हनुमान का लंका तट से छलांग लगाना और मैनाक पर्वत का स्पर्श

हनुमान जी लंका जाने के लिए समुद्र तट से विशाल रूप धारण कर छलांग लगाते हैं। बीच समुद्र में मैनाक पर्वत देवताओं की प्रेरणा से प्रकट होता है और उन्हें विश्राम के लिए आमंत्रित करता है। हनुमान उसके आतिथ्य का सम्मान करते हुए उसे स्पर्श करते हैं और बिना विश्राम किए आगे बढ़ जाते हैं। यह सर्ग हनुमान के अडिग संकल्प और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है।

विवरण

हनुमान जी सीता की खोज के लिए समुद्र पार करने का दृढ़ निश्चय करते हैं। वे लंका तट से पर्वत के समान विशाल रूप धारण कर आकाश में छलांग लगाते हैं। उनके प्रचंड वेग से समुद्र हिल उठता है और देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा महर्षि पुष्पवर्षा कर उनकी स्तुति करते हैं। उसी समय, देवताओं की प्रेरणा से मैनाक पर्वत समुद्र से प्रकट होता है। मैनाक का पूर्व इतिहास है – वह इन्द्र के वज्र से बचने के लिए समुद्र में छिप गया था और अब वह हनुमान की सेवा में उपस्थित होता है। वह हनुमान को विश्राम का निमंत्रण देता है। हनुमान उसके सत्कार को हृदय से स्वीकार करते हैं, किंतु कार्य की अति आवश्यकता के कारण वहाँ नहीं रुक सकते। वे मैनाक को हाथ के स्पर्श से आशीर्वाद देते हैं और पुनः वेगपूर्वक लंका की ओर उड़ान भरते हैं। मैनाक उनके स्पर्श से धन्य हो जाता है और देवता पुनः उनकी प्रशंसा करते हैं। इस प्रकार हनुमान अपनी अद्भुत शक्ति और धैर्य का परिचय देते हुए लंका की ओर अग्रसर होते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५७

(हनुमान का लंका तट से छलांग लगाना और मैनाक पर्वत का स्पर्श)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने समुद्र पार करने का दृढ़ निश्चय किया। वे लंका तट से विशाल रूप धारण कर आकाश में छलांग लगाते हैं। उस समय देवताओं की प्रेरणा से मैनाक पर्वत समुद्र से प्रकट होता है और हनुमान को विश्राम का निमंत्रण देता है। हनुमान उसके आतिथ्य की सराहना करते हैं और उसे स्पर्श करके आगे बढ़ जाते हैं। यह सर्ग हनुमान के अटूट साहस और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है।

🏞️ समुद्रलाँघन और मैनाक का आविर्भाव (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः समुत्पपाताशु वेगवान्मारुतात्मजः ।
वेलामासाद्य लङ्कायाः प्रांशुः पर्वतसन्निभः ॥
तस्य वेगेन महता वेल्लितः स महोदधिः ।
उत्पपात तदा वेलां सहसैव समन्ततः ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।
सम्पूज्य मनसा वीरं मुमुचुः पुष्पवृष्टयः ॥
तस्य वेगेन वेगज्ञो मैनाको नाम पर्वतः ।
उत्थितः सहसा तोयाद्दर्शयन्नात्मनो बलम् ॥
स मैनाको महाशैलो हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
विश्राम्यतां क्षणमिह प्रतीक्ष्यो भवता हि सः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; समुत्पपात = उछला; आशु = शीघ्र; वेगवान् = वेगवान; मारुतात्मजः = हनुमान; वेलाम् = तट; आसाद्य = पाकर; लङ्कायाः = लंका का; प्रांशुः = लम्बे; पर्वतसन्निभः = पर्वत के समान; तस्य = उसके; वेगेन = वेग से; महता = महान; वेल्लितः = हिल गया; सः = वह; महोदधिः = महासागर; उत्पपात = उछला; तदा = तब; वेलाम् = तट; सहसा = अचानक; एव = ही; समन्ततः = चारों ओर; ततः = तब; देवाः = देवता; सगन्धर्वाः = गन्धर्व सहित; सिद्धाः = सिद्ध; च = और; परमर्षयः = महर्षि; सम्पूज्य = पूजा करके; मनसा = मन से; वीरम् = वीर को; मुमुचुः = बरसाई; पुष्पवृष्टयः = पुष्प वर्षा; तस्य = उसके; वेगेन = वेग से; वेगज्ञः = वेग जानने वाला; मैनाकः = मैनाक; नाम = नाम; पर्वतः = पर्वत; उत्थितः = उठा; सहसा = अचानक; तोयात् = जल से; दर्शयन् = दिखाता हुआ; आत्मनः = अपना; बलम् = बल; सः = वह; मैनाकः = मैनाक; महाशैलः = महान पर्वत; हनूमन्तम् = हनुमान को; अथ = तब; अब्रवीत् = बोला; विश्राम्यताम् = विश्राम करो; क्षणम् = क्षणभर; इह = यहाँ; प्रतीक्ष्यः = प्रतीक्षा के योग्य; भवता = आपके द्वारा; हि = ही; सः = वह।
📖 भावार्थ : तब वेगवान मारुतिपुत्र हनुमान लंका के तट से पर्वत के समान विशाल रूप धारण कर शीघ्रता से आकाश में उछले। उनके महान वेग से वह महासागर हिल गया और अचानक चारों ओर से तट से बाहर उछलने लगा। तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि उस वीर का मन से सम्मान कर पुष्पवर्षा करने लगे। उनके वेग को जानकर मैनाक नामक पर्वत सहसा जल से प्रकट हुआ, अपना बल दिखाता हुआ। उस महान पर्वत मैनाक ने हनुमान से कहा: "हे वीर, क्षणभर यहाँ विश्राम करें, आप मेरे द्वारा प्रतीक्षित हैं।"
🔍 व्याख्या : हनुमान के पराक्रम से समुद्र भी हिल उठा और देवताओं ने पुष्पवर्षा की। मैनाक पर्वत, जो पहले इन्द्र के वज्र से बचने के लिए समुद्र में छिप गया था, अब हनुमान की सेवा में आगे आया।

⛰️ हनुमान का मैनाक पर्वत से संवाद और आगे प्रस्थान (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
हनूमांस्तु महातेजा मैनाकं प्रत्यपूजयत् ।
प्रत्युवाच च तं शैलं वचनं वाक्यकोविदः ॥
बहुमानाच्च ते शैल करोमि हृदि सत्क्रियाम् ।
न तु शक्यं मया स्थातुं कार्यवेगेन पीडितः ॥
अहं रामस्य कार्यार्थं प्रस्थितो लवणाम्बुधिम् ।
तस्य मे गच्छमानस्य निवासो नोपपद्यते ॥
ततः पाणितलेनैव स मैनाकमथास्पृशत् ।
प्रतस्थे च द्रुतं वीरो वेगवान्मारुतात्मजः ॥
स मैनाको महाशैलः स्पृष्ट्वा तेन महात्मना ।
मुमुदे परया प्रीत्या साधु साध्विति वादयन् ॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी हनुमान ने मैनाक का पूजन किया और वाक्य-कोविद होने के कारण उस पर्वत से बोले: "हे शैल! मैं तुम्हारा बहुमान करता हूँ और हृदय में सत्कार ग्रहण करता हूँ, परंतु कार्य के वेग से पीड़ित होने के कारण मेरे लिए यहाँ ठहरना संभव नहीं है। मैं राम के कार्य से नमक के समुद्र को पार करने के लिए प्रस्थित हूँ। इसलिए गतिशील मुझे निवास शोभा नहीं देता।" फिर उस वीर वेगवान मारुतिपुत्र ने अपने हाथ के तल से मैनाक को स्पर्श किया और शीघ्रता से आगे बढ़ गए। उस महान पर्वत मैनाक ने उस महात्मा के स्पर्श से अत्यंत प्रीति प्राप्त की और साधु साधु कहकर उसकी प्रशंसा की।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए मैनाक के आतिथ्य को हृदय से स्वीकार किया, पर रुके नहीं। मैनाक का स्पर्श कर उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया।
॥ श्लोक १६-२८ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः प्रशशंसुः पुनः पुनः ।
हनूमन्तं महात्मानं कर्मणा तेन सुव्रतम् ॥
इति संप्राप्य विश्रामं हनुमान् मारुतात्मजः ।
जगामाथ महावेगो लङ्कां रावणपालिताम् ॥
📖 भावार्थ : तब देवता और गन्धर्व पुनः-पुनः उस महात्मा हनुमान की प्रशंसा करने लगे, जो इस कर्म से सुव्रत (अच्छे व्रत वाले) सिद्ध हुए। इस प्रकार हनुमान ने क्षणिक विश्राम पाकर (या उस स्पर्श रूपी विश्राम को प्राप्त करके) महावेग से रावण द्वारा पालित लंका की ओर प्रस्थान किया।

📖 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💪 कर्तव्य परायणता

हनुमान का विश्राम को अस्वीकार करना दर्शाता है कि महान कार्यों में क्षणिक सुखों की इच्छा नहीं करनी चाहिए। वे केवल लक्ष्य पर केंद्रित थे।

🙏 देवताओं का सहयोग

देवताओं द्वारा पुष्पवर्षा और मैनाक का सहयोग दर्शाता है कि धर्म के कार्य में सहायता स्वयं आती है।

⛰️ मैनाक का महत्व

मैनाक पर्वत ने हनुमान को विश्राम देने की इच्छा की, किंतु हनुमान ने उसे स्पर्श मात्र से ही धन्य कर दिया। यह संकेत करता है कि सत्पुरुषों का सान्निध्य ही परम लाभ है।

🚀 अडिग संकल्प

हनुमान का यह साहसिक कदम उनके अडिग संकल्प और अलौकिक शक्ति का परिचायक है, जो आगे चलकर सीता की खोज में सफलता दिलाता है।

🎯 शिक्षा : हमें अपने जीवन के लक्ष्यों से भटकना नहीं चाहिए। कठिनाइयों के बीच भी मिलने वाले सुख के अवसरों को हमें केवल स्पर्श कर आगे बढ़ जाना चाहिए, जैसे हनुमान ने मैनाक को स्पर्श किया और अपने मार्ग पर अग्रसर रहे।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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