वाल्मीकि द्वारा लव-कुश को रामायण गाने की आज्ञा
वाल्मीकि ऋषि लव और कुश को सम्पूर्ण रामायण कथा सिखाते हैं और उन्हें अयोध्या में राम के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर वहाँ जाकर इसे गाने का आदेश देते हैं।
विवरण
इस सर्ग में वाल्मीकि ऋषि, जिन्होंने रामायण की रचना की थी, अपने शिष्यों लव और कुश – जो राम के पुत्र हैं – को सम्पूर्ण रामायण कथा का गान सिखाते हैं। वे उन्हें अयोध्या भेजते हैं, जहाँ अश्वमेध यज्ञ चल रहा है। लव और कुश वीणा के साथ मधुर कंठ से रामायण गाते हैं। राम और सभा में उपस्थित लोग उनके गान से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। राम उन्हें पहचान नहीं पाते, लेकिन उनकी कला से प्रभावित होकर उन्हें पुरस्कृत करते हैं। यह सर्ग रामायण के गान और राम द्वारा अपने पुत्रों से पहली मुलाकात की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०५
(वाल्मीकि द्वारा लव-कुश को रामायण गाने की आज्ञा)
🔆 प्रस्तावना : अब अगस्त्य मुनि राम को लव और कुश के जन्म और उनके द्वारा रामायण गाने की कथा सुनाते हैं। वाल्मीकि ऋषि ने रामायण की रचना की और उसे लव-कुश को सिखाकर अयोध्या भेजा, जहाँ वे राम के सामने गाते हैं।
🏕️ वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश (श्लोक १-१०)
शृणु राम महाबाहो लवकुशसमुद्भवम्।
यथा वाल्मीकिना प्रोक्तं गीतं ताभ्यां महात्मभिः॥
सीता तु वनवासं वै कुर्वती पतिव्रता।
वाल्मीकेराश्रमे रम्ये प्रसूता यमजौ सुतौ॥
लवश्च कुशश्च महात्मानौ तेजसा संयुतौ।
वाल्मीकिना समं तत्र वर्धितौ तपसा सह॥
वाल्मीकिः परमप्रीतस्ताभ्यां शिष्याभ्यमन्वहम्।
रामायणमिति ख्यातं चक्रे काव्यमनुत्तमम्॥
ताभ्यामध्यापयामास सर्वं रामायणं मुनिः।
स्वरसंपन्नया वाचा गीतं ताभ्यां सुशोभनम्॥
वाल्मीकिना सह नित्यं जपन्तौ सुसमाहितौ॥
एकदा तौ महात्मानौ वाल्मीकिः परमप्रभुः।
उवाच प्रीतमनसा रामायणविशारदौ॥
अयोध्यायां महाराजो रामो राज्यं प्रशास्ति वै।
अश्वमेधो महायज्ञस्तस्य वर्तति साम्प्रतम्॥
तत्र गत्वा महाभागौ गायतं रामायणं शुभम्।
यथाक्रमं यथावृत्तं रामस्य चरितं महत्॥
प्रीतिं च जनयिष्येथे रामस्य विदितात्मनः।
सर्वेषां च द्विजातीनां ये तत्र समुपागताः॥
🎤 लव-कुश का अयोध्या प्रस्थान और गान (श्लोक ११-२०)
अयोध्यां प्रययौ वीरौ रामायणविशारदौ॥
तौ गत्वा यज्ञभूमिं तु ददृशाते महाजनम्।
ऋषीन्राज्ञः समागतांस्तत्र तत्र महामतिः॥
तौ तु वीणासमायुक्तौ मधुरस्वरभाषिणौ।
गायन्तौ रामचरितं सर्वलोकमनोहरम्॥
रामः शुश्राव तद्गीतं सभायां समुपस्थितः।
विस्मयं परमं गत्वा पप्रच्छ परिचारकान्॥
काव्यं केन कृतं ब्रह्मन्के गायन्ति च सुस्वरम्।
आनयध्वं द्रुतं तांस्तु द्रष्टुमिच्छामि तत्त्वतः॥
दृष्ट्वा तौ राघवो राजा परमप्रीतमानसः॥
पूजयित्वा विधानेन दत्त्वा चार्घ्यं यथाविधि।
उवाच मधुरां वाणीं सान्त्वपूर्वं महामतिः॥
काव्यं केन कृतं ब्रह्मन्के युवां कस्य वा सुतौ।
गायथः सुमहद्भक्त्या रामचरितमुत्तमम्॥
तौ प्राहतुर्महात्मानौ वाल्मीकिरिति विश्रुतः।
मुनिः कृतवानेतत्काव्यं शिष्यौ स्वौ च स्मृतौ॥
वाल्मीकेराश्रमे रम्ये वसावः सीतया सह।
तया च पालितौ नित्यं वाल्मीकिश्च महातपाः॥
🤔 राम की जिज्ञासा और वाल्मीकि का आगमन (श्लोक २१-३०)
प्रीतिं परमिकां लेभे बाष्पपर्याकुलेक्षणः॥
उवाच च महात्मानौ पुनः प्रीतिपुरःसरम्।
सीता कच्चित्सुखं वास्ते वाल्मीकेश्चाश्रमे प्रिये॥
तौ प्राहतुर्महात्मानौ सुखं वास्ते तपस्विनी।
त्वया सह वियोगेन तपश्चरति दुश्चरम्॥
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो वाल्मीकिः परमप्रभुः।
रामेण पूजितः सम्यग्वसिष्ठप्रमुखैस्तथा॥
वाल्मीकिः प्राह राजेन्द्र पुत्रौ तव महात्मनौ।
लवकुशौ महाभागौ सीतायां तव वीर्यतः॥
एतौ ते तनयौ राम वाल्मीकेराश्रमे स्थितौ।
मया पालितौ धर्मेण सीतया च तपस्विना॥
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्तो अयोध्या नगरी मया।
यद्भवान्कृपया मह्यं दर्शितौ पुत्रकौ मम॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा पुत्रावालिङ्ग्य भाष्य च।
ददौ दानानि विप्रेभ्यो बहुरत्नान्यनेकशः॥
वाल्मीकिं पूजयित्वा च प्रेषयामास चाश्रमम्।
लवकुशौ च संगृह्य रेमे राज्ये सुखं तदा॥
अगस्त्य उवाच –
इति ते कथितं राम लवकुशसमुद्भवम्।
यथावृत्तं यथाकालं सर्वं पापप्रणाशनम्॥
रामः प्राह कृतार्थोऽस्मि भगवन्यत्कृपा त्वया।
कृता मयि महाभाग सफलं जीवितं मम॥
इति वाल्मीकिरामायणे उत्तरकाण्डे पञ्चोत्तरशततमः सर्गः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
📖 रामायण का गान
इस सर्ग में रामायण के गान का वर्णन है। वाल्मीकि द्वारा रचित यह काव्य लव-कुश के माध्यम से जन-जन तक पहुँचता है। यह दर्शाता है कि रामायण कालजयी है और सदा गाई जाती रहेगी।
👪 राम-पुत्र मिलन
राम का अपने पुत्रों से मिलन अत्यन्त भावुक क्षण है। यह दर्शाता है कि सीता के वियोग के बाद भी राम को सन्तान सुख मिलता है। पुत्रों का पालन-पोषण वाल्मीकि और सीता ने किया, जो उनके संस्कारों को दर्शाता है।
🎶 कला और भक्ति
लव-कुश ने वीणा के साथ मधुर स्वर में रामायण गाया। यह संगीत और भक्ति का अद्भुत संगम है। उनके गान से राम और सभा के सभी लोग मंत्रमुग्ध हो गए।
🙏 गुरु का महत्त्व
वाल्मीकि ने लव-कुश को रामायण सिखाई और उन्हें राम के पास भेजा। यह गुरु की महिमा को दर्शाता है। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची कला और भक्ति से मन मोहित हो जाता है। राम की तरह हमें भी अपने पूर्वजों और संतान के प्रति प्रेम रखना चाहिए। गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए और ज्ञान का प्रसार करना चाहिए।