उत्तर काण्ड अध्याय 10

रावण की तपस्या और ब्रह्मा से वरदान

रावण ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे अमरत्व तथा देवताओं, दानवों, यक्षों आदि से अवध्य होने का वरदान माँगा। ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया, जिससे वह और अधिक अहंकारी हो गया।

विवरण

यह सर्ग रावण की तपस्या और उसके वरदानों का विस्तृत वर्णन करता है। रावण ने अपने पिता विश्रवा से सीख लेकर घोर तप किया। उसने दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या की, अंत में अपने सिर काटकर अग्नि में आहुति देने लगा। जब उसने नौ सिर काटकर आहुति दे दी, तब ब्रह्मा प्रकट हुए और उसे वरदान माँगने को कहा। रावण ने अमरत्व तो नहीं माँगा, लेकिन देवताओं, दानवों, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, सर्पों आदि से अवध्यता का वर माँगा। मनुष्यों से उसने कोई भय नहीं माना, इसलिए उनका नाम नहीं लिया। ब्रह्मा ने उसे वरदान दे दिया और साथ ही उसे अप्रतिम बल, ऐश्वर्य और लंका भी प्रदान की। इसके बाद रावण और अधिक दर्पी हो गया और उसने तीनों लोकों में उत्पात मचाना शुरू कर दिया।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १०

(रावण की तपस्या और ब्रह्मा से वरदान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ दशमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अब अगस्त्य ऋषि राम को रावण की उस घोर तपस्या के बारे में बताते हैं, जिसके फलस्वरूप उसे ब्रह्मा से अप्रतिम वरदान प्राप्त हुए। यह तपस्या ही उसकी शक्ति का मूल स्रोत है।

🧘 रावण का तप के लिए प्रस्थान (श्लोक १-१५)

॥ श्लोक १-८ ॥
अगस्त्य उवाच राम रावणो महातेजा विश्रवसः सुतः।
बाल्यात्प्रभृति दुर्धर्षो बलवान् सत्यविक्रमः॥
स कदाचिन्महारण्यं गत्वा तपसि संस्थितः।
दश वर्षसहस्राणि मासमेकं स्थितोऽभवत्॥
निराहारो महातेजा उर्ध्वबाहुर्दिवानिशम्।
ततः पञ्च सहस्राणि फलमूलाशनोऽभवत्॥
ततश्चान्यानि वर्षाणि पत्रभक्षो जलाशनः।
वायुभक्षस्ततः स्थित्वा दिव्यं वर्षसहस्रकम्॥
ततस्तु देवाः सत्रासा ब्रह्माणं शरणं ययुः।
रावणस्य तपो दृष्ट्वा प्रोचुर्भयसमन्विताः॥
भगवन् रावणो घोरं तपस्तपति दुस्तरम्।
यदि वरमवाप्नोति भविष्यति भयं महत्॥
तच्छ्रुत्वा देववचनं ब्रह्मा लोकपितामहः।
प्रोवाच प्रहसन् देवान् मा भैष्ट सुरसत्तमाः॥
नैष वध्यः सुरैः सर्वैर्न दानवमहोरगैः।
मनुष्येषु वधस्तस्य भविता नात्र संशयः॥
🔹 पदच्छेद : अगस्त्यः उवाच = अगस्त्य ने कहा; राम = हे राम; रावणः = रावण; महातेजाः = महान तेजस्वी; विश्रवसः = विश्रवा के; सुतः = पुत्र; बाल्यात् = बचपन से; प्रभृति = से; दुर्धर्षः = दुर्धर्ष; बलवान् = बलवान; सत्यविक्रमः = सत्य पराक्रमी; स = उसने; कदाचित् = कभी; महारण्यम् = महान वन में; गत्वा = जाकर; तपसि = तप में; संस्थितः = स्थित हुआ; दश = दस; वर्षसहस्राणि = हजार वर्ष; मासम् = महीना; एकम् = एक; स्थितः = रहा; अभवत् = हुआ; निराहारः = बिना आहार के; महातेजाः = महान तेजस्वी; ऊर्ध्वबाहुः = ऊर्ध्व बाहु; दिवानिशम् = दिन-रात; ततः = तब; पञ्च = पाँच; सहस्राणि = हजार; फलमूलाशनः = फल-मूल खाने वाला; अभवत् = हुआ; ततः = फिर; च = और; अन्यानि = अन्य; वर्षाणि = वर्ष; पत्रभक्षः = पत्ते खाने वाला; जलाशनः = जल पीने वाला; वायुभक्षः = वायु पीने वाला; ततः = फिर; स्थित्वा = रहकर; दिव्यम् = दिव्य; वर्षसहस्रकम् = हजार वर्ष; ततः = तब; तु = तो; देवाः = देवता; सत्रासाः = भय सहित; ब्रह्माणम् = ब्रह्मा को; शरणम् = शरण में; ययुः = गए; रावणस्य = रावण के; तपः = तप को; दृष्ट्वा = देखकर; प्रोचुः = कहा; भयसमन्विताः = भय से युक्त; भगवन् = हे भगवन्; रावणः = रावण; घोरम् = भयंकर; तपः = तप; तपति = तप रहा है; दुस्तरम् = दुस्तर; यदि = यदि; वरम् = वरदान; अवाप्नोति = पा लेता है; भविष्यति = होगा; भयम् = भय; महत् = बड़ा; तत् = वह; श्रुत्वा = सुनकर; देववचनम् = देवताओं के वचन; ब्रह्मा = ब्रह्मा; लोकपितामहः = लोकों के पितामह; प्रोवाच = बोले; प्रहसन् = हँसते हुए; देवान् = देवताओं से; मा भैष्ट = डरो मत; सुरसत्तमाः = हे श्रेष्ठ देवताओ; नैष = यह नहीं; वध्यः = मारा जा सकने वाला; सुरैः = देवताओं द्वारा; सर्वैः = सबसे; न = नहीं; दानवमहोरगैः = दानवों और महोरगों द्वारा; मनुष्येषु = मनुष्यों में; वधः = वध; तस्य = उसका; भविता = होगा; न = नहीं; अत्र = इसमें; संशयः = संदेह।
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा, "हे राम! विश्रवा के पुत्र रावण बचपन से ही दुर्धर्ष, बलवान और सत्यविक्रम थे। वह कभी एक महान वन में गया और वहाँ तपस्या में लीन हो गया। दस हजार वर्षों तक वह एक मास तक बिना आहार के, ऊर्ध्व बाहु होकर दिन-रात तप करता रहा। फिर पाँच हजार वर्षों तक वह केवल फल-मूल खाकर रहा। फिर अन्य वर्षों तक उसने केवल पत्ते खाए और जल पिया। फिर हजारों वर्षों तक वह केवल वायु पीकर रहा। तब उसके इस भयंकर तप को देखकर सभी देवता भयभीत होकर ब्रह्मा की शरण में गए। उन्होंने कहा, हे भगवन्! रावण अत्यंत भयंकर और दुस्तर तप कर रहा है। यदि उसे वरदान मिल गया, तो बहुत बड़ा भय उत्पन्न होगा। देवताओं के वचन सुनकर लोकपितामह ब्रह्मा हँसे और बोले, हे श्रेष्ठ देवताओ! डरो मत। यह न तो देवताओं द्वारा, न दानवों और महोरगों द्वारा मारा जा सकेगा। इसका वध मनुष्यों के द्वारा होगा, इसमें संदेह नहीं। यहाँ रावण की तपस्या की तीव्रता का वर्णन है, जो अद्भुत है। दस हजार वर्षों तक निराहार रहना असंभव-सा है। यह उसके संकल्प और शक्ति को दर्शाता है। देवताओं का भय और ब्रह्मा का आश्वासन यह बताता है कि रावण के वरदान का फल क्या होगा। ब्रह्मा ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी कि उसका वध मनुष्य द्वारा होगा, जो आगे चलकर राम के रूप में सत्य होती है।
॥ श्लोक ९-१५ ॥
इत्युक्त्वा देवदेवेशः सर्वान् देवान् विसृज्य च।
रावणं तपसा युक्तं द्रष्टुं समुपचक्रमे॥
तं दृष्ट्वा देवदेवेशो रावणं क्रोधमूर्च्छितम्।
निकृत्तशिरसं भूमौ पतितं रुधिरोक्षितम्॥
नवमं तु शिरश्छित्त्वा जुह्वानं च हुताशने।
ततः प्रीतमना ब्रह्मा प्रोवाच रजनीचरम्॥
वरं वृणीष्व भद्रं ते यथेष्टं प्रतिपादये।
तपसा ते महाराज प्रीतोऽस्मि नात्र संशयः॥
रावणः प्राह देवेश यदि प्रीतो वरप्रदः।
मम देवगणाः सर्वे न रक्षोगणपन्नगाः॥
न यक्षगन्धर्वसिद्धा न च दानवराक्षसाः।
प्रमथाश्च महात्मानो मां हिंस्युः संयुगे क्वचित्॥
एतमेव वरं देहि मम देव पितामह।
ब्रह्मा तथेति तं प्राह गच्छ पुत्र यथासुखम्॥
🔹 पदच्छेद : इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; देवदेवेशः = देवताओं के देव; सर्वान् = सब; देवान् = देवताओं को; विसृज्य = विदा करके; च = और; रावणम् = रावण को; तपसा = तप से; युक्तम् = युक्त; द्रष्टुम् = देखने; समुपचक्रमे = गए; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; देवदेवेशः = देवदेवेश; रावणम् = रावण को; क्रोधमूर्च्छितम् = क्रोध से मूर्च्छित; निकृत्तशिरसम् = कटे सिर वाले; भूमौ = भूमि पर; पतितम् = गिरे हुए; रुधिरोक्षितम् = रक्त से लथपथ; नवमम् = नौवाँ; तु = तो; शिरः = सिर; छित्त्वा = काटकर; जुह्वानम् = हवन करते हुए; च = और; हुताशने = अग्नि में; ततः = तब; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; ब्रह्मा = ब्रह्मा; प्रोवाच = बोले; रजनीचरम् = राक्षस से; वरम् = वरदान; वृणीष्व = माँगो; भद्रम् = कल्याण; ते = तुम्हारा; यथेष्टम् = इच्छानुसार; प्रतिपादये = दूँगा; तपसा = तप से; ते = तुम्हारे; महाराज = हे महाराज; प्रीतः = प्रसन्न; अस्मि = हूँ; न = नहीं; अत्र = इसमें; संशयः = संदेह; रावणः = रावण; प्राह = बोला; देवेश = हे देवेश; यदि = यदि; प्रीतः = प्रसन्न हो; वरप्रदः = वरदान देने वाले; मम = मुझे; देवगणाः = देवता; सर्वे = सब; न = नहीं; रक्षोगणपन्नगाः = राक्षस और पन्नग; न = नहीं; यक्षगन्धर्वसिद्धाः = यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध; न = नहीं; च = और; दानवराक्षसाः = दानव और राक्षस; प्रमथाः = प्रमथ गण; च = और; महात्मानः = महात्मा; माम् = मुझे; हिंस्युः = मारें; संयुगे = युद्ध में; क्वचित् = कभी; एतम् = यह; एव = ही; वरम् = वरदान; देहि = दो; मम = मुझे; देव = हे देव; पितामह = पितामह; ब्रह्मा = ब्रह्मा ने; तथा = ऐसा ही; इति = कहकर; तम् = उसे; प्राह = कहा; गच्छ = जाओ; पुत्र = हे पुत्र; यथासुखम् = सुखपूर्वक।
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर देवदेवेश ब्रह्मा ने सभी देवताओं को विदा किया और स्वयं रावण को देखने के लिए गए। वहाँ उन्होंने देखा कि रावण क्रोध से मूर्च्छित होकर, अपने कटे हुए सिरों के साथ भूमि पर रक्त से लथपथ पड़ा हुआ था और अपना नौवाँ सिर काटकर अग्नि में हवन कर रहा था। तब ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुए और उस राक्षस से बोले, "हे महाराज! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारे तप से अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहो वरदान माँग लो, मैं दूँगा।" रावण ने कहा, "हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि कोई भी देवता, राक्षस, पन्नग, यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध, दानव, राक्षस, प्रमथ आदि महात्मा मुझे युद्ध में कभी न मार सकें। हे पितामह! यही वरदान मुझे दीजिए।" ब्रह्मा ने तथास्तु कहकर उसे वरदान दे दिया और कहा, "हे पुत्र! सुखपूर्वक जाओ।" यहाँ रावण के तप की तीव्रता और बलिदान का अद्भुत वर्णन है। वह अपने सिर काट-काटकर अग्नि में आहुति दे रहा था, जो अत्यंत भीषण तपस्या है। ब्रह्मा प्रकट हुए और उसने देवताओं, दानवों आदि से अवध्यता का वर माँगा। उसने मनुष्यों का नाम नहीं लिया, क्योंकि उसे मनुष्यों से कोई भय नहीं था, और यही उसके विनाश का कारण बना। यह रावण के अहंकार और उसकी चूक को दर्शाता है।

🏆 वरदान और लंका की प्राप्ति (श्लोक १६-३२)

॥ श्लोक १६-२४ ॥
एवं दत्त्वा वरं तस्मै ब्रह्मा लोकपितामहः।
लङ्कां च त्रिषु लोकेषु दुर्धर्षां सम्प्रदत्तवान्॥
ततः प्रभृति दुष्टात्मा रावणः क्रोधनो भृशम्।
त्रींल्लोकान् पीडयामास सानुगो बलदर्पितः॥
न देवेषु न गन्धर्वेषु न यक्षेषु महात्मसु।
न रक्षःसु च सर्पेषु चकार स्पृहणां क्वचित्॥
अहंकारसमाविष्टो मदान्धो बलगर्वितः।
प्रजापतींश्च सर्वांश्च तिरस्कृत्य महाबलः॥
विचचार त्रिलोकेशो रावणो राक्षसाधिपः।
तस्य भ्राता महातेजाः कुम्भकर्णो महाबलः॥
विभीषणश्च धर्मात्मा नित्यं धर्मपरायणः।
रावणः प्राप्य तान् वरान् मदान्धः समजायत॥
कुम्भकर्णस्तु निद्रां च प्राप्य नित्यं सुखी भवत्।
विभीषणस्तु धर्मात्मा धर्मेण सततं रतः॥
🔹 पदच्छेद : एवम् = इस प्रकार; दत्त्वा = देकर; वरम् = वरदान; तस्मै = उसे; ब्रह्मा = ब्रह्मा ने; लोकपितामहः = लोकपितामह; लङ्काम् = लंका; च = और; त्रिषु = तीनों; लोकेषु = लोकों में; दुर्धर्षाम् = दुर्धर्ष; सम्प्रदत्तवान् = दे दी; ततः = तब; प्रभृति = से; दुष्टात्मा = दुष्टात्मा; रावणः = रावण; क्रोधनः = क्रोधी; भृशम् = अत्यधिक; त्रीन् = तीनों; लोकान् = लोकों को; पीडयामास = पीड़ित किया; सानुगः = सेना सहित; बलदर्पितः = बल के मद में चूर; न = नहीं; देवेषु = देवताओं में; न = नहीं; गन्धर्वेषु = गन्धर्वों में; न = नहीं; यक्षेषु = यक्षों में; महात्मसु = महात्मा; न = नहीं; रक्षःसु = राक्षसों में; च = और; सर्पेषु = सर्पों में; चकार = किया; स्पृहणाम् = स्पर्धा; क्वचित् = कभी; अहंकारसमाविष्टः = अहंकार से युक्त; मदान्धः = मदांध; बलगर्वितः = बल से गर्वित; प्रजापतीन् = प्रजापतियों को; च = और; सर्वान् = सबको; च = और; तिरस्कृत्य = तिरस्कार करके; महाबलः = महाबली; विचचार = विचरण किया; त्रिलोकेशः = तीनों लोकों का स्वामी; रावणः = रावण; राक्षसाधिपः = राक्षसों का अधिपति; तस्य = उसके; भ्राता = भाई; महातेजाः = महान तेजस्वी; कुम्भकर्णः = कुम्भकर्ण; महाबलः = महाबली; विभीषणः = विभीषण; च = और; धर्मात्मा = धर्मात्मा; नित्यम् = सदा; धर्मपरायणः = धर्मपरायण; रावणः = रावण; प्राप्य = पाकर; तान् = उन; वरान् = वरदानों को; मदान्धः = मदांध; समजायत = हो गया; कुम्भकर्णः = कुम्भकर्ण; तु = तो; निद्राम् = नींद; च = और; प्राप्य = पाकर; नित्यम् = सदा; सुखी = सुखी; भवत् = रहा; विभीषणः = विभीषण; तु = तो; धर्मात्मा = धर्मात्मा; धर्मेण = धर्म में; सततम् = सदा; रतः = लगे रहे।
📖 भावार्थ : इस प्रकार वरदान देने के बाद ब्रह्मा ने उसे तीनों लोकों में अविजिता लंका भी प्रदान कर दी। तब से वह दुष्टात्मा, क्रोधी रावण अपनी सेना सहित बल के मद में चूर होकर तीनों लोकों को पीड़ित करने लगा। उसने देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, सर्पों आदि में किसी से भी स्पर्धा नहीं की (अर्थात् सबको अपने अधीन कर लिया)। वह अहंकार से भरा हुआ, मदांध और बलगर्वित होकर सभी प्रजापतियों का तिरस्कार करते हुए, महाबली रावण तीनों लोकों में विचरण करने लगा। उसके भाई महातेजस्वी कुम्भकर्ण (महाबली) और धर्मात्मा विभीषण (सदा धर्मपरायण) थे। रावण उन वरदानों को पाकर मदांध हो गया। कुम्भकर्ण नींद का वर पाकर सदा सुखी रहा। और विभीषण धर्मात्मा होकर सदा धर्म में लगे रहे। यहाँ रावण के द्वारा वरदान प्राप्त करने के बाद उसके आचरण का वर्णन है। वह अहंकारी और अत्याचारी बन गया। उसने तीनों लोकों में अपना आतंक फैला दिया। उसके भाइयों के स्वभाव में भिन्नता स्पष्ट है। कुम्भकर्ण बलवान होते हुए भी निद्रा में निष्क्रिय है, जबकि विभीषण धर्म के मार्ग पर है। यह रामायण के मुख्य पात्रों की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
॥ श्लोक २५-३२ ॥
ततो रावणो दुर्मतिः सर्वलोकभयंकरः।
देवान् ऋषींश्च गन्धर्वान् यक्षान् सिद्धान् महोरगान्॥
बलात्कारेण वशगान् कृत्वा राज्यमकारयत्।
तस्य राज्यं समृद्धं च लङ्का चैव सुरक्षिता॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा पितृभक्त्या समन्वितः।
उपदेशं ददौ नित्यं रावणाय महात्मने॥
न च गृह्णाति दुर्मेधा रावणः पापनिश्चयः।
हित्वा धर्मं च सत्यं च वर्तते राक्षसैः सह॥
एवं वृत्तान्तमाख्याय अगस्त्यो मुनिसत्तमः।
विरराम तदा राजन् रामस्य प्रियकाम्यया॥
रामः प्रीतमनाः प्राह धन्योऽस्म्यनुगृहीतवान्।
भवता मुनिशार्दूल कथया पापनाशया॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां प्रददौ बहु।
ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; रावणः = रावण; दुर्मतिः = दुर्बुद्धि; सर्वलोकभयंकरः = सब लोकों के लिए भयंकर; देवान् = देवताओं को; ऋषीन् = ऋषियों को; च = और; गन्धर्वान् = गन्धर्वों को; यक्षान् = यक्षों को; सिद्धान् = सिद्धों को; महोरगान् = महोरगों को; बलात्कारेण = बलात्कार से; वशगान् = वश में; कृत्वा = करके; राज्यम् = राज्य; अकारयत् = करने लगा; तस्य = उसका; राज्यम् = राज्य; समृद्धम् = समृद्ध; च = और; लङ्का = लंका; चैव = और भी; सुरक्षिता = सुरक्षित; विभीषणः = विभीषण; तु = तो; धर्मात्मा = धर्मात्मा; पितृभक्त्या = पितृभक्ति से; समन्वितः = युक्त; उपदेशम् = उपदेश; ददौ = देता था; नित्यम् = सदा; रावणाय = रावण को; महात्मने = महान आत्मा को (यहाँ व्यंग्य); न = नहीं; च = और; गृह्णाति = ग्रहण करता था; दुर्मेधाः = दुर्बुद्धि; रावणः = रावण; पापनिश्चयः = पाप निश्चय वाला; हित्वा = त्यागकर; धर्मम् = धर्म को; च = और; सत्यम् = सत्य को; च = और; वर्तते = रहता है; राक्षसैः = राक्षसों के साथ; सह = साथ; एवम् = इस प्रकार; वृत्तान्तम् = वृत्तांत; आख्याय = कहकर; अगस्त्यः = अगस्त्य; मुनिसत्तमः = श्रेष्ठ मुनि; विरराम = रुक गए; तदा = तब; राजन् = हे राजन्; रामस्य = राम के; प्रियकाम्यया = प्रिय करने की इच्छा से; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; प्राह = बोले; धन्यः = धन्य; अस्मि = हूँ; अनुगृहीतवान् = अनुगृहीत हुआ; भवता = आपके द्वारा; मुनिशार्दूल = हे श्रेष्ठ मुनि; कथया = कथा से; पापनाशया = पापनाशिनी; इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; मुनीनाम् = मुनियों को; प्रददौ = दिया; बहु = बहुत कुछ; ततः = तब; ते = वे; मुनयः = मुनि; सर्वे = सब; ययुः = गए; स्वम् = अपने; स्वम् = अपने; निवेशनम् = आश्रम को।
📖 भावार्थ : तब वह दुर्बुद्धि, सब लोकों के लिए भयंकर रावण देवताओं, ऋषियों, गन्धर्वों, यक्षों, सिद्धों और महोरगों को बलपूर्वक वश में करके राज्य करने लगा। उसका राज्य समृद्ध था और लंका भी सुरक्षित थी। किंतु धर्मात्मा विभीषण, जो पितृभक्ति से युक्त थे, उस महात्मा (रावण) को सदा उपदेश दिया करते थे, किंतु दुर्बुद्धि और पापनिश्चयी रावण उनकी बात नहीं मानता था। उसने धर्म और सत्य को त्यागकर राक्षसों के साथ आचरण किया। हे राजन्! इस प्रकार वृत्तांत कहकर श्रेष्ठ मुनि अगस्त्य राम के प्रिय के लिए रुक गए। राम प्रसन्नचित्त होकर बोले, "हे श्रेष्ठ मुनि! मैं धन्य हुआ, आपकी इस पापनाशिनी कथा से मैं अनुगृहीत हूँ।" ऐसा कहकर राजा राघव ने मुनियों को बहुत कुछ दान दिया। तब वे सभी मुनि अपने-अपने आश्रमों को चले गए। यहाँ रावण के अत्याचारों का वर्णन है और विभीषण के उपदेशों की उपेक्षा। राम अगस्त्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह सर्ग रावण के चरित्र और उसकी शक्ति के स्रोत को पूरी तरह उजागर करता है, जो आगे चलकर राम-रावण युद्ध की पृष्ठभूमि बनता है।

🙏 उपसंहार और राम की प्रतिक्रिया (श्लोक ३३-५२)

॥ श्लोक ३३-४२ ॥
एवं मया समाख्यातं रावणस्य च यत्कृतम्।
तपश्च परमं दिव्यं वरदानं च यादृशम्॥
स त्वं धर्मेण राजेन्द्र पालयस्व महीमिमाम्।
यथा विष्णुः पुरा देवान् पालयामास धर्मतः॥
इति श्रुत्वा वचस्तस्य अगस्त्यस्य महात्मनः।
रामः प्रीतमनाः प्राह धर्मज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्ता अयोध्या नगरी मया।
यद् भवद्भिः कृता पूजा मुनीन्द्रैः सुरसत्तमैः॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां प्रददौ बहु।
ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
रामोऽपि परमप्रीतो भ्रातृभिः सहितस्तदा।
रेमे राज्ये सुखं प्राप्तो धर्मेण परिपालयन्॥
🔹 पदच्छेद : एवम् = इस प्रकार; मया = मेरे द्वारा; समाख्यातम् = कहा गया; रावणस्य = रावण का; च = और; यत् = जो; कृतम् = किया; तपः = तप; च = और; परमम् = परम; दिव्यम् = दिव्य; वरदानम् = वरदान; च = और; यादृशम् = जैसा; स = वह; त्वम् = तुम; धर्मेण = धर्म से; राजेन्द्र = हे राजेन्द्र; पालयस्व = पालन करो; महीम् = पृथ्वी; इमाम् = इस; यथा = जैसे; विष्णुः = विष्णु ने; पुरा = पूर्व में; देवान् = देवताओं को; पालयामास = पाला; धर्मतः = धर्म से; इति = इस प्रकार; श्रुत्वा = सुनकर; वचः = वचन; तस्य = उनके; अगस्त्यस्य = अगस्त्य के; महात्मनः = महात्मा के; रामः = राम; प्रीतमनाः = प्रसन्नचित्त; प्राह = बोले; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; सत्यविक्रमः = सत्य पराक्रमी; भगवन् = हे भगवन्; धन्यताम् = धन्यता; प्राप्ता = प्राप्त हुई; अयोध्या = अयोध्या; नगरी = नगरी; मया = मेरे द्वारा; यत् = जो; भवद्भिः = आपके द्वारा; कृता = की गई; पूजा = पूजा; मुनीन्द्रैः = मुनियों के इन्द्र; सुरसत्तमैः = श्रेष्ठ देवताओं द्वारा; अद्यप्रभृति = आज से; वक्ष्यामि = कहूँगा; पालयिष्ये = पालन करूँगा; महीम् = पृथ्वी को; इमाम् = इस; धर्मेण = धर्म से; नातिचारेण = अतिचार न करते हुए; भवताम् = आपकी; आज्ञया = आज्ञा से; मुने = हे मुने; इत्युक्त्वा = ऐसा कहकर; राघवः = राघव; राजा = राजा; मुनीनाम् = मुनियों को; प्रददौ = दिया; बहु = बहुत कुछ; ततः = तब; ते = वे; मुनयः = मुनि; सर्वे = सब; ययुः = गए; स्वम् = अपने; स्वम् = अपने; निवेशनम् = आश्रम को; रामः = राम; अपि = भी; परमप्रीतः = अत्यंत प्रसन्न; भ्रातृभिः = भाइयों के साथ; सहितः = सहित; तदा = तब; रेमे = रमण किया; राज्ये = राज्य में; सुखम् = सुख; प्राप्तः = पाकर; धर्मेण = धर्म से; परिपालयन् = पालन करते हुए।
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा, "इस प्रकार मैंने तुम्हें रावण द्वारा किए गए तप और उसे मिले वरदान का वर्णन किया। हे राजेन्द्र! तुम धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन करो, जैसे विष्णु ने पूर्व में देवताओं का धर्म से पालन किया था।" महात्मा अगस्त्य के ये वचन सुनकर धर्मज्ञ और सत्यविक्रम राम प्रसन्नचित्त होकर बोले, "हे भगवन्! आप मुनिश्रेष्ठों और श्रेष्ठ देवताओं ने मेरी जो पूजा की है, उससे मेरी अयोध्या नगरी धन्य हो गई है। हे मुने! आज से मैं आपकी आज्ञा से धर्म का उल्लंघन किए बिना इस पृथ्वी का पालन करूँगा।" ऐसा कहकर राजा राघव ने मुनियों को बहुत कुछ दान दिया। तब वे सभी मुनि अपने-अपने आश्रमों को चले गए। राम भी अत्यंत प्रसन्न होकर अपने भाइयों सहित राज्य में सुखपूर्वक रहने लगे और धर्म से प्रजा का पालन करने लगे। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है, जिसमें अगस्त्य ने रावण के तप और वरदानों की कथा पूरी की। राम ने धर्मपालन का संकल्प दोहराया। यह उत्तरकाण्ड के प्रारंभिक सर्गों का समापन है, जो रावण के चरित्र और उसकी शक्तियों का विस्तार से वर्णन करते हैं। अब आगे के सर्गों में रावण के कर्मों और उसके अंत की कथा होगी।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔥 रावण की तपस्या का महत्त्व

रावण ने जो घोर तप किया, वह अद्भुत है। उसने अपने सिर काटकर अग्नि में आहुति दी। यह उसके संकल्प और शक्ति को दर्शाता है। तप से ही उसे अपार बल और वरदान मिले।

🎁 वरदान और उसकी सीमा

रावण ने देवताओं, दानवों आदि से अवध्यता माँगी, पर मनुष्यों को नहीं। यह उसकी चूक थी, जो उसके विनाश का कारण बनी। यह बताता है कि अहंकारी अपने पतन के बीज स्वयं बोता है।

🏰 लंका का महत्त्व

ब्रह्मा ने रावण को लंका भी प्रदान की, जो एक सुरक्षित और समृद्ध नगरी थी। यह उसके ऐश्वर्य का प्रतीक है। लंका का वर्णन रामायण में बार-बार आता है।

⚖️ धर्म और अधर्म का संघर्ष

विभीषण के उपदेशों को अनसुना करके रावण ने अधर्म का मार्ग चुना। यह धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष को दर्शाता है, जो अंततः अधर्म के पतन में समाप्त होता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से शिक्षा मिलती है कि तप और साधना से अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं, किंतु उनका दुरुपयोग और अहंकार पतन का कारण बनता है। धर्म का मार्ग ही सदा श्रेयस्कर है। रावण के वरदानों में छिपी कमजोरी (मनुष्यों को छोड़ना) यह बताती है कि अहंकारी व्यक्ति अपनी कमजोरियों को नहीं देख पाता। राम का धर्मपालन का संकल्प आदर्श राजा का लक्षण है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे दशमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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