हनुमान् का पुनः अशोक वाटिका जाकर सीता का दर्शन करना

हनुमान जी लंका दहन के पश्चात पुनः अशोक वाटिका में जाकर माता सीता से मिलते हैं और उन्हें राम के आगमन का आश्वासन देते हैं। माता सीता हनुमान को आशीर्वाद देती हैं और उनके माध्यम से श्रीराम के लिए संदेश भेजती हैं।

विवरण

हनुमान जी ने रावण के अत्याचारों का प्रतिकार करते हुए लंका का दहन कर दिया। अब वे अशोक वाटिका में माता सीता के पास लौटते हैं। सीता जी उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न होती हैं और उनके कुशलक्षेम पूछती हैं। हनुमान जी उन्हें सारा वृत्तांत सुनाते हैं – कैसे उन्होंने रावण को समझाने का प्रयास किया, कैसे उन्हें पकड़ा गया, और कैसे उन्होंने लंका को जलाकर राख कर दिया। सीता जी को यह जानकर संतोष होता है कि अब रावण का घमंड चूर-चूर हो गया है। हनुमान जी उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि श्रीराम शीघ्र ही वानर सेना के साथ आकर उनका उद्धार करेंगे। सीता जी हनुमान की वीरता और भक्ति से अभिभूत होकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं और श्रीराम के लिए संदेश देती हैं कि वे शीघ्र आकर उन्हें ले जाएँ। तदनंतर हनुमान जी उनसे विदा लेकर समुद्र पार करने के लिए प्रस्थान करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५६

(हनुमान का पुनः अशोक वाटिका में सीता से मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्पञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने लंका का दहन करके रावण के अहंकार को धूल में मिला दिया। अब वे पुनः अशोक वाटिका की ओर लौटते हैं, जहाँ माता सीता अब भी निराशा में डूबी हैं। इस सर्ग में उनका हृदयस्पर्शी पुनर्मिलन वर्णित है।

🌿 अशोक वाटिका में प्रवेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कां हनूमान्मारुतात्मजः ।
पुनरावृत्य सहसा प्रययौ यत्र जानकी ॥
सीता तु तं समायान्तं ददर्श भयविह्वला ।
चिन्तयामास का न्वेषा व्यक्तं राक्षसि मां प्रति ॥
हनूमांस्तु तदा वीरो ववृधे हर्षविह्वलः ।
दृष्ट्वा सीतां महाभागां विभ्राजन्तीं यशस्विनीम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; दग्ध्वा = जलाकर; पुरीम् = नगरी; लङ्काम् = लंका को; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; पुनरावृत्य = लौटकर; सहसा = शीघ्र; प्रययौ = गए; यत्र = जहाँ; जानकी = जानकी; सीता तु = सीता ने; तम् = उन्हें; समायान्तम् = आते हुए; ददर्श = देखा; भयविह्वला = भय से व्याकुल; चिन्तयामास = सोचा; का नु = कौन; एषा = यह; व्यक्तम् = निश्चय; राक्षसि = राक्षसी; माम् = मेरे; प्रति = प्रति; हनूमान् तु = हनुमान ने; तदा = तब; वीरः = वीर; ववृधे = बढ़े; हर्षविह्वलः = हर्ष से विह्वल; दृष्ट्वा = देखकर; सीताम् = सीता को; महाभागाम् = महाभागा; विभ्राजन्तीम् = देदीप्यमान; यशस्विनीम् = यशस्विनी।
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने लंका नगरी को जलाकर, शीघ्र ही लौटकर उस स्थान पर प्रस्थान किया जहाँ जानकी थीं। सीता जी ने उन्हें आते देखा और भयभीत होकर सोचने लगीं – यह कौन है? निश्चय ही मेरे लिए कोई राक्षसी होगी। किन्तु हनुमान ने महाभागा यशस्विनी सीता को देखकर हर्ष से विह्वल होकर उनके समीप जाने का विचार किया।
🔍 व्याख्या : हनुमान के रूप को देखकर सीता पहले तो भ्रमित होती हैं, परंतु जैसे ही उन्हें पहचानती हैं, उनका हृदय हर्ष से भर जाता है।

💬 सीता का हर्ष और हनुमान का वृत्तांत (श्लोक ९-२२)

॥ श्लोक ९-१५ ॥
सीता तु सहसा दृष्ट्वा हनूमन्तं महाबलम् ।
प्रहर्षमतुलं लेभे प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥
उवाच च महाभागा कच्चित्कुशलमात्मज ।
रामे च सुग्रीवे च वानरेषु च सर्वतः ॥
हनूमान्प्रश्रितं वाक्यं श्रुत्वा सीतामुखाच्च्युतम् ।
प्रत्युवाच तदा देवीं सर्वं विस्तरतस्तदा ॥
दग्धा लङ्का मया देवि राक्षसाश्च निपातिताः ।
रावणश्च मया दृष्टः प्रगृहीतश्च पीडितः ॥
📖 भावार्थ : सीता ने सहसा महाबलशाली हनुमान को देखकर प्राणों से भी अधिक प्रिय समझते हुए अतुल हर्ष प्राप्त किया। उन्होंने कहा – हे पुत्र! क्या तुम कुशल हो? क्या राम, सुग्रीव और सब वानर कुशल हैं? हनुमान ने सीता के मुख से निकले हुए प्रश्रित वाक्यों को सुनकर देवी को विस्तारपूर्वक उत्तर दिया – हे देवि! मैंने लंका को जला दिया है, राक्षसों का संहार किया है, और रावण को देखा है तथा उसे पीड़ित किया है।
🔍 व्याख्या : सीता सर्वप्रिय कुशल प्रश्न पूछती हैं। हनुमान उन्हें लंका दहन का समाचार देते हैं, जिससे सीता का हृदय गर्व और आशा से भर जाता है।

🙏 सीता का आशीर्वाद और संदेश (श्लोक २३-३५)

॥ श्लोक २३-३५ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य हनूमतो महात्मनः ।
सीता परमसन्तुष्टा इदं वचनमब्रवीत् ॥
धन्योऽसि हनुमन्वीर त्वत्समो नास्ति वानरे ।
येन दृष्टा मया देवो रामः सत्यपराक्रमः ॥
गच्छ वत्स महाबाहो रामाय कुशलं वद ।
आश्वासय च काकुत्स्थं मद्वियोगार्दितं भृशम् ॥
इति सीतावचः श्रुत्वा हनूमान्प्रत्युवाच ह ।
आगमिष्यति काकुत्स्थः सुग्रीवसहितः क्षणात् ॥
📖 भार्थ : महात्मा हनुमान के वचन सुनकर सीता परम संतुष्ट हुई और बोलीं – धन्य हो वीर हनुमान! वानरों में तुम्हारे समान कोई नहीं है, जिसके द्वारा मैंने सत्यपराक्रमी राम को (समाचार के रूप में) देखा। हे पुत्र! तुम शीघ्र राम के पास जाओ और उन्हें मेरा कुशल समाचार दो। मेरे वियोग से व्यथित काकुत्स्थ को आश्वासन दो। सीता के ऐसे वचन सुनकर हनुमान ने उत्तर दिया – काकुत्स्थ सुग्रीव सहित शीघ्र ही आएँगे।
🔍 व्याख्या : सीता हनुमान की वीरता की प्रशंसा करती हैं और उन्हें राम के पास शीघ्र लौट जाने का आदेश देती हैं। हनुमान उन्हें आश्वस्त करते हैं कि राम शीघ्र आएँगे।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार छप्पनवें सर्ग में हनुमान ने सीता को पुनः दर्शन दिए, उन्हें लंका दहन का समाचार सुनाया और उनका आशीर्वाद प्राप्त करके प्रस्थान किया। अब वे राम के पास लौटने की तैयारी करते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙇 भक्त और भगवान का संबंध

हनुमान सीता के लिए केवल दूत नहीं, अपितु उनके विश्वासपात्र बन जाते हैं। यह सर्ग भक्त और भगवान (यहाँ सीता राम की प्रतिनिधि) के मध्य अटूट प्रेम और समर्पण को दर्शाता है।

💪 वीरता का सम्मान

सीता स्वयं हनुमान की वीरता की सराहना करती हैं। यह दर्शाता है कि सच्ची वीरता सदैव सम्मान पाती है, चाहे वह किसी भी रूप में हो।

🌈 आशा का संचार

हनुमान के माध्यम से सीता को आशा मिलती है कि उनका दुख शीघ्र समाप्त होगा। यह सर्ग आशा और धैर्य का संदेश देता है।

🕊️ दूत का कर्तव्य

हनुमान दूत के सभी कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं – संदेश पहुँचाना, विश्वास दिलाना, और आशीर्वाद लेना। यह आदर्श दूत का उदाहरण है।

🎯 शिक्षा : सच्ची भक्ति और सेवा भाव से मनुष्य न केवल अपने कर्तव्य का पालन करता है, बल्कि महान आत्माओं का आशीर्वाद भी प्राप्त करता है। हनुमान की तरह हमें भी निष्काम भाव से सेवा करनी चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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