हनुमान् द्वारा राम को सीता का पता लगने की सूचना देना
हनुमान जी लंका से लौटकर समुद्र तट पर अपने साथी वानरों से मिलते हैं और उन्हें सीता के मिलने का समाचार सुनाते हैं। सभी हर्षित होकर किष्किन्धा लौटते हैं, जहाँ हनुमान श्रीराम को सीता का पता बताते हैं और उन्हें मुद्रिका प्रदान करते हैं। राम अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।
विवरण
सीता का पता लगाने के बाद हनुमान जी लंका से वापस लौटते हैं। वे समुद्र पार करके उसी स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ उनके साथी वानर (जाम्बवान, अंगद, नल, नील आदि) उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वानर हनुमान को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। हनुमान उन्हें सीता से भेंट, रावण का भय दिखाना, अशोक वाटिका का विनाश, तथा सीता द्वारा दी गई चूड़ामणि (मुद्रिका) के बारे में बताते हैं। सब वानर आनन्दित होकर हनुमान की प्रशंसा करते हैं। तत्पश्चात् वे सभी किष्किन्धा की ओर प्रस्थान करते हैं। वहाँ पहुँचकर हनुमान सीधे श्रीराम के पास जाते हैं और उन्हें सीता का पता बताते हैं। राम अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और हनुमान को धन्यवाद देते हैं। वे सुग्रीव से युद्ध की तैयारी करने को कहते हैं। यह सर्ग हनुमान की सफलता और राम के हर्ष का वर्णन करता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ६४
(हनुमान् द्वारा राम को सीता का पता लगने की सूचना देना)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने लंका में सीता का पता लगा लिया, अशोक वाटिका का विध्वंस किया, रावण से भेंट की और लंका दहन के बाद अब वापस लौट रहे हैं। वे समुद्र पार कर उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ उनके साथी वानर प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह सर्ग हनुमान के विजयी आगमन और राम को मधुर समाचार सुनाने का अद्भुत वर्णन करता है।
🙏 हनुमान का वानरों से मिलना और समाचार सुनाना (श्लोक १-१२)
जगाम त्वरितो यत्र वानरास्ते समागताः ॥
तं दृष्ट्वा वानराः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
परिष्वज्य च गात्रैस्ते पप्रच्छुः कुशलं तदा ॥
स तेभ्यो राक्षसीं मायां रावणस्य दुरात्मनः ।
शशंस विस्तरात् सर्वं यथा दृष्टं यथा श्रुतम् ॥
सीतायाः च परं दुःखं रावणस्य निवेशनम् ।
यथा च मुद्रिकां दत्त्वा सीता देवी मुदान्विता ॥
हनुमन्तं प्रशंसन्तः पुनः प्रीताः सबान्धवाः ॥
ततस्ते हृष्टमनसः किष्किन्धामभितो ययुः ।
हनूमन्तं पुरस्कृत्य सुग्रीवं द्रष्टुमुद्यताः ॥
🏹 राम से भेंट और समाचार निवेदन (श्लोक १३-२६)
ददृशुः सुग्रीवसहिताः प्रणेमुश्च यथाक्रमम् ॥
हनूमान् राघवं दृष्ट्वा बाष्पपूर्णेक्षणोऽभवत् ।
प्रणम्य शिरसा भूमौ न्यवेदयदनुत्तमम् ॥
दिष्ट्या प्राप्तोऽस्मि भद्रं ते राघव प्रियकाम्यया ।
सीता दृष्टा मया देवी रावणस्य निवेशने ॥
इदं चूडामणिं दिव्यं सीतया दत्तमुत्तमम् ।
प्रत्यभिज्ञानमर्थं च रामस्य परिदर्शयन् ॥
हर्षेण महताविष्टो लक्ष्मणं चेदमब्रवीत् ॥
सौमित्रे पश्य हनुमन्तं सीतायाः प्रियकारकम् ।
अनेन सदृशो नास्ति कर्मणा प्लवगेष्वपि ॥
गच्छ सुग्रीव सैन्यानि योजयस्व महाबल ।
लङ्कां यास्यामहे सर्वे यत्र सीता वसत्यसौ ॥
🌟 राम का हर्ष और हनुमान की प्रशंसा (श्लोक २७-३८)
उवाच मधुरं वाक्यं साश्रुनेत्रः प्रहर्षितः ॥
हनूमन् कृतकार्योऽस्मि त्वया प्रियसखा मम ।
यन्मे प्राणप्रिया सीता त्वया दृष्टा हि राक्षसीः ॥
त्वया सदृशमन्यं न पश्यामि प्लवगेष्वहम् ।
प्राणानपि प्रदास्यामि तुभ्यं वीर न संशयः ॥
हनूमते ददौ दिव्यं मणिं वज्रसमप्रभम् ॥
ततो युद्धाय सञ्जज्ञे बुद्धिः सर्वस्य रक्षसाम् ।
रामः सुग्रीवमाहूय यानं योजयतामिति ॥
📌 सर्गान्त : इस प्रकार चौंसठवें सर्ग में हनुमान ने राम को सीता का पता बताया और राम ने हर्षित होकर युद्ध की तैयारी का आदेश दिया। अगले सर्ग में वानर सेना का प्रस्थान वर्णित होगा।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🙌 हनुमान की विजय
यह सर्ग हनुमान की अदम्य साहस, बुद्धि और भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है। उन्होंने न केवल सीता का पता लगाया बल्कि राम के हृदय को आनन्द से भर दिया।
💞 राम का प्रेम
राम का हनुमान के प्रति स्नेह और कृतज्ञता उनके उदार हृदय का परिचायक है। वे भक्त के सम्मान में सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर हैं।
⚔️ युद्ध की तैयारी
इस सर्ग से राम-रावण युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार होती है। अब राम का क्रोध और कर्तव्य-बोध युद्ध की ओर अग्रसर करता है।
📿 चूड़ामणि का महत्व
सीता द्वारा दी गई चूड़ामणि प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। यह राम को सीता की स्मृति दिलाती है और उनके मिलन की आशा जगाती है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्ची भक्ति और निष्ठा से कठिन से कठिन कार्य भी सफल होते हैं। हनुमान ने अपने कर्तव्य का पालन कर राम को सुख दिया, और हमें भी निष्काम भाव से सेवा करनी चाहिए।