उत्तर काण्ड अध्याय 103

राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ का आदेश

राम अपने राज्य की समृद्धि और पुत्रेष्टि के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय करते हैं। वे भाइयों और ऋषियों से परामर्श कर यज्ञ की तैयारी का आदेश देते हैं।

विवरण

राम ने सुग्रीव, विभीषण आदि मित्रों के साथ मिलकर अयोध्या में सुखपूर्वक राज्य किया। कुछ समय पश्चात् उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करने का विचार किया, जो राजाओं के लिए सर्वोच्च यज्ञ माना जाता है। उन्होंने अपने भाइयों लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा वसिष्ठ आदि ऋषियों से विचार-विमर्श किया। सबने इसका समर्थन किया। राम ने यज्ञ के लिए स्वर्णमुखी अश्व को मुक्त करने का आदेश दिया और सेना सहित उसकी रक्षा का दायित्व भरत एवं शत्रुघ्न को सौंपा। यह सर्ग यज्ञ की तैयारियों का वर्णन करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०३

(राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ का आदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्र्युत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : राम ने रावण वध के बाद अयोध्या में सुखपूर्वक राज्य किया। अब वे अश्वमेध यज्ञ करना चाहते हैं, जो राजाओं के लिए सबसे बड़ा यज्ञ है। वे अपने भाइयों और ऋषियों से परामर्श कर यज्ञ की तैयारी का आदेश देते हैं।

🤔 राम का संकल्प और परामर्श (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः कालेन महता रामो राज्यं प्रशासति।
चिन्तयामास धर्मात्मा यज्ञार्थं सुमहामनाः॥
अश्वमेधो महायज्ञः सर्वपापप्रणाशनः।
कथं नु खलु कर्तव्यो मया राज्यमिहेच्छता॥
सुग्रीवश्च विभीषणश्च जाम्बवान्हनुमांस्तथा।
अङ्गदश्च महातेजाः सर्वे ते समुपस्थिताः॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्समेतान्धर्मवत्सलः।
अश्वमेधं चिकीर्षामि यज्ञं पापप्रणाशनम्॥
भवन्तः सानुमत्यन्तां यदि कार्यमिदं मम।
वसिष्ठप्रमुखाश्चापि ऋषयः समुपागताः॥
वसिष्ठः प्राह धर्मात्मन् यज्ञस्ते प्राप्तकालतः।
कुरुष्व नृपशार्दूल सर्वलोकहिताय वै॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कालेन = समय से; महता = बड़े; रामः = राम; राज्यम् = राज्य; प्रशासति = शासन करते हुए; चिन्तयामास = विचार किया; धर्मात्मा = धर्मात्मा; यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; सुमहामनाः = महामना; अश्वमेधः = अश्वमेध; महायज्ञः = महान यज्ञ; सर्वपापप्रणाशनः = सब पापों का नाश करने वाला; कथम् = कैसे; नु = तो; खलु = निश्चय; कर्तव्यः = करना चाहिए; मया = मुझे; राज्यम् = राज्य; इह = यहाँ; इच्छता = चाहते हुए; सुग्रीवः = सुग्रीव; च = और; विभीषणः = विभीषण; च = और; जाम्बवान् = जाम्बवान्; हनुमान् = हनुमान; तथा = तथा; अङ्गदः = अङ्गद; च = और; महातेजाः = महान तेजस्वी; सर्वे = सब; ते = वे; समुपस्थिताः = उपस्थित हुए; रामः = राम; प्रोवाच = बोले; तान् = उन; सर्वान् = सब; समेतान् = एकत्रित; धर्मवत्सलः = धर्मप्रिय; अश्वमेधम् = अश्वमेध; चिकीर्षामि = करना चाहता हूँ; यज्ञम् = यज्ञ; पापप्रणाशनम् = पापनाशक; भवन्तः = आप लोग; सानुमत्यन्ताम् = अनुमति दें; यदि = यदि; कार्यम् = कार्य; इदम् = यह; मम = मेरा; वसिष्ठप्रमुखाः = वसिष्ठ के नेतृत्व में; च = और; अपि = भी; ऋषयः = ऋषि; समुपागताः = आ गए; वसिष्ठः = वसिष्ठ; प्राह = बोले; धर्मात्मन् = हे धर्मात्मा; यज्ञः = यज्ञ; ते = तुम्हारे लिए; प्राप्तकालतः = उचित समय पर; कुरुष्व = करो; नृपशार्दूल = हे नृपश्रेष्ठ; सर्वलोकहिताय = सब लोकों के हित के लिए; वै = निश्चय।
📖 भावार्थ : बहुत समय बीत जाने पर, जब राम धर्मपूर्वक राज्य का शासन कर रहे थे, उनके मन में अश्वमेध यज्ञ करने का विचार आया। वे सोचने लगे कि यह यज्ञ सब पापों का नाश करने वाला है, अतः मुझे इसे कैसे करना चाहिए? उसी समय सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान्, हनुमान और अङ्गद आदि सभी वहाँ उपस्थित हुए। राम ने उन सबसे कहा: मैं अश्वमेध यज्ञ करना चाहता हूँ। आप सब अनुमति दें। तभी वसिष्ठ आदि ऋषि भी वहाँ आ गए। वसिष्ठ ने कहा: हे धर्मात्मा राम! यह यज्ञ तुम्हारे लिए उचित समय पर है। इसे करो, इससे सब लोकों का हित होगा। इस प्रकार राम ने अपने मित्रों और ऋषियों से परामर्श किया और यज्ञ का संकल्प लिया। यह दर्शाता है कि राजा को कोई भी महत्वपूर्ण कार्य करने से पहले विद्वानों और मंत्रियों से सलाह लेनी चाहिए।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
सुग्रीवः प्राह राजेन्द्र यज्ञस्ते प्राप्तकालतः।
वयं सर्वे करिष्यामः सेवनं तव शासनात्॥
विभीषणश्च प्रोवाच रामं प्रीतिपुरःसरम्।
अश्वमेधं महायज्ञं कुरुष्व नृपसत्तम॥
हनुमानपि तेजस्वी प्राञ्जलिः प्राह राघवम्।
आज्ञापय महाबाहो करिष्यामः सुदुष्करम्॥
एवं सर्वे समुत्साहा रामस्य वचनं प्रति।
बभूवुः परमप्रीता यज्ञार्थं समुपस्थिताः॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्समेतान्प्रियदर्शनः।
यद्येवं मुनयः सन्ति वसिष्ठप्रमुखास्तथा॥
अश्वमेधस्य यज्ञस्य विधिं वक्ष्यन्ति ते द्विजाः।
तथैव क्रियतां सर्वं यथाशास्त्रं यथाविधि॥
🔹 पदच्छेद : सुग्रीवः = सुग्रीव; प्राह = बोले; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; यज्ञः = यज्ञ; ते = तुम्हारे लिए; प्राप्तकालतः = उचित समय पर; वयम् = हम; सर्वे = सब; करिष्यामः = करेंगे; सेवनम् = सेवा; तव = तुम्हारे; शासनात् = आदेश से; विभीषणः = विभीषण; च = और; प्रोवाच = बोले; रामम् = राम से; प्रीतिपुरःसरम् = प्रेमपूर्वक; अश्वमेधम् = अश्वमेध; महायज्ञम् = महान यज्ञ; कुरुष्व = करो; नृपसत्तम = हे राजाओं में श्रेष्ठ; हनुमान् = हनुमान; अपि = भी; तेजस्वी = तेजस्वी; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; प्राह = बोले; राघवम् = राघव से; आज्ञापय = आज्ञा दो; महाबाहो = महाबाहो; करिष्यामः = करेंगे; सुदुष्करम् = अत्यन्त कठिन; एवम् = इस प्रकार; सर्वे = सब; समुत्साहाः = उत्साहित; रामस्य = राम के; वचनम् = वचन; प्रति = के प्रति; बभूवुः = हुए; परमप्रीताः = अत्यन्त प्रसन्न; यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; समुपस्थिताः = उपस्थित; रामः = राम; प्रोवाच = बोले; तान् = उन; सर्वान् = सब; समेतान् = एकत्रित; प्रियदर्शनः = प्रियदर्शन; यदि = यदि; एवम् = ऐसा है; मुनयः = मुनि; सन्ति = हैं; वसिष्ठप्रमुखाः = वसिष्ठ प्रमुख; तथा = तथा; अश्वमेधस्य = अश्वमेध; यज्ञस्य = यज्ञ के; विधिम् = विधि; वक्ष्यन्ति = बताएँगे; ते = वे; द्विजाः = द्विज; तथैव = वैसे ही; क्रियताम् = किया जाए; सर्वम् = सब; यथाशास्त्रम् = शास्त्रानुसार; यथाविधि = विधिपूर्वक।
📖 भावार्थ : सुग्रीव ने कहा: हे राजेन्द्र! यह यज्ञ उचित समय पर है। हम सब आपके आदेश से सेवा करेंगे। विभीषण ने भी प्रेमपूर्वक कहा: हे नृपसत्तम! आप अश्वमेध महायज्ञ कीजिए। हनुमान ने हाथ जोड़कर कहा: हे महाबाहो! आज्ञा दीजिए, हम सबसे कठिन कार्य भी करेंगे। इस प्रकार सभी ने उत्साहपूर्वक राम के वचन का समर्थन किया और यज्ञ के लिए तैयार हो गए। तब राम ने कहा: यदि ऐसा है, तो वसिष्ठ आदि मुनि यज्ञ की विधि बताएँगे। उसी के अनुसार शास्त्र और विधि से सब कार्य किए जाएँ। यह दर्शाता है कि राम न केवल धर्मात्मा थे, बल्कि शास्त्रों के अनुसार कार्य करने में भी विश्वास रखते थे। उन्होंने अपने मित्रों और ऋषियों के सहयोग से यज्ञ का बीड़ा उठाया।

🐎 यज्ञ की तैयारी और अश्व मोक्ष (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
ततः सुमन्त्रमाहूय रामः प्रोवाच धर्मवित्।
आनयस्व ममाज्ञप्त्या वाजिनं श्वेतमुत्तमम्॥
स तथेति प्रतिज्ञाय सुमन्त्रो राजशासनात्।
आजहार हयं दिव्यं सर्वलक्षणलक्षितम्॥
तमश्वं पूजयित्वा तु रामो वचनमब्रवीत्।
भरत शत्रुघ्न सुग्रीव सर्वे च सचिवाः स्थिताः॥
अयं हयो महाबाहो मुच्यतां विधिपूर्वकम्।
अनुगच्छत चैनं वै सेनया चतुरङ्गया॥
भरतः प्राह धर्मात्मा करिष्ये तव शासनम्।
अहं च शत्रुघ्नश्चैव सेनया परया सह॥
रामः प्रोवाच भद्रं वो यात सर्वे जयेन च।
रक्षितव्यो हयः सम्यक्छत्रुभ्यः सर्वतो भयात्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुमन्त्रम् = सुमन्त्र को; आहूय = बुलाकर; रामः = राम; प्रोवाच = बोले; धर्मवित् = धर्मज्ञ; आनयस्व = लाओ; ममाज्ञप्त्या = मेरी आज्ञा से; वाजिनम् = घोड़ा; श्वेतम् = सफेद; उत्तमम् = उत्तम; सः = उन्होंने; तथा = वैसे; इति = कहकर; प्रतिज्ञाय = स्वीकार कर; सुमन्त्रः = सुमन्त्र; राजशासनात् = राजा की आज्ञा से; आजहार = लाए; हयम् = घोड़ा; दिव्यम् = दिव्य; सर्वलक्षणलक्षितम् = सभी लक्षणों से युक्त; तम् = उस; अश्वम् = अश्व को; पूजयित्वा = पूजा कर; तु = तो; रामः = राम; वचनम् = वचन; अब्रवीत् = बोले; भरत = हे भरत; शत्रुघ्न = हे शत्रुघ्न; सुग्रीव = हे सुग्रीव; सर्वे = सब; च = और; सचिवाः = मंत्री; स्थिताः = स्थित; अयम् = यह; हयः = घोड़ा; महाबाहो = हे महाबाहु; मुच्यताम् = छोड़ा जाए; विधिपूर्वकम् = विधिपूर्वक; अनुगच्छत = पीछे चलो; च = और; एनम् = इस; वै = निश्चय; सेनया = सेना के साथ; चतुरङ्गया = चतुरंगिणी; भरतः = भरत; प्राह = बोले; धर्मात्मा = धर्मात्मा; करिष्ये = करूँगा; तव = तुम्हारा; शासनम् = आदेश; अहम् = मैं; च = और; शत्रुघ्नः = शत्रुघ्न; च = और; एव = ही; सेनया = सेना के साथ; परया = उत्तम; सह = सहित; रामः = राम; प्रोवाच = बोले; भद्रम् = कल्याण; वः = आपका; यात = जाओ; सर्वे = सब; जयेन = विजय के साथ; च = और; रक्षितव्यः = रक्षा करनी चाहिए; हयः = घोड़ा; सम्यक् = भलीभाँति; शत्रुभ्यः = शत्रुओं से; सर्वतः = सब ओर; भयात् = भय से।
📖 भावार्थ : तब राम ने सुमन्त्र को बुलाकर कहा: मेरी आज्ञा से उत्तम सफेद घोड़ा लाओ। सुमन्त्र ने आज्ञा स्वीकार की और राजा के आदेश से सभी लक्षणों से युक्त एक दिव्य घोड़ा लाया। राम ने उस अश्व की पूजा की और भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव तथा सभी मंत्रियों से कहा: हे महाबाहो! यह घोड़ा विधिपूर्वक छोड़ा जाए। तुम लोग चतुरंगिणी सेना के साथ इसकी रक्षा करते हुए पीछे चलो। भरत ने कहा: हे धर्मात्मा! मैं और शत्रुघ्न उत्तम सेना के साथ आपकी आज्ञा का पालन करेंगे। राम ने कहा: तुम सबका कल्याण हो, विजयी होकर लौटो। घोड़े की सब ओर से शत्रुओं के भय से रक्षा करनी होगी। यह अश्वमेध यज्ञ का प्रारम्भिक चरण था, जिसमें अश्व को स्वतंत्र विचरण के लिए छोड़ा जाता है और उसकी रक्षा के लिए सेना साथ चलती है। जो राजा उस अश्व को पकड़ता है, उससे युद्ध करना पड़ता है।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततस्ते सैन्यमादाय भरतः शत्रुघ्नस्तथा।
प्रययुः परमप्रीता हयं कान्तमनुव्रताः॥
रामोऽपि मुनिभिः सार्धं वसिष्ठप्रमुखैस्तथा।
यज्ञभूमिं परिक्रम्य चक्रे यज्ञस्य दीक्षणम्॥
स्वर्णाभरणसंयुक्ता वेदी कनकतोरणा।
कारिता विधिवद्रामेण यज्ञार्थं सुमनोहरा॥
ऋत्विजश्च समाहूता वेदवेदाङ्गपारगाः।
सर्वे समागता यज्ञे रामस्य च महात्मनः॥
एवं यज्ञः समारब्धो रामस्य विदितात्मनः।
अश्वमेधो महातेजा यत्र गाथा गयिष्यतः॥
अगस्त्य उवाच –
इति ते कथितं राम यज्ञारम्भं महात्मनः।
यथा त्वयाभ्यनुज्ञातं यज्ञार्थं च हयो मुतः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; ते = वे; सैन्यम् = सेना; आदाय = लेकर; भरतः = भरत; शत्रुघ्नः = शत्रुघ्न; तथा = तथा; प्रययुः = गए; परमप्रीताः = अत्यन्त प्रसन्न; हयम् = घोड़ा; कान्तम् = सुन्दर; अनुव्रताः = अनुसरण करते; रामः = राम; अपि = भी; मुनिभिः = मुनियों के साथ; सार्धम् = सहित; वसिष्ठप्रमुखैः = वसिष्ठ प्रमुख; तथा = तथा; यज्ञभूमिम् = यज्ञभूमि; परिक्रम्य = परिक्रमा कर; चक्रे = की; यज्ञस्य = यज्ञ की; दीक्षणम् = दीक्षा; स्वर्णाभरणसंयुक्ता = सुवर्णाभरणों से युक्त; वेदी = वेदी; कनकतोरणा = सोने के तोरणों वाली; कारिता = करवाई; विधिवत् = विधिपूर्वक; रामेण = राम ने; यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; सुमनोहरा = सुन्दर; ऋत्विजः = ऋत्विज; च = और; समाहूताः = बुलाए गए; वेदवेदाङ्गपारगाः = वेद-वेदांग में पारंगत; सर्वे = सब; समागताः = आए; यज्ञे = यज्ञ में; रामस्य = राम के; च = और; महात्मनः = महात्मा; एवम् = इस प्रकार; यज्ञः = यज्ञ; समारब्धः = आरम्भ हुआ; रामस्य = राम का; विदितात्मनः = ज्ञानी; अश्वमेधः = अश्वमेध; महातेजाः = महान तेजस्वी; यत्र = जहाँ; गाथाः = गाथाएँ; गयिष्यतः = गाई जाएँगी; अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; इति = इस प्रकार; ते = तुमसे; कथितम् = कहा; राम = हे राम; यज्ञारम्भम् = यज्ञ का आरम्भ; महात्मनः = महात्मा का; यथा = जैसे; त्वया = तुमने; अभ्यनुज्ञातम् = अनुमति दी; यज्ञार्थम् = यज्ञ के लिए; च = और; हयः = घोड़ा; मुतः = छोड़ा गया।
📖 भावार्थ : तब भरत और शत्रुघ्न सेना सहित अत्यन्त प्रसन्न होकर उस सुन्दर घोड़े के पीछे-पीछे चल दिए। राम ने वसिष्ठ आदि मुनियों के साथ यज्ञभूमि की परिक्रमा की और यज्ञ की दीक्षा ली। उन्होंने विधिपूर्वक सोने के आभूषणों और तोरणों से सुसज्जित एक सुन्दर वेदी बनवाई। वेद-वेदांग में पारंगत ऋत्विजों को बुलाया गया, जो यज्ञ में सम्मिलित हुए। इस प्रकार महात्मा राम का अश्वमेध यज्ञ आरम्भ हुआ, जिसमें आगे चलकर अद्भुत गाथाएँ गाई जाएँगी। अगस्त्य ने कहा: हे राम! इस प्रकार मैंने तुम्हें महात्मा के यज्ञ के आरम्भ की कथा सुनाई, कैसे तुमने आज्ञा दी और अश्व छोड़ा गया। यह सर्ग अश्वमेध यज्ञ के प्रारम्भ का वर्णन करता है, जो आगे चलकर लव-कुश द्वारा रामायण गाने का मंच बनेगा।

🔥 यज्ञ की दीक्षा और ऋत्विजों का आगमन (श्लोक २६-३५)

॥ श्लोक २६-३० ॥
ततः सुमन्त्रः शीघ्रं तु राजाज्ञां शिरसा वहन्।
आहूय विविधान्विप्रान्वेदविद्याविशारदान्॥
स्वर्णपात्राणि रत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च।
ददौ रामः स्वयं हृष्टो विप्रेभ्यो यज्ञवृद्धये॥
वसिष्ठः प्राह धर्मात्मन् यज्ञोयं सम्प्रवर्तताम्।
अग्निहोत्रादिकं सर्वं क्रियतां विधिपूर्वकम्॥
तथेति प्रतिजग्राह रामो वचनमुत्तमम्।
ऋत्विजश्च महाभागाः प्रणेमुस्तं नराधिपम्॥
एवं यज्ञः समारब्धो रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
अश्वे चरति भूतले पाल्यमाने महात्मना॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सुमन्त्रः = सुमन्त्र; शीघ्रम् = शीघ्र; तु = तो; राजाज्ञाम् = राजा की आज्ञा; शिरसा = शिर पर; वहन् = धारण कर; आहूय = बुलाकर; विविधान् = विविध; विप्रान् = ब्राह्मणों को; वेदविद्याविशारदान् = वेदविद्या में निपुण; स्वर्णपात्राणि = सोने के पात्र; रत्नानि = रत्न; वस्त्राणि = वस्त्र; आभरणानि = आभूषण; च = और; ददौ = दिए; रामः = राम; स्वयम् = स्वयं; हृष्टः = प्रसन्न; विप्रेभ्यः = ब्राह्मणों को; यज्ञवृद्धये = यज्ञ की वृद्धि के लिए; वसिष्ठः = वसिष्ठ; प्राह = बोले; धर्मात्मन् = हे धर्मात्मा; यज्ञः = यज्ञ; अयम् = यह; सम्प्रवर्तताम् = प्रारम्भ हो; अग्निहोत्रादिकम् = अग्निहोत्र आदि; सर्वम् = सब; क्रियताम् = किया जाए; विधिपूर्वकम् = विधिपूर्वक; तथा = वैसे; इति = कहकर; प्रतिजग्राह = स्वीकार किया; रामः = राम ने; वचनम् = वचन; उत्तमम् = उत्तम; ऋत्विजः = ऋत्विज; च = और; महाभागाः = महाभाग; प्रणेमुः = प्रणाम किया; तम् = उन्हें; नराधिपम् = नरेश; एवम् = इस प्रकार; यज्ञः = यज्ञ; समारब्धः = आरम्भ; रामस्य = राम का; अक्लिष्टकर्मणः = अक्लिष्ट कर्म वाले; अश्वे = अश्व; चरति = विचरता है; भूतले = भूतल पर; पाल्यमाने = पालन किए जाते हुए; महात्मना = महात्मा द्वारा।
📖 भावार्थ : तब सुमन्त्र ने राजा की आज्ञा से वेदविद्या में निपुण अनेक ब्राह्मणों को बुलाया। राम ने स्वयं प्रसन्न होकर उन ब्राह्मणों को सोने के पात्र, रत्न, वस्त्र और आभूषण दान में दिए, ताकि यज्ञ की वृद्धि हो। वसिष्ठ ने कहा: हे धर्मात्मा! यह यज्ञ प्रारम्भ हो। अग्निहोत्र आदि सब क्रियाएँ विधिपूर्वक की जाएँ। राम ने उनका वचन स्वीकार किया। ऋत्विजों ने राम को प्रणाम किया। इस प्रकार अक्लिष्टकर्मा राम का यज्ञ आरम्भ हुआ, और अश्व भूतल पर विचरता रहा, जिसकी रक्षा महात्मा भरत आदि कर रहे थे। यह सर्ग यज्ञ के आरम्भ और दीक्षा का वर्णन करता है। आगे के सर्गों में यज्ञ का विस्तार और लव-कुश के आगमन का वर्णन होगा।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
रामः प्राह मुनीन्सर्वान्यज्ञेऽस्मिन्मम सत्तमाः।
भवन्तः सानुगृह्णन्तु यथा स्यान्निष्फलो न हि॥
मुनयः प्राहुरव्यग्रा रामं सत्यपराक्रमम्।
यज्ञस्ते सफलो राजन्भविष्यति न संशयः॥
इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे यज्ञकर्म समारभन्।
रामः प्रीतमनाश्चासीद्ददौ दानान्यनेकशः॥
अगस्त्य उवाच –
एष ते राम यज्ञस्य प्रारम्भः कथितो मया।
यथावृत्तं यथाकालं शृणु त्वं परमाद्भुतम्॥
इति वाल्मीकिरामायणे उत्तरकाण्डे त्र्युत्तरशततमः सर्गः॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; प्राह = बोले; मुनीन् = मुनियों से; सर्वान् = सब; यज्ञे = यज्ञ में; अस्मिन् = इस; मम = मेरे; सत्तमाः = हे सत्पुरुष; भवन्तः = आप लोग; सानुगृह्णन्तु = अनुग्रह करें; यथा = जिससे; स्यात् = हो; निष्फलः = निष्फल; न = नहीं; हि = ही; मुनयः = मुनि; प्राहुः = बोले; अव्यग्राः = व्यग्रता रहित; रामम् = राम से; सत्यपराक्रमम् = सत्यपराक्रमी; यज्ञः = यज्ञ; ते = तुम्हारा; सफलः = सफल; राजन् = हे राजन्; भविष्यति = होगा; न = नहीं; संशयः = संदेह; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; मुनयः = मुनि; सर्वे = सब; यज्ञकर्म = यज्ञकर्म; समारभन् = आरम्भ किए; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; आसीत् = हुआ; ददौ = दिए; दानानि = दान; अनेकशः = अनेक प्रकार से; अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; एषः = यह; ते = तुमको; राम = हे राम; यज्ञस्य = यज्ञ का; प्रारम्भः = प्रारम्भ; कथितः = कहा; मया = मैंने; यथावृत्तम् = यथावृत्त; यथाकालम् = यथाकाल; शृणु = सुनो; त्वम् = तुम; परमाद्भुतम् = परम अद्भुत; इति = इस प्रकार; वाल्मीकिरामायणे = वाल्मीकि रामायण में; उत्तरकाण्डे = उत्तरकाण्ड में; त्र्युत्तरशततमः = १०३ वाँ; सर्गः = सर्ग।
📖 भावार्थ : राम ने सभी मुनियों से कहा: हे सत्पुरुषो! मेरे इस यज्ञ में आप सब कृपा करें, जिससे यह निष्फल न हो। मुनियों ने कहा: हे सत्यपराक्रमी राजन्! तुम्हारा यज्ञ निश्चय ही सफल होगा। ऐसा कहकर सभी मुनियों ने यज्ञकर्म आरम्भ किए। राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अनेक दान दिए। अगस्त्य ने कहा: हे राम! मैंने तुम्हें यज्ञ का यह प्रारम्भ यथावृत्त और यथाकाल सुनाया। अब आगे की अद्भुत कथा सुनो। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है। यह सर्ग अश्वमेध यज्ञ के आरम्भ का वर्णन करता है, जो आगे चलकर रामायण के गान का मंच तैयार करता है। राम के यज्ञ में दान और ऋत्विजों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि राजा को यज्ञों के माध्यम से धर्म का पालन और समाज का कल्याण करना चाहिए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🐎 अश्वमेध यज्ञ का महत्त्व

अश्वमेध यज्ञ राजाओं के लिए सर्वोच्च यज्ञ है। यह राज्य की समृद्धि, विजय और पुत्रप्राप्ति के लिए किया जाता है। राम का यह यज्ञ उनके धर्मराज्य की स्थापना और आगे के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है।

🤝 सहयोग और एकता

राम ने यज्ञ के लिए सभी भाइयों, मित्रों और ऋषियों का सहयोग लिया। यह दर्शाता है कि बड़े कार्यों में सबके सहयोग की आवश्यकता होती है। भरत और शत्रुघ्न ने अश्वरक्षा का दायित्व संभाला, जो उनकी निष्ठा को दर्शाता है।

📜 शास्त्रानुसार कर्म

राम ने वसिष्ठ के निर्देश पर शास्त्रानुसार यज्ञ किया। यह दर्शाता है कि धार्मिक कर्मों में शास्त्र विधि का पालन आवश्यक है।

🎶 भविष्य की गाथा

इस यज्ञ में ही आगे चलकर लव-कुश रामायण गाएँगे। इस प्रकार यह यज्ञ रामायण कथा के श्रवण का माध्यम बनेगा। यह संकेत करता है कि धार्मिक अनुष्ठान और कथा-कीर्तन का गहरा संबंध है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में बड़े कार्यों के लिए हमें योजना बनानी चाहिए और योग्य व्यक्तियों से परामर्श लेना चाहिए। धार्मिक कर्मों को शास्त्र विधि से करना चाहिए। सहयोग और एकता से ही बड़े कार्य सिद्ध होते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे त्र्युत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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