रावण वध के बाद ऋषियों का राम के दरबार में आगमन

राम के राज्याभिषेक के पश्चात विभिन्न ऋषि-मुनि उनके दरबार में आते हैं और रावण वध पर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। राम उनका सम्मान करते हैं और ऋषि अगस्त्य रावण के वृत्तांत का वर्णन प्रारंभ करते हैं।

विवरण

रावण वध के बाद राम अयोध्या लौट आते हैं और उनका राज्याभिषेक होता है। कुछ समय पश्चात अनेक ऋषि-मुनि, जिनमें अगस्त्य, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि प्रमुख हैं, राम के दरबार में पधारते हैं। वे राम की विजय की स्तुति करते हैं और रावण के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए धन्यवाद देते हैं। राम उनका यथोचित सत्कार करते हैं। तब अगस्त्य ऋषि राम से कहते हैं कि अब आप रावण के वंश और उसके पूर्व जन्म की कथा सुनें। इस प्रकार यह सर्ग उत्तरकाण्ड की भूमिका प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग १

(रावण वध के बाद ऋषियों का राम के दरबार में आगमन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण वध के पश्चात राम अयोध्या लौटे और राज्याभिषेक हुआ। कुछ समय बाद अनेक महर्षि उनके दरबार में पधारे। यह सर्ग उन ऋषियों के आगमन और राम द्वारा उनके सत्कार का वर्णन करता है।

🧘 ऋषियों का आगमन (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो रामेऽभिषिक्ते तु राज्ये वर्षगणैः सह।
ऋषयः सम्प्रहृष्टास्तु समाजग्मुर्यशस्विनः॥
वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे विश्वामित्रादयस्तथा।
अगस्त्यश्च महातेजा दीर्घतपा महामुनिः॥
ते रामं समुपागम्य राजानं धर्मवत्सलम्।
ऊचुः प्राञ्जलयो वाक्यं हर्षगद्गदया गिरा॥
जय राजन्महाबाहो रावणान्तकर प्रभो।
त्वया निहत्य दुष्टात्मा लोकाः स्वस्था भवन्तु वै॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; रामे = राम; अभिषिक्ते = राज्याभिषेक होने पर; तु = तो; राज्ये = राज्य में; वर्षगणैः = अनेक वर्षों तक; सह = साथ; ऋषयः = ऋषि; सम्प्रहृष्टाः = अत्यन्त प्रसन्न; समाजग्मुः = एकत्र हुए; यशस्विनः = यशस्वी; वसिष्ठप्रमुखाः = वसिष्ठ के नेतृत्व में; सर्वे = सभी; विश्वामित्रादयः = विश्वामित्र आदि; तथा = तथा; अगस्त्यः = अगस्त्य; च = और; महातेजाः = महान तेजस्वी; दीर्घतपाः = दीर्घ तपस्वी; महामुनिः = महामुनि; ते = वे; रामम् = राम के पास; समुपागम्य = आकर; राजानम् = राजा को; धर्मवत्सलम् = धर्मप्रिय; ऊचुः = बोले; प्राञ्जलयः = हाथ जोड़कर; वाक्यम् = वचन; हर्षगद्गदया = हर्ष से गद्गद; गिरा = वाणी से; जय = जय हो; राजन् = राजन्; महाबाहो = महाबाहु; रावणान्तकर = रावण का अन्त करने वाले; प्रभो = प्रभु; त्वया = आपके द्वारा; निहत्य = मारकर; दुष्टात्मा = दुष्ट आत्मा (रावण); लोकाः = लोग; स्वस्थाः = कुशल; भवन्तु = हों; वै = निश्चय।
📖 भावार्थ : उसके बाद राम के राज्याभिषेक के अनेक वर्षों बाद, सभी यशस्वी ऋषि अत्यन्त प्रसन्न होकर एकत्र हुए। वसिष्ठ, विश्वामित्र, और महातेजस्वी दीर्घतपा महामुनि अगस्त्य प्रमुख थे। वे धर्मवत्सल राजा राम के पास आए और हाथ जोड़कर हर्षित वाणी में बोले: "महाबाहो रावणान्तक प्रभो! आपकी जय हो। आपने दुष्ट रावण का वध करके सभी लोगों को कुशल किया।"
॥ श्लोक ५-८ ॥
रामः प्रोवाच तान्सर्वान्मुनिवृन्दान्कृताञ्जलिः।
स्वागतं वः महाभागाः पूजिताः सर्वकामदाः॥
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुखावहम्।
यद्भवन्तो महात्मानो दर्शनं मे प्रदत्तवान्॥
आसनान्यर्घ्यपाद्यं च गवां दानं च पार्थिवम्।
गृह्यतां भगवन्तोऽत्र यथोचितमनुत्तमम्॥
🔹 पदच्छेद : रामः = राम; प्रोवाच = बोले; तान् = उन; सर्वान् = सब; मुनिवृन्दान् = मुनियों को; कृताञ्जलिः = हाथ जोड़कर; स्वागतम् = स्वागत; वः = आपका; महाभागाः = महान भाग्यशाली; पूजिताः = पूजित; सर्वकामदाः = सभी मनोरथ देने वाले; अद्य = आज; मे = मेरा; सफलम् = सफल; जन्म = जन्म; जीवितम् = जीवन; च = और; सुखावहम् = सुखदायक; यत् = जो; भवन्तः = आप लोग; महात्मानः = महानुभाव; दर्शनम् = दर्शन; मे = मुझे; प्रदत्तवान् = दिए; आसनानि = आसन; अर्घ्यपाद्यम् = अर्घ्य और पाद्य; च = और; गवाम् = गायों का; दानम् = दान; च = और; पार्थिवम् = पार्थिव; गृह्यताम् = ग्रहण करें; भगवन्तः = हे भगवन्; अत्र = यहाँ; यथोचितम् = यथोचित; अनुत्तमम् = उत्तम।
📖 भावार्थ : राम ने हाथ जोड़कर उन सभी मुनियों से कहा: "महाभागों! आपका स्वागत है। आप सब पूज्य हैं और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। आज मेरा जन्म सफल हो गया और जीवन सुखदायक हो गया, क्योंकि आप महात्माओं ने मुझे दर्शन दिए। हे भगवन्! यहाँ आसन, अर्घ्य, पाद्य तथा गायों का दान आप यथोचित रूप से ग्रहण करें।"
॥ श्लोक ९-१२ ॥
एवं संपूजिताः सर्वे मुनयो धर्मकोविदाः।
आसनेषु महार्हेषु निषेदुः सुखमास्थिताः॥
रामोऽपि परमप्रीतस्तेषां मध्ये समास्थितः।
पप्रच्छ कुशलं सर्वं तपोविघ्नमकण्टकम्॥
ततः प्रोवाच मुनिराडगस्त्यो वेदपारगः।
शृणु राम महाबाहो कथां पापप्रणाशिनीम्॥
यथा रावण उत्पन्नो ब्रह्मणोऽनुग्रहात्पुरा।
वधश्चास्य महाबाहो त्वया धर्मभृतां वर॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार सभी धर्मज्ञ मुनियों ने पूजित होकर उत्तम आसनों पर सुखपूर्वक विराजमान हुए। राम भी अत्यन्त प्रसन्न होकर उनके मध्य बैठे और उनके कुशलक्षेम तथा तप में किसी प्रकार के विघ्न की बात पूछी। तब वेदपारंगत मुनिराज अगस्त्य ने कहा: "हे महाबाहो राम! सुनो, पापनाशिनी कथा। किस प्रकार पूर्वकाल में ब्रह्मा के वरदान से रावण उत्पन्न हुआ और हे धर्मवत्सल! तुमने उसका वध किया।"

🙏 राम का स्वागत और सत्कार (श्लोक १३-२५)

॥ श्लोक १३-१७ ॥
ततः सुमन्त्रः शीघ्रं तु राजाज्ञां शिरसा वहन्।
आहारं विविधं स्वादु मुनिभ्यः समुपाहरत्॥
मधुपर्कं च रत्नानि वस्त्राण्याभरणानि च।
ददौ रामः स्वयं हृष्टो मुनीनां भावितात्मनाम्॥
लक्ष्मणश्च महाबाहुः शत्रुघ्नो भरतस्तथा।
परिचर्यां मुनीनां ते चक्रुर्विनयशालिनः॥
सीता देवी च साध्वी च पतिव्रतपरायणा।
मुनीनां भार्यया सार्धं ददर्शाञ्जलिमादधत्॥
एवं सत्कारमासाद्य मुनयः परमर्षयः।
रामं परमधर्मज्ञं प्रशशंसुः पुनः पुनः॥
📖 भावार्थ : तब सुमन्त्र राजा की आज्ञा शिरोधार्य कर शीघ्र ही मुनियों के लिए विविध प्रकार के स्वादिष्ट भोजन लाए। राम ने स्वयं प्रसन्न होकर उन भावितात्मा मुनियों को मधुपर्क, रत्न, वस्त्र और आभूषण दिए। महाबाहु लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरत ने विनयशील होकर मुनियों की सेवा की। देवी सीता, जो साध्वी और पतिव्रता थीं, ने मुनियों की पत्नियों के साथ हाथ जोड़कर उनके दर्शन किए। इस प्रकार सत्कार पाकर परमर्षि मुनियों ने परम धर्मज्ञ राम की बारंबार प्रशंसा की।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
मुनयः प्राहुरव्यग्रा राघवं सत्यविक्रमम्।
त्वयि राज्ञि धर्मात्मन् लोकाः सर्वे सुखान्विताः॥
न शोचन्ति न तप्यन्ति न च व्याधिभयं क्वचित्।
सर्वे धर्मपरा नित्यं त्वत्प्रभावान्महामते॥
इदानीं किं करिष्यामो वयं सर्वे समागताः।
आज्ञापय महाबाहो वचनं नः करोतु भवान्॥
रामः प्रोवाच भद्रं वो मुनयः सत्यवादिनः।
यद् युष्माकमभिप्रेतं तन्मे ब्रूत न संशयः॥
अगस्त्यः प्राह धर्मात्मन् श्रोतुमिच्छामहे वयम्।
रावणस्य दुराचारस्य वृत्तान्तं पापनाशनम्॥
📖 भावार्थ : मुनियों ने सत्यविक्रम राघव से निश्चिंत होकर कहा: "हे धर्मात्मन्! आपके राज्य में सभी लोग सुखी हैं। न कोई शोक करता है, न संताप, न कहीं व्याधि का भय। हे महामते! आपके प्रभाव से सभी नित्य धर्मपरायण हैं। अब हम सब एकत्र होकर क्या करें? हे महाबाहो! आज्ञा दीजिए, हम आपका वचन पालन करेंगे।" राम ने कहा: "हे सत्यवादी मुनियो! आपका कल्याण हो। आप जो चाहते हैं, वह मुझे बताइए, इसमें संशय नहीं।" अगस्त्य ने कहा: "हे धर्मात्मन्! हम दुराचारी रावण के पापनाशक वृत्तान्त को सुनना चाहते हैं।"
॥ श्लोक २३-२५ ॥
रामः प्राह कृतार्थोऽस्मि यद् भवन्तः कथोत्सुकाः।
रावणस्य दुरात्मानो वधो मे हृदि संस्थितः॥
तत्कथ्यतां महाभाग यथावृत्तं यथाक्रमम्।
येन जानामि तत्सर्वं पौर्वापर्येण तत्त्वतः॥
इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठो रामेण प्रीतमानसः।
प्रवक्तुमुपचक्राम रावणस्य कथां तदा॥
📖 भावार्थ : राम ने कहा: "मैं कृतार्थ हूँ कि आप लोग कथा सुनने के लिए उत्सुक हैं। दुरात्मा रावण का वध मेरे हृदय में स्थित है। हे महाभाग! उसकी यथावृत्त, यथाक्रम कथा कहिए, जिससे मैं पूर्वापर सहित सब कुछ तत्त्व से जान सकूँ।" इस प्रकार राम के द्वारा कहे जाने पर वे मुनिश्रेष्ठ प्रीतमना होकर रावण की कथा कहने लगे।

📜 अगस्त्य का रावण कथा प्रारंभ (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-२९ ॥
अगस्त्यः प्राह राम त्वं शृणु राजीवलोचन।
रावणस्य दुरात्मानो यथा वृत्तं पुरातनम्॥
पुलस्त्यो ब्रह्मणः पुत्रो महातेजा महामुनिः।
तस्य पुत्रो विश्रवा नाम सर्वलोकेषु विश्रुतः॥
तस्य पुत्रो महातेजा रावणो नाम राक्षसः।
पितामहवरात्प्राप्तो देवदानवदुर्जयः॥
दशग्रीव इति ख्यातः सर्वलोकभयंकरः।
लोकान् धर्षयते सर्वान्ब्रह्मणो वरदर्पितः॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा: "हे राजीवलोचन राम! सुनो, दुरात्मा रावण का पुरातन वृत्त। ब्रह्मा के पुत्र महातेजस्वी महामुनि पुलस्त्य थे। उनके पुत्र विश्रवा हुए, जो सर्वलोक विश्रुत हैं। उनके पुत्र महातेजा रावण नामक राक्षस हुए, जिन्होंने पितामह ब्रह्मा के वरदान से देवताओं और दानवों से भी दुर्जयता प्राप्त की। वह दशग्रीव के नाम से ख्यात हुआ, जो सब लोकों के लिए भयकारी था। ब्रह्मा के वरदान के मद में चूर होकर वह सभी लोकों को पीड़ित करने लगा।"
॥ श्लोक ३०-३४ ॥
स कदाचिद्वनं गत्वा तपस्तप्त्वा सुदारुणम्।
दश वर्षसहस्राणि मासमेकं स्थितोऽभवत्॥
ततः प्रीतो महादेवस्तस्मै वरमदात्पुरा।
अवध्यत्वं नृलोके च स्वयं वव्रे स राक्षसः॥
ततश्च ब्रह्मणा प्रीतो दत्तं वरमनुत्तमम्।
राक्षसेन्द्रत्वमैश्वर्यं लङ्का चेयं सुरक्षिता॥
एवं स बलवान् जातो देवदानवदुर्जयः।
अत्याक्रमत लोकांस्त्रीन्ब्रह्मणो वरदर्पितः॥
तस्यान्तः समनुप्राप्तो रामस्त्वं रणमूर्धनि।
हतो दशमुखः पापो धर्मेण त्वं प्रतिष्ठितः॥
📖 भावार्थ : "वह कभी वन में जाकर दारुण तप करता था। दस हजार वर्षों तक एक मास तक स्थित रहकर तप किया। तब पूर्वकाल में महादेव प्रसन्न हुए और उसे वरदान दिया। उस राक्षस ने मनुष्यों से अवध्यता का वर माँगा। फिर ब्रह्मा जी प्रसन्न होकर उसे अनुत्तम वरदान देते हैं – राक्षसेन्द्र का ऐश्वर्य और यह सुरक्षित लंका। इस प्रकार वह बलवान हो गया और देवदानवों से दुर्जय हो गया। ब्रह्मा के वरदान के मद में वह तीनों लोकों को अत्याचारित करने लगा। उसका अन्त हे राम! तुमने रणभूमि में प्राप्त किया। पापी दशमुख मारा गया और तुम धर्म से प्रतिष्ठित हुए।"
॥ श्लोक ३५-३८ ॥
इत्याख्यानं समाकर्ण्य रामः प्रीतमनाः सुखी।
उवाच मुनिशार्दूलं कृतज्ञः सत्यविक्रमः॥
भगवन्धन्यतां प्राप्ता अयोध्या नगरी मया।
यद् भवद्भिः कृता पूजा मुनीन्द्रैः सुरसत्तमैः॥
अद्यप्रभृति वक्ष्यामि पालयिष्ये महीमिमाम्।
धर्मेण नातिचारेण भवतामाज्ञया मुने॥
इत्युक्त्वा राघवो राजा मुनीनां प्रददौ बहु।
ततस्ते मुनयः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम्॥
📖 भावार्थ : इस आख्यान को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए और कृतज्ञ होकर सत्यविक्रम मुनिश्रेष्ठ से बोले: "हे भगवन्! मेरे द्वारा अयोध्या नगरी धन्य हो गई, क्योंकि आप मुनीन्द्रों और सुरश्रेष्ठों ने मेरी पूजा की। आज से मैं आपकी आज्ञा से धर्म का उल्लंघन किए बिना इस पृथ्वी का पालन करूँगा।" ऐसा कहकर राजा राघव ने मुनियों को बहुत कुछ दान दिया। तब वे सभी मुनि अपने-अपने आश्रमों को चले गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 राम का राज्याभिषेक और धर्मराज्य

राम के राज्याभिषेक के बाद ऋषियों का आगमन यह दर्शाता है कि धर्म की स्थापना से सम्पूर्ण विश्व में संतोष छा जाता है। राम का सत्कार और मुनियों का आशीर्वाद उनके धर्मराज्य की नींव को मजबूत करता है।

📖 अगस्त्य द्वारा रावण कथा का प्रारम्भ

यह सर्ग उत्तरकाण्ड की मुख्य कथा – रावण के वंश और उसके पूर्वजन्म की कथा – का प्रवेश द्वार है। अगस्त्य ऋषि का वृत्तान्त सुनाना यह संकेत करता है कि अब हम रावण की उत्पत्ति और उसके कर्मों का विस्तार से जानेंगे।

🧘 ऋषियों की महिमा

राम द्वारा ऋषियों का यथोचित सम्मान करना राजा और ऋषि के आदर्श सम्बन्ध को दर्शाता है। राजा को ऋषियों से मार्गदर्शन लेना चाहिए और ऋषियों को राजा के धर्मपालन में सहायक होना चाहिए।

⚖️ धर्म की विजय

रावण के वध के बाद ऋषियों का आगमन और राम की प्रशंसा यह सिद्ध करती है कि धर्म की हमेशा विजय होती है। राम के राज्य में सभी सुखी हैं, जो एक आदर्श राज्य के लक्षण हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि राजा को धर्मपरायण होना चाहिए और ऋषियों-मुनियों का सम्मान करना चाहिए। धर्म की स्थापना से ही प्रजा सुखी रहती है। साथ ही, बुराई का नाश होने पर अच्छाई की जय होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे उत्तरकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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