हनुमान द्वारा राम को सीता का संदेश देना
हनुमान जी लंका से सफलतापूर्वक लौटकर राम को सीता का समाचार देते हैं। वे सीता की दशा, उनका संदेश और रावण की धमकियों का वर्णन करते हैं। राम सीता के वियोग में व्याकुल हो जाते हैं और हनुमान की वीरता की प्रशंसा करते हैं। यह सर्ग राम-हनुमान के मिलन और सीता के प्रति राम के अगाध प्रेम को दर्शाता है।
विवरण
हनुमान जी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे, अशोक वाटिका में सीता को पाया, उन्हें राम की मुद्रिका दी, सीता ने अपना चूड़ामणि हनुमान को देकर राम के लिए संदेश भेजा। हनुमान वापस लौटे और राम को सब बताया। राम सीता का समाचार सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और हनुमान को गले लगाया। राम ने कहा कि सीता का संदेश पाकर उन्हें जीवन मिल गया। इस सर्ग में हनुमान की वीरता और भक्ति का वर्णन है। हनुमान ने राम को बताया कि सीता ने एक मास के भीतर राम के आने की प्रतीक्षा करने का निश्चय किया है, अन्यथा रावण उनके प्राण ले लेगा। यह सुनकर राम व्याकुल हो उठते हैं और लक्ष्मण से सेना संग्रह की तैयारी करने को कहते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ६५
(हनुमान द्वारा राम को सीता का संदेश देना)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने सीता का पता लगा लिया था। अब वे लंका से लौटकर उस शुभ समाचार को राम तक पहुँचाने आए हैं। यह सर्ग उस हृदयस्पर्शी मिलन का वर्णन करता है, जब राम सीता के जीवित होने का समाचार सुनकर गद्गद हो जाते हैं और हनुमान के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
🐒 हनुमान का आगमन और राम का प्रश्न (श्लोक १-१०)
उपविष्टो महाप्राज्ञो राघवस्य महात्मनः ॥
ददर्श रामं धर्मज्ञं लक्ष्मणेन सह स्थितम् ।
प्रहृष्टवदनो भूत्वा प्रणम्य शिरसा नृपम् ॥
उवाच वचनं श्रीमान् हनूमान् मारुतात्मजः ।
दिष्ट्या प्राप्तोऽस्मि भद्रं ते दिष्ट्या सीतां ददर्श ह ॥
हर्षेण महता युक्तः परिष्वज्य महाकपिम् ॥
उवाच परमप्रीतो हनूमन्तं महाबलम् ।
कच्चित् सीता महाभागा जीवतीति न संशयः ॥
📿 सीता का समाचार और चूड़ामणि अर्पण (श्लोक ११-२५)
जीवति क्लेशसहना राम! सीता पतिव्रता ॥
इदं चूडामणिं दिव्यं सीतया सहितं मया ।
आनीतं राघवेन्द्र! त्वां द्रष्टुं सीताप्रियं प्रति ॥
तद् गृहाण महाबाहो! सीतायाः परमं प्रियम् ।
चिह्नं प्रेषितमत्यर्थं राम! त्वद्दर्शनातुरम् ॥
बाष्पपूर्णमुखो रामः सुमहद् विललाप ह ॥
अयं स चूडामणिः श्रीमान् मया दत्तो महाप्रभः ।
सीतायै सत्यसन्धेन यथा वृत्तं तथा श्रुतम् ॥
नूनं सा द्रक्ष्यते सीता यदि जीवति मे प्रिया ।
इत्युक्त्वा राघवो वीरः प्ररुरोद सुदुःखितः ॥
💔 राम का हर्ष-विलाप और हनुमान की प्रशंसा (श्लोक २६-४२)
न तेऽस्ति सदृशो लोके कर्मणा मनसा गिरा ॥
यथा त्वयैतत् कर्मेदं कृतं दुष्करमुत्तमम् ।
न तत् सुरा न गन्धर्वा नासुराः कर्म शेरते ॥
कृतं त्वया महाबाहो! प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।
प्रीतिमानस्मि ते वत्स! वरं वरय मा चिरम् ॥
भवानेव हि मे वरः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ॥
तव दर्शनमेवाहं वरेण वरयाम्यहम् ।
यदि मे भगवान् प्रीतः सर्वं एव वृतं मम ॥
रामस्त्वतिप्रसन्नात्मा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
सुग्रीवेण समं वत्स! स्थीयतां हृदये मम ॥
📌 सर्गान्त : इस प्रकार पैंसठवें सर्ग में हनुमान द्वारा राम को सीता का संदेश देने और राम द्वारा हनुमान की प्रशंसा का मनोहारी वर्णन है। अगले सर्ग में सेना संग्रह की तैयारी का वर्णन होगा।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
💞 राम-सीता का अटूट प्रेम
चूड़ामणि देखकर राम का विलाप और हर्ष यह दर्शाता है कि उनका हृदय सीता के प्रति कितना समर्पित है। यह आदर्श प्रेम का प्रतीक है।
🙏 हनुमान की अनन्य भक्ति
हनुमान ने वर के रूप में केवल राम के दर्शन को चाहा – यह निष्काम भक्ति का उत्तम उदाहरण है। राम ने उन्हें हृदय में स्थान देकर उनकी भक्ति को सदा के लिए अमर कर दिया।
⚔️ युद्ध की तैयारी का संकेत
इस सर्ग में राम ने सेना संग्रह का आदेश नहीं दिया है, किंतु सीता के संदेश में एक मास की समय-सीमा आगामी युद्ध की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
🌊 हनुमान के कार्य की महिमा
राम स्वीकार करते हैं कि हनुमान का कार्य देवताओं के लिए भी असंभव था। यह हनुमान की वीरता और बुद्धि का सर्वोच्च सम्मान है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्ची भक्ति में फल की इच्छा नहीं होती। हनुमान की तरह हमें भी निष्काम भाव से सेवा करनी चाहिए। साथ ही, प्रियजनों का समाचार मिलने पर राम की तरह आनंदित होना और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना मानवीय संबंधों की सुंदरता है।