हनुमान् का रावण के अंत:पुर में पुष्पक विमान देखना
सुन्दरकाण्ड के सातवें सर्ग में हनुमान् लंका के राक्षसराज रावण के अन्तःपुर में प्रवेश करते हैं और वहाँ पुष्पक विमान को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं। इसके पश्चात वे रावण की शय्या और उसकी स्त्रियों को देखते हैं, किन्तु सीता को वहाँ न पाकर अन्यत्र खोजने का निश्चय करते हैं।
विवरण
हनुमान् ने समुद्र लाँघकर लंका में प्रवेश किया। रात्रि के समय वे लंका नगरी का भ्रमण करते हुए रावण के भवन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकार की सम्पत्तियाँ, रथ, वाहन, और मणियों से जड़ित स्तम्भ देखे। तदनन्तर उनकी दृष्टि पुष्पक विमान पर पड़ी। वह विमान अद्भुत था, जो स्वर्ण एवं रत्नों से सुसज्जित था और आकाश में विचरण करने योग्य था। उसकी शोभा देखकर हनुमान् को ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह विमान कुबेर के धन की झाँकी प्रस्तुत कर रहा हो। हनुमान् ने उसकी परिक्रमा की और फिर रावण के अन्तःपुर में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने निद्रामग्न रावण को देखा, जो अनेक सुन्दरियों से घिरा हुआ था। उन स्त्रियों में रावण की पटरानी मन्दोदरी भी थी। किन्तु राम की पतिव्रता सीता वहाँ नहीं थी। हनुमान् ने सोचा कि सीता का ऐसे स्थान पर होना असम्भव है, क्योंकि वे तो राम के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का स्पर्श भी नहीं कर सकतीं। इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे वहाँ से आगे बढ़े और सीता की खोज जारी रखी।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ७
(हनुमान् का रावण के अंत:पुर में पुष्पक विमान देखना)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान् ने समुद्र लाँघकर लंका में प्रवेश किया। रात्रि के समय वे लंका नगरी का भ्रमण करते हुए रावण के महल में पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपूर्व ऐश्वर्य देखा। इस सर्ग में हनुमान् द्वारा रावण के अन्तःपुर का निरीक्षण, पुष्पक विमान का दर्शन, तथा रावण और उसकी स्त्रियों को सोते हुए देखने का वर्णन है। सीता वहाँ न मिलने पर हनुमान् आगे की खोज हेतु निकल पड़े।
✨ हनुमान् का रावण-भवन में प्रवेश एवं पुष्पक विमान (श्लोक १-१५)
राक्षसाधिपतेर्द्दष्ट्वा परां वृद्धिमुपस्थितम् ॥
ददर्श पुष्पकं नाम विमानं हेमभूषितम् ।
प्रभूतरत्ननिचयं कुबेरभवनोपमम् ॥
तस्य हेममयैः स्तम्भैर्मणिविद्रुमवेदिकैः ।
सोपानैश्च महार्हैश्च विचित्रैरुपशोभितम् ॥
तच्चन्द्रशिशिरैर्मुक्ताजालैः प्रतिविभूषितम् ।
विमानं द्विरदेन्द्रस्य गजेन्द्रस्येव वल्गुना ॥
🛌 रावण के अन्तःपुर का निरीक्षण (श्लोक १६-३५)
सुप्तं भूषणभूषाङ्गं विमानशतसंवृतम् ॥
नानारत्नप्रभाजुष्टं नानास्त्रणकृतास्पदम् ।
महार्हशयनं दिव्यं रावणस्य महात्मनः ॥
तस्योपरि महार्हाणि चित्राणि विविधानि च ।
व्यजनानि च तत्रासन् वीज्यमानानि योषिताम् ॥
ददर्श च महाबाहुः सुप्तांस्तत्र महाबलान् ।
राक्षसान् राक्षसेन्द्रस्य रक्षार्थं पर्युपस्थितान् ॥
ततः प्रविश्य हनुमान् रावणस्य निवेशनम् ।
ददर्श रावणं सुप्तं मन्दोदर्या समन्वितम् ॥
🧘 हनुमान् का आत्मचिन्तन और आगे बढ़ना (श्लोक ३६-४२)
रावणस्य निकुञ्जेषु शयितुं युज्यते क्वचित् ॥
भर्तारं नानुपश्यन्ती सीता धर्मपरायणा ।
रावणस्य न शयने कथं शयितुमर्हति ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् रामकार्यहिते रतः ।
तस्मात् प्रदेशान्निश्चक्राम सीतान्वेषणतत्परः ॥
🎯 सर्ग निचोड़ : इस सर्ग में हनुमान् ने रावण के अन्तःपुर और पुष्पक विमान का सुन्दर वर्णन किया है। सीता को वहाँ न पाकर वे निराश नहीं होते, वरन् नई उमंग से खोज जारी रखते हैं। यह हनुमान् के अटल धैर्य और राम-भक्ति का प्रतीक है।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🕉️ हनुमान् का संयम
रावण को निद्रावस्था में देखकर भी हनुमान् ने उसका वध नहीं किया, क्योंकि उनका मुख्य उद्देश्य सीता का पता लगाना था। यह उनके कर्तव्यपरायणता और संयम को दर्शाता है।
🏰 पुष्पक विमान का वैभव
पुष्पक विमान का वर्णन रामायण में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह विमान बाद में राम-रावण युद्ध के उपरान्त विभीषण द्वारा राम को सौंपा गया था।
🌙 सीता की पतिव्रता
हनुमान् के चिन्तन से सीता के पतिव्रताधर्म की झलक मिलती है। वे राम के अतिरिक्त किसी और के समीप रहना तो दूर, उनके भवन में भी नहीं रह सकतीं।
📜 रावण का ऐश्वर्य
इस सर्ग में रावण के ऐश्वर्य का भव्य वर्णन है, जो लंका की समृद्धि और रावण की महत्ता को दर्शाता है। किन्तु यह ऐश्वर्य उसके अहंकार का ही परिणाम था।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि कार्य के प्रति समर्पित व्यक्ति कैसे आकर्षणों और अवसरों के बावजूद अपने मार्ग पर अटल रहता है। हनुमान् ने रावण के ऐश्वर्य और रूप-यौवन से मोहित हुए बिना, केवल अपने कर्तव्य का पालन किया। हमें भी जीवन में लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिए।