता और सत्यता उन्हें विस्मित कर देती है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः परिचारकैस्तौ तु आनीतौ रामसन्निधौ।
दृष्ट्वा तौ राघवो राजा परमप्रीतमानसः॥
पूजयित्वा विधानेन दत्त्वा चार्घ्यं यथाविधि।
उवाच मधुरां वाणीं सान्त्वपूर्वं महामतिः॥
काव्यं केन कृतं ब्रह्मन्के युवां कस्य वा सुतौ।
गायथः सुमहद्भक्त्या रामचरितमुत्तमम्॥
तौ प्राहतुर्महात्मानौ वाल्मीकिरिति विश्रुतः।
मुनिः कृतवानेतत्काव्यं शिष्यौ स्वौ च स्मृतौ॥
वाल्मीकेराश्रमे रम्ये वसावः सीतया सह।
तया च पालितौ नित्यं वाल्मीकिश्च महातपाः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; परिचारकैः = सेवकों द्वारा; तौ = उन दोनों को; तु = तो; आनीतौ = लाया गया; रामसन्निधौ = राम के समीप; दृष्ट्वा = देखकर; तौ = उन्हें; राघवः = राघव; राजा = राजा; परमप्रीतमानसः = अत्यन्त प्रसन्न मन वाले; पूजयित्वा = पूजा कर; विधानेन = विधि से; दत्त्वा = देकर; च = और; अर्घ्यम् = अर्घ्य; यथाविधि = यथाविधि; उवाच = बोले; मधुराम् = मधुर; वाणीम् = वाणी; सान्त्वपूर्वम् = सान्त्वना सहित; महामतिः = महामति; काव्यम् = काव्य; केन = किसने; कृतम् = रचा; ब्रह्मन् = हे ब्रह्मन्; के = कौन; युवाम् = तुम दोनों; कस्य = किसके; वा = वा; सुतौ = पुत्र; गायथः = गाते हो; सुमहद्भक्त्या = अत्यन्त भक्ति से; रामचरितम् = रामचरित; उत्तमम् = उत्तम; तौ = उन्होंने; प्राहतुः = कहा; महात्मानौ = महात्माओं ने; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; इति = इस प्रकार; विश्रुतः = प्रसिद्ध; मुनिः = मुनि; कृतवान् = रचा; एतत् = यह; काव्यम् = काव्य; शिष्यौ = शिष्य; स्वौ = अपने; च = और; स्मृतौ = माने जाते हैं; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमे = आश्रम में; रम्ये = रम्य; वसावः = रहते हैं; सीतया = सीता के साथ; सह = सहित; तया = उनके द्वारा; च = और; पालितौ = पाले गए; नित्यम् = नित्य; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; च = और; महातपाः = महान तपस्वी।
📖 भावार्थ : तब सेवक उन दोनों को राम के पास लाए। राघव ने उन्हें देखा तो उनका मन अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उन्होंने विधिपूर्वक उनका पूजन किया, अर्घ्य दिया और मधुर वाणी में पूछा: हे ब्रह्मन्! यह काव्य किसने रचा है? तुम दोनों कौन हो और किसके पुत्र हो? तुम अत्यन्त भक्ति से यह उत्तम रामचरित गा रहे हो। तब उन दोनों महात्माओं ने कहा: यह काव्य प्रसिद्ध मुनि वाल्मीकि ने रचा है। हम उनके शिष्य हैं। हम वाल्मीकि के रम्य आश्रम में सीता के साथ रहते हैं। सीता और महातपस्वी वाल्मीकि ने हमारा पालन-पोषण किया है। इस प्रकार लव-कुश ने अपना परिचय दिया, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वे राम के पुत्र हैं, क्योंकि वे स्वयं नहीं जानते थे या वाल्मीकि ने उन्हें यह बताने से मना किया होगा। उन्होंने केवल सीता का नाम लिया, जिससे राम को और अधिक जिज्ञासा हुई।

🤔 राम की जिज्ञासा और वाल्मीकि का आगमन (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
रामः श्रुत्वा तु तद्वाक्यं सीतानाम समन्वितम्।
प्रीतिं परमिकां लेभे बाष्पपर्याकुलेक्षणः॥
उवाच च महात्मानौ पुनः प्रीतिपुरःसरम्।
सीता कच्चित्सुखं वास्ते वाल्मीकेश्चाश्रमे प्रिये॥
तौ प्राहतुर्महात्मानौ सुखं वास्ते तपस्विनी।
त्वया सह वियोगेन तपश्चरति दुश्चरम्॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो वाल्मीकिः परमप्रभुः।
रामेण पूजितः सम्यग्वसिष्ठप्रमुखैस्तथा॥
वाल्मीकिः प्राह राजेन्द्र पुत्रौ तव महात्मनौ।
लवकुशौ महाभागौ सीतायां तव वीर्यतः॥
एतौ ते तनयौ राम वाल्मीकेराश्रमे स्थितौ।
मया पालितौ धर्मेण सीतया च तपस्विना॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; श्रुत्वा = सुनकर; तु = तो; तत् = उस; वाक्यम् = वाक्य को; सीतानाम = सीता के नाम से; समन्वितम् = युक्त; प्रीतिम् = प्रसन्नता; परमिकाम् = परम; लेभे = प्राप्त की; बाष्पपर्याकुलेक्षणः = आँसुओं से भरे नेत्र वाले; उवाच = बोले; च = और; महात्मानौ = महात्माओं से; पुनः = फिर; प्रीतिपुरःसरम् = प्रेमपूर्वक; सीता = सीता; कच्चित् = क्या; सुखम् = सुख से; वास्ते = रहती हैं; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमे = आश्रम में; प्रिये = हे प्रिय; तौ = उन्होंने; प्राहतुः = कहा; महात्मानौ = महात्माओं ने; सुखम् = सुख से; वास्ते = रहती हैं; तपस्विनी = तपस्विनी; त्वया = तुमसे; सह = साथ; वियोगेन = वियोग से; तपः = तप; चरति = करती है; दुश्चरम् = कठिन; एतस्मिन् = इसी; अन्तरे = अवसर पर; प्राप्तः = आए; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; परमप्रभुः = परम प्रभु; रामेण = राम ने; पूजितः = पूजा की; सम्यक् = भलीभाँति; वसिष्ठप्रमुखैः = वसिष्ठ आदि ने; तथा = तथा; वाल्मीकिः = वाल्मीकि; प्राह = बोले; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; पुत्रौ = पुत्र; तव = तुम्हारे; महात्मनौ = महात्मा; लवकुशौ = लव-कुश; महाभागौ = महाभाग; सीतायाम् = सीता से; तव = तुम्हारे; वीर्यतः = वीर्य से; एतौ = ये; ते = तुम्हारे; तनयौ = पुत्र; राम = हे राम; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमे = आश्रम में; स्थितौ = स्थित; मया = मेरे द्वारा; पालितौ = पाले गए; धर्मेण = धर्म से; सीतया = सीता द्वारा; च = और; तपस्विना = तपस्वी ने।
📖 भावार्थ : राम ने जब सीता का नाम सुना तो उनके नेत्रों में आँसू आ गए और वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रेमपूर्वक पूछा: क्या सीता वाल्मीकि के आश्रम में सुखपूर्वक रहती हैं? लव-कुश ने कहा: तपस्विनी सीता वहाँ सुख से रहती हैं, लेकिन आपके वियोग में कठोर तप कर रही हैं। इतने में ही परम प्रभु वाल्मीकि वहाँ आ गए। राम और वसिष्ठ आदि ने उनका सम्यक् पूजन किया। वाल्मीकि ने कहा: हे राजेन्द्र! ये दोनों महात्मा लव और कुश तुम्हारे ही पुत्र हैं, जो सीता से तुम्हारे वीर्य से उत्पन्न हुए हैं। ये तुम्हारे पुत्र मेरे आश्रम में रहते हैं और मेरे तथा सीता द्वारा धर्मपूर्वक पाले गए हैं। इस प्रकार वाल्मीकि ने राम को सच्चाई बताई। राम के लिए यह अत्यन्त हर्ष का क्षण था कि उनके पुत्र जीवित हैं और उनके सामने हैं।
॥ श्लोक २६-३० ॥
रामः श्रुत्वा तु तद्वाक्यं परं हर्षसमन्वितः।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्तो अयोध्या नगरी मया।
यद्भवान्कृपया मह्यं दर्शितौ पुत्रकौ मम॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा पुत्रावालिङ्ग्य भाष्य च।
ददौ दानानि विप्रेभ्यो बहुरत्नान्यनेकशः॥
वाल्मीकिं पूजयित्वा च प्रेषयामास चाश्रमम्।
लवकुशौ च संगृह्य रेमे राज्ये सुखं तदा॥
अगस्त्य उवाच –
इति ते कथितं राम लवकुशसमुद्भवम्।
यथावृत्तं यथाकालं सर्वं पापप्रणाशनम्॥
रामः प्राह कृतार्थोऽस्मि भगवन्यत्कृपा त्वया।
कृता मयि महाभाग सफलं जीवितं मम॥
इति वाल्मीकिरामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चोत्तरशततमः सर्गः॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; श्रुत्वा = सुनकर; तु = तो; तत् = उस; वाक्यम् = वाक्य को; परम् = परम; हर्षसमन्वितः = हर्ष से युक्त; उवाच = बोले; मुनिशार्दूलम् = मुनिश्रेष्ठ से; कृतज्ञः = कृतज्ञ; सत्यविक्रमः = सत्यविक्रम; भगवन् = हे भगवन्; धन्यताम् = धन्यता; प्राप्तः = प्राप्त; अयोध्या = अयोध्या; नगरी = नगरी; मया = मुझसे; यत् = जो; भवान् = आप; कृपया = कृपा से; मह्यम् = मुझे; दर्शितौ = दिखाए; पुत्रकौ = पुत्र; मम = मेरे; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; पुत्रौ = पुत्रों को; आलिङ्ग्य = गले लगाकर; भाष्य = बोलकर; च = और; ददौ = दिए; दानानि = दान; विप्रेभ्यः = ब्राह्मणों को; बहुरत्नानि = बहुत रत्न; अनेकशः = अनेक; वाल्मीकिम् = वाल्मीकि को; पूजयित्वा = पूजा कर; च = और; प्रेषयामास = विदा किया; च = और; आश्रमम् = आश्रम को; लवकुशौ = लव-कुश को; च = और; संगृह्य = साथ लेकर; रेमे = आनन्दित हुए; राज्ये = राज्य में; सुखम् = सुख से; तदा = तब; अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; इति = इस प्रकार; ते = तुमको; कथितम् = कहा; राम = हे राम; लवकुशसमुद्भवम् = लव-कुश का जन्म; यथावृत्तम् = यथावृत्त; यथाकालम् = यथाकाल; सर्वम् = सब; पापप्रणाशनम् = पापनाशक; रामः = राम; प्राह = बोले; कृतार्थः = कृतार्थ; अस्मि = हूँ; भगवन् = हे भगवन्; यत् = जो; कृपा = कृपा; त्वया = आपने; कृता = की; मयि = मुझ पर; महाभाग = महाभाग; सफलम् = सफल; जीवितम् = जीवन; मम = मेरा; इति = इस प्रकार; वाल्मीकिरामायणे = वाल्मीकि रामायण में; उत्तरकाण्डे = उत्तरकाण्ड में; पञ्चोत्तरशततमः = १०५ वाँ; सर्गः = सर्ग।
📖 भावार्थ : राम ने वाल्मीकि का यह वचन सुनकर अपार हर्ष का अनुभव किया। वे कृतज्ञता से भर गए और बोले: हे भगवन्! मुझसे अयोध्या नगरी धन्य हो गई, क्योंकि आपने कृपा करके मेरे पुत्रों को दिखाया। ऐसा कहकर राघव ने अपने पुत्रों को गले लगाया और उनसे बातें की। फिर उन्होंने ब्राह्मणों को अनेक रत्न और दान दिए। वाल्मीकि की पूजा करके उन्हें आश्रम विदा किया। लव और कुश को साथ लेकर राम राज्य में सुखपूर्वक रहने लगे। अगस्त्य ने कहा: हे राम! मैंने तुम्हें लव-कुश के जन्म की यह पापनाशक कथा यथावृत्त और यथाकाल सुनाई। राम ने कहा: हे भगवन्! मैं कृतार्थ हूँ, आपने मुझ पर कृपा की। मेरा जीवन सफल हो गया। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है। यह राम के अपने पुत्रों से मिलन का हृदयस्पर्शी वर्णन है। इसके साथ ही उत्तरकाण्ड की मुख्य कथा समाप्त होती है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

📖 रामायण का गान

इस सर्ग में रामायण के गान का वर्णन है। वाल्मीकि द्वारा रचित यह काव्य लव-कुश के माध्यम से जन-जन तक पहुँचता है। यह दर्शाता है कि रामायण कालजयी है और सदा गाई जाती रहेगी।

👪 राम-पुत्र मिलन

राम का अपने पुत्रों से मिलन अत्यन्त भावुक क्षण है। यह दर्शाता है कि सीता के वियोग के बाद भी राम को सन्तान सुख मिलता है। पुत्रों का पालन-पोषण वाल्मीकि और सीता ने किया, जो उनके संस्कारों को दर्शाता है।

🎶 कला और भक्ति

लव-कुश ने वीणा के साथ मधुर स्वर में रामायण गाया। यह संगीत और भक्ति का अद्भुत संगम है। उनके गान से राम और सभा के सभी लोग मंत्रमुग्ध हो गए।

🙏 गुरु का महत्त्व

वाल्मीकि ने लव-कुश को रामायण सिखाई और उन्हें राम के पास भेजा। यह गुरु की महिमा को दर्शाता है। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची कला और भक्ति से मन मोहित हो जाता है। राम की तरह हमें भी अपने पूर्वजों और संतान के प्रति प्रेम रखना चाहिए। गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए और ज्ञान का प्रसार करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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