उत्तर काण्ड अध्याय 100

बुध का इला से मिलन

इस सर्ग में इला के स्त्री रूप में चंद्रपुत्र बुध से मिलन और पुरूरवा के जन्म का विस्तृत वर्णन है। अंत में राम अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लेते हैं।

विवरण

अगस्त्य ऋषि राम को इला और बुध के मिलन की विस्तृत कथा सुनाते हैं। जब इला स्त्री रूप में थी, तब वह चंद्रपुत्र बुध के उद्यान में पहुँची। बुध उसकी सुंदरता पर मोहित हो गए और उन दोनों का विवाह हो गया। इस मिलन से पुरूरवा नामक पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर चंद्रवंश का प्रवर्तक बना। इला ने पुत्र प्राप्ति के बाद पुनः पुरुष रूप धारण कर लिया और राज्य करने लगी। यह सर्ग इला के जीवन की विचित्र गाथा को समाप्त करता है। अंत में अगस्त्य ऋषि राम को अश्वमेध यज्ञ की प्रेरणा देते हैं, जिसे सुनकर राम उस यज्ञ को करने का संकल्प लेते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १००

(बुध का इला से मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ शततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अगस्त्य ऋषि अब राम को इला और चंद्रपुत्र बुध के मिलन की विस्तृत कथा सुनाते हैं, जिससे चंद्रवंश के प्रवर्तक पुरूरवा का जन्म हुआ। इस कथा के अंत में वे राम को अश्वमेध यज्ञ की प्रेरणा भी देते हैं।

💞 बुध का विवाह प्रस्ताव (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
अगस्त्य उवाच।
ततः सा रजनी सर्वा व्यतीता राम तद्वने।
बुधेन सहिता राज्ञी रूपयौवनशालिनी॥
प्रभातायां तु शर्वर्यां बुधः प्रोवाच तामिलाम्।
भद्रे त्वं मम भार्या वै भविष्यसि न संशयः॥
अहं च तव भर्तास्मि पुत्रस्ते भविता महान्।
पुरूरवा इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य बुधस्याक्लिष्टकर्मणः।
प्रहृष्टवदना राज्ञी बुधं वचनमब्रवीत्॥
यदि त्वं मम भर्ता वै पुत्रश्च भविता महान्।
ततः प्रीतिर्मम महती नान्यत्किंचन कामये॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा: हे राम, तब वह रूप और यौवन से शालिनी राज्ञी इला बुध के साथ उस वन में समस्त रात्रि व्यतीत कर चुकी थी। प्रभात होने पर बुध ने उस इला से कहा: हे भद्रे, तुम निस्संदेह मेरी भार्या बनोगी। और मैं तुम्हारा पति हूँ। तुम्हारा महान पुत्र होगा, जो पुरूरवा के नाम से ख्यात होगा और तीनों लोकों में विख्यात होगा। अक्लिष्टकर्मा बुध के उन वचनों को सुनकर राज्ञी ने प्रसन्न मुख से बुध से कहा: यदि तुम मेरे पति हो और मेरा महान पुत्र होगा, तो मुझे अत्यंत प्रीति है। मैं और कुछ नहीं चाहती। इला के मन में अब एक नई आशा का संचार हुआ। उसने सोचा कि यद्यपि उसे शिव के शाप के कारण यह विचित्र स्थिति झेलनी पड़ रही है, परंतु अब उसे एक पति और पुत्र का सुख मिल रहा है। बुध न केवल सुंदर थे, बल्कि अत्यंत ज्ञानी और तेजस्वी भी थे। वे चंद्रमा के पुत्र थे, अतः उनका कुल भी अत्यंत प्रतिष्ठित था। इला ने सोचा कि इस मिलन से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह निश्चय ही महान होगा। बुध ने इला को आश्वस्त किया कि वह उसकी रक्षा करेगा और उसके इस रहस्य को भी छिपाए रखेगा। उन्होंने कहा कि जब तक इला स्त्री रूप में है, वह उसके साथ रहेगा, और जब वह पुरुष रूप धारण करे, तब वह अपने लोक चला जाएगा। इस प्रकार दोनों ने एक समझौता कर लिया।
॥ श्लोक ६-१० ॥
ततः सा बुधमामंत्र्य राज्ञी राम यथाक्रमम्।
जगाम स्वपुरं हृष्टा राज्ञा सुद्युम्नसंज्ञिता॥
तत्र गत्वा निविष्टा सा राज्ञी परमशोभना।
बुधोऽपि च ययौ स्थानं स्वमेव च यथाक्रमम्॥
मासे मासे तु सा राज्ञी बुधेन सह संगता।
पुत्रार्थं सुभगा राम चन्द्रपुत्रेण धीमता॥
ततः सा सम्भृता राज्ञी बुधेन सह संगता।
गर्भं धारयते राज्ञी कालेन महता तदा॥
📖 भावार्थ : तब वह राज्ञी इला यथाक्रम बुध से विदा लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर को लौट गई, जहाँ वह राजा सुद्युम्न के नाम से जानी जाती थी (पुरुष रूप में)। वहाँ जाकर वह परम शोभन राज्ञी निवास करने लगी। बुध भी यथाक्रम अपने स्थान को चले गए। हे राम, वह सुभगा राज्ञी प्रति मास उस धीमान चंद्रपुत्र बुध के साथ पुत्र की प्राप्ति के लिए संगत हुई। तब वह राज्ञी बुध के साथ संगत होकर गर्भ से युक्त हो गई और महान काल के बाद उसने गर्भ धारण किया। अब इला के जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ। वह प्रति मास जब स्त्री रूप में होती, तब बुध से मिलने जाती। यह मिलन गुप्त रूप से होता था, क्योंकि इला के राज्य में किसी को यह ज्ञात नहीं था कि उनका राजा सुद्युम्न वास्तव में इला है। कुछ समय पश्चात इला ने देखा कि वह गर्भवती है। उसके मन में अपार हर्ष हुआ। अब वह एक माँ बनने वाली थी। परंतु उसके सामने एक समस्या यह थी कि जब वह पुरुष रूप में होता, तो उसका गर्भ कैसे छिपा रहेगा? सौभाग्य से, उसके गर्भ का अधिकांश समय स्त्री रूप में ही बीता। जब वह पुरुष रूप में होता, तो उसके उदर में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता था। यह शिव के वरदान का ही प्रभाव था कि उसके दोनों रूपों में यह संतुलन बना रहा।

👶 पुरूरवा का जन्म (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः काले बहुतिथे राज्ञी पुत्रं व्यजायत।
पुरूरवसं नाम्ना तं बुधस्य रघुनन्दन॥
जातमात्रे तु तं पुत्रं बुधः परमधार्मिकः।
आजगाम तदा राज्ञीमिलां द्रष्टुं यदृच्छया॥
स दृष्ट्वा पुत्रमतुलं हर्षेण महतान्वितः।
उवाच वचनं राज्ञीं बुधः परमधार्मिकः॥
एष ते पुत्र राजेन्द्रि चन्द्रवंशविवर्धनः।
पुरूरवा इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥
राज्यं त्वमपि पुत्रस्य कुरु राम महामते।
इत्युक्त्वा बुधो राज्ञीं तामन्तर्धानं गतस्तदा॥
📖 भावार्थ : तब बहुत काल के पश्चात उस राज्ञी ने बुध से एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम पुरूरवा रखा गया। हे रघुनन्दन, वह बुध का पुत्र था। पुत्र के जन्म लेते ही परम धार्मिक बुध यदृच्छया उस राज्ञी इला को देखने के लिए आए। उन्होंने उस अद्वितीय पुत्र को देखा और अत्यधिक हर्ष से युक्त होकर परम धार्मिक बुध ने राज्ञी से कहा: हे राजेन्द्रि, यह तुम्हारा पुत्र है, जो चंद्रवंश को बढ़ाने वाला है। यह पुरूरवा के नाम से ख्यात होगा और तीनों लोकों में विख्यात होगा। हे महामते राम, तुम भी इस पुत्र के लिए राज्य करो। ऐसा कहकर बुध वहाँ अंतर्धान हो गए। पुरूरवा का जन्म एक अद्भु� घटना थी। वह जन्म लेते ही तेज से दीप्तिमान था। उसके शरीर से एक दिव्य कांति निकल रही थी। सभी ऋषि-मुनि और देवता उसे देखकर चकित रह गए। उन्होंने भविष्यवाणी की कि यह बालक बड़ा होकर एक महान सम्राट बनेगा और एक नए वंश की स्थापना करेगा। इला ने अपने पुत्र को देखा तो उसकी सारी पीड़ा समाप्त हो गई। उसे लगा कि शिव के शाप के बावजूद, उसके जीवन का यह सबसे सुखद क्षण है। उसने पुत्र का नाम पुरूरवा रखा, जिसका अर्थ है बहुतों द्वारा पुकारा जाने वाला या प्रसिद्ध। बुध ने पुत्र को आशीर्वाद दिया कि वह महान पराक्रमी, धर्मात्मा और यशस्वी होगा।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः सा राज्ञी पुत्रं संप्राप्य हर्षेण महतान्विता।
पुनः सा पुरुषो भूत्वा राज्यं चक्रे यथाविधि।
सुद्युम्न इति नाम्ना स विख्यातो रघुनन्दन।
पुरूरवास्तु राजेन्द्रो बभूव रघुनन्दन॥
इत्येषा ते कथा प्रोक्ता इलायाश्चरितं महत्।
यां श्रुत्वा पापनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि शक्रस्य चरितं महत्।
यथा यज्ञेन देवेन्द्रो मुक्तः पापेन वै पुरा॥
तच्छ्रुत्वा राघवो राजा यज्ञं कर्तुं मनो दधे।
📖 भावार्थ : तब वह राज्ञी इला पुत्र को प्राप्त करके अत्यधिक हर्ष से युक्त हो गई। फिर वह पुनः पुरुष बन गई और यथाविधि राज्य करने लगी। हे रघुनन्दन, वह सुद्युम्न के नाम से विख्यात हुआ। हे रघुनन्दन, राजेंद्र पुरूरवा भी हुए। इस प्रकार तुम्हें इला के महान चरित्र की यह कथा कही गई, जिसे सुनकर मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है और रुद्रलोक को प्राप्त होता है। इसके आगे मैं इंद्र के महान चरित्र का वर्णन करूंगा कि कैसे पूर्वकाल में देवेंद्र यज्ञ द्वारा पाप से मुक्त हुए थे। उसे सुनकर राजा राघव ने यज्ञ करने का मन बनाया। पुत्र प्राप्ति के बाद इला ने निर्णय लिया कि अब उसे अपने राज्य का भार पुत्र को सौंप देना चाहिए। उसने पुरूरवा को युवराज घोषित किया और उसे राजकाज की शिक्षा देना आरंभ किया। पुरूरवा ने बहुत कम आयु में ही राजकाज के सभी गुण सीख लिए। वह न्यायप्रिय, दानी और पराक्रमी था। इला (अब सुद्युम्न) ने देखा कि उसका पुत्र राज्य संभालने में पूर्णतः सक्षम है, तो उसने राज्य का पूरा भार उसे सौंप दिया और स्वयं वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण कर लिया। पुरूरवा ने बहुत समय तक धर्मपूर्वक राज्य किया और उसके वंश में आगे चलकर महान राजा नहुष, ययाति आदि हुए, जिनकी कथाएँ पुराणों में वर्णित हैं। इस प्रकार इला की यह अद्भुत कथा समाप्त होती है।

🐎 राम का अश्वमेध यज्ञ संकल्प (श्लोक २१-३८)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
अगस्त्य उवाच।
ततः स राजा रामस्तु श्रुत्वा वृत्रवधं महत्।
शक्रस्य च परां मुक्तिं यज्ञस्य च महात्मनः॥
प्रहृष्टवदनो भूत्वा अगस्त्यं वाक्यमब्रवीत्।
भगवन्केन यज्ञेन मुच्यते पातकान्नरः॥
तन्मे ब्रूहि महाभाग येन यज्ञेन मुच्यते।
अहमपि च यज्ञेन यक्ष्ये पापभयातुरः॥
अगस्त्य उवाच।
शृणु राम महाबाहो यज्ञानां यज्ञमुत्तमम्।
अश्वमेधं प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशनम्॥
येन देवाः पितृगणा गन्धर्वोरगराक्षसाः।
तृप्तिं परमिकां यान्ति दत्तेन विधिवन्नृप॥
अश्वमेधसहस्रं तु कृतं येन महात्मना।
स याति परमं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ऋषि ने कहा: तब उस राजा राम ने वृत्र के महान वध, इंद्र की परम मुक्ति और उस महान यज्ञ की कथा सुनकर प्रसन्न मुख से अगस्त्य से कहा: हे भगवन्, किस यज्ञ से मनुष्य पातकों से मुक्त होता है? हे महाभाग, मुझे वह बताइए, जिस यज्ञ से मनुष्य मुक्त होता है। मैं भी पाप के भय से व्याकुल होकर यज्ञ करना चाहता हूँ। अगस्त्य ने कहा: हे महाबाहो राम, सुनिए। मैं यज्ञों में उत्तम अश्वमेध यज्ञ का वर्णन करता हूँ, जो सभी पापों का नाश करने वाला है। हे नृप, जिस यज्ञ से देवता, पितृगण, गंधर्व, उरग और राक्षस विधिपूर्वक दिए गए दान से परम तृप्ति को प्राप्त होते हैं। जिस महात्मा ने हजारों अश्वमेध यज्ञ किए हैं, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है, जहाँ देवेश्वर महादेव विराजमान हैं। राम के मन में अब यह दृढ़ संकल्प उत्पन्न हुआ कि उन्हें अश्वमेध यज्ञ अवश्य करना चाहिए। उन्होंने देखा कि इंद्र जैसे देवराज भी ब्रह्महत्या के पाप से तभी मुक्त हो पाए जब उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया। यद्यपि राम स्वयं निरपराध थे, फिर भी उनके मन में यह भाव था कि एक राजा के रूप में उनसे अनजाने में कोई पाप हुआ हो, तो उसका प्रायश्चित आवश्यक है। साथ ही, उन्होंने यह भी सोचा कि अश्वमेध यज्ञ से उनके राज्य की कीर्ति और बढ़ेगी और समस्त प्रजा सुखी होगी। अतः उन्होंने अगस्त्य ऋषि से अश्वमेध यज्ञ की विधि के बारे में विस्तार से पूछना आरंभ किया।
॥ श्लोक २९-३८ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि यज्ञस्यास्य विधिं परम्।
यथाक्रमं यथान्यायं यथाशास्त्रं यथाविधि॥
अश्वमेधो महायज्ञः सर्वपापप्रणाशनः।
राज्ञां राज्यप्रदो नित्यं कीर्तिमान्सुखदस्तथा॥
तस्मात्त्वं रघुशार्दूल यज्ञेनानेन पावनः।
यजस्व विधिवद्राजन्सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे॥
इत्युक्त्वा भगवानगस्त्यो रामेण सहितस्तदा।
जगाम स्वाश्रमं पुण्यं देवगन्धर्वसेवितम्॥
रामोऽपि परमप्रीतः श्रुत्वा वाक्यमनुत्तमम्।
यज्ञाय मनसा चक्रे लक्ष्मणं चेदमब्रवीत्॥
सौमित्रे यज्ञसंभारान्सम्भर त्वं ममाज्ञया।
अश्वमेधेन यक्ष्येऽहं विधिवद्देवपूर्वकम्॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा लक्ष्मणेन सहानघः।
यज्ञाय मनसा चक्रे राघवः सत्यविक्रमः॥
📖 भावार्थ : अब मैं इस यज्ञ के परम विधि का वर्णन करूँगा, यथाक्रम, यथान्याय, यथाशास्त्र और यथाविधि। अश्वमेध महायज्ञ सभी पापों का नाश करने वाला है। यह राजाओं को नित्य राज्य प्रदान करने वाला, कीर्तिमान और सुखदायक है। इसलिए हे रघुशार्दूल, तुम इस यज्ञ से पवित्र होकर विधिपूर्वक यज्ञ करो। हे राजन, तुम सभी पापों से मुक्त हो जाओगे। ऐसा कहकर भगवान अगस्त्य राम के साथ देवगन्धर्वों द्वारा सेवित अपने पुण्य आश्रम को चले गए। राम भी उस अनुत्तम वाक्य को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और मन ही मन यज्ञ के लिए तैयार हो गए। उन्होंने लक्ष्मण से यह कहा: हे सौमित्र, मेरी आज्ञा से यज्ञ की सामग्री एकत्रित करो। मैं विधिपूर्वक देवताओं सहित अश्वमेध यज्ञ करूँगा। ऐसा कहकर अनघ राजा राघव ने लक्ष्मण के साथ मिलकर मन ही मन यज्ञ का संकल्प किया। यह सर्ग उत्तरकाण्ड के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। अब तक अगस्त्य ऋषि ने राम को अनेक कथाएँ सुनाईं - वृत्र की कथा, इंद्र की मुक्ति, इला की कथा। इन सभी कथाओं का उद्देश्य राम को अश्वमेध यज्ञ के लिए प्रेरित करना था। अब राम ने यह यज्ञ करने का दृढ़ निश्चय कर लिया है। अगले सर्गों में इसी यज्ञ का विस्तृत वर्णन होगा, जिसमें राम के पुत्र लव-कुश का राम से मिलन भी होगा। यह यज्ञ राम के राज्य के सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌙 चंद्रवंश की स्थापना

इस सर्ग में चंद्रवंश की स्थापना का वर्णन है। पुरूरवा के जन्म के साथ ही चंद्रवंश की नींव पड़ती है, जिसमें आगे चलकर महाभारत के कुरुवंशी राजा हुए। इस प्रकार यह सर्ग रामायण और महाभारत दो महाकाव्यों को जोड़ने का कार्य करता है।

🐎 अश्वमेध यज्ञ की तैयारी

यह सर्ग राम के अश्वमेध यज्ञ की पृष्ठभूमि तैयार करता है। अगस्त्य ऋषि की कथाओं का उद्देश्य राम को यज्ञ के लिए प्रेरित करना था। अब राम ने यज्ञ का संकल्प ले लिया है, जो आगे के सर्गों की कथा को आगे बढ़ाएगा।

🙏 गुरु की आज्ञा का पालन

राम ने अगस्त्य ऋषि की सभी कथाएँ ध्यानपूर्वक सुनीं और उनके द्वारा सुझाए गए यज्ञ को करने का संकल्प लिया। यह दर्शाता है कि राम गुरुजनों के प्रति कितने आज्ञाकारी और श्रद्धालु थे। वे केवल सुनकर ही नहीं रह गए, बल्कि उस पर अमल भी किया।

🔄 चक्र की पूर्णता

इस सर्ग के साथ उत्तरकाण्ड का एक चक्र पूरा होता है। प्रारंभ में अगस्त्य ऋषि ने रावण की कथा आरंभ की थी, और अब अंत में उन्होंने राम को अश्वमेध यज्ञ के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार उनका संवाद एक पूर्णता को प्राप्त होता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग की मुख्य शिक्षा यह है कि जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं, परंतु धैर्य और सद्कर्मों से हम हर परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। इला ने शाप को भी वरदान में बदल लिया और एक महान वंश की जननी बनी। राम ने गुरु की आज्ञा का पालन कर यज्ञ का संकल्प लिया, जो उनके धर्मपरायण जीवन का प्रतीक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे शततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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