रावण के महल के आंतरिक भवनों का वर्णन

हनुमान जी लंका में प्रवेश कर रावण के महल की खोज करते हैं। वे महल के भीतरी भाग (अन्तःपुर) में प्रवेश करते हैं, जहाँ रावण अपनी रानियों के साथ सोया हुआ है। वहाँ वे अनेक सुन्दर स्त्रियों को देखते हैं, किन्तु सीता को न पाकर आगे बढ़ जाते हैं। यह सर्ग रावण के वैभव और अन्तःपुर के विलासितापूर्ण जीवन का सजीव चित्रण करता है।

विवरण

हनुमान जी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं और रात्रि के समय नगरी में प्रवेश करते हैं। वे रावण के महल की खोज करते हुए अत्यन्त सुन्दर एवं भव्य महल को देखते हैं। उस महल के द्वार पर राक्षस पहरा दे रहे हैं। हनुमान अति सूक्ष्म रूप धारण कर महल के भीतर प्रवेश कर जाते हैं। वहाँ उन्हें रावण का सभा-भवन, नृत्य-गीत के स्थान और फिर अन्तःपुर (रनिवास) दिखाई देता है। अन्तःपुर में अनेक सुन्दर स्त्रियाँ नाना प्रकार के आभूषणों से सजी हुई सो रही हैं। हनुमान उनके सौन्दर्य और समृद्धि को देखकर चकित रह जाते हैं। वे रावण को भी देखते हैं, जो अपनी प्रिय रानियों के बीच सोया हुआ है। किन्तु उन्हें वहाँ सीता के दर्शन नहीं होते। तब हनुमान सोचते हैं कि सीता धर्मपरायणा पतिव्रता हैं, वे इस प्रकार के विलास-स्थल में नहीं रह सकतीं। अतः वे वहाँ से आगे बढ़कर अन्य स्थानों में सीता की खोज करने का निश्चय करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ९

(रावण के अन्तःपुर का वर्णन – हनुमान द्वारा सीता की खोज)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ नवमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने समुद्र लाँघकर लंका में प्रवेश किया। रात्रि के समय वे नगरी में घूमते हुए रावण के भव्य महल में पहुँचे। अब वे सीता की खोज में महल के भीतरी भागों का निरीक्षण करेंगे। इस सर्ग में रावण के अन्तःपुर (रनिवास) का अद्भुत वर्णन है, जहाँ हनुमान सीता को न पाकर आगे बढ़ते हैं।

🏰 रावण के महल में प्रवेश – प्रथम दृश्य (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
स तु राजगृहं रम्यं प्रविवेश महाकपिः ।
राक्षसाधिपतेर्धीमान् रावणस्य महात्मनः ॥
ददर्श तत्र सुश्रोणी राक्षसीः परिचारिकाः ।
नानाप्रहरणा घोरा विकृताः कामरूपिणीः ॥
तास्तमालोक्य सहसा प्रविष्टं वानरर्षभम् ।
प्रतिसंहृतसत्वास्ताः प्रणेदुर्भयमोहिताः ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; तु = तो; राजगृहम् = राजमहल में; रम्यम् = रमणीय; प्रविवेश = प्रवेश किया; महाकपिः = महान वानर; राक्षसाधिपतेः = राक्षसराज; धीमान् = बुद्धिमान; रावणस्य = रावण के; महात्मनः = महात्मा के; ददर्श = देखा; तत्र = वहाँ; सुश्रोणीः = सुन्दर नितम्बों वाली; राक्षसीः = राक्षसियों को; परिचारिकाः = सेविकाएँ; नानाप्रहरणाः = अनेक शस्त्रों से युक्त; घोराः = भयंकर; विकृताः = विकृत; कामरूपिणीः = मनचाहा रूप धारण करने वाली; ताः = उन्होंने; तम् = उसे; आलोक्य = देखकर; सहसा = अचानक; प्रविष्टम् = प्रवेश किये हुए; वानरर्षभम् = श्रेष्ठ वानर को; प्रतिसंहृतसत्वाः = साहस खोकर; प्रणेदुः = चिल्ला उठीं; भयमोहिताः = भय से मोहित हो।
📖 भावार्थ : तब वे महान बुद्धिमान वानर हनुमान राक्षसराज महात्मा रावण के रमणीय राजमहल में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने अनेक शस्त्रों से सुसज्जित, भयंकर विकृत मुखों वाली तथा मनमाना रूप धारण करने वाली राक्षसी सेविकाओं को देखा। उन राक्षसियों ने अचानक प्रविष्ट हुए उस श्रेष्ठ वानर को देखकर भय के कारण चिल्लाना प्रारम्भ कर दिया।
🔍 व्याख्या : रावण के महल में प्रवेश करते ही हनुमान को राक्षसी पहरेदार मिलीं। वे भयानक थीं, पर हनुमान ने उनकी चिल्लाहट की परवाह न करते हुए आगे बढ़ने का निश्चय किया।
॥ श्लोक ५-८ ॥
तासां शब्देन वित्रस्ता राक्षस्यः सर्वतोदिशम् ।
अपश्यन्त स्त्रियश्चान्या नानाप्रहरणायुधाः ॥
स तु धीरो महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ।
न विव्यथे महाबाहुः प्रविष्टो राक्षसालये ॥
स तत्र विविधान् दिव्यान् रत्नसञ्चयशोभितान् ।
अपश्यद्विमलान् राजन् प्रासादान् राक्षसेश्वरः ॥
📖 भावार्थ : उनके चिल्लाने के शब्द से सभी दिशाओं में स्थित राक्षसियाँ भयभीत हो गईं। उन्होंने अन्य स्त्रियों को भी देखा, जो अनेक प्रकार के शस्त्र धारण किए हुए थीं। किन्तु धीर, महातेजस्वी, महाबाहु हनुमान, जो मारुत के पुत्र थे, राक्षसों के घर में प्रवेश करके भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने वहाँ राक्षसराज के अनेक विविध दिव्य, रत्नों के समूहों से शोभित स्वच्छ प्रासादों को देखा।

💤 अन्तःपुर का वर्णन और सोती हुई स्त्रियाँ (श्लोक ९-२२)

॥ श्लोक ९-१५ ॥
ततो हेममयैर्द्वारैः स्फाटिकैर्वज्रतोरणैः ।
वैदूर्यमयनिर्यूहैः प्रविवेशान्तरं महत् ॥
ददर्श च स्त्रियस्तत्र नानाभरणभूषिताः ।
सुप्ताः प्रासादवर्येषु यथेन्द्रस्याप्सरोगणाः ॥
तासां मध्ये तु सुश्रोणी राक्षसेन्द्रप्रियाः स्त्रियः ।
रावणं पर्युपासन्ते सुप्तं मदनमोहितम् ॥
ता दृष्ट्वा मदसम्पूर्णा नरेन्द्राणां हि योषितः ।
न हि ता मानुषीं प्राप्ताः सीतां द्रक्ष्याम्यहं कथम् ॥
📖 भावार्थ : फिर वे सोने के द्वारों, स्फटिकमय तथा वज्र के तोरणों और वैदूर्यमय निर्यूहों (द्वार-शाखाओं) से युक्त उस महल के भीतरी भाग में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने अनेक आभूषणों से विभूषित स्त्रियों को सोते देखा, जो इन्द्र के आप्सरोगणों के समान शोभित थीं। उनके मध्य में राक्षसेन्द्र रावण की प्रिय स्त्रियाँ, मदनमोहित होकर सोये हुए रावण की सेवा में तत्पर थीं। उन स्त्रियों को देखकर हनुमान ने सोचा: "ये तो राजाओं की पत्नियाँ हैं, मद से परिपूर्ण हैं। यहाँ सीता नहीं है। मैं किस प्रकार सीता को देखूँगा?"
🔍 व्याख्या : हनुमान रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं, जहाँ उनकी सभी रानियाँ और उपपत्नियाँ सो रही हैं। उनके मुख पर मद और निद्रा का भाव है। हनुमान को सीता वहाँ नहीं दिखती।
॥ श्लोक १६-२२ ॥
ततः स रावणं दृष्ट्वा सुप्तं राज्यं च सर्वशः ।
ददर्श च महाबाहुः सीतामन्वेषते वने ॥
न सीता दृश्यते तत्र राक्षसीनां समीपतः ।
नूनं नेह भवेत् सीता पतिव्रता परं तपः ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् धीमान् मारुतनन्दनः ।
प्रासादादवरुह्याशु सीतामन्वेषितुं वनम् ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् उन्होंने सोये हुए रावण को और सम्पूर्ण राज्य को देखा। महाबाहु हनुमान ने वन में सीता की खोज की। राक्षसियों के समीप सीता दिखाई नहीं दीं। उन्होंने विचार किया: "निश्चय ही पतिव्रता परम तपस्विनी सीता यहाँ नहीं हो सकती।" ऐसा विचार करके बुद्धिमान मारुतनन्दन हनुमान प्रासाद से उतरकर शीघ्र ही सीता की खोज के लिए वन में चले गए।

🔍 सीता की अनुपस्थिति और हनुमान का निर्णय (श्लोक २३-४१)

॥ श्लोक २३-४१ ॥
न हि सीता भवेदत्र या वैदेही पतिव्रता ।
अवश्यं सा जनस्थाने राक्षसीवशमागता ॥
इति निश्चित्य हनुमान् प्रासादादवरुह्य च ।
अन्वेषितुं वनं सर्वं प्रायाद् वायुसुतः कपिः ॥
स तु तत्र विचिन्वानो नापश्यद् रघुनन्दनम् ।
सीतामनुपमां रम्यां रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
📖 भावार्थ : "यहाँ वह वैदेही पतिव्रता सीता नहीं हो सकती। निश्चय ही वह राक्षसी के वश में होकर कहीं और है।" ऐसा निश्चय करके हनुमान प्रासाद से उतर आए और सम्पूर्ण वन में सीता की खोज करने के लिए आगे बढ़े। वहाँ खोज करते हुए भी उन्होंने रघुनन्दन राम की अनुपमा रमणीय महिषी प्रिय सीता को नहीं देखा।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने निश्चय किया कि सीता जैसी पतिव्रता नारी इस विलास-स्थल में नहीं रह सकती। अतः वे अन्य स्थानों, विशेषकर अशोक वाटिका में खोज करेंगे, जहाँ आगे चलकर उन्हें सीता मिलती हैं।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार नवें सर्ग में हनुमान रावण के अन्तःपुर का वर्णन करते हुए सीता की अनुपस्थिति का निश्चय कर वहाँ से निकल जाते हैं। अगले सर्ग में वे अशोक वाटिका की ओर प्रस्थान करेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का वैभव

यह सर्ग लंका के अतुल ऐश्वर्य और रावण के राजवैभव का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। रत्नजड़ित प्रासाद, स्वर्ण-द्वार, वैदूर्य स्तम्भ – ये सब रावण की समृद्धि के प्रतीक हैं।

💔 सीता का स्थान

हनुमान का यह निष्कर्ष कि सीता इस विलास-स्थल में नहीं हो सकती, उनके चरित्र-बल और पतिव्रता धर्म को दर्शाता है। सीता की खोज में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

🧘 हनुमान का धैर्य

राक्षसियों के चिल्लाने, भयानक दृश्यों के बावजूद हनुमान अविचल रहते हैं। यह उनके मानसिक स्थिरता और समर्पण को दर्शाता है।

🌺 अन्तःपुर वर्णन की प्रासंगिकता

यह वर्णन केवल सौन्दर्य-वर्णन नहीं, बल्कि राम-रावण संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करता है। सीता के विपरीत इन स्त्रियों का जीवन हमें सीता के त्याग और तपस्या की महिमा का बोध कराता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा धैर्य और विवेक ही कठिन परिस्थितियों में मार्ग दिखाता है। हनुमान ने विलासिता और मोह के वातावरण में भी अपने लक्ष्य को नहीं भुलाया और सीता की खोज में आगे बढ़े। हमें भी जीवन में सतर्क और लक्ष्यनिष्ठ बने रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे नवमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।