हनुमान् का लंका नगरी में आग लगाने का निश्चय

रावण के आदेश पर हनुमान की पूंछ में आग लगा दी जाती है। किन्तु हनुमान अग्नि से मुक्त होकर लंका के घरों में कूद-कूद कर आग लगाने का निश्चय करते हैं। वे रावण के महल और सम्पूर्ण लंका नगरी को जलाकर राख कर देते हैं। यह सर्ग हनुमान के पराक्रम, आत्मसमर्पण और लंका दहन की पृष्ठभूमि का वर्णन करता है।

विवरण

हनुमान जी सीता जी से भेंट करने के बाद रावण के पास संदेशा लेकर जाते हैं। रावण क्रोधित होकर उन्हें मार डालने का आदेश देता है, पर विभीषण के कहने पर वह हनुमान की पूंछ में कपड़ा लपेटकर आग लगाने की सजा देता है। राक्षस हनुमान की पूंछ में तेल से सने वस्त्र लपेट कर आग लगा देते हैं। उस समय हनुमान अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते हैं, पूंछ को फैलाकर सिकोड़ लेते हैं और बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। वे लंका के ऊपर आकाश में उड़ते हुए निर्णय लेते हैं कि इस दुष्ट राक्षसों की नगरी को भस्म कर दूँ। वे सोने की लंका के घरों, महलों, चौराहों और बाग-बगिचों पर छलांग लगाते हुए आग लगाने लगते हैं। रावण का महल, अशोक वाटिका, सारी लंका धू-धू कर जलने लगती है। हनुमान सीता जी की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए आग नहीं लगाते, किन्तु शेष सब जल जाता है। अंत में हनुमान समुद्र तट पर जाकर आग बुझा लेते हैं और सीता को सूचना देकर वापस लौटने की तैयारी करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५४

(हनुमान् का लंका नगरी में आग लगाने का निश्चय)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी सीता जी का संदेश लेकर रावण के दरबार में पहुँचे। रावण ने क्रोध में आकर उन्हें मृत्युदंड देने का आदेश दिया, किन्तु विभीषण के समझाने पर हनुमान की पूंछ में आग लगाने की सजा दी गई। अब हनुमान उस अग्नि को लंका के विनाश का कारण बनाने जा रहे हैं।

🔥 पूंछ में आग लगना और हनुमान का प्रताप (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततो राक्षसराजेन दत्ताज्ञा राक्षसास्तदा ।
हनूमतः पुच्छदेशे वस्त्रमग्निसमन्वितम् ॥
बबन्धुस्ते सुघोरायां वेलायां जातहर्षाः ।
हनूमांस्तु महातेजा ददर्श ज्वलनं तदा ॥
न विव्यथे महाबाहुश्चिन्तयामास वानरः ।
अयं मे सुप्रतीकारो लङ्कादाहो भविष्यति ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = फिर; राक्षसराजेन = राक्षसराज द्वारा; दत्ताज्ञा = आज्ञा दिए जाने पर; राक्षसाः = राक्षसों ने; तदा = तब; हनूमतः = हनुमान के; पुच्छदेशे = पूंछ के भाग में; वस्त्रम् = वस्त्र; अग्निसमन्वितम् = अग्नि सहित; बबन्धुः = बाँध दिया; ते = उन्होंने; सुघोरायाम् = अत्यन्त भयंकर; वेलायाम् = समय पर; जातहर्षाः = हर्षित होकर; हनूमान् = हनुमान; तु = तो; महातेजाः = महान तेजस्वी; ददर्श = देखा; ज्वलनम् = अग्नि को; तदा = तब; न विव्यथे = विचलित नहीं हुए; महाबाहुः = महाबाहु; चिन्तयामास = विचार किया; वानरः = वानर ने; अयम् = यह; मे = मेरा; सुप्रतीकारः = सुन्दर उपाय; लङ्कादाहः = लंका दहन; भविष्यति = होगा।
📖 भावार्थ : राक्षसराज रावण की आज्ञा पाकर राक्षसों ने हनुमान की पूंछ में आग से युक्त वस्त्र बाँध दिया। वे उस भयंकर अवसर पर अत्यन्त प्रसन्न थे। किन्तु महातेजस्वी महाबाहु हनुमान ने उस ज्वलन्त अग्नि को देखकर भी विचलित न हुए और विचार किया – 'यह अग्नि मेरे लिए लंका को जलाने का उत्तम साधन बनेगी।'
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अग्नि को अपना शत्रु न मानकर मित्र बना लिया। यह उनकी अद्भुत मानसिकता और आत्मविश्वास को दर्शाता है।
॥ श्लोक ५-१० ॥
स बद्धपुच्छो रक्षोभिर्लङ्कां दहनमानसः ।
ववृधे सहसा वीरो युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥
तेन बद्ध्वा तु पुच्छं तं राक्षसा हृष्टमानसाः ।
प्रहृष्टनगरीं लङ्कां दर्शयामासुरोजसा ॥
📖 भावार्थ : राक्षसों द्वारा पूंछ बाँधे जाने पर लंका को जलाने की इच्छा वाले वीर हनुमान युगान्तकालीन अग्नि के समान तीव्रता से बढ़ने लगे। राक्षसों ने उनकी पूंछ बाँधकर हर्षित मन से उन्हें सम्पूर्ण लंका का भ्रमण कराया।

🏰 लंका दहन का निश्चय और अग्नि प्रसार (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
हनूमांस्तु महातेजाः सीतायै शंसन् प्रियम् ।
दह्यमानां पुरीं दृष्ट्वा राक्षसाधिपतेः पुरीम् ॥
चिन्तयामास धीमान् वै नष्टा सीता भवेदिति ।
ततः सीतां परित्रातुं ज्वलनं शमयिष्यति ॥
विचिन्त्य च पुनर्धीमान् सीतां रामप्रियां सतीम् ।
न दहेयं पुरीं सर्वां यावत्सीता न दृश्यते ॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी हनुमान सीता को प्रिय समाचार सुनाने वाले थे। जलती हुई लंका को देखकर उन्होंने सोचा – 'कहीं सीता भस्म न हो जायें।' तब उन्होंने सीता की रक्षा के लिए अग्नि को शान्त करना चाहा। फिर विचार करके उन्होंने निश्चय किया – 'जब तक सीता दिखाई न दें, मैं पूरी नगरी नहीं जलाऊँगा।'
🔍 व्याख्या : हनुमान ने पहले सीता के सुरक्षित स्थान (अशोक वाटिका) का ध्यान रखा। यह उनकी सूझबूझ और दायित्वबोध को दर्शाता है।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
स गत्वा रावणगृहं ददाह राक्षसालयम् ।
न सीता दह्यते तत्र सीतायाः पार्श्वतः स्थितः ॥
ददाह नगरीं सर्वां रावणस्य दुरात्मनः ।
हनूमान्मारुतिस्तूर्णं प्रदीप्त इव पावकः ॥
📖 भावार्थ : हनुमान रावण के महल में गए और उसे जला दिया, किन्तु जहाँ सीता थीं, वहाँ नहीं जलाया – वे स्वयं सीता के पास खड़े रहे। फिर उन्होंने दुष्ट रावण की सम्पूर्ण नगरी को शीघ्र ही जलाकर राख कर दिया, मानो वे स्वयं प्रज्वलित अग्नि हों।

🌊 लंका की दुर्दशा और हनुमान का समुद्र तट पर आग बुझाना (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
दग्ध्वा लङ्कां हनूमांस्तु सीतां दृष्ट्वा यथासुखम् ।
समुद्रतोयं प्रविवेश शमयित्वा हुताशनम् ॥
ततो हृष्टतरो भूत्वा सीतामाह हनूमान् ।
देवि ते श्वः प्रयास्यामि रामाय प्रियमाचरन् ॥
📖 भावार्थ : लंका को जलाकर और सीता का सुखपूर्वक दर्शन करके हनुमान ने समुद्र के जल में प्रवेश कर अपनी पूंछ की अग्नि को शान्त किया। फिर अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने सीता से कहा – 'देवि! मैं कल प्रस्थान करूँगा और राम को प्रिय समाचार सुनाऊँगा।'

📌 सर्गान्त : इस प्रकार चौवनवें सर्ग में हनुमान ने लंका में आग लगाने का निश्चय किया, उसे कार्यान्वित किया और सीता को आश्वस्त कर अगले दिन लौटने की योजना बनाई। अगले सर्ग में वे वानरेश्वर सुग्रीव और राम के पास वापस जायेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🔥 अग्नि का सम्मान

हनुमान अग्नि को अपने ऊपर प्रहार नहीं मानते, बल्कि उसे लंका के विनाश का अवसर समझते हैं। यह उनकी सकारात्मक दृष्टि और कूटनीति का उदाहरण है।

🛡️ सीता की सुरक्षा

इस सर्ग में हनुमान ने यह सुनिश्चित किया कि सीता को अग्नि से कोई खतरा न हो। यह उनके कर्तव्यपरायणता और विवेक को दर्शाता है।

💪 हनुमान का पराक्रम

हनुमान ने अकेले दम पर सम्पूर्ण लंका को जलाकर राख कर दिया। यह उनकी असीम शक्ति और दैवीय अनुग्रह का प्रतीक है।

🌍 लंका का भविष्य

यह घटना रावण के पतन की आहट है। लंका दहन राम-रावण युद्ध की पूर्वसूचना बन जाता है।

🎯 शिक्षा : विपरीत परिस्थितियाँ भी यदि सही दृष्टिकोण से ली जाएँ तो विजय का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं। हनुमान ने अग्नि को शाप नहीं, वरदान बना लिया। हमें भी जीवन की कठिनाइयों को अवसर में बदलना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे चतुःपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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