बुध का इला से मिलन
इस सर्ग में इला के स्त्री रूप में चंद्रपुत्र बुध से मिलन और पुरूरवा के जन्म का विस्तृत वर्णन है। अंत में राम अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लेते हैं।
विवरण
अगस्त्य ऋषि राम को इला और बुध के मिलन की विस्तृत कथा सुनाते हैं। जब इला स्त्री रूप में थी, तब वह चंद्रपुत्र बुध के उद्यान में पहुँची। बुध उसकी सुंदरता पर मोहित हो गए और उन दोनों का विवाह हो गया। इस मिलन से पुरूरवा नामक पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर चंद्रवंश का प्रवर्तक बना। इला ने पुत्र प्राप्ति के बाद पुनः पुरुष रूप धारण कर लिया और राज्य करने लगी। यह सर्ग इला के जीवन की विचित्र गाथा को समाप्त करता है। अंत में अगस्त्य ऋषि राम को अश्वमेध यज्ञ की प्रेरणा देते हैं, जिसे सुनकर राम उस यज्ञ को करने का संकल्प लेते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १००
(बुध का इला से मिलन)
🔆 प्रस्तावना : अगस्त्य ऋषि अब राम को इला और चंद्रपुत्र बुध के मिलन की विस्तृत कथा सुनाते हैं, जिससे चंद्रवंश के प्रवर्तक पुरूरवा का जन्म हुआ। इस कथा के अंत में वे राम को अश्वमेध यज्ञ की प्रेरणा भी देते हैं।
💞 बुध का विवाह प्रस्ताव (श्लोक १-१०)
ततः सा रजनी सर्वा व्यतीता राम तद्वने।
बुधेन सहिता राज्ञी रूपयौवनशालिनी॥
प्रभातायां तु शर्वर्यां बुधः प्रोवाच तामिलाम्।
भद्रे त्वं मम भार्या वै भविष्यसि न संशयः॥
अहं च तव भर्तास्मि पुत्रस्ते भविता महान्।
पुरूरवा इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य बुधस्याक्लिष्टकर्मणः।
प्रहृष्टवदना राज्ञी बुधं वचनमब्रवीत्॥
यदि त्वं मम भर्ता वै पुत्रश्च भविता महान्।
ततः प्रीतिर्मम महती नान्यत्किंचन कामये॥
जगाम स्वपुरं हृष्टा राज्ञा सुद्युम्नसंज्ञिता॥
तत्र गत्वा निविष्टा सा राज्ञी परमशोभना।
बुधोऽपि च ययौ स्थानं स्वमेव च यथाक्रमम्॥
मासे मासे तु सा राज्ञी बुधेन सह संगता।
पुत्रार्थं सुभगा राम चन्द्रपुत्रेण धीमता॥
ततः सा सम्भृता राज्ञी बुधेन सह संगता।
गर्भं धारयते राज्ञी कालेन महता तदा॥
👶 पुरूरवा का जन्म (श्लोक ११-२०)
पुरूरवसं नाम्ना तं बुधस्य रघुनन्दन॥
जातमात्रे तु तं पुत्रं बुधः परमधार्मिकः।
आजगाम तदा राज्ञीमिलां द्रष्टुं यदृच्छया॥
स दृष्ट्वा पुत्रमतुलं हर्षेण महतान्वितः।
उवाच वचनं राज्ञीं बुधः परमधार्मिकः॥
एष ते पुत्र राजेन्द्रि चन्द्रवंशविवर्धनः।
पुरूरवा इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥
राज्यं त्वमपि पुत्रस्य कुरु राम महामते।
इत्युक्त्वा बुधो राज्ञीं तामन्तर्धानं गतस्तदा॥
पुनः सा पुरुषो भूत्वा राज्यं चक्रे यथाविधि।
सुद्युम्न इति नाम्ना स विख्यातो रघुनन्दन।
पुरूरवास्तु राजेन्द्रो बभूव रघुनन्दन॥
इत्येषा ते कथा प्रोक्ता इलायाश्चरितं महत्।
यां श्रुत्वा पापनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि शक्रस्य चरितं महत्।
यथा यज्ञेन देवेन्द्रो मुक्तः पापेन वै पुरा॥
तच्छ्रुत्वा राघवो राजा यज्ञं कर्तुं मनो दधे।
🐎 राम का अश्वमेध यज्ञ संकल्प (श्लोक २१-३८)
ततः स राजा रामस्तु श्रुत्वा वृत्रवधं महत्।
शक्रस्य च परां मुक्तिं यज्ञस्य च महात्मनः॥
प्रहृष्टवदनो भूत्वा अगस्त्यं वाक्यमब्रवीत्।
भगवन्केन यज्ञेन मुच्यते पातकान्नरः॥
तन्मे ब्रूहि महाभाग येन यज्ञेन मुच्यते।
अहमपि च यज्ञेन यक्ष्ये पापभयातुरः॥
अगस्त्य उवाच।
शृणु राम महाबाहो यज्ञानां यज्ञमुत्तमम्।
अश्वमेधं प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशनम्॥
येन देवाः पितृगणा गन्धर्वोरगराक्षसाः।
तृप्तिं परमिकां यान्ति दत्तेन विधिवन्नृप॥
अश्वमेधसहस्रं तु कृतं येन महात्मना।
स याति परमं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः॥
यथाक्रमं यथान्यायं यथाशास्त्रं यथाविधि॥
अश्वमेधो महायज्ञः सर्वपापप्रणाशनः।
राज्ञां राज्यप्रदो नित्यं कीर्तिमान्सुखदस्तथा॥
तस्मात्त्वं रघुशार्दूल यज्ञेनानेन पावनः।
यजस्व विधिवद्राजन्सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे॥
इत्युक्त्वा भगवानगस्त्यो रामेण सहितस्तदा।
जगाम स्वाश्रमं पुण्यं देवगन्धर्वसेवितम्॥
रामोऽपि परमप्रीतः श्रुत्वा वाक्यमनुत्तमम्।
यज्ञाय मनसा चक्रे लक्ष्मणं चेदमब्रवीत्॥
सौमित्रे यज्ञसंभारान्सम्भर त्वं ममाज्ञया।
अश्वमेधेन यक्ष्येऽहं विधिवद्देवपूर्वकम्॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा लक्ष्मणेन सहानघः।
यज्ञाय मनसा चक्रे राघवः सत्यविक्रमः॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🌙 चंद्रवंश की स्थापना
इस सर्ग में चंद्रवंश की स्थापना का वर्णन है। पुरूरवा के जन्म के साथ ही चंद्रवंश की नींव पड़ती है, जिसमें आगे चलकर महाभारत के कुरुवंशी राजा हुए। इस प्रकार यह सर्ग रामायण और महाभारत दो महाकाव्यों को जोड़ने का कार्य करता है।
🐎 अश्वमेध यज्ञ की तैयारी
यह सर्ग राम के अश्वमेध यज्ञ की पृष्ठभूमि तैयार करता है। अगस्त्य ऋषि की कथाओं का उद्देश्य राम को यज्ञ के लिए प्रेरित करना था। अब राम ने यज्ञ का संकल्प ले लिया है, जो आगे के सर्गों की कथा को आगे बढ़ाएगा।
🙏 गुरु की आज्ञा का पालन
राम ने अगस्त्य ऋषि की सभी कथाएँ ध्यानपूर्वक सुनीं और उनके द्वारा सुझाए गए यज्ञ को करने का संकल्प लिया। यह दर्शाता है कि राम गुरुजनों के प्रति कितने आज्ञाकारी और श्रद्धालु थे। वे केवल सुनकर ही नहीं रह गए, बल्कि उस पर अमल भी किया।
🔄 चक्र की पूर्णता
इस सर्ग के साथ उत्तरकाण्ड का एक चक्र पूरा होता है। प्रारंभ में अगस्त्य ऋषि ने रावण की कथा आरंभ की थी, और अब अंत में उन्होंने राम को अश्वमेध यज्ञ के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार उनका संवाद एक पूर्णता को प्राप्त होता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग की मुख्य शिक्षा यह है कि जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं, परंतु धैर्य और सद्कर्मों से हम हर परिस्थिति का सामना कर सकते हैं। इला ने शाप को भी वरदान में बदल लिया और एक महान वंश की जननी बनी। राम ने गुरु की आज्ञा का पालन कर यज्ञ का संकल्प लिया, जो उनके धर्मपरायण जीवन का प्रतीक है।