हनुमान् का सीता के अग्नि में भस्म होने का संदेह

हनुमान जी लंका दहन करने से पूर्व सीता की सुरक्षा को लेकर चिंतित होते हैं। वे अग्निदेव से प्रार्थना करते हैं कि वे सीता को अग्नि से बचाएँ। फिर वे लंका में आग लगा देते हैं, परंतु सीता सुरक्षित रहती हैं।

विवरण

हनुमान जी सीता जी से भेंट कर उन्हें राम का संदेश सुना चुके हैं। सीता जी ने उन्हें चूड़ामणि देकर राम को देने को कहा है। अब हनुमान जी लंका से प्रस्थान की तैयारी में हैं, पर वे सोचते हैं कि राक्षसों का दम्भ चूर्ण करने के लिए लंका का दहन करना उचित होगा। किन्तु उनके मन में यह संदेह उत्पन्न होता है कि कहीं आग लगाने से सीता भस्म न हो जाएँ। वे चिंतित होकर विचार करते हैं कि सीता पतिव्रता हैं, अतः अग्नि उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। फिर भी वे अग्निदेव की स्तुति करते हैं और उनसे सीता की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। तत्पश्चात वे अपनी पूँछ में आग लगाकर लंका का दहन करते हैं, पर सीता जी सुरक्षित रहती हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५५

(हनुमान् का सीता के अग्नि में भस्म होने का संदेह)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने सीता जी से भेंट कर लिया है और अब वे लंका से प्रस्थान करना चाहते हैं। किन्तु वे सोचते हैं कि राक्षसों के अहंकार को चूर करने के लिए लंका का दहन कर देना चाहिए। परंतु उनके मन में यह भय उत्पन्न होता है कि कहीं इस अग्नि में सीता जी भस्म न हो जाएँ। यह सर्ग हनुमान के इसी संदेह और उसके निवारण का वर्णन करता है।

🔥 लंका दहन का निश्चय और सीता के प्रति चिंता (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
लंकां दिदक्षुर्हनुमान् दहितुं राक्षसालयम् ।
चिन्तयामास मेधावी सीतायाः कुशलं प्रति ॥
कथं नु दह्यमानायां लंकायां जनकात्मजा ।
न दहेदिति संचिन्त्य प्रार्थयामास पावकम् ॥
त्वं हि वै पावक देवानां मुखमग्ने सनातन ।
रक्ष मां सीतया सार्धं रामकार्यार्थसिद्धये ॥
इति संप्रार्थ्य हनुमान् दीप्तां ज्वालां समाददे ।
प्रददाह पुरीं लंकां राक्षसैः सह रावणम् ॥
🔹 पदच्छेद : लंकाम् = लंका को; दिदक्षुः = जलाने की इच्छा रखने वाले; हनुमान् = हनुमान; दहितुम् = जलाने के लिए; राक्षसालयम् = राक्षसों के निवास स्थान को; चिन्तयामास = चिन्ता की; मेधावी = बुद्धिमान; सीतायाः = सीता के; कुशलम् = कल्याण के; प्रति = विषय में; कथम् = कैसे; नु = निश्चय ही; दह्यमानायाम् = जलती हुई; लंकायाम् = लंका में; जनकात्मजा = जनकपुत्री; न दहेत् = न जले; इति = ऐसा; संचिन्त्य = सोचकर; प्रार्थयामास = प्रार्थना की; पावकम् = अग्नि से; त्वम् = तुम; हि वै = निश्चय ही; पावक = हे पावक; देवानाम् = देवताओं के; मुखम् = मुख; अग्ने = हे अग्नि; सनातन = सनातन; रक्ष = रक्षा करो; माम् = मेरी; सीतया = सीता के साथ; सार्धम् = सहित; रामकार्यार्थसिद्धये = राम के कार्य की सिद्धि के लिए; इति = इस प्रकार; संप्रार्थ्य = प्रार्थना करके; हनुमान् = हनुमान; दीप्ताम् = प्रज्वलित; ज्वालाम् = ज्वाला को; समाददे = ग्रहण किया; प्रददाह = जला दिया; पुरीम् = नगरी; लंकाम् = लंका को; राक्षसैः = राक्षसों के साथ; सह = सहित; रावणम् = रावण को।
📖 भावार्थ : लंका को जलाने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान हनुमान ने सीता के कल्याण के विषय में चिंता की। "जलती हुई लंका में कहीं जनकपुत्री सीता न जल जाएँ" – ऐसा सोचकर उन्होंने अग्निदेव से प्रार्थना की: "हे पावक, हे सनातन अग्निदेव, तुम देवताओं के मुख हो। राम के कार्य की सिद्धि के लिए मेरी और सीता की रक्षा करो।" इस प्रकार प्रार्थना करके हनुमान ने प्रज्वलित ज्वाला को ग्रहण किया और राक्षसों एवं रावण सहित लंका नगरी को जला दिया।
🔍 व्याख्या : यहाँ हनुमान की सीता के प्रति सजगता और करुणा प्रकट होती है। वे केवल राक्षसों को दण्ड देने के इच्छुक हैं, सीता को कोई हानि नहीं पहुँचाना चाहते। अतः वे अग्निदेव की शरण लेते हैं।
॥ श्लोक ५-१० ॥
ततो हनूमतो बुद्धिः समुत्पन्ना महात्मनः ।
सीतायाः परमं सौख्यं यथा स्यादिति चिन्तयन् ॥
अग्निर्हि सर्वभूतानां मुखमाहुर्विदो जनाः ।
साक्षादेव मया दृष्टः प्रसन्नो हव्यवाहनः ॥
नूनं सीता महाभागा पतिव्रता यशस्विनी ।
नैनामग्निः प्रदह्येत इति मे निश्चिता मतिः ॥
तथापि रक्षितव्या सा स्वयं चैव विशेषतः ।
इति कृत्वा व्यवसितं लंकादहनकर्मणि ॥
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् महात्मा हनुमान की बुद्धि में यह विचार उत्पन्न हुआ कि सीता का परम सुख कैसे हो। जानने वाले लोग कहते हैं कि अग्नि सभी प्राणियों का मुख है। मैंने प्रत्यक्ष ही प्रसन्न हव्यवाहन अग्नि को देखा है। निश्चय ही सीता महाभागा, पतिव्रता और यशस्विनी हैं, अतः अग्नि उन्हें नहीं जला सकती – ऐसा मेरा निश्चित मत है। तो भी उनकी रक्षा स्वयं भी विशेष रूप से करनी चाहिए – ऐसा निश्चय करके उन्होंने लंका-दहन के कार्य में प्रवृत्त हुए।
🔍 व्याख्या : हनुमान का यह सोचना कि अग्नि सीता को नहीं जला सकती, उनके धर्मज्ञान और सीता के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाता है। फिर भी वे सावधानी बरतते हैं।

🙏 अग्निदेव की स्तुति और आश्वासन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः प्रसन्नो भगवानग्निर्वैश्वानरः स्वयम् ।
उवाच हनुमन्तं तु स्मितपूर्वमिदं वचः ॥
हनूमन्मा भयं कार्षीः सीतायाः कुशलं प्रति ।
न दहेयं कथंचित्तां पतिव्रतामनिन्दिताम् ॥
रामस्य महिषी देवी सीता धर्मपरायणा ।
मया रक्ष्या सदा वत्स यथैव हव्यवाहनः ॥
गच्छ त्वं निर्भयः श्रीमान् दह लंकां समन्ततः ।
सीता च ते मया गुप्ता न भयं विद्यते क्वचित् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न हुए भगवान वैश्वानर अग्नि ने स्वयं हनुमान से मुस्कुराते हुए यह वचन कहा: "हे हनुमान, सीता के कल्याण के विषय में भय मत करो। उस अनिन्दिता पतिव्रता को मैं किसी भी प्रकार नहीं जलाऊँगा। हे वत्स, राम की महिषी देवी सीता धर्मपरायणा हैं, वे मेरे द्वारा सदा रक्षित हैं, ठीक वैसे ही जैसे हवि को धारण करने वाला अग्नि रहता है। तुम निर्भय होकर जाओ, श्रीमान्, लंका को चारों ओर से जला दो। सीता मेरे द्वारा सुरक्षित है, कहीं भी भय नहीं है।"
🔍 व्याख्या : यहाँ अग्निदेव प्रकट होकर हनुमान को आश्वस्त करते हैं। यह दृश्य हनुमान की प्रार्थना की सफलता और सीता की पवित्रता को रेखांकित करता है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
इत्युक्त्वा भगवानग्निरन्तर्धानं गतः क्षणात् ।
हनूमांश्च महातेजा लंकादहनमारभत् ॥
सीतामनुस्मरन्नेव प्रदक्षिणमवर्तयत् ।
न दहेयं कथंचित्सा यथोक्तमग्निना विभुः ॥
ततः स वालधिं कृत्वा दीप्तं लंकापुरे तदा ।
प्रददाह गृहान् सर्वान् राक्षसानां महात्मनाम् ॥
ददाह राजमार्गांश्च वप्रान् प्राकारगोपुरान् ।
सीता चासीत्सुखं तत्र ध्यायन्ती रघुनन्दनम् ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर भगवान अग्नि क्षणभर में अन्तर्धान हो गए। महातेजस्वी हनुमान ने लंका-दहन आरम्भ किया। वे सीता का स्मरण करते हुए उनकी प्रदक्षिणा करते रहे, कहीं वे न जल जाएँ – ऐसा ध्यान रखते हुए, और अग्नि के कथनानुसार कार्य करते हुए। तब उन्होंने अपनी पूँछ को प्रज्वलित करके लंकापुरी में महात्मा राक्षसों के सब घरों को जला दिया। उन्होंने राजमार्गों, प्राचीरों, परकोटों और गोपुरों को भी जला दिया। और सीता वहाँ सुखपूर्वक रघुनन्दन राम का ध्यान करती हुई बैठी रहीं।
🔍 व्याख्या : हनुमान सावधानीपूर्वक लंका का दहन करते हैं, सीता को सुरक्षित रखते हैं। यह उनके कर्तव्यनिष्ठा और प्रेम का प्रमाण है।

🛡️ सीता की सुरक्षा और हनुमान का संतोष (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
न दग्धा सीता तेजस्विन्यग्निना हव्यवाहने ।
हनूमांश्च महातेजा दृष्ट्वा विस्मयमागतः ॥
अहो पतिव्रतायास्तु महिमा ह्यतुलो महान् ।
यस्याः प्रभावादग्निर्मां न दहत्यद्य किंचन ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् हृष्टो रामप्रियंकरः ।
लंकां दग्ध्वा समग्रां तु पुनरायान्महोदधिम् ॥
सीतायाश्चरणौ स्पृष्ट्वा प्रणम्य च पुनः पुनः ।
उत्पपात महावेगो यथेन्द्रस्य महाध्वजः ॥
📖 भावार्थ : तेजस्विनी सीता अग्नि से नहीं जली। महातेजस्वी हनुमान यह देखकर विस्मय में पड़ गए। उन्होंने सोचा, "अहो! पतिव्रता के महिमा का तो अतुल और महान प्रभाव है, जिसके प्रभाव से आज अग्नि मुझे कुछ भी नहीं जला रही है।" ऐसा विचार करके राम के प्रिय कार्य करने वाले हनुमान हर्षित हुए। सम्पूर्ण लंका को जलाकर वे पुनः महासागर के पास आए। सीता के चरणों को स्पर्श करके बार-बार प्रणाम किया और अत्यन्त वेग से आकाश में उड़े, जैसे इन्द्र का महान ध्वज फहराता है।
🔍 व्याख्या : हनुमान सीता की अग्नि में अजेयता देखकर चकित होते हैं और उनकी पतिव्रता धर्म की महिमा का गुणगान करते हैं। वे सीता को प्रणाम करके वापस लौटते हैं।

📌 श्लोक २६-३५ : हनुमान समुद्र पार करते हुए राम के पास लौटने की कामना करते हैं। वे सोचते हैं कि अब राम को सीता का समाचार देकर उनके शोक को दूर करेंगे। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि राम रावण का वध करके सीता को वापस ले आएँगे। इस प्रकार हनुमान अपने मन में सीता की सुरक्षा और राम के कार्य की सिद्धि के लिए आश्वस्त होकर आगे बढ़ते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔥 सीता की अग्निपरीक्षा का पूर्वाभास

इस सर्ग में हनुमान का सीता के अग्नि में भस्म होने का संदेह और अग्निदेव का आश्वासन, आगे चलकर युद्धकाण्ड में होने वाली सीता की अग्निपरीक्षा की ओर संकेत करता है। यहाँ अग्नि सीता की रक्षा करते हैं, वहीं आगे वे उनकी पवित्रता की साक्षी बनते हैं।

💪 हनुमान की कर्तव्यनिष्ठा

हनुमान न केवल वीर हैं, अपितु अत्यन्त सावधान और कर्तव्यनिष्ठ भी हैं। वे अपने कार्य के दुष्परिणाम की चिंता करते हैं और उसके निवारण का उपाय ढूँढ़ते हैं। यही उनकी महानता है।

🙏 अग्निदेव की साक्षात् उपस्थिति

इस सर्ग में अग्निदेव स्वयं प्रकट होकर हनुमान को आश्वस्त करते हैं। यह दैवीय अनुग्रह और सीता की पतिव्रता धर्म की रक्षा का प्रतीक है।

🌊 समुद्रयात्रा का प्रारम्भ

अन्त में हनुमान का समुद्र पार करना और राम के पास लौटने का उल्लेख, अगले सर्गों की भूमिका तैयार करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा भक्त अपने कार्य में न केवल साहस दिखाता है, बल्कि उसके प्रभावों के प्रति भी सचेत रहता है। हनुमान की तरह हमें भी अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते समय दूसरों की भलाई का ध्यान रखना चाहिए और ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारे कार्यों से किसी को हानि न हो।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।