राम द्वारा हनुमान् से सीता के वचनों को दोहराने का आग्रह

हनुमान जी के लंका से लौटने पर श्रीराम उनसे सीता के वचनों को पुनः सुनने की इच्छा व्यक्त करते हैं। हनुमान जी भाव-विभोर होकर सीता का संदेश दोहराते हैं, जिसे सुनकर राम अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और हनुमान की प्रशंसा करते हैं।

विवरण

हनुमान जी के सफलतापूर्वक लंका से लौटने और सीता का पता लगाने के बाद, वे राम को सब कुछ बताते हैं। राम सीता के समाचार सुनकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं, परन्तु वे पुनः हनुमान से सीता द्वारा कहे गए वचनों को विस्तार से सुनना चाहते हैं। राम कहते हैं कि जिस प्रकार प्यासा व्यक्ति बार-बार जल पीना चाहता है, उसी प्रकार वे सीता के वचन सुनकर तृप्त नहीं होते। तब हनुमान भक्ति और करुणा से भरे हुए सीता के कथनों को दोहराते हैं – कैसे सीता ने उनकी पहचान की, चूड़ामणि दी, और राम के प्रति अपने अटूट प्रेम का प्रकट किया। राम भाव-विह्वल हो जाते हैं और हनुमान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह सर्ग भक्त और भगवान के मधुर सम्बन्ध को दर्शाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ६६

(राम द्वारा हनुमान् से सीता के वचनों को दोहराने का आग्रह)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्षष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने लंका से लौटकर श्रीराम को सीता का समाचार दिया। अब राम उनसे पुनः सीता के वचन सुनने की इच्छा प्रकट करते हैं। यह सर्ग राम के विरह-व्याकुल हृदय और हनुमान की भक्ति-वाक्पटुता का अद्भुत संगम है।

🗣️ राम का आग्रह – प्रथम दृश्य (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
स त्वं सीतां महाभागां पुनरेव वदस्व मे ।
यथादृष्टा त्वया देवी लङ्कायां राक्षसीगृहे ॥
पीत्वेव सलिलं तृष्णा न मे तृप्तिर्हि तद्वचः ।
सुहृद्दर्शनजा प्रीतिर्यथा तृप्तिं न गच्छति ॥
तथा मे सीतया वत्स संगमे प्रियकाम्यया ।
भूय एव ब्रवीष्वद्य यथावृत्तं यथाश्रुतम् ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; त्वम् = तुम; सीताम् = सीता के बारे में; महाभागाम् = महाभागा; पुनः एव = फिर से; वदस्व = कहो; मे = मुझसे; यथा = जैसे; दृष्टा = देखी; त्वया = तुमने; देवी = देवी; लङ्कायाम् = लंका में; राक्षसीगृहे = राक्षसियों के घर में; पीत्वा = पीकर; एव = ही; सलिलम् = जल; तृष्णा = प्यास; न = नहीं; मे = मेरी; तृप्तिः = तृप्ति; हि = ही; तद्वचः = उन वचनों से; सुहृद्दर्शनजा = सुहृद के दर्शन से उत्पन्न; प्रीतिः = प्रेम; यथा = जैसे; तृप्तिम् = तृप्ति; न = नहीं; गच्छति = प्राप्त होती; तथा = वैसे ही; मे = मेरी; सीतया = सीता के; वत्स = हे वत्स; संगमे = मिलन में; प्रियकाम्यया = प्रिय की इच्छा से; भूयः = फिर; एव = ही; ब्रवीष्व = कहो; अद्य = आज; यथावृत्तम् = जैसा हुआ; यथाश्रुतम् = जैसा सुना।
📖 भावार्थ : हे हनुमान, तुम मुझसे पुनः उस महाभागा सीता के विषय में कहो, जैसे तुमने लंका में राक्षसियों के घर में उस देवी को देखा। जैसे जल पीकर भी प्यास नहीं बुझती, वैसे ही उन वचनों से मेरी तृप्ति नहीं होती। जैसे मित्र के दर्शन से उत्पन्न प्रीति तृप्ति को नहीं पाती, उसी प्रकार हे वत्स, सीता से मिलने की इच्छा से मैं पुनः तुमसे वैसा ही वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ।
🔍 व्याख्या : राम का यह आग्रह उनके अनन्य प्रेम को दर्शाता है। वे हनुमान से बार-बार सीता के वचन सुनकर अपने हृदय की पीड़ा को शांत करना चाहते हैं।

💬 हनुमान द्वारा सीता के वचनों का वर्णन (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
सा तु दृष्ट्वा मया देवी रावणेन निपीडिता ।
रक्षोभिः परिवारा तु वने वनगता यथा ॥
राक्षसीभिः परिवृता भीमाभिर्विकृताननाः ।
अभक्ष्यमाणा सीता तु ध्यायन्ती त्वामवस्थिता ॥
तया चोक्तं महाराज प्रियं वचनमादितः ।
त्वं हि नित्यं प्रियो भर्तुः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥
इत्युक्त्वा मां विसृष्टा सा प्रियं वचनमब्रवीत् ।
रामस्य कुशलं पृष्ट्वा सुग्रीवस्य च धीमतः ॥
अब्रवीच्च पुनर्वाक्यं बाष्पगद्गदया गिरा ।
आनयस्व ममोपायं रामः सत्यपराक्रमः ॥
📖 भावार्थ : हे राम, मैंने देवी सीता को देखा, जो रावण द्वारा पीड़ित थीं, राक्षसों से घिरी हुई, जैसे वन में वनगता हिरणी हो। भयंकर और विकृत मुखों वाली राक्षसियों से घिरी हुई सीता, कुछ खाती-पीती नहीं थीं, केवल आपका ध्यान करती थीं। उन्होंने मुझसे पहले यह प्रिय वचन कहे: 'तुम अपने पति के सदा प्रिय हो, प्राणों से भी बढ़कर हो।' ऐसा कहकर उन्होंने मुझे विदा किया और प्रिय वचन कहे। उन्होंने राम और बुद्धिमान सुग्रीव का कुशल पूछा। फिर अश्रुपूरित गद्गद वाणी से बोलीं: 'जिनका सत्य ही पराक्रम है, वे राम मुझे ले जाने का कोई उपाय करें।'
🔍 व्याख्या : हनुमान सीता की दयनीय दशा और उनके धैर्य का वर्णन करते हैं। सीता का संदेश राम के प्रति उनके अटूट विश्वास को दर्शाता है।
॥ श्लोक १६-२२ ॥
इदं चूडामणिं रत्नं मया बद्धं तवाङ्कितम् ।
धारयिष्यति ते राम भवानेतत् प्रयच्छति ॥
एतच्च तव रामेति धारयामि यशस्विनि ।
सर्वथा राक्षसा घोरा न शक्या दुर्जयाः पुरा ॥
ततो मया चूडामणिं गृहीत्वा त्वरितं तदा ।
आगतं वानरश्रेष्ठ तव पार्श्वमरिंदम ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने कहा: 'यह चूड़ामणि रत्न है, जो सीता ने मुझे दिया। उन्होंने कहा कि यह राम को दे देना, यह उनका स्मृति-चिह्न है। हे राम, मैं इसे धारण करूँगी, यह आपका ही है। निश्चय ही ये राक्षस भयंकर और दुर्जेय हैं।' तब हे वानरश्रेष्ठ, मैंने वह चूड़ामणि लेकर शीघ्र ही आपके पास प्रस्थान किया।
॥ श्लोक २३-२८ ॥
इति ते कथितं राजन् यथावृत्तं महामते ।
प्रियं ते वचनं श्रुत्वा कुरु यत् साम्प्रतं हितम् ॥
अथ तद्वचनं श्रुत्वा हनुमता समीरितम् ।
रामः सुग्रीवमुख्याश्च मुदा परमया युताः ॥
प्रशशंसुः प्रियं वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः ।
कपीनामृषभः श्रीमान् सीतायाः संगमे रतः ॥
📖 भावार्थ : 'हे महामते राजन्! मैंने आपको वह सब कुछ कह दिया जैसा हुआ। आप यह प्रिय समाचार सुनकर अब जो उचित हो वह कीजिए।' हनुमान के इस प्रकार कहने पर राम और सुग्रीव आदि अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने हनुमान के प्रिय वचनों की प्रशंसा की। वे श्रीमान् हनुमान, वानरों में श्रेष्ठ, सीता के मिलन में लीन हो गए।

🙏 राम की प्रतिक्रिया और हनुमान की प्रशंसा (श्लोक २९-३६)

॥ श्लोक २९-३६ ॥
ततो रामो महातेजा हनूमन्तमभाषत ।
प्रीतोऽस्मि ते महाबाहो यथा दृष्टा च मैथिली ॥
न त्वां शक्नोमि संपूज्य दातुं किंचिदपि प्रभो ।
सुग्रीवसचिवश्रेष्ठ ग्रहीष्यसि च मामकम् ॥
इत्युक्त्वा परिषस्वजे हनूमन्तं कृताञ्जलिम् ।
रामः प्रीतमना राजन् बाष्पपूर्णेक्षणस्तदा ॥
सुग्रीवश्चापि हनुमान् लक्ष्मणश्च महाबलः ।
अभ्यषिञ्चन् प्रियं वाक्यैर्जयाशीर्भिश्च वानरम् ॥
हनूमांश्च महातेजाः प्रतिजग्राह तद्वचः ।
प्रणिपत्याब्रवीद् रामं किं करोम्यनुशाधि माम् ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी राम ने हनुमान से कहा: 'हे महाबाहो! जिस प्रकार तुमने मैथिली को देखा, उससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ। हे प्रभो! मैं तुम्हारा यथोचित पूजन करने में असमर्थ हूँ। हे सुग्रीव के श्रेष्ठ मंत्री, तुम मेरे हृदय को ग्रहण करोगे।' ऐसा कहकर राम ने हाथ जोड़े हुए हनुमान को भरपूर आलिंगन दिया। राजा राम प्रसन्नचित्त होकर अश्रुपूरित नेत्रों से देखते रहे। सुग्रीव और महाबली लक्ष्मण ने भी हनुमान को प्रिय वचनों और जयाशीषों से सराबोर किया। महातेजस्वी हनुमान ने उन वचनों को स्वीकार किया और राम को प्रणाम कर कहा: 'मुझे आज्ञा दीजिए, मैं क्या करूँ?'
🔍 व्याख्या : राम का यह आलिंगन और अश्रुपूरित नेत्र उनकी भावुकता और हनुमान के प्रति कृतज्ञता को प्रदर्शित करते हैं। हनुमान विनम्रतापूर्वक सेवा में तत्पर रहते हैं।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार छियासठवें सर्ग में राम के आग्रह पर हनुमान ने सीता के वचनों को दोहराया और राम ने उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। अगले सर्ग में वे वानर-सेना सहित समुद्र तट पर प्रस्थान करेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💞 राम का विरह-व्याकुल हृदय

राम का बार-बार सीता के वचन सुनने का आग्रह उनके गहन प्रेम और विरह-व्याकुलता को दर्शाता है। वे सीता के शब्दों में ही अपनी पीड़ा की शांति पाते हैं।

🕉️ हनुमान की भक्ति और वाक्पटुता

हनुमान ने सीता के संदेश को जिस भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया, उससे उनकी असीम भक्ति और वाणी पर अधिकार सिद्ध होता है। वे केवल दूत नहीं, बल्कि राम-सीता के हृदय के स्पन्दन को समझने वाले सच्चे भक्त हैं।

🙌 गुरु-शिष्य का आदर्श सम्बन्ध

राम का हनुमान को आलिंगन देना और हनुमान का विनम्रतापूर्वक सेवा में तत्पर रहना गुरु-शिष्य, स्वामी-सेवक के आदर्श सम्बन्ध का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🔮 सीता के संकेत

सीता का चूड़ामणि भेजना और राम के पराक्रम पर विश्वास प्रकट करना आगामी युद्ध की भूमिका तैयार करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि प्रेम और भक्ति के सम्मुख शब्द भी अपनी सीमा पा लेते हैं। राम जैसे प्रभु भी प्रेम में विह्वल हो जाते हैं। हनुमान की तरह हमें भी अपने इष्टदेव की आज्ञा का पालन करने में सदा तत्पर रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे षट्षष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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