वानरों का मधुवन में विश्राम

सीता का पता लगाकर लौटे वानरगण सुग्रीव की आज्ञा से मधुवन (नन्दनवन) में प्रवेश करते हैं। अंगद के नेतृत्व में वे वहाँ सुरक्षित रखे मधु (शहद) का सेवन करते हैं और उत्सव मनाते हैं। वन के रक्षक दधिमुख द्वारा रोकने पर भी वे नहीं मानते, जिससे दधिमुख सुग्रीव से शिकायत करने जाता है।

विवरण

सीता का समाचार पाकर हनुमान सहित सभी वानर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। वे लंका से लौटकर उसी स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ से उन्होंने यात्रा शुरू की थी। सुग्रीव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वानरों को आया देख सुग्रीव अत्यन्त हर्षित होते हैं और उनके आतिथ्य के लिए उन्हें मधुवन (राजकीय उद्यान) जाने की आज्ञा देते हैं। सुग्रीव की आज्ञा पाकर वे सब मधुवन में प्रवेश करते हैं, जो दधिमुख नामक वानर की देखरेख में था। वहाँ पहुँचकर क्षुधा-पिपासा से व्याकुल वानरगण सुरक्षित रखे मधु (शहद) का सेवन करने लगते हैं। अंगद उनका नेतृत्व करते हैं। मदिरा के समान मधु पीकर वे मस्त हो जाते हैं और नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करने लगते हैं। दधिमुख उन्हें रोकता है, पर वे नहीं मानते। तब दधिमुख क्रोधित होकर उनका अपमान करता है और सुग्रीव से शिकायत करने चला जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ६१

(वानरों का मधुवन में प्रवेश और विश्राम)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चदशः सर्गः (६१) ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान और वानरों ने लंका में सीता का पता लगा लिया और सफलतापूर्वक वापस लौट आए। अब वे सुग्रीव से मिलने जा रहे हैं, किन्तु मार्ग में उनकी भेंट सुग्रीव के निजी उद्यान मधुवन से होती है। यह सर्ग उनके विजयोल्लास और उस उल्लास के कारण उत्पन्न एक मधुर हास्य-प्रसंग का वर्णन करता है।

🍃 सुग्रीव की आज्ञा और मधुवन की ओर प्रस्थान (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः समुद्रमुत्तीर्य हनूमान् मारुतात्मजः ।
तमेव देशमागम्य यत्र ते हरयोऽभवन् ॥
तत्र तान् हरिशार्दूलान् ददर्श हनुमान् कपीन् ।
ततः सर्वे समागम्य परिष्वज्य परस्परम् ॥
प्रहृष्टवदनाः सर्वे बभूवुर्हरिपुङ्गवाः ।
ततः कथयितुं वृत्तं सर्वे ते हरिपुङ्गवाः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; समुद्रमुत्तीर्य = समुद्र पार करके; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; तमेव = उसी; देशम् = स्थान पर; आगम्य = आकर; यत्र = जहाँ; ते = वे; हरयः = वानर; अभवन् = थे; तत्र = वहाँ; तान् = उन; हरिशार्दूलान् = श्रेष्ठ वानरों को; ददर्श = देखा; हनुमान् = हनुमान ने; कपीन् = वानरों को; ततः = तब; सर्वे = सब; समागम्य = एकत्र होकर; परिष्वज्य = परस्पर गले मिलकर; परस्परम् = एक-दूसरे को; प्रहृष्टवदनाः = प्रसन्न मुख वाले; सर्वे = सब; बभूवुः = हो गए; हरिपुङ्गवाः = श्रेष्ठ वानर; ततः = तब; कथयितुम् = कहने के लिए; वृत्तम् = वृत्तान्त; सर्वे = सब; ते = वे; हरिपुङ्गवाः = श्रेष्ठ वानर।
📖 भावार्थ : तदनन्तर पवनपुत्र हनुमान समुद्र पार करके उसी स्थान पर आए, जहाँ वे सब वानर थे। वहाँ उन श्रेष्ठ वानरों को देखकर हनुमान ने उन्हें देखा। तब सब वानर एकत्र होकर परस्पर गले मिले और उनके मुख प्रसन्नता से खिल उठे। फिर वे सब श्रेष्ठ वानर आपस में अपना-अपना वृत्तान्त कहने लगे।
॥ श्लोक ५-८ ॥
ततः सुग्रीवमासाद्य प्रहृष्टा हरिपुङ्गवाः ।
ददृशुस्ते महात्मानं रामं च विजयोत्सुकाः ॥
तान् दृष्ट्वा हृष्टवदनान् सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् ।
सीतायाश्चरितं ब्रूत कच्चिद्दृष्टा च मैथिली ॥
ततः सर्वे समुत्पत्य सुग्रीवं प्रत्यपूजयन् ।
ततो हनूमता सार्धं मधुवनमुपागमन् ॥
📖 भावार्थ : फिर वे हर्षित श्रेष्ठ वानर सुग्रीव के पास गए और उन्होंने विजय की इच्छा रखने वाले महात्मा राम को देखा। उन्हें प्रसन्न मुख देखकर सुग्रीव ने कहा, "सीता का वृत्तान्त बताओ। क्या मैथिली का पता चला?" तब सब वानर उठकर सुग्रीव का अभिवादन करने लगे। फिर वे हनुमान के साथ मधुवन को चले गए।

🍯 मधुवन का वैभव और वानरों का आनन्द (श्लोक ९-२२)

॥ श्लोक ९-१५ ॥
तद् रम्यं मधुवनं नाम सुग्रीवस्याभिपालितम् ।
दधिमुखो नाम हरिः पालयामास तत् वनम् ॥
तत्र प्रविश्य ते सर्वे मधून्यास्वादयन् कपाः ।
तेषां मधूनि जग्मुस्ते यथाकामं यथासुखम् ॥
ततः प्रहृष्टा हरयश्चेरुस्तत्र यथासुखम् ।
नृत्यन्तो गायन्तश्च हसन्तश्च महाबलाः ॥
📖 भावार्थ : वह रमणीय मधुवन सुग्रीव द्वारा सुरक्षित था। दधिमुख नामक वानर उस वन की रक्षा करता था। वहाँ प्रवेश करके उन सब वानरों ने मधु (शहद) का आस्वादन किया। वे यथाकाम और यथासुख उन मधुओं को पीने लगे। तब वे प्रसन्न हुए महाबली वानर वहाँ यथासुख विचरने लगे, नाचने, गाने और हँसने लगे।
🔍 व्याख्या : मधुवन एक सुरक्षित राजकीय उद्यान था, जहाँ का मधु केवल राजा सुग्रीव के उपयोग के लिए सुरक्षित रखा जाता था।
॥ श्लोक १६-२२ ॥
ते मधूनि पिबन्तस्तु प्रहृष्टा हरिपुङ्गवाः ।
न चैव ज्ञायतां कश्चिद् यत्नेनापि समन्वितः ॥
अथापश्यद् दधिमुखस्तान् वानरान् मदोत्कटान् ।
उवाच चैव सङ्क्रुद्धो मधु रक्षन्तु मा चिरम् ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नैव ते हरयोऽब्रुवन् ।
प्रहस्य चापि ते सर्वे पुनरेव पपुर्मधु ॥
📖 भावार्थ : वे श्रेष्ठ वानर मधु पीते हुए इतने प्रसन्न हो गए कि उन्हें किसी का भी ध्यान नहीं रहा। तब दधिमुख ने उन वानरों को मद से मतवाला देखा। वे अत्यन्त क्रोधित होकर बोले, "मधु की रक्षा करो, देर मत करो।" उनका वचन सुनकर भी वे वानर नहीं माने और हँसकर फिर से मधु पीने लगे।

😡 दधिमुख का क्रोध और सुग्रीव से शिकायत (श्लोक २३-३५)

॥ श्लोक २३-३५ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो दधिमुखो महाबलः ।
निषिध्य बहुधा तांस्तु न शशाक निवारितुम् ॥
ततः प्रहस्य तान् सर्वान् सामन्तान् हरियूथपान् ।
उवाच परुषं वाक्यं दधिमुखो भृशदुःखितः ॥
निवर्तयामास ततो यत्नेन महता तदा ।
ततस्ते हरयः सर्वे क्रोधयुक्ता महाबलाः ॥
दधिमुखं परामृश्य क्रोधाद् विस्मयमागताः ।
ततः स दधिमुखः क्रुद्धः सुग्रीवमभिचक्रमे ॥
आचख्यौ च तदा सर्वं यथावृत्तं निवेशने ।
मधुवने समुत्पन्नं यद्वृत्तं हरिभिस्तदा ॥
📖 भावार्थ : तब क्रोध से भरा महाबली दधिमुख उन्हें बहुत प्रकार से मना करने पर भी रोक न सका। तब उसने उन सब वानरों और यूथपतियों की ओर देखकर व्यंग्यपूर्ण कठोर वचन कहे। बहुत यत्न करके भी वह उन्हें रोक न सका। तब वे सब महाबली वानर भी क्रोधित हो गए और उन्होंने दधिमुख को पकड़ लिया, जिससे वह विस्मित हो गया। तब क्रोधित दधिमुख सुग्रीव के पास गया और उन्हें उस समस्त वृत्तान्त को बताया जो मधुवन में वानरों के कारण हुआ था।
🔍 व्याख्या : दधिमुख सुग्रीव के पास शिकायत लेकर जाता है, किन्तु आगे के सर्ग में सुग्रीव इस समाचार को सुनकर प्रसन्न होंगे, क्योंकि वे समझ जाते हैं कि वानरों की यह मस्ती किसी बड़ी सफलता का सूचक है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार पन्द्रहवें (६१वें) सर्ग में वानरों का मधुवन में विश्राम और दधिमुख का सुग्रीव के पास जाना वर्णित है। अगले सर्ग में हनुमान द्वारा सुग्रीव और राम को सीता का समाचार सुनाया जाएगा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🎉 विजयोत्सव का प्रतीक

मधुवन में मधुपान करना केवल मद्यपान नहीं है, बल्कि यह एक कठिन अभियान की सफलता के उपलक्ष्य में मनाया गया विजयोत्सव है। यह वानरों के सहज मानवीय स्वभाव को दर्शाता है।

🍯 मधुवन का महत्व

मधुवन सुग्रीव के राजचिह्न और वैभव का प्रतीक है। वानरों द्वारा उसका उपभोग करना उनके प्रति सुग्रीव के अपार स्नेह और उनके अटूट समर्पण के पुरस्कार के रूप में देखा जा सकता है।

😅 हास्य रस का प्रयोग

यह सर्ग रामायण में हास्य रस का एक सुन्दर उदाहरण है। मस्त वानरों का नाचना-गाना और दधिमुख की असहायता का चित्रण अत्यन्त मनोरंजक है।

📢 समाचार-वाहक की भूमिका

दधिमुख की शिकायत ही अप्रत्यक्ष रूप से सुग्रीव तक यह संदेश पहुँचाने का माध्यम बनती है कि उसके वानर असाधारण रूप से प्रसन्न हैं, अतः उनका अभियान सफल रहा होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सफलता का उत्सव मनाना चाहिए, परन्तु मर्यादा का पालन करते हुए। वानरों की मस्ती के कारण उन्हें दधिमुख के विरोध का सामना करना पड़ा, तथापि उनके हर्ष के कारण को समझकर उनके स्वामी ने उन्हें क्षमा कर दिया। हमें अपने उल्लास में दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः (६१) ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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