दधिमुख द्वारा सुग्रीव को मधुवन के विनाश की सूचना

सीता का समाचार पाकर हर्षित वानरों ने सुग्रीव के निजी उद्यान मधुवन में प्रवेश कर उसे नष्ट कर दिया। वनरक्षक दधिमुख उन्हें रोकने में असफल रहे और सुग्रीव को यह दुःसाहस की सूचना देने गए। उन्होंने जाकर सुग्रीव को बताया कि अंगद आदि वानर मधुवन को उजाड़ रहे हैं और मदहोश होकर उन्मत्त की तरह घूम रहे हैं।

विवरण

हनुमान द्वारा सीता का समाचार प्राप्त करने के बाद, सभी वानर अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं। वे सफलता के आनंद में सीता की खोज का वर्णन करते हैं और फिर सुग्रीव के निजी और सुरक्षित उद्यान "मधुवन" में प्रवेश कर जाते हैं। आनंदोन्मत्त वानर उस सुरक्षित वन के फल-फूल खाकर और शहद पीकर उसे उजाड़ने लगते हैं। मधुवन के रक्षक दधिमुख उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, लेकिन वे उनकी एक नहीं सुनते। दधिमुख और अन्य राक्षस उनसे भिड़ते हैं, परन्तु वानरों के हाथों पराजित होते हैं। तब दधिमुख स्वयं सुग्रीव के पास जाकर शिकायत करते हैं कि अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि ने मधुवन को नष्ट कर दिया है। सुग्रीव इस समाचार को सुनकर पहले तो क्रोधित होते हैं, लेकिन फिर विचार करते हैं कि ऐसा साहसिक कार्य वे ही कर सकते हैं जिन्होंने सीता का पता लगा लिया हो। यह सोचकर वे प्रसन्न हो जाते हैं और दधिमुख को बुलाकर सारा वृत्तांत जानना चाहते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ६३

(दधिमुख द्वारा सुग्रीव को मधुवन के विनाश की सूचना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान ने सीता का समाचार दे दिया है। सफलता के इस अपार हर्ष में समस्त वानर सेना उन्मत्त हो उठी है। वे सुग्रीव के निजी और सुरक्षित उद्यान मधुवन में घुस गए हैं। अब इस सर्ग में देखना है कि जब वानर राजा के निजी वन को उजाड़ा जाएगा तो उसके रक्षक दधिमुख की क्या दशा होती है और वह जाकर सुग्रीव को यह दुःसाहस की कैसे सूचना देता है।

🍯 मधुवन में प्रवेश और आनन्दोत्सव (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रहृष्टा हरयः सीतायाः समदर्शनात्।
चक्रुः सर्वे महोत्साहा मधुवनं विचेतवे॥
तन्मधुवनमासाद्य सुग्रीवस्य महात्मनः।
अभ्ययुस्ते महाकाया वानरा हरियूथपाः॥
ते तत्र विविशुः सर्वे मधुवनं महाबलाः।
रक्षितं वानरेन्द्रेण सुग्रीवेण महात्मना॥
प्राप्य तन्मधुवनं रम्यं नानाद्रुमलतावृतम्।
तान् द्रुमान् पुष्पसम्पन्नान् भ्रमन्तो व्यचरन् कपिः॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् सीता के दर्शन (समाचार) से अत्यन्त प्रसन्न होकर सभी महोत्साही वानर मधुवन को देखने के लिए चल पड़े। वे महाकाय वानर और यूथपति महात्मा सुग्रीव के उस मधुवन में जा पहुँचे। वहाँ उन महाबली वानरों ने उस मधुवन में प्रवेश किया, जो महात्मा वानरेन्द्र सुग्रीव द्वारा सुरक्षित था। उस रमणीय, अनेक वृक्षों एवं लताओं से घिरे मधुवन को प्राप्त करके वे वानर पुष्पों से भरे उन वृक्षों के बीच विचरण करने लगे।
🔍 व्याख्या : मधुवन सुग्रीव का निजी और सुरक्षित उद्यान था, जहाँ प्रवेश वर्जित था। किन्तु असीम हर्ष में डूबे वानर उस निषेध की चिन्ता किए बिना ही उसमें घुस गए।
॥ श्लोक ५-१० ॥
केचित्पिबन्ति मध्वत्र केचित्खादन्ति पादपान्।
केचिन्नृत्यन्ति हृष्यन्तो गायन्ति च हसन्ति च॥
तेषां तद्वृत्तमालोक्य दधिमुखो नाम वानरः।
सुग्रीवस्य सखा राज्ञो मधुवनस्य रक्षिता॥
स तानुवाच क्रुद्धस्तु वानरान् वनचारिणः।
अयुक्तं क्रियते यूयं सुग्रीवस्य प्रियं वनम्॥
📖 भावार्थ : उनमें से कोई वहाँ मधु (शहद) पी रहे थे, कोई वृक्षों को खा रहे थे (फल-फूल तोड़ रहे थे), कोई हर्षित होकर नाच रहे थे, गा रहे थे और हँस रहे थे। उनकी उस दशा को देखकर राजा सुग्रीव का मित्र और मधुवन का रक्षक, दधिमुख नामक वानर क्रोधित होकर उन वनचारी वानरों से बोला: "तुम लोग अनुचित कार्य कर रहे हो, जो सुग्रीव के प्रिय वन को इस प्रकार नष्ट कर रहे हो।"

⚔️ दधिमुख का प्रतिरोध और पराजय (श्लोक ११-२२)

॥ श्लोक ११-१७ ॥
न चैनं वचनं तस्य चक्रुस्ते हरियूथपाः।
ततोऽब्रवीदिदं वाक्यं भूय एवाभिकोपयन्॥
गृह्यतां बध्यतां चैते दीयतामत्र ताडनम्।
इत्युक्त्वा स तु तान् सर्वानभ्यधावत वानरः॥
ते तमापतन्तं संरब्धाः प्रत्यगृह्णन्त वानराः।
ततो युद्धमभूत्तत्र तेषां च वनरक्षिणाम्॥
दधिमुखस्तु तान् सर्वान् वानरान् वनगोचरान्।
अभ्यधावत संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव॥
📖 भावार्थ : किन्तु उन यूथपति वानरों ने दधिमुख की बात नहीं मानी। तब उसने अत्यन्त क्रोधित होकर यह वाक्य कहा: "इन्हें पकड़ो, बाँधो और इन्हें दण्ड दो।" ऐसा कहकर वह वानर उन सब पर झपटा। किन्तु उन वानरों ने आते हुए उसका सामना किया। तब उन वनरक्षकों और वानरों के बीच घोर युद्ध हुआ। दधिमुख ने क्रोध में भरकर उन सब वानरों पर आक्रमण कर दिया, जैसे सिंह छोटे पशुओं पर आक्रमण करता है।
🔍 व्याख्या : दधिमुख ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वानरों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन वह अंगद, हनुमान और जाम्बवान जैसे महारथियों के सामने कहाँ टिक पाता।
॥ श्लोक १८-२२ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे दधिमुखमुपाद्रवन्।
ततः परिघबाहुभ्यां तं वृक्षैश्च समन्ततः।
अभ्यघ्नंस्ते महात्मानो दधिमुखं वनौकसः॥
स तेनाभिहतो राजन् दधिमुखो वानरर्षभः।
विसंज्ञः पतितो भूमौ मुहूर्तं चेतनां गतः॥
📖 भावार्थ : तब उन सब वानरों ने दधिमुख पर आक्रमण कर दिया। उन महात्मा वानरों ने अपनी परिघ के समान भुजाओं तथा वृक्षों से उसे चारों ओर से मारना आरम्भ कर दिया। उनके द्वारा मारे गए वह वानरर्षभ दधिमुख वहीं धरती पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। कुछ क्षणों में उसे होश आया।

🏃 दधिमुख की सुग्रीव के पास यात्रा (श्लोक २३-३३)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
स लब्धसंज्ञो वेगेन हनूमन्तमभाषत।
नूनं राज्ञः प्रियं कार्यं मम चैतद्विचिन्त्यताम्॥
इत्युक्त्वा प्रययौ शीघ्रं यत्र राजा सुग्रीवः।
स ददर्श महात्मानं सुग्रीवं प्लवगेश्वरम्॥
तमुवाच ततः सर्वं यथावृत्तं महाकपिः।
राजंस्तव मधुवनं हनूमान्सह वानरैः॥
📖 भावार्थ : होश में आने पर उसने वेग से हनुमान से कहा: "निश्चय ही राजा का हित सोचना चाहिए, मेरा भी यही कर्तव्य है।" ऐसा कहकर वह शीघ्र ही वहाँ गया जहाँ राजा सुग्रीव थे। उसने उस महात्मा प्लवगेश्वर सुग्रीव को देखा। तब उस महाकपि दधिमुख ने उनसे सारा वृत्तांत कहा कि हे राजन्! आपके मधुवन को हनुमान सहित सभी वानरों ने नष्ट कर दिया है।
॥ श्लोक २९-४२ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य सुग्रीवः प्रत्यभाषत।
न मे दुःखं मधुवने यदेते विचरन्ति वै॥
प्रहर्षमतुलं लेभे सुग्रीवः सचिवैः सह।
अवश्यमेव हनुमान् दृष्टा सीतेति निश्चितम्॥
न ह्येषां हर्षो मध्वासीत् सीतामदृष्ट्वा कथंचन।
एवं निश्चित्य मनसा प्रेषयामास तं कपिम्॥
📖 भावार्थ : दधिमुख की बात सुनकर सुग्रीव ने कहा: "मुझे मधुवन के नष्ट होने का कोई दुःख नहीं है।" और वे अपने मंत्रियों के साथ अपार हर्ष का अनुभव करने लगे। उन्होंने निश्चय किया कि निश्चय ही हनुमान ने सीता को देख लिया है। क्योंकि बिना सीता को देखे उन्हें इतना हर्ष नहीं हो सकता था। ऐसा मन में निश्चय करके उन्होंने दधिमुख को ही हनुमान को बुलाने के लिए भेजा।
🔍 व्याख्या : सुग्रीव का यह कथन उनकी सूझबूझ और विवेकशीलता को दर्शाता है। वे क्षणिक क्रोध में आकर दण्ड देने के बजाय, इस उल्लास के मूल कारण को समझ गए और प्रसन्न हो गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🍯 मधुवन का प्रतीकात्मक अर्थ

मधुवन केवल एक उद्यान नहीं, बल्कि नियमों और मर्यादाओं का प्रतीक है। सफलता के उन्माद में वानरों द्वारा उसका विनाश यह दर्शाता है कि कभी-कभी अपार हर्ष में मर्यादाएँ भंग हो जाती हैं।

🧠 सुग्रीव का नेतृत्व कौशल

सुग्रीव ने यहाँ एक कुशल नेता की तरह व्यवहार किया। उन्होंने अपने अधिकारी (दधिमुख) की शिकायत सुनी, लेकिन परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए उचित निर्णय लिया। उन्होंने विनाश पर दुःखी होने के बजाय, उसके पीछे छिपी सफलता पर हर्ष व्यक्त किया।

📢 दधिमुख का कर्तव्यपालन

दधिमुख ने अपने कर्तव्य का पालन किया। वह युद्ध में हार गए, किन्तु अपने स्वामी को सूचित करने में सफल रहे। यह हमें सिखाता है कि असफलता के बावजूद अपने दायित्व का निर्वाह करना चाहिए।

🎉 उल्लास और सफलता का सम्बन्ध

यह सर्ग बताता है कि सच्ची सफलता का उल्लास इतना प्रबल होता है कि वह सारी बाधाओं और मर्यादाओं को पार कर जाता है। हनुमान और वानरों का यह उन्माद उसी अपार सफलता का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि एक सफल नेता को परिस्थितियों को समग्रता में देखना चाहिए। सुग्रीव की तरह हमें भी छोटी-मोटी हानियों से विचलित हुए बिना, बड़ी सफलता के आनन्द को समझना चाहिए। कार्य की सफलता ही सबसे बड़ा प्रमाण है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।