राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ का आदेश
राम अपने राज्य की समृद्धि और पुत्रेष्टि के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय करते हैं। वे भाइयों और ऋषियों से परामर्श कर यज्ञ की तैयारी का आदेश देते हैं।
विवरण
राम ने सुग्रीव, विभीषण आदि मित्रों के साथ मिलकर अयोध्या में सुखपूर्वक राज्य किया। कुछ समय पश्चात् उन्होंने अश्वमेध यज्ञ करने का विचार किया, जो राजाओं के लिए सर्वोच्च यज्ञ माना जाता है। उन्होंने अपने भाइयों लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा वसिष्ठ आदि ऋषियों से विचार-विमर्श किया। सबने इसका समर्थन किया। राम ने यज्ञ के लिए स्वर्णमुखी अश्व को मुक्त करने का आदेश दिया और सेना सहित उसकी रक्षा का दायित्व भरत एवं शत्रुघ्न को सौंपा। यह सर्ग यज्ञ की तैयारियों का वर्णन करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०३
(राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ का आदेश)
🔆 प्रस्तावना : राम ने रावण वध के बाद अयोध्या में सुखपूर्वक राज्य किया। अब वे अश्वमेध यज्ञ करना चाहते हैं, जो राजाओं के लिए सबसे बड़ा यज्ञ है। वे अपने भाइयों और ऋषियों से परामर्श कर यज्ञ की तैयारी का आदेश देते हैं।
🤔 राम का संकल्प और परामर्श (श्लोक १-१२)
चिन्तयामास धर्मात्मा यज्ञार्थं सुमहामनाः॥
अश्वमेधो महायज्ञः सर्वपापप्रणाशनः।
कथं नु खलु कर्तव्यो मया राज्यमिहेच्छता॥
सुग्रीवश्च विभीषणश्च जाम्बवान्हनुमांस्तथा।
अङ्गदश्च महातेजाः सर्वे ते समुपस्थिताः॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्समेतान्धर्मवत्सलः।
अश्वमेधं चिकीर्षामि यज्ञं पापप्रणाशनम्॥
भवन्तः सानुमत्यन्तां यदि कार्यमिदं मम।
वसिष्ठप्रमुखाश्चापि ऋषयः समुपागताः॥
वसिष्ठः प्राह धर्मात्मन् यज्ञस्ते प्राप्तकालतः।
कुरुष्व नृपशार्दूल सर्वलोकहिताय वै॥
वयं सर्वे करिष्यामः सेवनं तव शासनात्॥
विभीषणश्च प्रोवाच रामं प्रीतिपुरःसरम्।
अश्वमेधं महायज्ञं कुरुष्व नृपसत्तम॥
हनुमानपि तेजस्वी प्राञ्जलिः प्राह राघवम्।
आज्ञापय महाबाहो करिष्यामः सुदुष्करम्॥
एवं सर्वे समुत्साहा रामस्य वचनं प्रति।
बभूवुः परमप्रीता यज्ञार्थं समुपस्थिताः॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्समेतान्प्रियदर्शनः।
यद्येवं मुनयः सन्ति वसिष्ठप्रमुखास्तथा॥
अश्वमेधस्य यज्ञस्य विधिं वक्ष्यन्ति ते द्विजाः।
तथैव क्रियतां सर्वं यथाशास्त्रं यथाविधि॥
🐎 यज्ञ की तैयारी और अश्व मोक्ष (श्लोक १३-२५)
आनयस्व ममाज्ञप्त्या वाजिनं श्वेतमुत्तमम्॥
स तथेति प्रतिज्ञाय सुमन्त्रो राजशासनात्।
आजहार हयं दिव्यं सर्वलक्षणलक्षितम्॥
तमश्वं पूजयित्वा तु रामो वचनमब्रवीत्।
भरत शत्रुघ्न सुग्रीव सर्वे च सचिवाः स्थिताः॥
अयं हयो महाबाहो मुच्यतां विधिपूर्वकम्।
अनुगच्छत चैनं वै सेनया चतुरङ्गया॥
भरतः प्राह धर्मात्मा करिष्ये तव शासनम्।
अहं च शत्रुघ्नश्चैव सेनया परया सह॥
रामः प्रोवाच भद्रं वो यात सर्वे जयेन च।
रक्षितव्यो हयः सम्यक्छत्रुभ्यः सर्वतो भयात्॥
प्रययुः परमप्रीता हयं कान्तमनुव्रताः॥
रामोऽपि मुनिभिः सार्धं वसिष्ठप्रमुखैस्तथा।
यज्ञभूमिं परिक्रम्य चक्रे यज्ञस्य दीक्षणम्॥
स्वर्णाभरणसंयुक्ता वेदी कनकतोरणा।
कारिता विधिवद्रामेण यज्ञार्थं सुमनोहरा॥
ऋत्विजश्च समाहूता वेदवेदाङ्गपारगाः।
सर्वे समागता यज्ञे रामस्य च महात्मनः॥
एवं यज्ञः समारब्धो रामस्य विदितात्मनः।
अश्वमेधो महातेजा यत्र गाथा गयिष्यतः॥
अगस्त्य उवाच –
इति ते कथितं राम यज्ञारम्भं महात्मनः।
यथा त्वयाभ्यनुज्ञातं यज्ञार्थं च हयो मुतः॥
🔥 यज्ञ की दीक्षा और ऋत्विजों का आगमन (श्लोक २६-३५)
आहूय विविधान्विप्रान्वेदविद्याविशारदान्॥
स्वर्णपात्राणि रत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च।
ददौ रामः स्वयं हृष्टो विप्रेभ्यो यज्ञवृद्धये॥
वसिष्ठः प्राह धर्मात्मन् यज्ञोयं सम्प्रवर्तताम्।
अग्निहोत्रादिकं सर्वं क्रियतां विधिपूर्वकम्॥
तथेति प्रतिजग्राह रामो वचनमुत्तमम्।
ऋत्विजश्च महाभागाः प्रणेमुस्तं नराधिपम्॥
एवं यज्ञः समारब्धो रामस्याक्लिष्टकर्मणः।
अश्वे चरति भूतले पाल्यमाने महात्मना॥
भवन्तः सानुगृह्णन्तु यथा स्यान्निष्फलो न हि॥
मुनयः प्राहुरव्यग्रा रामं सत्यपराक्रमम्।
यज्ञस्ते सफलो राजन्भविष्यति न संशयः॥
इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे यज्ञकर्म समारभन्।
रामः प्रीतमनाश्चासीद्ददौ दानान्यनेकशः॥
अगस्त्य उवाच –
एष ते राम यज्ञस्य प्रारम्भः कथितो मया।
यथावृत्तं यथाकालं शृणु त्वं परमाद्भुतम्॥
इति वाल्मीकिरामायणे उत्तरकाण्डे त्र्युत्तरशततमः सर्गः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🐎 अश्वमेध यज्ञ का महत्त्व
अश्वमेध यज्ञ राजाओं के लिए सर्वोच्च यज्ञ है। यह राज्य की समृद्धि, विजय और पुत्रप्राप्ति के लिए किया जाता है। राम का यह यज्ञ उनके धर्मराज्य की स्थापना और आगे के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण है।
🤝 सहयोग और एकता
राम ने यज्ञ के लिए सभी भाइयों, मित्रों और ऋषियों का सहयोग लिया। यह दर्शाता है कि बड़े कार्यों में सबके सहयोग की आवश्यकता होती है। भरत और शत्रुघ्न ने अश्वरक्षा का दायित्व संभाला, जो उनकी निष्ठा को दर्शाता है।
📜 शास्त्रानुसार कर्म
राम ने वसिष्ठ के निर्देश पर शास्त्रानुसार यज्ञ किया। यह दर्शाता है कि धार्मिक कर्मों में शास्त्र विधि का पालन आवश्यक है।
🎶 भविष्य की गाथा
इस यज्ञ में ही आगे चलकर लव-कुश रामायण गाएँगे। इस प्रकार यह यज्ञ रामायण कथा के श्रवण का माध्यम बनेगा। यह संकेत करता है कि धार्मिक अनुष्ठान और कथा-कीर्तन का गहरा संबंध है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में बड़े कार्यों के लिए हमें योजना बनानी चाहिए और योग्य व्यक्तियों से परामर्श लेना चाहिए। धार्मिक कर्मों को शास्त्र विधि से करना चाहिए। सहयोग और एकता से ही बड़े कार्य सिद्ध होते हैं।