दधिमुख का किष्किन्धा की ओर प्रस्थान
अशोक वाटिका के विध्वंस के बाद, वानरों द्वारा मधुवन फल खाने के कारण दधिमुख और उनके अनुयायियों से विवाद हो जाता है। दधिमुख वानरों को दंड देने का प्रयास करते हैं, परन्तु वानर उन्हें परास्त कर देते हैं। तब दधिमुख स्वयं किष्किन्धा जाकर सुग्रीव को यह समाचार देने का निश्चय करते हैं।
विवरण
हनुमान द्वारा अशोक वाटिका के विध्वंस और सीता को संदेश देने के बाद, वानरगण प्रसन्नतापूर्वक वापस लौट रहे थे। मार्ग में उन्होंने सुग्रीव के ससुर और मधुवन के रक्षक दधिमुख के मधुवन में प्रवेश किया। वानरों ने वहाँ के सुरक्षित फलों को खाना प्रारम्भ कर दिया। दधिमुख और उनके सहायकों ने उन्हें रोकना चाहा, परन्तु वानरों ने उनकी अवहेलना की और उन्हें मारकर भगा दिया। दधिमुख क्रोधित होकर सुग्रीव के पास किष्किन्धा जाने को उद्यत हुए, जिससे यह समाचार शीघ्र ही सुग्रीव और श्रीराम तक पहुँच सके। यह सर्ग मधुवन प्रसंग के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ वानरों के आनन्दोत्सव का वर्णन है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ६२
(दधिमुख का किष्किन्धा की ओर प्रस्थान – मधुवन प्रसंग)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान द्वारा सीता का संदेश पाकर समस्त वानर हर्षित थे। वे उत्तर की ओर लौट रहे थे। मार्ग में स्थित सुग्रीव के श्वसुर दधिमुख द्वारा संरक्षित मधुवन में उन्होंने प्रवेश किया और उसके रसीले फलों का आनन्द लेने लगे। किन्तु इसी आनन्दोत्सव ने दधिमुख से उनका विवाद उत्पन्न कर दिया।
🍯 मधुवन में वानरों का प्रवेश और आनन्दोत्सव (श्लोक १-१०)
सुग्रीवस्य प्रियं रम्यं दधिमुखेन सुरक्षितम्॥
तद् दृष्ट्वा मधुवनं रम्यं वानराः फलसंकुलम्।
प्रहृष्टा मधु लुब्धाश्च दध्यौ चिरमरिंदमाः॥
अथाब्रुवन् प्रहृष्टास्ते वानराः सत्यविक्रमाः।
अनुजानीहि नः सर्वान् मधुवनं प्रवेशितुम्॥
पपुश्च मधु संहृष्टा ननृतुश्च यथासुखम्॥
केचिद् गायन्ति वानर्यः केचिद् हसन्ति चापरे।
केचिन्नृत्यन्ति चाप्यन्ये केचित् क्रीडन्ति संघशः॥
🛡️ दधिमुख का प्रतिरोध और पराजय (श्लोक ११-२०)
उवाच वानरान् सर्वान् मा यूयं मधु भक्षय॥
एतत् सुग्रीव भवनं रक्ष्यते मधुवनं मम।
न चान्येन तु भोक्तव्यं राज्ञामेतद् धि भोजनम्॥
न चैव ते निवर्तन्ते मदान्धाः कामरूपिणः॥
ततो दधिमुखः क्रोधात् ताडयामास वानरान्।
ते तु तेनाभिभूतास्ते दधिमुखं पर्यवारयन्॥
ततस्ते वानराः क्रुद्धा दधिमुखं परिचक्रमुः।
अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धा वधायास्य समन्ततः॥
🏃 दधिमुख का किष्किन्धा की ओर प्रस्थान (श्लोक २१-३३)
दधिमुखं परामृष्ट्वा निष्पिपेषुः सहस्रशः॥
स दधिमुखो वानरैर्बहुभिः परिवारितः।
विनिष्पिष्टशरीरस्तु कृच्छ्राद् विप्रजहौ तदा॥
स मुक्तो वानरैस्तैस्तु दधिमुखो वानरर्षभः।
जगाम किष्किन्धां शीघ्रं सुग्रीवाय निवेदितुम्॥
राजन् वानरमुख्यास्ते ये गताः सीतया सह॥
ते मधुवनमासाद्य मम रक्षाविधिं विना।
भक्षयन्ति फलं तत्र मधु चैव बलाद्बली॥
सुग्रीवस्तु तच्छ्रुत्वा वचनं दधिमुखस्य च।
उवाच प्रहसन् राजा दधिमुखं कृताञ्जलिः॥
न ते दोषो महाभाग यद्भुक्तं मधुवनं त्वया।
ममैते हृदयप्राणाः प्राणैरपि गरीयसः॥
एतच्छ्रुत्वा दधिमुखः प्रहृष्टवदनस्तदा।
प्रत्युवाच महात्मानं सुग्रीवं वानरेश्वरम्॥
यदि तुष्टो महाराज वानरैर्मधु भक्षितम्।
ततोऽहमपि तुष्टोऽस्मि गमिष्यामि यथासुखम्॥
📌 सर्गान्त : इस प्रकार द्विषष्टितम सर्ग में दधिमुख द्वारा किष्किन्धा प्रस्थान का वर्णन है। यह सर्ग वानरों के आनन्दोत्सव और उससे उत्पन्न विवाद के माध्यम से सीता के समाचार को सुग्रीव तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त करता है। अगले सर्ग में हनुमान और वानरों के किष्किन्धा आगमन का वर्णन होगा।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🍯 मधुवन प्रसंग का महत्त्व
मधुवन प्रसंग सुन्दरकाण्ड का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह वानरों के आनन्दोत्सव का प्रतीक है, जो उनके सफल अभियान की सूचना देता है। बिना किसी पूर्व सूचना के, दधिमुख की शिकायत ही सुग्रीव तक यह समाचार पहुँचाने का माध्यम बन जाती है।
👑 दधिमुख का चरित्र
दधिमुख एक कर्तव्यनिष्ठ रक्षक हैं। वे राजा के श्वसुर होते हुए भी अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। उनकी शिकायत अहंकारवश नहीं, बल्कि राज्य के नियमों के पालन हेतु है।
😊 सुग्रीव की प्रतिक्रिया
सुग्रीव का हँसते हुए उत्तर देना दर्शाता है कि वे वानरों के उत्साह का कारण समझ गए थे। उनकी यह प्रतिक्रिया उनके कूटनीतिक ज्ञान और वात्सल्य भाव को प्रदर्शित करती है।
🎉 उत्सव का महत्त्व
यह सर्ग बताता है कि सफलता के उपरान्त उत्सव मनाना स्वाभाविक है। वानरों ने मधुवन में जो आनन्द मनाया, वह उनकी कठिन यात्रा और सफलता का परिणाम था।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि कभी-कभी छोटे-छोटे विवाद भी बड़े कार्यों को सिद्ध करने का माध्यम बन जाते हैं। दधिमुख का किष्किन्धा जाना ही सुग्रीव तक सीता के मिलन के शुभ समाचार को शीघ्र पहुँचाने का कारण बना। हमें हर परिस्थिति में ईश्वरीय योजना को देखना चाहिए।