महल के अंदर प्रवेश और चंद्रमा का वर्णन

सुन्दरकाण्ड के छठे सर्ग में हनुमान जी का लंकापुरी में प्रवेश और उसके सौंदर्य का वर्णन है। रात्रि के समय चन्द्रमा के उदय होने पर हनुमान जी उसकी शोभा का वर्णन करते हैं और फिर रावण के महल के भीतर प्रवेश कर सीता की खोज प्रारम्भ करते हैं।

विवरण

समुद्र लाँघकर लंका पहुँचने के बाद हनुमान जी पर्वत शिखर पर खड़े होकर सुनहरी लंका नगरी को देखते हैं। रात्रि हो जाने के कारण वे अंधेरे में ही नगर में प्रवेश करने का निश्चय करते हैं। इसी समय चन्द्रमा का उदय होता है, जो रोहिणी नक्षत्र से युक्त होकर सम्पूर्ण लंका को अपनी शीतल किरणों से आलोकित कर देता है। हनुमान जी चन्द्रमा की इस अद्भुत छटा का वर्णन करते हैं। तत्पश्चात वे लंका के रक्षकों को चकमा देकर नगरी में प्रवेश कर जाते हैं। वहाँ वे भव्य महलों, सड़कों, बगीचों और चौराहों को देखते हैं। अन्त में वे रावण के अति सुन्दर महल के भीतर प्रवेश करते हैं, जो नाना प्रकार के रत्नों और कलाकृतियों से सुसज्जित है। महल के अन्दर वे रावण को निद्रा में देखते हैं तथा अन्य स्थानों पर सुन्दर स्त्रियों को सोते हुए देखते हैं, किन्तु सीता वहाँ नहीं होतीं। यह सर्ग हनुमान के लंका-प्रवेश और उसके सौन्दर्य-वर्णन के लिए महत्वपूर्ण है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ६

(महल के अंदर प्रवेश और चंद्रमा का वर्णन)

ॐ श्री हनुमते नमः ॥ अथ षष्ठः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : समुद्र लाँघकर हनुमान जी लंका के त्रिकूट पर्वत पर उतरते हैं। सूर्यास्त हो चुका है, रात्रि का आगमन होता है। वे अंधकार का लाभ उठाकर लंका नगरी में प्रवेश करना चाहते हैं। इसी समय चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सम्पूर्ण लंका को आलोकित कर देता है। यह सर्ग उस चन्द्रोदय के मनोहारी वर्णन तथा हनुमान के रावण के महल में प्रवेश की कथा कहता है।

🌕 चन्द्रोदय और उसकी शोभा (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रदोषे सम्प्राप्ते चन्द्रमा उदितः शुभः ।
रोहिणीमभिसम्पन्नः शुक्लपक्ष इवोदितः ॥
शीतांशुः शीतलैः किरणैः प्लावयन्निव लङ्कया ।
दर्शयामास तेजस्वी चन्द्रमा रोहिणीपतिः ॥
तस्योदयप्रभावेण लङ्का सर्वा विराजिता ।
प्रासादैर्विविधैः शुभ्रैः सूर्यरश्मिभिरिव प्रभा ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रदोषे = सन्ध्या काल में; सम्प्राप्ते = आने पर; चन्द्रमा = चन्द्रमा; उदितः = उदय हुआ; शुभः = कल्याणकारी; रोहिणीम् = रोहिणी नक्षत्र से; अभिसम्पन्नः = युक्त; शुक्लपक्षः = शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा; इव = समान; उदितः = उदित हुआ; शीतांशुः = शीतल किरणों वाला; शीतलैः = शीतल; किरणैः = किरणों से; प्लावयन् = डुबोता हुआ; इव = सा; लङ्कया = लंका को; दर्शयामास = दिखाया; तेजस्वी = तेजस्वी; चन्द्रमा = चन्द्रमा; रोहिणीपतिः = रोहिणी का पति; तस्य = उसके; उदयप्रभावेण = उदय के प्रभाव से; लङ्का = लंका; सर्वा = सम्पूर्ण; विराजिता = सुशोभित हुई; प्रासादैः = महलों से; विविधैः = अनेक प्रकार के; शुभ्रैः = स्वच्छ (सफेद); सूर्यरश्मिभिः = सूर्य की किरणों से; इव = समान; प्रभा = कान्ति।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात सन्ध्या काल आने पर शुभ चन्द्रमा उदित हुआ। वह रोहिणी नक्षत्र से युक्त था, मानो शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा हो। उस शीतल किरणों वाले तेजस्वी रोहिणीपति चन्द्रमा ने अपनी शीतल किरणों से सम्पूर्ण लंका को मानो डुबो दिया। उसके उदय के प्रभाव से सारी लंका शोभायमान हो उठी, मानो अनेक प्रकार के उज्ज्वल महल सूर्य की किरणों से जगमगा रहे हों।
🔍 व्याख्या : वाल्मीकि ने यहाँ चन्द्रमा के उदय का अत्यन्त रमणीय वर्णन किया है। रात्रि के समय हनुमान लंका में प्रवेश कर रहे हैं, अतः चन्द्रमा का प्रकाश उनके मार्ग को प्रकाशित करता है और नगरी के सौन्दर्य को निखारता है। चन्द्रमा को रोहिणीपति कहना पौराणिक परम्परा है।
॥ श्लोक ४-१० ॥
स तत्र विविधान् देशान् प्रेक्षमाणो महाकपिः ।
ददर्श लङ्कां पूर्णां च राक्षसैर्भीमदर्शनैः ॥
गुप्तां रक्षोभिर्बलिभिः सुगुप्तद्वारगोपुराम् ।
नानाप्रकारैः शस्त्रैश्च यन्त्रैश्च समलंकृताम् ॥
तां रात्रिमिव दुष्पारां नदीं प्रावृषिजां क्षणात् ।
हनुमान् लङ्कया तुल्यां रावणस्य निवेशनम् ॥
प्रविवेश महातेजा हनुमान् मारुतात्मजः ।
राक्षसाधिपतेः सौधं रावणस्य महात्मनः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ विविध प्रदेशों को देखते हुए महाकपि हनुमान ने लंका को देखा जो भयंकर दिखने वाले राक्षसों से भरी हुई थी। वह लंका बलवान् राक्षसों द्वारा सुरक्षित थी, जिसके द्वार और गोपुर सुगुप्त थे तथा अनेक प्रकार के शस्त्रों और यंत्रों से सुसज्जित थी। उस दुस्तर रात्रि के समान अगम लंका को देखकर हनुमान ने उस नदी के समान रावण के निवास स्थान में प्रवेश किया। महातेजस्वी हनुमान, वायुपुत्र, राक्षसाधिपति महात्मा रावण के महल में प्रविष्ट हुए।
🔍 व्याख्या : हनुमान लंका की सुरक्षा-व्यवस्था को देखकर भी निडरता से उसमें प्रवेश कर जाते हैं। यहाँ लंका की तुलना वर्षा ऋतु की अगम नदी से की गई है।

🏰 रावण के महल का अवलोकन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
स सौधाग्राणि दिव्यानि नानारत्नविभूषितान् ।
ददर्श हनुमान् तत्र रावणस्य निवेशनान् ॥
काञ्चनैस्तोरणैश्चित्रैर्मुक्ताजालविभूषितैः ।
वैदूर्यमयपादैश्च प्रवालफलकैस्तथा ॥
शातकुम्भमयैर्दिव्यैर्नानाचित्रपताकिभिः ।
वरस्त्रीभिश्च संकीर्णं नानापुष्पफलद्रुमैः ॥
तदद्भुततमं दृष्ट्वा रावणस्य निवेशनम् ।
हनुमान् विस्मयमगात् सीतादर्शनकांक्षया ॥
📖 भावार्थ : वहाँ हनुमान ने रावण के निवास स्थानों को देखा, जो दिव्य महलों के शिखरों से युक्त और नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित थे। वे सुनहले तोरणों से सज्जित थे, जिन पर मोतियों के जाल विभूषित थे, तथा जिनके पाये वैदूर्य मणि के बने थे और फलक प्रवाल (मूंगा) के थे। वे महल कुन्दन (सोने) के बने थे, दिव्य थे, तथा नाना प्रकार की चित्र-विचित्र पताकाओं से युक्त थे। वे उत्तम स्त्रियों से भरे हुए थे और उनमें अनेक प्रकार के पुष्प-फल वाले वृक्ष भी थे। रावण के उस अत्यन्त अद्भुत निवास स्थान को देखकर हनुमान आश्चर्यचकित हो गए, सीता के दर्शन की अभिलाषा रखते हुए।
॥ श्लोक १६-२० ॥
स राक्षसेन्द्र भवनं प्रविश्य हनुमान् कपिः ।
ददर्श रावणं निद्रां सम्प्राप्तं भीमदर्शनम् ॥
नानारत्नसमायुक्ते पर्यङ्के परमास्तृते ।
उपगीयमानं रम्याभिर्नारीभिरप्सरोभिः ॥
तस्य देहप्रभा दीप्ता समन्तात् प्रतिभाति च ।
दीप्तस्येव हि सूर्यस्य प्रभा भवति भास्वरा ॥
📖 भावार्थ : राक्षसेन्द्र के भवन में प्रवेश करके हनुमान कपि ने रावण को देखा, जो निद्रा में मग्न था और भयंकर दिख रहा था। वह अनेक रत्नों से युक्त, अति सुन्दर बिछी हुई शैया पर सो रहा था। उसके चारों ओर रमणीय अप्सराओं के समान सुन्दर स्त्रियाँ गान कर रही थीं। उसके शरीर की प्रभा चारों ओर फैल रही थी, मानो प्रज्वलित सूर्य की किरणें हों।
🔍 व्याख्या : रावण का वैभव और शक्ति अद्वितीय थी, पर वह अधर्मी था। हनुमान उसे देखकर भी विचलित नहीं होते, क्योंकि उनका लक्ष्य केवल सीता का पता लगाना है।

🔍 सीता की खोज का संकल्प (श्लोक २१-२८)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
तत्र सीतां न पश्यामि रावणान्तःपुरे कपिः ।
इति चिन्तापरो भूत्वा पुनर्ध्यानमुपागतः ॥
नूनं सीता न दृश्येत रावणस्य निवेशने ।
अन्यत्र भवनात् तस्या वनं यास्यामि मैथिलीम् ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् राक्षसेन्द्र निवेशनात् ।
निष्क्रम्यान्यत्र सीतायाः मार्गणाय मनो दधे ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने रावण के अन्तःपुर में सीता को नहीं देखा। तब वे चिन्तित होकर पुनः विचार करने लगे: "निश्चय ही रावण के इस निवास स्थान में सीता नहीं दिख रही हैं। अतः इस भवन से अन्यत्र कहीं वन या उपवन में मैं मैथिली की खोज करूँगा।" ऐसा सोचकर हनुमान राक्षसेन्द्र के भवन से बाहर निकल आये और सीता की खोज के लिए अन्यत्र जाने का मन बनाया।
🔍 व्याख्या : इस प्रकार हनुमान पूरे महल में सीता को न पाकर निराश नहीं होते, बल्कि खोज जारी रखने का निश्चय करते हैं। यह उनकी दृढ़ निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌕 चन्द्रमा का काव्यात्मक वर्णन

वाल्मीकि ने इस सर्ग में चन्द्रमा के उदय का जो अलौकिक वर्णन किया है, वह सम्पूर्ण रामायण में अद्वितीय है। यह वर्णन रात्रि के सौन्दर्य और हनुमान के मनोभावों को उजागर करता है।

🏰 लंका का वैभव

रावण के महल का विस्तारपूर्वक वर्णन करके वाल्मीकि राक्षसों की समृद्धि और रावण के ऐश्वर्य को दर्शाते हैं, जो अन्त में उसके पतन का कारण बनता है। यह वर्णन आगे के सर्गों में सीता की खोज के लिए भूमिका तैयार करता है।

🐒 हनुमान की दृढ़निश्चयता

महल में सीता न मिलने पर भी हनुमान विचलित नहीं होते, बल्कि नये स्थान पर खोज करने का संकल्प लेते हैं। यह हनुमान के अटूट धैर्य और समर्पण को दर्शाता है।

📜 रात्रि का महत्त्व

रात्रि के समय हनुमान का लंका में प्रवेश रहस्य और साहस को उजागर करता है। यह हनुमान के गुप्तचर कौशल को भी दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि लक्ष्य की प्राप्ति के लिए धैर्य और दृढ़ता आवश्यक है। हनुमान ने रात्रि के अंधकार का लाभ उठाया, चन्द्रमा के प्रकाश में मार्ग देखा, और बिना विचलित हुए अपनी खोज जारी रखी। हमें भी जीवन में आने वाली बाधाओं से घबराकर अपने लक्ष्य से विमुख नहीं होना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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