उत्तर काण्ड अध्याय 104

अश्वमेध यज्ञ का वर्णन

राम के अश्वमेध यज्ञ का विस्तृत वर्णन। यज्ञ की वेदी, ऋत्विजों द्वारा अनुष्ठान, दान, और अश्व की रक्षा का वर्णन। सीता की अनुपस्थिति में स्वर्ण प्रतिमा का निर्माण।

विवरण

इस सर्ग में राम के अश्वमेध यज्ञ का भव्य वर्णन है। यज्ञ की वेदी सुवर्ण और रत्नों से सज्जित है। वसिष्ठ और अन्य ऋत्विज यज्ञ का संचालन करते हैं। चारों ओर से राजा और ऋषि आते हैं। चूँकि सीता वन में हैं, उनकी स्वर्ण प्रतिमा बनाकर यज्ञ में स्थापित की जाती है। अश्व एक वर्ष तक भ्रमण करता है और बिना किसी युद्ध के लौट आता है, क्योंकि सभी राजा राम की अधीनता स्वीकार करते हैं। यज्ञ के अंत में पूर्णाहुति दी जाती है और भरपूर दान दिया जाता है। यह यज्ञ राम के राज्य की समृद्धि और धर्मपरायणता का प्रतीक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०४

(अश्वमेध यज्ञ का वर्णन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुरुत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम के आदेशानुसार अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ हुआ। इस सर्ग में उस भव्य यज्ञ का विस्तृत वर्णन है – वेदी, ऋत्विज, दान, और अश्व की रक्षा। चूँकि सीता वन में हैं, उनकी स्वर्ण प्रतिमा बनाई गई।

🏗️ यज्ञवेदी का निर्माण और सजावट (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच –
ततः रामो महातेजा यज्ञार्थं समुपस्थितः।
कारयामास विधिवद्वेदीं कनकतोरणाम्॥
स्वर्णाभरणसंयुक्तां रत्नस्तम्भविराजिताम्।
मणिकाञ्चनचित्राढ्यां दिव्याम्बरविभूषिताम्॥
ऋत्विजः सुसमाहूता वेदवेदाङ्गपारगाः।
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे समाजग्मुर्यशस्विनः॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्मुनिवृन्दान्कृताञ्जलिः।
भगवन्तो यथाशास्त्रं यज्ञमेतं प्रवर्तय॥
वसिष्ठः प्राह धर्मात्मन्यज्ञस्ते प्राप्तकालतः।
अग्निहोत्रादिकं सर्वं क्रियतां विधिपूर्वकम्॥
🔹 पदच्छेद : अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; ततः = उसके बाद; रामः = राम; महातेजाः = महान तेजस्वी; यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; समुपस्थितः = उपस्थित; कारयामास = करवाया; विधिवत् = विधिपूर्वक; वेदीम् = वेदी; कनकतोरणाम् = सोने के तोरणों वाली; स्वर्णाभरणसंयुक्ताम् = सुवर्णाभरणों से युक्त; रत्नस्तम्भविराजिताम् = रत्नजड़ित स्तम्भों से सुशोभित; मणिकाञ्चनचित्राढ्याम् = मणि और काञ्चन से चित्रित; दिव्याम्बरविभूषिताम् = दिव्य वस्त्रों से अलंकृत; ऋत्विजः = ऋत्विज; सुसमाहूताः = भलीभाँति बुलाए गए; वेदवेदाङ्गपारगाः = वेद-वेदांग में पारंगत; वसिष्ठप्रमुखाः = वसिष्ठ के नेतृत्व में; सर्वे = सब; समाजग्मुः = आए; यशस्विनः = यशस्वी; रामः = राम; प्रोवाच = बोले; तान् = उन; सर्वान् = सब; मुनिवृन्दान् = मुनियों को; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; भगवन्तः = हे भगवन्; यथाशास्त्रम् = शास्त्रानुसार; यज्ञम् = यज्ञ; एतम् = इस; प्रवर्तय = प्रारम्भ करें; वसिष्ठः = वसिष्ठ; प्राह = बोले; धर्मात्मन् = हे धर्मात्मा; यज्ञः = यज्ञ; ते = तुम्हारा; प्राप्तकालतः = उचित समय पर; अग्निहोत्रादिकम् = अग्निहोत्र आदि; सर्वम् = सब; क्रियताम् = किया जाए; विधिपूर्वकम् = विधिपूर्वक।
📖 भावार्थ : अगस्त्य मुनि ने कहा: तत्पश्चात् महातेजस्वी राम ने यज्ञ के लिए विधिपूर्वक एक अत्यन्त भव्य वेदी का निर्माण करवाया। वह वेदी सोने के तोरणों से सुशोभित थी, सुवर्ण के आभूषणों से युक्त थी, रत्नजड़ित स्तम्भों से विराजमान थी, मणि और कांचन से चित्रित थी, और दिव्य वस्त्रों से अलंकृत थी। इस प्रकार वह वेदी अत्यन्त मनोहारी थी। तब वसिष्ठ के नेतृत्व में सभी यशस्वी ऋत्विज, जो वेद-वेदांग में पारंगत थे, वहाँ आए। राम ने हाथ जोड़कर उन सभी मुनियों से कहा: हे भगवन्! आप लोग शास्त्रानुसार इस यज्ञ को प्रारम्भ करें। वसिष्ठ ने कहा: हे धर्मात्मा! तुम्हारा यज्ञ उचित समय पर है। अग्निहोत्र आदि सब कर्म विधिपूर्वक किए जाएँ। इस प्रकार यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। यह वर्णन दर्शाता है कि राम ने यज्ञ के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी और अत्यन्त भव्य तैयारी की। वेदी की सजावट से उनकी समृद्धि और धर्मनिष्ठा का पता चलता है। ऋत्विजों का आना और वसिष्ठ का मार्गदर्शन यज्ञ की वैधता और पवित्रता सुनिश्चित करता है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः सुमन्त्रः शीघ्रं तु राजाज्ञां शिरसा वहन्।
आहूय विविधान्विप्रान्वेदविद्याविशारदान्॥
स्वर्णपात्राणि रत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च।
ददौ रामः स्वयं हृष्टो विप्रेभ्यो यज्ञवृद्धये॥
वसिष्ठः प्राह धर्मात्मन् सीतादेवी वनाश्रिता।
तस्याः स्वर्णमयी प्रतिमा कार्या यज्ञे नियोगतः॥
रामः प्राह तथा कुर्यां यथाह भगवान्गुरुः।
स्वर्णकारैः स्वर्णमयी प्रतिमा कारिता द्रुतम्॥
तां प्रतिष्ठाप्य विधिवद्रामः प्रीतमनाः सुखी।
यज्ञाङ्गानि समारेभे वसिष्ठस्य मते स्थितः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुमन्त्रः = सुमन्त्र; शीघ्रम् = शीघ्र; तु = तो; राजाज्ञाम् = राजा की आज्ञा; शिरसा = शिर पर; वहन् = धारण कर; आहूय = बुलाकर; विविधान् = विविध; विप्रान् = ब्राह्मणों को; वेदविद्याविशारदान् = वेदविद्या में निपुण; स्वर्णपात्राणि = सोने के पात्र; रत्नानि = रत्न; वस्त्राणि = वस्त्र; आभरणानि = आभूषण; च = और; ददौ = दिए; रामः = राम; स्वयम् = स्वयं; हृष्टः = प्रसन्न; विप्रेभ्यः = ब्राह्मणों को; यज्ञवृद्धये = यज्ञ की वृद्धि के लिए; वसिष्ठः = वसिष्ठ; प्राह = बोले; धर्मात्मन् = हे धर्मात्मा; सीतादेवी = सीता देवी; वनाश्रिता = वन में हैं; तस्याः = उनकी; स्वर्णमयी = सोने की; प्रतिमा = प्रतिमा; कार्या = बनवानी चाहिए; यज्ञे = यज्ञ में; नियोगतः = नियोग से; रामः = राम; प्राह = बोले; तथा = वैसे; कुर्याम् = करूँगा; यथा = जैसे; आह = कहते हैं; भगवान् = भगवान्; गुरुः = गुरु; स्वर्णकारैः = सुनारों से; स्वर्णमयी = सोने की; प्रतिमा = प्रतिमा; कारिता = बनवाई; द्रुतम् = शीघ्र; ताम् = उसे; प्रतिष्ठाप्य = स्थापित कर; विधिवत् = विधिपूर्वक; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; सुखी = सुखी; यज्ञाङ्गानि = यज्ञ के अंग; समारेभे = आरम्भ किए; वसिष्ठस्य = वसिष्ठ के; मते = मत में; स्थितः = स्थित।
📖 भावार्थ : तब सुमन्त्र ने राजा की आज्ञा से अनेक वेदविद्या में निपुण ब्राह्मणों को बुलाया। राम ने स्वयं प्रसन्न होकर उन्हें सोने के पात्र, रत्न, वस्त्र और आभूषण दान किए, ताकि यज्ञ की वृद्धि हो। तब वसिष्ठ ने कहा: हे धर्मात्मा! सीता देवी वन में हैं। उनकी सोने की प्रतिमा बनवाकर यज्ञ में स्थापित करनी चाहिए। राम ने कहा: गुरु की आज्ञा का पालन करूँगा। उन्होंने शीघ्र ही सुनारों से सोने की प्रतिमा बनवाई। उसे विधिपूर्वक स्थापित करके, वसिष्ठ के मत के अनुसार यज्ञ के अंगों का आरम्भ किया। यह घटना दर्शाती है कि यज्ञ में पत्नी की उपस्थिति आवश्यक होती है, अतः उनकी अनुपस्थिति में प्रतिमा बनाई गई। राम ने गुरु की आज्ञा का पूर्ण सम्मान किया और तत्परता से कार्य किया। सीता की स्वर्ण प्रतिमा यज्ञ में सम्मिलित थी, जो राम की निष्ठा और धर्मपरायणता को दर्शाता है।

🔥 यज्ञ का अनुष्ठान और अश्व का भ्रमण (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१६ ॥
वसिष्ठो विधिवद्राजन्नग्निहोत्रं प्रवर्तयत्।
होमाश्च विविधाः प्रोक्ताः स्वाहाकारपुरःसराः॥
ऋत्विजश्च जपुर्मन्त्रान्वेदोक्तान्यज्ञशान्तये।
देवाः सर्षिगणाः सर्वे समागम्य दिवौकसः॥
प्रीतिमन्तः प्रशशंसू रामस्य यज्ञमुत्तमम्।
अश्वश्च पर्यटन्सर्वान्देशान्कुर्वन्यथाविधि॥
निर्विघ्नं समतीतो वै वर्षान्ते पुनरागतः।
रामस्यानुचरैः सार्धं भरताद्यैर्महात्मभिः॥
तमश्वं पूजयित्वा तु रामः प्रीतमनाः सुखी।
यज्ञोत्तरं महाभागः पूर्णाहुतिमथाकरोत्॥
🔹 पदच्छेद : वसिष्ठः = वसिष्ठ; विधिवत् = विधिपूर्वक; राजन् = हे राजन्; अग्निहोत्रम् = अग्निहोत्र; प्रवर्तयत् = प्रारम्भ किया; होमाः = होम; च = और; विविधाः = विविध; प्रोक्ताः = कहे गए; स्वाहाकारपुरःसराः = स्वाहाकार के साथ; ऋत्विजः = ऋत्विज; च = और; जपुः = जप किए; मन्त्रान् = मन्त्र; वेदोक्तान् = वेदोक्त; यज्ञशान्तये = यज्ञ की शान्ति के लिए; देवाः = देवता; सर्षिगणाः = ऋषियों के साथ; सर्वे = सब; समागम्य = आकर; दिवौकसः = देवता; प्रीतिमन्तः = प्रसन्न; प्रशशंसुः = प्रशंसा की; रामस्य = राम के; यज्ञम् = यज्ञ की; उत्तमम् = उत्तम; अश्वः = अश्व; च = और; पर्यटन् = भ्रमण करता हुआ; सर्वान् = सब; देशान् = देशों में; कुर्वन् = करते हुए; यथाविधि = यथाविधि; निर्विघ्नम् = बिना विघ्न; समतीतः = बीता; वै = निश्चय; वर्षान्ते = वर्ष के अन्त में; पुनः = फिर; आगतः = आया; रामस्यानुचरैः = राम के अनुचरों के साथ; सार्धम् = सहित; भरताद्यैः = भरत आदि; महात्मभिः = महात्माओं के साथ; तम् = उस; अश्वम् = अश्व को; पूजयित्वा = पूजा कर; तु = तो; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; सुखी = सुखी; यज्ञोत्तरम् = यज्ञ के बाद; महाभागः = महाभाग; पूर्णाहुतिम् = पूर्णाहुति; अथ = तब; अकरोत् = की।
📖 भावार्थ : वसिष्ठ ने विधिपूर्वक अग्निहोत्र प्रारम्भ किया। विविध प्रकार के होम स्वाहाकार के साथ किए गए। ऋत्विजों ने यज्ञ की शान्ति के लिए वेदोक्त मन्त्रों का जाप किया। सभी देवता और ऋषिगण वहाँ आए और राम के उत्तम यज्ञ की प्रशंसा की। अश्व ने विधिपूर्वक सभी देशों में भ्रमण किया और बिना किसी विघ्न के, वर्ष के अन्त में राम के अनुचरों भरत आदि के साथ लौट आया। राम ने उस अश्व की पूजा की और अत्यन्त प्रसन्न होकर यज्ञ की पूर्णाहुति दी। यह वर्णन दर्शाता है कि राम के यज्ञ में किसी प्रकार का विघ्न नहीं आया। सभी देवता प्रसन्न थे। अश्व का निर्विघ्न भ्रमण यह सिद्ध करता है कि राम की कीर्ति से सभी राजा उनके अधीन थे और किसी ने अश्व को रोकने का साहस नहीं किया। यह राम के सार्वभौम साम्राज्य का प्रतीक है।
॥ श्लोक १७-२५ ॥
ततो दानानि दत्त्वा स विप्रेभ्यो रघुनन्दनः।
गवां शतसहस्राणि स्वर्णमाल्यान्यनेकशः॥
रत्नानि विविधान्येव वस्त्राण्याभरणानि च।
यज्ञे तस्मिन्महाभागो रामः प्रीतमना ददौ॥
ऋत्विजश्च महात्मानो यज्ञदक्षिणया तथा।
तोषिताः प्रययुः सर्वे स्वं स्वं देशं यथागतम्॥
देवाः प्रीताः प्रयाताश्च स्वानि धिष्ण्यानि राघव।
रामोऽपि परमप्रीतः प्रजाः पाल्य सुखान्विताः॥
रेमे राज्ये सुखं प्राप्य धर्मेण सुसमाहितः।
एवं यज्ञो महानासीद्रामस्याक्लिष्टकर्मणः॥
अगस्त्य उवाच –
इति ते कथितं राम यज्ञविस्तरमुत्तमम्।
यथा त्वयाभ्यनुज्ञातं यथा वृत्तं महात्मनः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; दानानि = दान; दत्त्वा = देकर; सः = वह; विप्रेभ्यः = ब्राह्मणों को; रघुनन्दनः = रघुनन्दन; गवाम् = गायों; शतसहस्राणि = लाखों; स्वर्णमाल्यानि = सोने की मालाएँ; अनेकशः = अनेक; रत्नानि = रत्न; विविधानि = विविध; एव = ही; वस्त्राणि = वस्त्र; आभरणानि = आभूषण; च = और; यज्ञे = यज्ञ में; तस्मिन् = उस; महाभागः = महाभाग; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; ददौ = दिए; ऋत्विजः = ऋत्विज; च = और; महात्मानः = महात्मा; यज्ञदक्षिणया = यज्ञदक्षिणा से; तथा = तथा; तोषिताः = संतुष्ट; प्रययुः = गए; सर्वे = सब; स्वम् = अपने; स्वम् = अपने; देशम् = देश; यथागतम् = जैसे आए थे; देवाः = देवता; प्रीताः = प्रसन्न; प्रयाताः = चले गए; च = और; स्वानि = अपने; धिष्ण्यानि = स्थानों को; राघव = हे राघव; रामः = राम; अपि = भी; परमप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न; प्रजाः = प्रजा; पाल्य = पालन कर; सुखान्विताः = सुखी; रेमे = आनन्दित; राज्ये = राज्य में; सुखम् = सुख; प्राप्य = पाकर; धर्मेण = धर्म से; सुसमाहितः = समाहित; एवम् = इस प्रकार; यज्ञः = यज्ञ; महान् = महान्; आसीत् = हुआ; रामस्य = राम का; अक्लिष्टकर्मणः = अक्लिष्ट कर्म वाले; अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; इति = इस प्रकार; ते = तुमको; कथितम् = कहा; राम = हे राम; यज्ञविस्तरम् = यज्ञ का विस्तार; उत्तमम् = उत्तम; यथा = जैसे; त्वया = तुमने; अभ्यनुज्ञातम् = अनुमति दी; यथा = जैसे; वृत्तम् = हुआ; महात्मनः = महात्मा का।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् रघुनन्दन राम ने ब्राह्मणों को लाखों गायें, असंख्य सोने की मालाएँ, विविध रत्न, वस्त्र और आभूषण दान में दिए। यज्ञ में अत्यन्त प्रसन्न होकर राम ने यह सब दान किया। ऋत्विज महात्मा लोग यज्ञदक्षिणा पाकर संतुष्ट हुए और जैसे आए थे, वैसे अपने-अपने देशों को लौट गए। देवता भी प्रसन्न होकर अपने लोकों को चले गए। हे राघव! राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते हुए राज्य में सुखपूर्वक रहने लगे। इस प्रकार अक्लिष्टकर्मा राम का यह महान यज्ञ सम्पन्न हुआ। अगस्त्य ने कहा: हे राम! मैंने तुम्हें इस उत्तम यज्ञ का विस्तार बताया, जैसा तुमने अनुमति दी और जैसा हुआ। यह सर्ग अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति का वर्णन करता है। राम के दान और यज्ञ की पूर्णता से सभी संतुष्ट हुए। यह यज्ञ राम के धर्मराज्य की स्थापना का प्रतीक है।

🙏 देवताओं की प्रशंसा और यज्ञ समापन (श्लोक २६-४२)

॥ श्लोक २६-३४ ॥
ततः प्रभृति रामस्य कीर्तिर्लोकेषु विश्रुता।
यज्ञेनानेन महता पुण्येन च समन्विता॥
राजानश्च नृपाः सर्वे रामस्य वशगाः स्थिताः।
अर्चयन्ति स्म धर्मज्ञं भक्त्या परमया युताः॥
सीता च वनवासं तु कुर्वती पतिव्रता।
शुश्राव यज्ञवृत्तान्तं रामस्य विदितात्मनः॥
प्रीतिमाप परां देवी पुत्राभ्यां सह संस्थिता।
वाल्मीकेराश्रमे रम्ये तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्॥
एवं वृत्तो महायज्ञो रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
अश्वमेध इति ख्यातः सर्वपापप्रणाशनः॥
अगस्त्य उवाच –
इति ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वया विभो।
अश्वमेधस्य यज्ञस्य वृत्तान्तं पापनाशनम्॥
रामः प्राह कृतार्थोऽस्मि भगवन्यत्कृपा त्वया।
कृता मयि महाभाग सफलं जीवितं मम॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभृति = से; रामस्य = राम की; कीर्तिः = कीर्ति; लोकेषु = लोकों में; विश्रुता = प्रसिद्ध; यज्ञेन = यज्ञ से; अनेन = इस; महता = महान; पुण्येन = पुण्य से; च = और; समन्विता = युक्त; राजानः = राजा; च = और; नृपाः = राजा; सर्वे = सब; रामस्य = राम के; वशगाः = वश में; स्थिताः = रहे; अर्चयन्ति = पूजा करते थे; स्म = स्म; धर्मज्ञम् = धर्मज्ञ को; भक्त्या = भक्ति से; परमया = परम; युताः = युक्त; सीता = सीता; च = और; वनवासम् = वनवास; तु = तो; कुर्वती = करती हुई; पतिव्रता = पतिव्रता; शुश्राव = सुना; यज्ञवृत्तान्तम् = यज्ञ का वृत्तान्त; रामस्य = राम का; विदितात्मनः = ज्ञानी; प्रीतिम् = प्रसन्नता; आप = प्राप्त; पराम् = परम; देवी = देवी; पुत्राभ्याम् = पुत्रों के साथ; सह = सहित; संस्थिता = स्थित; वाल्मीकेः = वाल्मीकि के; आश्रमे = आश्रम में; रम्ये = रम्य; तपः = तप; तप्त्वा = करके; सुदुश्चरम् = अत्यन्त कठिन; एवम् = इस प्रकार; वृत्तः = हुआ; महायज्ञः = महायज्ञ; रामस्य = राम का; अक्लिष्टकर्मणः = अक्लिष्ट कर्म वाले; अश्वमेधः = अश्वमेध; इति = इस नाम से; ख्यातः = प्रसिद्ध; सर्वपापप्रणाशनः = सब पापों का नाश करने वाला; अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; इति = इस प्रकार; ते = तुमको; सर्वम् = सब; आख्यातम् = बताया; यत् = जो; पृष्टः = पूछा; अहम् = मैंने; त्वया = तुमने; विभो = हे विभो; अश्वमेधस्य = अश्वमेध; यज्ञस्य = यज्ञ का; वृत्तान्तम् = वृत्तान्त; पापनाशनम् = पापनाशक; रामः = राम; प्राह = बोले; कृतार्थः = कृतार्थ; अस्मि = हूँ; भगवन् = हे भगवन्; यत् = जो; कृपा = कृपा; त्वया = आपने; कृता = की; मयि = मुझ पर; महाभाग = महाभाग; सफलम् = सफल; जीवितम् = जीवन; मम = मेरा।
📖 भावार्थ : इस यज्ञ के बाद राम की कीर्ति सब लोकों में फैल गई। सभी राजा राम के वश में हो गए और भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करने लगे। सीता, जो वन में पतिव्रता धर्म का पालन कर रही थीं, ने वाल्मीकि के आश्रम में रहते हुए यह यज्ञवृत्तान्त सुना। वे अपने दोनों पुत्रों के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुईं और कठोर तप करती रहीं। इस प्रकार अक्लिष्टकर्मा राम का यह अश्वमेध महायज्ञ सम्पन्न हुआ, जो सब पापों का नाश करने वाला है। अगस्त्य ने कहा: हे विभो! मैंने तुमसे जो पूछा था, वह सब बता दिया – अश्वमेध यज्ञ का पापनाशक वृत्तान्त। राम ने कहा: हे भगवन्! मैं कृतार्थ हो गया, आपने मुझ पर कृपा की। मेरा जीवन सफल हो गया। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है। सीता का उल्लेख यह दर्शाता है कि वे जीवित हैं और पुत्रों के साथ आश्रम में हैं। यह आगे लव-कुश के आगमन की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
॥ श्लोक ३५-४२ ॥
अगस्त्यः प्राह राजेन्द्र यदन्यच्छ्रोतुमिच्छसि।
तद्वदामि महाबाहो निखिलेन यथातथम्॥
रामः प्राह भगवन्ब्रूहि यद्यस्ति श्रोतव्यमुत्तमम्।
लवकुशोद्भवं चैव चरितं पुण्यवर्धनम्॥
अगस्त्यः प्राह राजेन्द्र शृणुष्वावहितस्ततः।
वाल्मीकिना कृता या च रामायणकथा शुभा॥
तां च गायन्ति यौ वीरौ लवकुशौ महामती।
तयोश्चरितमाख्यास्ये शृणु राम समाहितः॥
इत्युक्त्वा विररामाथ मुनिर्गम्भीरया गिरा।
रामः प्रीतमनाश्चैव प्रशशंस मुहुर्मुहुः॥
इति वाल्मीकिरामायणे उत्तरकाण्डे चतुरुत्तरशततमः सर्गः॥
🔹 पदच्छेद : अगस्त्यः = अगस्त्य; प्राह = बोले; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; यत् = जो; अन्यत् = अन्य; श्रोतुम् = सुनना; इच्छसि = चाहते हो; तत् = वह; वदामि = कहूँगा; महाबाहो = महाबाहो; निखिलेन = सम्पूर्णता से; यथातथम् = यथार्थ; रामः = राम; प्राह = बोले; भगवन् = हे भगवन्; ब्रूहि = कहिए; यदि = यदि; अस्ति = है; श्रोतव्यम् = सुनने योग्य; उत्तमम् = उत्तम; लवकुशोद्भवम् = लव-कुश का जन्म; च = और; एव = ही; चरितम् = चरित्र; पुण्यवर्धनम् = पुण्य बढ़ाने वाला; अगस्त्यः = अगस्त्य; प्राह = बोले; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; शृणुष्व = सुनो; अवहितः = ध्यान से; ततः = तब; वाल्मीकिना = वाल्मीकि ने; कृता = रचित; या = जो; च = और; रामायणकथा = रामायण कथा; शुभा = शुभ; ताम् = उसे; च = और; गायन्ति = गाते हैं; यौ = जो; वीरौ = वीर; लवकुशौ = लव-कुश; महामती = महामती; तयोः = उनका; चरितम् = चरित्र; आख्यास्ये = कहूँगा; शृणु = सुनो; राम = हे राम; समाहितः = ध्यान से; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; विरराम = रुके; अथ = तब; मुनिः = मुनि; गम्भीरया = गम्भीर; गिरा = वाणी से; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; च = और; एव = ही; प्रशशंस = प्रशंसा की; मुहुर्मुहुः = बारम्बार; इति = इस प्रकार; वाल्मीकिरामायणे = वाल्मीकि रामायण में; उत्तरकाण्डे = उत्तरकाण्ड में; चतुरुत्तरशततमः = १०४ वाँ; सर्गः = सर्ग।
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा: हे राजेन्द्र! यदि और कुछ सुनना चाहो तो कहूँ। राम बोले: हे भगवन्! यदि कोई उत्तम कथा हो, तो कहिए। लव-कुश के जन्म और उनके पुण्यवर्धन चरित्र के बारे में सुनना चाहता हूँ। अगस्त्य ने कहा: हे राजेन्द्र! ध्यान से सुनो। वाल्मीकि ने जो शुभ रामायण कथा रची है, उसे दो वीर लव-कुश गाते हैं। उनका चरित्र मैं बताऊँगा, ध्यान से सुनो। ऐसा कहकर मुनि रुक गए। राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनकी बारम्बार प्रशंसा की। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है और अगले सर्ग में लव-कुश द्वारा रामायण गाने की कथा आरम्भ होगी। यह सर्ग अश्वमेध यज्ञ का समापन और लव-कुश के आगमन की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏛️ यज्ञ का वैभव

इस सर्ग में अश्वमेध यज्ञ का भव्य वर्णन है। यह दर्शाता है कि राम का राज्य कितना समृद्ध और धर्मपरायण था। यज्ञ में दिए गए दान और उसकी पूर्णता से प्रजा और देवता सभी संतुष्ट हुए।

🪔 सीता की स्वर्ण प्रतिमा

सीता की अनुपस्थिति में स्वर्ण प्रतिमा बनाना यह सिद्ध करता है कि धार्मिक कर्मों में पत्नी की उपस्थिति आवश्यक है। राम ने धर्म की रक्षा के लिए यह किया। यह पत्नी के महत्त्व को भी रेखांकित करता है।

🌍 सार्वभौम साम्राज्य

अश्व का निर्विघ्न भ्रमण और सभी राजाओं का राम के अधीन होना यह दर्शाता है कि राम का साम्राज्य सार्वभौम था। उनकी कीर्ति से सभी प्रभावित थे और उन्होंने बिना युद्ध के ही उनकी अधीनता स्वीकार कर ली।

🎶 लव-कुश की भूमिका

सर्ग के अंत में लव-कुश के चरित्र की ओर संकेत किया गया है। यह बताता है कि अब राम अपने पुत्रों से मिलने वाले हैं और रामायण कथा का गान होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धार्मिक अनुष्ठानों को विधिपूर्वक और श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। दान और यज्ञ से समाज में सुख-समृद्धि आती है। साथ ही, पत्नी का सम्मान और उसकी उपस्थिति का महत्त्व भी समझना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे चतुरुत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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