रावण द्वारा हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश

रावण के आदेश पर राक्षस हनुमान की पूंछ में तेल से सनी वस्त्र लपेटकर आग लगा देते हैं। हनुमान उसी जलती पूंछ से लंका का दहन कर देते हैं।

विवरण

हनुमान जब रावण के दरबार में पहुँचे और रावण ने उन्हें मारने का आदेश दिया, तब विभीषण ने राजनीति का हवाला देते हुए कहा कि दूत को मारना उचित नहीं है। तब रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। राक्षस हनुमान की पूंछ में तेल से सनी हुई वस्त्र लपेटकर आग लगा देते हैं। हनुमान उसी जलती हुई पूंछ से लंका के घरों, महलों और उद्यानों में आग लगा देते हैं। समस्त लंका दहक उठती है। हनुमान आग बुझने के बाद समुद्र में कूद जाते हैं और वापस लौटने की तैयारी करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५३

(रावण द्वारा हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश और लंका दहन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी रावण के दरबार में वानरदूत के रूप में उपस्थित हुए। रावण ने क्रोधित होकर उन्हें मारने का आदेश दिया, किन्तु विभीषण ने नीति का हवाला देकर उन्हें समझाया कि दूत-वध उचित नहीं। तब रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। यह सर्ग उस घटना और हनुमान द्वारा लंका दहन का अद्भुत वर्णन प्रस्तुत करता है।

🔥 रावण का क्रोध और हनुमान को दण्ड देने का आदेश (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो रावणो राक्षसेश्वरः ।
हनूमन्तं ददर्शाथ वानरं क्रूरलोचनः ॥
दिधक्षुरिव चक्षुर्भ्यां वानरं ज्वलनार्चिषा ।
उवाच राक्षसान् सर्वान् समीपस्थान् महाबलः ॥
हन्यतां वध्यतां क्षिप्रमेष वानरपुङ्गवः ।
येनायं राक्षसेन्द्रस्य दर्पो हि परिमन्थितः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; क्रोधसमाविष्टः = क्रोध से भरा हुआ; रावणः = रावण; राक्षसेश्वरः = राक्षसराज; हनूमन्तम् = हनुमान को; ददर्शाथ = देखा; वानरम् = वानर को; क्रूरलोचनः = क्रूर नेत्रों वाला; दिधक्षुरिव = जलाने की इच्छा से; चक्षुर्भ्याम् = आँखों से; वानरम् = वानर को; ज्वलनार्चिषा = प्रज्वलित अग्नि के समान; उवाच = बोला; राक्षसान् = राक्षसों से; सर्वान् = सभी; समीपस्थान् = पास खड़े; महाबलः = महाबली; हन्यताम् = मारा जाए; वध्यताम् = वध किया जाए; क्षिप्रम् = शीघ्र; एषः = यह; वानरपुङ्गवः = श्रेष्ठ वानर; येन = जिसने; अयम् = यह; राक्षसेन्द्रस्य = राक्षसराज का; दर्पः = अभिमान; हि = ही; परिमन्थितः = मथ डाला (नष्ट किया)।
📖 भावार्थ : तब क्रोध से भरे हुए राक्षसराज रावण ने उस वानर हनुमान को क्रूर दृष्टि से देखा, मानो आँखों की अग्नि से उन्हें जलाना चाहते हों। फिर महाबली रावण ने पास खड़े सभी राक्षसों से कहा, "इस श्रेष्ठ वानर को शीघ्र मार डालो, वध कर दो, जिसने राक्षसराज के अभिमान को नष्ट कर दिया है।"
🔍 व्याख्या : हनुमान के अद्भुत पराक्रम और रावण के दरबार में उनके साहसिक संवाद से रावण क्रोधित हो उठता है और उन्हें मृत्युदंड देने का आदेश देता है।
॥ श्लोक ६-१० ॥
तच्छ्रुत्वा राक्षसाः सर्वे रावणस्य वचस्तदा ।
हनूमन्तं परामृष्टुं प्राद्रवन्त सहस्रशः ॥
तानापतत एवाशु हनूमान्मारुतात्मजः ।
गदापाणिरिव क्रुद्धो न चचाल महाबलः ॥
ततः प्रहरणैर्घोरैस्ताडयामासुराहवे ।
न चैनं व्यथयामासुः सुपर्णमिव पन्नगाः ॥
📖 भावार्थ : रावण के उन वचनों को सुनकर सभी राक्षस हनुमान को पकड़ने के लिए हजारों की संख्या में दौड़े। उन्हें आते देख मारुतिपुत्र हनुमान, मानो क्रोधित गदाधारी की भाँति, निश्चल खड़े रहे। तब राक्षसों ने घोर अस्त्रों से उन पर प्रहार किया, किन्तु वे हनुमान को विचलित न कर सके, जैसे सर्प गरुड़ को पीड़ित नहीं कर सकते।

🛡️ विभीषण का हस्तक्षेप और पूंछ दहन का आदेश (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततो विभीषणो नाम राक्षसो धर्मवत्सलः ।
उवाच रावणं वाक्यं सान्त्वपूर्वं महाबलः ॥
न वध्यो दूत इत्याहुः सन्तः शास्त्रविशारदाः ।
अस्य वानरमुख्यस्य युक्तो दण्डः सुदारुणः ॥
तच्छ्रुत्वा रावणो वाक्यं विभीषणसमीरितम् ।
उवाच राक्षसान् सर्वान् पुनरेव महाबलः ॥
यद्येवं दूत एषोऽद्य न वधं प्राप्नुयान्मम ।
तस्य लाङ्गूलमालिप्य वस्त्रेणाग्निं प्रदीप्यताम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मप्रिय राक्षस विभीषण ने महाबली रावण से सान्त्वनापूर्वक कहा, "हे राजन्! दूत का वध नहीं करना चाहिए, ऐसा शास्त्रवेत्ता सज्जन कहते हैं। इस वानरश्रेष्ठ के लिए कोई भयंकर दण्ड उचित हो सकता है।" विभीषण की यह बात सुनकर रावण ने सभी राक्षसों से पुनः कहा, "यदि यह दूत है और मेरे द्वारा वध के योग्य नहीं, तो इसकी पूंछ में वस्त्र लपेटकर उसमें आग लगा दी जाए।"
🔍 व्याख्या : विभीषण दूत-वध के विरुद्ध नीति का पालन कराते हैं, जिससे रावण पूंछ दहन का आदेश देता है। यह घटना रावण की क्रूरता और विभीषण की धर्मनिष्ठा को दर्शाती है।
॥ श्लोक १६-२० ॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे हनूमत्पुच्छमुत्तमम् ।
वेष्टयामासुरालिप्य वस्त्रैः कार्पाससंभवैः ॥
तेजस्वी च महातेजा हनूमान्मारुतात्मजः ।
तदा प्रज्वलितं दृष्ट्वा लाङ्गूलं वानरर्षभः ॥
चिन्तयामास धीमान् स किं करोमीति वानरः ।
हित्वा तु राक्षसान् सर्वान् लङ्कां दहति पावकः ॥
📖 भावार्थ : तब सभी राक्षसों ने हनुमान की उत्तम पूंछ पर कपास-मिश्रित वस्त्र लपेटकर उसे आग लगा दी। उस जलती हुई पूंछ को देखकर तेजस्वी मारुतिपुत्र हनुमान ने सोचा, "अब मैं क्या करूँ? इन राक्षसों को छोड़कर यह अग्नि पूरी लंका को जला डालेगी।"

🌋 हनुमान की पूंछ में आग लगना और लंका दहन (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२८ ॥
ततः संवर्धयामास लाङ्गूलं कपिकुञ्जरः ।
तदापतद्विचित्रं हि महोल्केव दिविच्युता ॥
तेन दग्धा पुरी लङ्का सगोपुरगृहा तदा ।
सद्वारा सापणा चैव सचत्वरगृहा तथा ॥
हनूमता क्रोधदीप्ता लङ्का दग्धा सराक्षसा ।
विनेशुस्तत्र राक्षस्यो राक्षसाश्च सहस्रशः ॥
📖 भावार्थ : तब उस श्रेष्ठ वानर हनुमान ने अपनी पूंछ को और अधिक प्रज्वलित कर लिया। वह जलती पूंछ आकाश से गिरते हुए बड़े उल्कापिंड की भाँति चारों ओर फैल गई। उससे समस्त लंका नगरी, जिसमें गोपुर, गृह, द्वार, बाज़ार और चौराहे थे, जलकर भस्म हो गई। हनुमान के क्रोध से दीप्त लंका राक्षसों सहित जल उठी। हजारों राक्षस और राक्षसियाँ वहाँ नष्ट हो गईं।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अपनी जलती हुई पूंछ से लंका के हर भाग में आग लगा दी, जिससे पूरी नगरी धू-धू कर जल उठी। यह हनुमान के प्रचंड पराक्रम का प्रतीक है।
॥ श्लोक २९-३५ ॥
रावणस्य गृहं दग्धं मन्दोदर्याश्च भामिनीः ।
सर्वेषामेव रक्षसां प्रासादाः पतिता भुवि ॥
हनूमता तदा लङ्का निर्दग्धा सर्वतो दिशम् ।
अग्निना दह्यमानां तां दृष्ट्वा रावण आतुरः ॥
📖 भावार्थ : रावण का महल, मन्दोदरी आदि रानियों के भवन और सभी राक्षसों के प्रासाद धराशायी हो गए। हनुमान द्वारा लंका चारों ओर से जला दी गई। उस अग्नि से दहकती लंका को देखकर रावण व्याकुल हो गया।

🌊 हनुमान का समुद्र में कूदना और वापसी की तैयारी (श्लोक ३६-४५)

॥ श्लोक ३६-४१ ॥
दग्ध्वा लङ्कां ततो हृष्टो हनूमान्मारुतात्मजः ।
न्यपतत्सागरे क्षिप्रं शान्तार्चिरिव पावकः ॥
निमज्ज्य स महाबाहुः समुद्रे सरितां पतौ ।
उत्पपात पुनर्वेगादाकाशं मारुतात्मजः ॥
चिन्तयामास वैदेहीं द्रष्टुं रामप्रियां सतीम् ।
इति निश्चित्य मनसा प्रययौ यत्र सा स्थिता ॥
📖 भावार्थ : लंका का दहन करके हर्षित हनुमान तुरंत समुद्र में कूद पड़े, मानो बुझी हुई ज्वाला जल में समा गई हो। समुद्र में डुबकी लगाकर उन्होंने अपनी पूंछ की आग बुझाई और फिर वेग से आकाश में उछल पड़े। तब उन्होंने सीता माता के दर्शन की इच्छा से विचार किया और निश्चय करके जहाँ सीता थीं, वहाँ गए।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने समुद्र में कूदकर अग्नि शांत की और पुनः सीता से मिलने का विचार किया, जो उनके समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।
॥ श्लोक ४२-४५ ॥
ततो गत्वाशोकवनिकां सीतामासाद्य वानरः ।
ददर्श तां महाभागां राक्षसीभिः समावृताम् ॥
प्रहर्षमतुलं लेभे दृष्ट्वा सीतां स मारुतिः ।
ध्यात्वा रामं महात्मानं प्रतस्थे स विनिश्चयात् ॥
📖 भावार्थ : फिर अशोक वाटिका में जाकर उस वानर ने सीता को देखा, जो राक्षसियों से घिरी हुई थीं। महाभागा सीता को देखकर हनुमान को अपार हर्ष हुआ। महात्मा राम का स्मरण कर वे निश्चयपूर्वक आगे बढ़े।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ नीति का पालन

विभीषण का हस्तक्षेप दर्शाता है कि धर्म और नीति का मार्ग क्रोध के आवेश में भी नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने रावण को दूत-वध जैसे अधर्म से बचाया।

💪 हनुमान का पराक्रम

हनुमान ने जलती पूंछ से समस्त लंका को जला दिया, जो उनके असीम सामर्थ्य और भक्ति के बल को प्रदर्शित करता है। वे अग्नि से भी अप्रभावित रहे।

🔥 लंका दहन का प्रतीकात्मक अर्थ

लंका दहन रावण के अहंकार और अधर्म के नाश का प्रतीक है। यह आग बुराई पर अच्छाई की विजय की अग्नि है।

🙏 हनुमान की विनम्रता

इतना बड़ा पराक्रम करने के बाद भी हनुमान सीता के दर्शन के लिए पुनः अशोक वाटिका जाते हैं, जो राम-भक्ति के प्रति उनकी अटूट निष्ठा दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि धर्म और नीति का पालन ही अंततः विजय दिलाता है। हनुमान का साहस और समर्पण हमें प्रेरित करता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और बल का सही उपयोग करें।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे त्रिपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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