उत्तर काण्ड अध्याय 101

पुरुरवा का जन्म

इला और बुध के पुत्र पुरुरवा के जन्म की कथा। इला सुद्युम्न की पुत्री थीं, जो शाप के कारण पुरुष से स्त्री बन गईं और बुध से उनका विवाह हुआ।

विवरण

राम के राज्याभिषेक के बाद अगस्त्य ऋषि रावण के वृत्तांत का वर्णन करते हैं। इसी क्रम में वे सोमवंश की उत्पत्ति और चन्द्रवंशी राजाओं का इतिहास सुनाते हैं। इस सर्ग में इला (सुद्युम्न की पुत्री) और बुध (चन्द्रमा के पुत्र) के मिलन तथा उनसे पुरुरवा के जन्म की कथा वर्णित है। पुरुरवा आगे चलकर चन्द्रवंश के प्रथम प्रतिष्ठित राजा बने। यह कथा वंशावली के साथ-साथ शाप और वरदान के प्रभाव को भी दर्शाती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०१

(पुरुरवा का जन्म)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोत्तरशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण कथा के पश्चात अगस्त्य मुनि अब सोमवंश की उत्पत्ति सुनाते हैं। इसी क्रम में इला – जो पूर्व में राजा सुद्युम्न थे और शापवश स्त्री बन गए – और चन्द्रपुत्र बुध के मिलन तथा उनसे पुरुरवा के जन्म की कथा आती है।

🌀 इला का पूर्व वृत्त (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच –
शृणु राम महाबाहो वंशं सोमस्य कीर्तिमान्।
यथा प्रवृत्तो लोकेषु चन्द्रवंशः सनातनः॥
इला नाम पुरा राजा सुद्युम्न इति विश्रुतः।
मनोः पुत्रो महातेजाः सर्वलोकेषु पूजितः॥
स कदाचिद्वनं गत्वा शिवस्य च गिरेः प्रियम्।
अपश्यत्स्त्रीगणं क्रीडत्स्त्रीभूतः शापमोहितः॥
या शिवेन पुरा दत्ता शापः स्त्रीत्वं गमिष्यति।
स चापि गन्धमादन्यामुमाख्यं सर आश्रितः॥
🔹 पदच्छेद : अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; शृणु = सुनो; राम = हे राम; महाबाहो = महाबाहु; वंशम् = वंश; सोमस्य = सोम का; कीर्तिमान् = कीर्तिमान्; यथा = जैसे; प्रवृत्तः = प्रवृत्त हुआ; लोकेषु = लोकों में; चन्द्रवंशः = चन्द्रवंश; सनातनः = सनातन; इला = इला; नाम = नाम; पुरा = पूर्व में; राजा = राजा; सुद्युम्नः = सुद्युम्न; इति = इस प्रकार; विश्रुतः = प्रसिद्ध; मनोः = मनु के; पुत्रः = पुत्र; महातेजाः = महान तेजस्वी; सर्वलोकेषु = सभी लोकों में; पूजितः = पूजित; सः = वह; कदाचित् = कभी; वनम् = वन; गत्वा = जाकर; शिवस्य = शिव के; च = और; गिरेः = पर्वत के; प्रियम् = प्रिय; अपश्यत् = देखा; स्त्रीगणम् = स्त्रियों के समूह; क्रीडत् = खेलते हुए; स्त्रीभूतः = स्त्री बने; शापमोहितः = शाप से मोहित; या = जो; शिवेन = शिव ने; पुरा = पूर्व; दत्ता = दिया; शापः = शाप; स्त्रीत्वम् = स्त्रीपन; गमिष्यति = जायेंगे; सः = वह; च = और; अपि = भी; गन्धमादन्याम् = गन्धमादन पर्वत पर; उमाख्यम् = उमा नामक; सरः = सरोवर; आश्रितः = आश्रित।
📖 भावार्थ : अगस्त्य मुनि ने राम से कहा: हे महाबाहो राम! अब मैं तुम्हें सोमवंश का वर्णन सुनाता हूँ, जो सनातन चन्द्रवंश के नाम से विख्यात है। पूर्वकाल में राजा सुद्युम्न हुए, जो मनु के पुत्र थे और इला के नाम से भी जाने जाते थे। वे अत्यन्त तेजस्वी और सभी लोकों में पूजित थे। एक बार वे वन में शिकार के लिए गए। वहाँ शिव के प्रिय पर्वत के पास वे उमा नामक सरोवर पर पहुँचे। उस सरोवर में स्नान करते ही वे स्त्री बन गए, क्योंकि शिव ने पहले वरदान दिया था कि इस सर में प्रवेश करने वाला पुरुष स्त्री बन जाएगा। इस प्रकार सुद्युम्न इला नामक सुन्दरी स्त्री बन गईं। वहाँ उन्होंने अप्सराओं के समान स्त्रियों के समूह को देखा और वह उनके साथ विचरने लगीं। यह घटना शाप और वरदान के प्रभाव को दर्शाती है, जो मनुष्य के जीवन को पूरी तरह बदल सकते हैं।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः सा स्त्रीत्वमापन्ना रेमे राम वने सुखम्।
चचार विविधान्देशान्सखीभिः परिवारिता॥
बुधो नाम ग्रहः श्रीमान्सोमपुत्रो महायशाः।
स ददर्श वने रम्ये इलां कमललोचनाम्॥
तां दृष्ट्वा मुमुहे राजन्कन्दर्पशरपीडितः।
उवाच मधुरां वाणीं सान्त्वपूर्वं महामतिः॥
का त्वं कमलपत्राक्षि कस्य पुत्री वरानने।
किमर्थं तप्यते भीरु कथयस्व यदिच्छसि॥
इला प्राह तदा विप्रं बुधं ज्ञात्वा ग्रहोत्तमम्।
राजपुत्री महाभाग सुद्युम्नस्य प्रिया सुता॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सा = वह; स्त्रीत्वम् = स्त्रीपन; आपन्ना = प्राप्त कर; रेमे = क्रीड़ा की; राम = हे राम; वने = वन में; सुखम् = सुखपूर्वक; चचार = घूमी; विविधान् = विविध; देशान् = देशों में; सखीभिः = सखियों से; परिवारिता = घिरी; बुधः = बुध; नाम = नाम; ग्रहः = ग्रह; श्रीमान् = श्रीमान्; सोमपुत्रः = सोमपुत्र; महायशाः = महायशस्वी; सः = वह; ददर्श = देखा; वने = वन में; रम्ये = रमणीय; इलाम् = इला को; कमललोचनाम् = कमलनयनी; ताम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; मुमुहे = मोहित हुए; राजन् = हे राजन्; कन्दर्पशरपीडितः = कामदेव के बाणों से पीड़ित; उवाच = बोले; मधुराम् = मधुर; वाणीम् = वाणी; सान्त्वपूर्वम् = सान्त्वना सहित; महामतिः = महान बुद्धि वाले; का = कौन; त्वम् = तुम; कमलपत्राक्षि = कमलदल नयनी; कस्य = किसकी; पुत्री = पुत्री; वरानने = सुन्दर मुख वाली; किमर्थम् = किसलिए; तप्यते = तप करती हो; भीरु = डरपोक; कथयस्व = बताओ; यदि = यदि; इच्छसि = चाहो; इला = इला; प्राह = बोली; तदा = तब; विप्रम् = ब्राह्मण को; बुधम् = बुध; ज्ञात्वा = जानकर; ग्रहोत्तमम् = ग्रहों में श्रेष्ठ; राजपुत्री = राजपुत्री; महाभाग = महाभाग; सुद्युम्नस्य = सुद्युम्न की; प्रिया = प्रिय; सुता = पुत्री।
📖 भावार्थ : हे राम! इस प्रकार स्त्री रूप धारण कर इला वन में सखियों के साथ सुखपूर्वक विचरने लगी। वह विभिन्न स्थानों पर घूमती हुई एक रमणीक वन में पहुँची। उसी समय चन्द्रमा के पुत्र बुध नामक ग्रह (जो कि एक महान योगी और विद्वान थे) उधर आ निकले। उन्होंने इला को कमल के समान नेत्रों वाली अत्यन्त सुन्दरी देखा और कामदेव के बाणों से पीड़ित होकर उनसे बातचीत की। बुध ने मधुर वाणी में पूछा: हे कमलनयनी! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और इस वन में तुम क्यों तपस्या कर रही हो? तब इला ने बुध को पहचान लिया और कहा: मैं राजा सुद्युम्न की पुत्री इला हूँ। इस प्रकार दोनों के बीच प्रेम का सूत्रपात हुआ। यह मिलन पूर्व नियति के अनुसार हुआ, क्योंकि शाप और वरदान के कारण इला को यह रूप धारण करना ही था। बुध के मन में इला के प्रति गहरा आकर्षण उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर विवाह में परिणत हुआ।

💞 इला-बुध मिलन और विवाह (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
बुधः प्राह तदा देवीं प्रीत्या परमया युतः।
भार्या भव मम प्रीता गान्धर्वेण विधानतः॥
इलापि प्राह धर्मज्ञा बुधं प्रीतिपुरःसरम्।
अनुज्ञाता पिता यावन्न दद्याद्वरमुत्तमम्॥
बुधः प्राह पिता तेऽद्य वशिष्ठवचनात्पुरा।
स्त्रीत्वं प्राप्स्यसि कल्याणि मत्संगाद्बहुरूपिणी॥
एवं तौ समयं कृत्वा रेमाते ज्ञानिनौ वने।
बुधस्तु सोमपुत्रोऽसौ ग्रहरूपी महायशाः॥
इलायां जनयामास पुत्रं पुरुरवास्तथा।
स च राजा महातेजाः सोमवंशविवर्धनः॥
🔹 पदच्छेद : बुधः = बुध; प्राह = बोले; तदा = तब; देवीम् = देवी को; प्रीत्या = प्रेम से; परमया = परम; युतः = युक्त; भार्या = पत्नी; भव = बनो; मम = मेरी; प्रीता = प्रिय; गान्धर्वेण = गान्धर्व विवाह से; विधानतः = विधिपूर्वक; इला = इला; अपि = भी; प्राह = बोली; धर्मज्ञा = धर्मज्ञ; बुधम् = बुध से; प्रीतिपुरःसरम् = प्रेमपूर्वक; अनुज्ञाता = अनुमति; पिता = पिता; यावत् = जब तक; न = नहीं; दद्यात् = देते; वरम् = वर; उत्तमम् = उत्तम; बुधः = बुध; प्राह = बोले; पिता = पिता; ते = तुम्हारे; अद्य = अब; वशिष्ठवचनात् = वसिष्ठ के वचन से; पुरा = पूर्व; स्त्रीत्वम् = स्त्रीपन; प्राप्स्यसि = प्राप्त होगा; कल्याणि = कल्याणी; मत्संगात् = मेरे संग से; बहुरूपिणी = बहुरूपिणी; एवम् = इस प्रकार; तौ = वे दोनों; समयम् = प्रतिज्ञा; कृत्वा = करके; रेमाते = क्रीड़ा की; ज्ञानिनौ = ज्ञानी; वने = वन में; बुधः = बुध; तु = तो; सोमपुत्रः = सोमपुत्र; असौ = वह; ग्रहरूपी = ग्रह रूप में; महायशाः = महान यशस्वी; इलायाम् = इला में; जनयामास = उत्पन्न किया; पुत्रम् = पुत्र; पुरुरवा = पुरुरवा; तथा = भी; सः = वह; च = और; राजा = राजा; महातेजाः = महान तेजस्वी; सोमवंशविवर्धनः = सोमवंश बढ़ाने वाला।
📖 भावार्थ : तब बुध ने प्रेमपूर्वक इला से कहा: तुम गान्धर्व विवाह से मेरी पत्नी बनो। इला धर्मज्ञ थीं, उन्होंने उत्तर दिया: मेरे पिता की अनुमति के बिना यह उचित नहीं। बुध ने कहा: हे कल्याणी! तुम्हारे पिता ने वसिष्ठ के वचन से पहले ही तुम्हें स्त्री रूप में जाना है और मेरे संग से तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। इस प्रकार दोनों ने एक समझौता किया और वन में साथ रहने लगे। बुध, जो चन्द्रमा के पुत्र और ग्रह के अधिष्ठाता थे, ने इला से पुरुरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया। यह पुरुरवा ही आगे चलकर सोमवंश का प्रथम राजा बना। उसका जन्म अत्यन्त तेजस्वी था और उसने चन्द्रवंश को आगे बढ़ाया। यह घटना दर्शाती है कि कैसे शाप और वरदान के बीच भी ईश्वरीय योजना से महान वंशों की उत्पत्ति होती है। इला का स्त्री रूप में होना और बुध का उनसे मिलना पूर्व निर्धारित था, जिससे चन्द्रवंश की नींव पड़ी।
॥ श्लोक १६-२० ॥
जातमात्रे सुते तस्मिन्बुधः स्वर्गं गतः प्रभुः।
इलापि पुत्रमादाय वनं पुनरुपागमत्॥
पुरुरवा विवृद्धस्तु बाल एव महायशाः।
वेदाध्ययनसम्पन्नो धनुर्वेदे च निष्ठितः॥
एकदा मुनयः सर्वे समेतास्तीर्थकारणात्।
ददृशुस्तं नरश्रेष्ठं पुरुरवसमद्भुतम्॥
ऊचुश्च मुनयः सर्वे राजपुत्र निबोध मे।
त्वं राजा भविता लोके चन्द्रवंशस्य गौरवम्॥
इत्युक्त्वा मुनयः सर्वे जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम्।
पुरुरवा अपि प्रीतः प्रतिजग्राह तद्वचः॥
🔹 पदच्छेद : जातमात्रे = उत्पन्न होते ही; सुते = पुत्र; तस्मिन् = उस; बुधः = बुध; स्वर्गम् = स्वर्ग; गतः = चले गए; प्रभुः = प्रभु; इला = इला; अपि = भी; पुत्रम् = पुत्र; आदाय = लेकर; वनम् = वन; पुनः = फिर; उपागमत् = आ गई; पुरुरवा = पुरुरवा; विवृद्धः = बड़ा हुआ; तु = तो; बालः = बालक; एव = ही; महायशाः = महायशस्वी; वेदाध्ययनसम्पन्नः = वेदों का अध्ययन करने वाला; धनुर्वेदे = धनुर्वेद में; च = और; निष्ठितः = निष्णात; एकदा = एक दिन; मुनयः = मुनि; सर्वे = सब; समेताः = एकत्रित; तीर्थकारणात् = तीर्थ के कारण; ददृशुः = देखा; तम् = उस; नरश्रेष्ठम् = नरश्रेष्ठ; पुरुरवसम् = पुरुरवा को; अद्भुतम् = अद्भुत; ऊचुः = बोले; च = और; मुनयः = मुनि; सर्वे = सब; राजपुत्र = हे राजपुत्र; निबोध = सुनो; मे = मेरी; त्वम् = तुम; राजा = राजा; भविता = होगे; लोके = लोक में; चन्द्रवंशस्य = चन्द्रवंश का; गौरवम् = गौरव; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; मुनयः = मुनि; सर्वे = सब; जग्मुः = गए; स्वम् = अपने; स्वम् = अपने; निवेशनम् = आश्रम; पुरुरवाः = पुरुरवा; अपि = भी; प्रीतः = प्रसन्न; प्रतिजग्राह = स्वीकार किया; तत् = उनका; वचः = वचन।
📖 भावार्थ : पुत्र के जन्म के बाद बुध स्वर्ग लौट गए। इला पुत्र को लेकर वन में ही रहने लगी। पुरुरवा बड़ा हुआ और अत्यन्त तेजस्वी बालक था। उसने वेदों का अध्ययन किया और धनुर्वेद में निपुणता प्राप्त की। एक बार सभी मुनि तीर्थयात्रा के लिए एकत्रित हुए और उन्होंने पुरुरवा को देखा। वे उसकी विद्वता और तेज से प्रभावित हुए और बोले: हे राजपुत्र! तुम चन्द्रवंश के गौरव बनोगे और राजा होगे। यह सुनकर पुरुरवा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने मुनियों के वचन को स्वीकार किया। इस प्रकार पुरुरवा का जन्म और उसकी भावी राजगद्दी की घोषणा हुई। यह घटना दर्शाती है कि जो महान कार्य करने वाले होते हैं, उनकी पहचान बाल्यकाल से ही हो जाती है। मुनियों का आशीर्वाद पाकर पुरुरवा आगे चलकर सोमवंश का प्रथम सम्राट बना, जिससे चन्द्रवंश की शाखा विस्तृत हुई।

👑 पुरुरवा का राज्याभिषेक और महिमा (श्लोक २१-३२)

॥ श्लोक २१-२६ ॥
ततः कालेन महता पुरुरवा महायशाः।
अभिषिक्तो नृपः सम्यक्प्रजापालनतत्परः॥
स राजा धर्मविद्वाग्मी शत्रुभिः परिवारितः।
चकार पृथिवीं सर्वां वशे वीर्येण धर्मतः॥
इलापि पुत्रं संप्रेक्ष्य राजानं धर्मवत्सलम्।
रेमे वने सखीभिश्च कृतकृत्येव भामिनी॥
पुरुरवसः कीर्तिर्या सोमवंशे प्रकाशते।
सा राम तव राज्येऽपि वर्तते धर्मनित्यया॥
अगस्त्य उवाच –
एष ते राम वंशस्य प्रथमः सोमजः स्मृतः।
पुरुरवा महातेजा यस्य कीर्तिः सनातनी॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; कालेन = समय से; महता = बड़े; पुरुरवा = पुरुरवा; महायशाः = महायशस्वी; अभिषिक्तः = राज्याभिषिक्त; नृपः = राजा; सम्यक् = सम्यक्; प्रजापालनतत्परः = प्रजापालन में तत्पर; सः = वह; राजा = राजा; धर्मवित् = धर्मज्ञ; वाग्मी = वाक्पटु; शत्रुभिः = शत्रुओं से; परिवारितः = घिरा हुआ; चकार = किया; पृथिवीम् = पृथ्वी; सर्वाम् = सब; वशे = वश में; वीर्येण = वीर्य से; धर्मतः = धर्मपूर्वक; इला = इला; अपि = भी; पुत्रम् = पुत्र; संप्रेक्ष्य = देखकर; राजानम् = राजा; धर्मवत्सलम् = धर्मप्रिय; रेमे = क्रीड़ा की; वने = वन में; सखीभिः = सखियों के साथ; च = और; कृतकृत्येव = कृतकृत्य सी; भामिनी = सुन्दरी; पुरुरवसः = पुरुरवा की; कीर्तिः = कीर्ति; या = जो; सोमवंशे = सोमवंश में; प्रकाशते = प्रकाशित होती है; सा = वह; राम = हे राम; तव = तुम्हारे; राज्येऽपि = राज्य में भी; वर्तते = विद्यमान है; धर्मनित्यया = धर्मनित्य से; अगस्त्यः = अगस्त्य; उवाच = बोले; एषः = यह; ते = तुमको; राम = राम; वंशस्य = वंश का; प्रथमः = प्रथम; सोमजः = सोमपुत्र; स्मृतः = माना गया; पुरुरवा = पुरुरवा; महातेजाः = महान तेजस्वी; यस्य = जिसकी; कीर्तिः = कीर्ति; सनातनी = सनातन; इति = इस प्रकार; आख्यानम् = आख्यान; समाकर्ण्य = सुनकर; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; सुखी = सुखी; उवाच = बोले; मुनिशार्दूलम् = मुनिश्रेष्ठ; कृतज्ञः = कृतज्ञ; सत्यविक्रमः = सत्यविक्रम।
📖 भावार्थ : कुछ समय बाद पुरुरवा का राज्याभिषेक हुआ और वह प्रजापालन में तत्पर हुआ। वह धर्मज्ञ, वाक्पटु और वीर राजा था। उसने अपने पराक्रम और धर्म से सम्पूर्ण पृथ्वी को वश में किया। इला अपने पुत्र को राजा देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुई और वन में सखियों के साथ सुखपूर्वक रहने लगी। पुरुरवा की कीर्ति सोमवंश में सदा प्रकाशित रही। अगस्त्य ने राम से कहा: हे राम! यह पुरुरवा सोमवंश का प्रथम राजा माना गया, जिसकी कीर्ति सनातन है। यह सुनकर राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अगस्त्य की स्तुति की। इस सर्ग में सोमवंश की उत्पत्ति और पुरुरवा के जन्म की कथा वर्णित है, जो आगे चलकर चन्द्रवंशी राजाओं की परम्परा का आधार बनी। पुरुरवा के जन्म से यह सिद्ध होता है कि शाप और वरदान के बीच भी ईश्वरीय योजना से महान पुरुषों का आविर्भाव होता है, जो धर्म की स्थापना करते हैं।
॥ श्लोक २७-३२ ॥
रामः प्राह कृतार्थोऽस्मि यदेतच्छ्रुतमद्भुतम्।
सोमवंशस्य चोत्पत्तिं पुरुरवस एव च॥
अद्य मे संशयः सर्वो गतो मुनिवरोत्तम।
यद्भवान्कृपया मह्यं कथितं पापनाशनम्॥
अगस्त्यः प्राह धर्मात्मन् यदन्यच्छ्रोतुमिच्छसि।
तद्वदामि महाबाहो निखिलेन यथातथम्॥
रामः प्राह भगवन् ब्रूहि यद्यस्ति श्रोतव्यमुत्तमम्।
वंशानां चरितं पुण्यं येन पूता भवेमहि॥
अगस्त्यः प्राह राजेन्द्र शृणुष्वावहितस्ततः।
इलायाः पुनरागम्यं पौरुषं च यथा भवेत्॥
इत्युक्त्वा विररामाथ मुनिर्गम्भीरया गिरा।
रामः प्रीतमनाश्चैव प्रशशंस मुहुर्मुहुः॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; प्राह = बोले; कृतार्थः = कृतार्थ; अस्मि = हूँ; यत् = जो; एतत् = यह; श्रुतम् = सुना; अद्भुतम् = अद्भुत; सोमवंशस्य = सोमवंश की; च = और; उत्पत्तिम् = उत्पत्ति; पुरुरवसः = पुरुरवा की; एव = ही; च = और; अद्य = आज; मे = मेरा; संशयः = संशय; सर्वः = सब; गतः = गया; मुनिवरोत्तम = हे मुनिश्रेष्ठ; यत् = जो; भवान् = आप; कृपया = कृपा से; मह्यम् = मुझे; कथितम् = कहा; पापनाशनम् = पापनाशक; अगस्त्यः = अगस्त्य; प्राह = बोले; धर्मात्मन् = हे धर्मात्मा; यत् = जो; अन्यत् = अन्य; श्रोतुम् = सुनना; इच्छसि = चाहते हो; तत् = वह; वदामि = कहूँगा; महाबाहो = महाबाहो; निखिलेन = सम्पूर्णता से; यथातथम् = यथार्थ; रामः = राम; प्राह = बोले; भगवन् = हे भगवन्; ब्रूहि = कहिए; यदि = यदि; अस्ति = है; श्रोतव्यम् = सुनने योग्य; उत्तमम् = उत्तम; वंशानाम् = वंशों का; चरितम् = चरित्र; पुण्यम् = पुण्यमय; येन = जिससे; पूताः = पवित्र; भवेमहि = हों; अगस्त्यः = अगस्त्य; प्राह = बोले; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; शृणुष्व = सुनो; अवहितः = ध्यान से; ततः = तब; इलायाः = इला के; पुनरागम्यम् = पुनः लौटने; पौरुषम् = पुरुषत्व; च = और; यथा = जैसे; भवेत् = हो; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; विरराम = रुके; अथ = तब; मुनिः = मुनि; गम्भीरया = गम्भीर; गिरा = वाणी से; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; च = और; एव = ही; प्रशशंस = प्रशंसा की; मुहुर्मुहुः = बारम्बार।
📖 भावार्थ : राम ने कहा: हे मुनिश्रेष्ठ! मैं कृतार्थ हो गया, यह अद्भुत कथा सुनकर। सोमवंश की उत्पत्ति और पुरुरवा के जन्म की यह कथा सुनकर मेरे सभी संशय दूर हो गए। आपकी कृपा से यह पापनाशक कथा सुनी। अगस्त्य ने कहा: हे धर्मात्मन्! यदि और कुछ सुनना चाहो तो कहूँ। राम बोले: हे भगवन्! यदि कोई उत्तम वंशों का पुण्य चरित्र हो तो कहिए, जिससे हम पवित्र हों। तब अगस्त्य ने कहा: हे राजेन्द्र! अब इला के पुनः पुरुष रूप में लौटने की कथा सुनो। ऐसा कहकर मुनि रुक गए और राम ने उनकी बारम्बार प्रशंसा की। यह सर्ग समाप्त होता है और अगले सर्ग में इला के पुनः पुरुष बनने की कथा आरम्भ होगी। इस प्रकार पुरुरवा के जन्म के साथ चन्द्रवंश की नींव पड़ी, जिसका विस्तार आगे चलकर महाभारत काल तक हुआ। राम की जिज्ञासा और अगस्त्य का उपदेश धर्म और वंश परम्परा के महत्त्व को दर्शाते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌙 चन्द्रवंश की उत्पत्ति

इस सर्ग में सोमवंश (चन्द्रवंश) के प्रथम राजा पुरुरवा के जन्म की कथा है। यह वंश आगे चलकर कुरुवंश, यादववंश आदि के रूप में विस्तृत हुआ। पुरुरवा का जन्म बुध और इला से हुआ, जो चन्द्रमा के पौत्र थे। इस प्रकार चन्द्रवंश की स्थापना हुई, जो भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण वंशावली है।

🔄 शाप और वरदान का रहस्य

इला का स्त्री रूप में परिवर्तन शाप के कारण हुआ, किन्तु इसी से बुध से मिलन हुआ और पुरुरवा का जन्म। यह दर्शाता है कि शाप भी कभी-कभी ईश्वरीय योजना का हिस्सा होते हैं, जिससे बड़े कार्य सिद्ध होते हैं। इला के बाद पुनः पुरुष बनने की कथा आगे आएगी, जो परिवर्तन और संतुलन का प्रतीक है।

👪 माता-पिता का योगदान

इला ने पुत्र पुरुरवा का पालन-पोषण वन में किया और उसे संस्कार दिए। बुध ने यद्यपि स्वर्ग गमन किया, किन्तु उनका आशीर्वाद पुत्र पर बना रहा। यह दर्शाता है कि माता-पिता का प्यार और संस्कार ही संतान को महान बनाते हैं।

📜 वंश परम्परा का महत्त्व

राम की जिज्ञासा वंशों के चरित्र के प्रति है। वे जानना चाहते हैं कि कैसे पूर्वजों ने धर्म की स्थापना की। यह हमें सिखाता है कि अपनी जड़ों और परम्पराओं को जानना आवश्यक है, क्योंकि उनसे ही हमारी पहचान बनती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भले ही परिस्थितियाँ कैसी भी हों, ईश्वर की योजना में सबका कुछ न कुछ उद्देश्य होता है। इला के स्त्री रूप में होने से चन्द्रवंश की उत्पत्ति हुई, जो आगे जाकर अनेक वीरों का वंश बना। हमें धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, फल की चिन्ता किए बिना।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे एकोत्तरशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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