हनुमान् द्वारा अपने साथी वानरों को सीता की दशा का वर्णन

लंका दहन के पश्चात हनुमान जी समुद्र तट पर अपने साथी वानरों से मिलते हैं और उन्हें सीता माता की दशा, उनके दुःख, रावण के आतंक एवं उनके द्वारा दिये गये संदेश का विस्तार से वर्णन करते हैं।

विवरण

लंका का दहन करके हनुमान जी समुद्र तट पर लौट आते हैं, जहाँ अंगद, जाम्बवान आदि सभी वानर चिन्तित एवं उत्सुक हैं। हनुमान को सकुशल देख सब आनन्दित होते हैं। फिर वानरेश्वर अंगद के पूछने पर हनुमान जी सीता की खोज का सारा वृत्तान्त सुनाते हैं। वे बताते हैं कि किस प्रकार सीता अशोक वाटिका में राक्षसियों से घिरी अत्यन्त दीन दशा में थीं, रावण के भय से व्याकुल थीं, तथा केवल राम का नाम जपते हुए उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। हनुमान ने सीता को राम की अंगूठी दी और उनका सन्देश लिया कि वे एक मास के भीतर राम को आकर उन्हें बचाने का निवेदन करें। यह सुनकर सभी वानर हर्षित होते हैं और राम के प्रति आस्था और भी दृढ़ होती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५९

(हनुमान् द्वारा अपने साथी वानरों को सीता की दशा का वर्णन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनषष्टितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने लंका का दहन करके सीता की खोज का महान कार्य सम्पन्न किया। अब वे सकुशल समुद्र पार कर उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ अंगद, जाम्बवान आदि सभी वानर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वानर हनुमान को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और फिर हनुमान उन्हें सीता की दशा का सविस्तार वर्णन सुनाते हैं।

🐒 हनुमान का वानरों से मिलना और अंगद का प्रश्न (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो ददर्श हनुमान् वानरान् हेमपिङ्गलान् ।
समुद्रतीरमासाद्य सुखं स्वप्नोपमान् स्थितान् ॥
ते तमायान्तमालोक्य हनूमन्तं महाबलम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभुः सम्प्रहृष्टतनूरुहाः ॥
अङ्गदस्तु ततो वीरो हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
कच्चित् सीता समृद्धा ते दृष्टा रामप्रियाङ्गना ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; ददर्श = देखा; हनुमान् = हनुमान ने; वानरान् = वानरों को; हेमपिङ्गलान् = सुवर्ण के समान पिङ्गल वर्ण वाले; समुद्रतीरम् = समुद्र के तट पर; आसाद्य = पहुँचकर; सुखम् = सुखपूर्वक; स्वप्नोपमान् = स्वप्न के समान; स्थितान् = स्थित; ते = उन्होंने; तम् = उसको; आयान्तम् = आते हुए; आलोक्य = देखकर; हनूमन्तम् = हनुमान को; महाबलम् = महाबली; प्रहर्षम् = हर्ष को; अतुलम् = अपूर्व; लेभुः = प्राप्त किया; सम्प्रहृष्टतनूरुहाः = रोमाञ्चित हुए; अङ्गदः = अंगद; तु = तो; ततः = फिर; वीरः = वीर; हनूमन्तम् = हनुमान से; अथ = उसके बाद; अब्रवीत् = बोले; कच्चित् = क्या; सीता = सीता; समृद्धा = सकुशल; ते = तुमने; दृष्टा = देखी; रामप्रियाङ्गना = राम की प्रिय पत्नी।
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने समुद्र के तट पर पहुँचकर सोने के समान पिङ्गल वर्ण वाले वानरों को देखा, जो सुखपूर्वक ऐसे स्थित थे मानो स्वप्न देख रहे हों। उन्होंने आते हुए महाबली हनुमान को देखकर अपूर्व हर्ष प्राप्त किया और रोमाञ्चित हो गये। फिर वीर अंगद हनुमान से बोले – “क्या तुमने राम की प्रिय पत्नी सीता को सकुशल देखा?”
🔍 व्याख्या : वानर सेना लंका के भय से दूर समुद्र तट पर एकत्र थी। हनुमान की वापसी से उनमें नवचेतना आ गई। अंगद ने सर्वप्रथम सीता के विषय में पूछा, जो सबके हृदय में बसी थीं।
॥ श्लोक ५-८ ॥
ततः सीतामनुप्राप्तां हनुमान् वाक्यमब्रवीत् ।
दृष्टा सीता मया देवी रामस्य महिषी प्रिया ॥
रावणेन समानीता निहता राक्षसीवशे ।
अशोकवनिकामध्ये रक्षिता क्रूरराक्षसीः ॥
न च सा भोक्तुमिच्छति रावणस्य महीपतेः ।
राम एव गतिः सीता नान्यं पश्यति सा नृपम् ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने सीता के विषय में बताते हुए कहा – “मैंने देवी सीता को देखा है, जो राम की प्रिय महिषी हैं। वे रावण द्वारा हरकर लाई गई हैं और राक्षसियों के वश में अशोक वाटिका में क्रूर राक्षसियों द्वारा रक्षित हैं। वह रावण के भोग को स्वीकार नहीं करना चाहतीं। सीता के लिए राम ही एकमात्र आश्रय हैं; वे किसी अन्य पुरुष को नहीं देखतीं।”
🔍 व्याख्या : हनुमान ने सीता के शील और राम के प्रति एकनिष्ठ प्रेम का उल्लेख किया। यह वानरों के लिए अत्यन्त प्रेरणादायक था।

😔 सीता की दीन दशा का वर्णन (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१५ ॥
एकवेणीधरा दीना मलिनाम्बरधारिणी ।
भूमौ शयाना सततं रामरामेति वादिनी ॥
राक्षसीभिः परिवृता भयसन्त्रस्तचेतना ।
निश्वसन्ती मुहुर्दीना पद्मिनीव हिमागमे ॥
तां दृष्ट्वा दीनवदनां मलिनां पांशुकुण्ठिताम् ।
मया चाभिज्ञया दत्ता रामस्याङ्गुलियष्टिका ॥
📖 भावार्थ : “वे एक चोटी किये हुए, दीन, मैले वस्त्र धारण किये हुए, भूमि पर लेटी हुई सदा ‘राम राम’ कहती रहती हैं। राक्षसियों से घिरी भय से व्याकुल चित्त वाली, बार-बार नि:श्वास लेती हुई वह दीना स्त्री हिम के समय कमलिनी के समान दिखती है। उनके दीन मुख, मलिन और धूल से सनी देख मैंने राम की अंगुलीयक (अंगूठी) उन्हें पहचान के रूप में दी।”
🔍 व्याख्या : हनुमान ने सीता की शारीरिक दशा का वर्णन कर वानरों के हृदय को द्रवित किया। साथ ही उन्होंने राम की अंगूठी देने की बात कही, जो उनकी सफलता का प्रमाण थी।
॥ श्लोक १६-२० ॥
सा तु दृष्ट्वा प्रहर्षिता प्रत्यभिज्ञाय चाङ्गुलीम् ।
रामचन्द्रस्य देवस्य प्रियाख्यानमथाब्रवीत् ॥
सा मामुवाच वैदेही क्षिप्रमाख्याहि वानर ।
रामाय सह सुग्रीव सीतां दृष्ट्वा ह्यनामयाम् ॥
मासेन त्वरितो राम इहागत्य बलान्वितः ।
निहत्य रावणं संख्ये मामुद्धरतु वानर ॥
📖 भावार्थ : “अंगूठी को देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुईं और पहचान कर श्रीरामचन्द्र के लिए प्रिय समाचार कहा। वैदेही ने मुझसे कहा – ‘हे वानर, शीघ्र जाकर राम और सुग्रीव से कहो कि तुमने सीता को सकुशल देखा है। राम एक मास के भीतर शीघ्रता से सेना सहित आकर युद्ध में रावण को मारकर मेरा उद्धार करें।’”
🔍 व्याख्या : सीता ने समय की बाध्यता भी बताई – एक मास के अन्दर राम का आना आवश्यक है। यह सुन वानरों के मन में उत्सुकता और उत्साह बढ़ा।

🎉 वानरों का उत्साह और राम के प्रति निष्ठा (श्लोक २१-३२)

॥ श्लोक २१-३२ ॥
तच्छ्रुत्वा हनुमद्वाक्यं सर्वे वानरयूथपाः ।
प्रहर्षमतुलं लेभुः प्रशशंसुश्च वायसुतम् ॥
अङ्गदो जाम्बवांश्चैव नलनीलौ च वानरौ ।
ऊचुः प्रहृष्टमनसो हनूमन्तमिदं वचः ॥
त्वया सुग्रीवकार्याणि साधितानि महाकपे ।
रामप्रियार्थे यत्नेन प्राणत्यागेन वा कृतम् ॥
अद्य प्रभृति ते वीरा वयमाज्ञापय प्रभो ।
रामकार्ये ध्रुवं सर्वे त्यजामो वा स्वजीवितम् ॥
📖 भावार्थ : हनुमान के वचन सुनकर सभी वानर यूथपति अपूर्व हर्ष से भर गये और वायुपुत्र की प्रशंसा करने लगे। अंगद, जाम्बवान, नल और नील ने प्रसन्न मन से हनुमान से कहा – “हे महाकपे! तुमने सुग्रीव के कार्यों को सिद्ध किया है। राम के प्रिय के लिए प्राण त्याग कर भी यत्न किया है। आज से हम सब तुम्हारी आज्ञा में हैं। हे प्रभो! राम के कार्य के लिए हम निश्चय ही अपना जीवन त्याग देंगे।”
🔍 व्याख्या : हनुमान की सफलता से सम्पूर्ण वानर सेना में नव स्फूर्ति आ गई। सभी ने राम के कार्य के लिए निःस्वार्थ समर्पण का भाव प्रकट किया।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार उन्नीसवें सर्ग में हनुमान ने वानरों को सीता का वृत्तान्त सुनाकर उनमें नया जोश भर दिया। अब वे सभी राम को यह समाचार देने के लिए किष्किन्धा की ओर प्रस्थान करेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💬 संवाद की सुन्दरता

हनुमान और वानरों के मध्य यह संवाद मित्रता, विश्वास और एकता का प्रतीक है। हनुमान ने जिस प्रकार सीता की दशा का मार्मिक वर्णन किया, उससे वानरों के हृदय में करुणा एवं क्रोध दोनों जागृत हुए।

⏳ समय का महत्व

सीता द्वारा निर्धारित एक मास की समय-सीमा आगे की योजना के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। इससे राम को शीघ्र कार्यवाही करने की प्रेरणा मिलती है।

🧘 हनुमान की निष्ठा

हनुमान ने केवल सीता को खोजा ही नहीं, अपितु उनके संदेश को सही रूप में वानरों तक पहुँचाया। उनकी भक्ति और कर्तव्यपरायणता अनुकरणीय है।

🛡️ वानर सेना का उत्साह

हनुमान के वर्णन ने वानरों को आत्मविश्वास और बल प्रदान किया। वे अब राम के कार्य के लिए प्राण त्यागने को तैयार हैं – यह नेतृत्व की सफलता का उत्कृष्ट उदाहरण है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा सेवक अपने स्वामी के कार्य को ही अपना सर्वस्व मानता है। हनुमान ने न केवल सीता को खोजा, वरन् अपने साथियों को भी उस कार्य के प्रति समर्पित कर दिया। हमें भी अपने दायित्वों के प्रति ऐसी ही निष्ठा रखनी चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे एकोनषष्टितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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