रावण द्वारा हनुमान् को मारने का आदेश

हनुमान जी को बन्दी बनाकर रावण के सामने प्रस्तुत किया जाता है। रावण उनसे पूछताछ करता है और हनुमान अपना परिचय देते हुए राम का संदेश सुनाते हैं। क्रोधित होकर रावण हनुमान को मारने का आदेश देता है, किन्तु विभीषण धर्मानुसार दूत को न मारने की सलाह देते हैं।

विवरण

अशोक वाटिका में हनुमान द्वारा सीता को राम का संदेश सुनाने और वाटिका का विध्वंस करने के बाद, रावण के पुत्र इन्द्रजीत ब्रह्मास्त्र से हनुमान को बन्दी बना लेते हैं। राक्षस हनुमान को रावण के दरबार में लाते हैं। रावण क्रोध में पूछता है, “तू कौन है? यहाँ कैसे आया?” हनुमान विनम्रतापूर्वक अपना परिचय देते हुए बताते हैं कि वे श्रीराम के दूत हैं और रावण से सीता को लौटाने तथा राम से क्षमा माँगने का संदेश देते हैं। रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच जाता है और वह हनुमान को तुरन्त मार डालने का आदेश देता है। तब रावण का छोटा भाई विभीषण आगे बढ़ता है और धर्मशास्त्र का हवाला देते हुए कहता है कि किसी दूत को मारना उचित नहीं है, वह तो केवल संदेशवाहक होता है। रावण विभीषण की बात मान लेता है और हनुमान को मारने के स्थान पर उनकी पूँछ में आग लगाने का आदेश देता है। यह सर्ग रावण के अहंकार, हनुमान के धैर्य और विभीषण की धर्मनिष्ठा को उजागर करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५२

(रावण द्वारा हनुमान् को मारने का आदेश – विभीषण का धर्मोपदेश)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विपञ्चाशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अशोक वाटिका का विध्वंस करने के बाद हनुमान इन्द्रजीत के ब्रह्मास्त्र से बद्ध होकर रावण के दरबार में उपस्थित किए जाते हैं। यहाँ रावण उनसे प्रश्न करता है और हनुमान अपने गौरवपूर्ण उत्तरों से रावण को क्रोधित कर देते हैं। फलस्वरूप रावण हनुमान को मारने की आज्ञा देता है, किन्तु विभीषण धर्मशास्त्र का हवाला देकर इस आदेश को बदलवा देते हैं।

🏛️ हनुमान का रावण-दरबार में प्रवेश (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततस्तु राक्षसैः सार्धं हनूमान् समरुद्धः ।
नीयमानो दशग्रीवं ददर्श रिपुमर्दनः ॥
रावणस्य सभां दिव्यां प्रविष्टो मारुतात्मजः ।
ददर्श राक्षसेन्द्रं तं सिंहासनगतं प्रभुम् ॥
ज्वलन्तमिव तेजोभिर्दीप्तमग्निमिव ज्वलम् ।
सिंहं गिरिगुहाश्रयम् ॥
तं दृष्ट्वा हनुमान् वीरो न विव्यथे कदाचन ।
धैर्यमालम्ब्य सुस्थितः प्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; तु = तो; राक्षसैः = राक्षसों के साथ; सार्धम् = साथ; हनूमान् = हनुमान; समरुद्धः = बन्दी; नीयमानः = ले जाते हुए; दशग्रीवम् = दशानन को; ददर्श = देखा; रिपुमर्दनः = शत्रुओं का मर्दन करने वाले (हनुमान); रावणस्य = रावण की; सभाम् = सभा में; दिव्याम् = दिव्य; प्रविष्टः = प्रवेश किया; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; ददर्श = देखा; राक्षसेन्द्रम् = राक्षसराज को; तम् = उस; सिंहासनगतम् = सिंहासन पर स्थित; प्रभुम् = स्वामी को; ज्वलन्तम् = जलते हुए; इव = समान; तेजोभिः = तेज से; दीप्तम् = प्रज्वलित; अग्निम् = अग्नि; इव = समान; ज्वलम् = ज्वाला; सिंहम् = सिंह; गिरिगुहाश्रयम् = गिरिकन्दरा में शयन करने वाले; तम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; हनुमान् = हनुमान; वीरः = वीर; न विव्यथे = नहीं घबराए; कदाचन = कभी; धैर्यम् = धैर्य; आलम्ब्य = धारण कर; सुस्थितः = अच्छी तरह स्थित; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; प्रणतः = झुका हुआ; अभवत् = हो गया।
📖 भावार्थ : राक्षसों के द्वारा बन्दी बनाकर ले जाते समय हनुमान ने दशग्रीव रावण को देखा। वे रावण की दिव्य सभा में प्रविष्ट हुए और उस राक्षसेन्द्र को सिंहासन पर विराजमान देखा, जो तेज से जलते हुए अग्नि के समान तथा पर्वत की गुफा में शयन करने वाले सिंह के समान दीप्त हो रहा था। उसे देखकर भी वीर हनुमान जरा भी विचलित नहीं हुए; उन्होंने धैर्य धारण कर हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने रावण के प्रति यद्यपि शत्रुता थी, फिर भी सभा की मर्यादा और राजा के रूप में उसे प्रणाम किया। यह उनके शिष्टाचार और सभ्यता का परिचायक है।
॥ श्लोक ५-८ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो रावणो वाक्यमब्रवीत् ।
कस्त्वं वानर विक्रान्त किमर्थमिह चागतः ॥
केन वा प्रेषितः शत्रो किं वा कार्यं चिकीर्षसि ।
सत्यं वदस्व मे शीघ्रं मा ते जीवितनाशनम् ॥
📖 भावार्थ : तब क्रोध से भरे हुए रावण ने यह वाक्य कहा: “हे वानर, तू कौन है? यहाँ किसलिए आया है? किसके द्वारा भेजा गया है? क्या करना चाहता है? मुझे शीघ्र सत्य बता, अन्यथा तेरे प्राणों का नाश हो जाएगा।”
🔍 व्याख्या : रावण ने क्रोध में आकर कठोर शब्दों में हनुमान से पूछताछ की। वह जानना चाहता था कि यह वानर इतना साहस कैसे कर सकता है।

📜 हनुमान का उत्तर और राम-संदेश (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१२ ॥
हनूमान् प्राह तेजस्वी विनयावनतः स्थितः ।
रामस्याहं महाबाहो दूतः कपिगणेश्वरः ॥
सुग्रीवसचिवो नाम हनूमान् मारुतात्मजः ।
रामसंदेशमुख्यार्थं त्वत्सकाशमुपागतः ॥
रामो दाशरथिः श्रीमान् भार्यां ते वशमागताम् ।
सीतामाहर्तुमिच्छामि त्वत्तो राक्षसपुङ्गव ॥
तस्मात् प्रसादं धर्मज्ञ कुरुष्व मम राघवे ।
सीतां दत्वा प्रसादं च शान्तिं याहि सुरैः सह ॥
📖 भावार्थ : तेजस्वी हनुमान ने विनयपूर्वक झुककर कहा: “हे महाबाहो! मैं राम का दूत हूँ, कपियों का सेनापति हूँ। सुग्रीव का मंत्री हनूमान नाम से विख्यात हूँ, मारुत का पुत्र हूँ। राम का मुख्य संदेश लेकर तुम्हारे पास आया हूँ। राम दशरथ के पुत्र हैं। उनकी पत्नी सीता तुम्हारे वश में हैं। हे राक्षसश्रेष्ठ! मैं उनसे सीता को प्राप्त करना चाहता हूँ। अतः हे धर्मज्ञ! मुझ पर और राम पर प्रसन्न होओ। सीता को लौटाकर और प्रसन्नता प्रदान कर देवताओं के साथ शांति प्राप्त करो।”
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अत्यंत विनम्रता और साहस के साथ राम का संदेश रावण को सुनाया। उन्होंने धर्म का सहारा लेते हुए रावण को सीता लौटाने की सलाह दी।
॥ श्लोक १३-२० ॥
न चेद्दास्यसि वैदेहीं रामस्य महिषीं प्रियाम् ।
ततो द्रक्ष्यसि रामेण वज्रपाणिमिव स्थितम् ॥
वानरैः सहितं युद्धे क्षिप्रं राक्षसपुङ्गव ।
हतान् राक्षससैन्यांस्त्वं द्रक्ष्यसे रणमूर्धनि ॥
📖 भावार्थ : “यदि तूने राम की प्रिय महिषी वैदेही सीता को नहीं लौटाया, तो तू राम को वज्रपाणि इन्द्र के समान युद्ध में देखेगा। वानरों के साथ आए हुए राम को देखकर तू और तेरे राक्षस-सैनिक युद्धभूमि में मारे जाएँगे।”

🔥 रावण का क्रोध और वध-आदेश (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
तच्छ्रुत्वा रावणः क्रुद्धो रक्तनेत्रोऽब्रवीद्वचः ।
वध्यतामेष दुष्टात्मा कपिः शत्रुः पुरा मम ॥
यो मां विनयसम्पन्नं ब्रूते धर्षयते बलात् ।
न हि मे वचनं श्रुत्वा जीवितुं मर्हति क्वचित् ॥
इत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रेण राक्षसाः क्रोधमूर्छिताः ।
हनूमन्तं समासाद्य वधाय समुपस्थिताः ॥
📖 भावार्थ : यह सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित हो गया। उसकी आँखें लाल हो गईं और वह बोला: “इस दुष्टात्मा वानर को मार डालो, यह मेरा शत्रु है। जो मुझे विनयपूर्वक समझाने के बदले धृष्टता से बोलता है, वह मेरा वचन सुनकर भी जीवित नहीं रह सकता।” ऐसा कहकर राक्षसेन्द्र ने आज्ञा दी। तब क्रोध में भरे राक्षस हनुमान को मारने के लिए उनके पास आए।
॥ श्लोक २६-३० ॥
तान् दृष्ट्वा हनुमान् धीरो न चचाल महाकपिः ।
आत्मानं मोचयामास ब्रह्मास्त्रवशतः कपिः ॥
ब्रह्मास्त्रं तस्य वीरस्य हनुमान् मारुतात्मजः ।
स्वयमेव विमोक्ष्यामि न बध्यः कस्यचित् क्वचित् ॥
इति ज्ञात्वा महातेजाः स्थितो धैर्येण वीर्यवान् ।
राक्षसा वध्यतामिति चुक्रुशुः सर्वतो दिशम् ॥
📖 भावार्थ : उन राक्षसों को देखकर भी धीर महाकपि हनुमान जरा भी विचलित नहीं हुए। वे ब्रह्मास्त्र के वश में बँधे थे, पर उन्होंने सोचा कि मैं स्वयं ही इस ब्रह्मास्त्र को मुक्त कर सकता हूँ, क्योंकि मैं वास्तव में किसी के द्वारा बाँधा नहीं जा सकता। ऐसा जानकर वे धैर्यपूर्वक स्थित रहे। राक्षस चारों ओर से “इसे मारो, इसे मारो” चिल्लाने लगे।
🔍 व्याख्या : हनुमान को ब्रह्मास्त्र से बाँधा गया था, पर ब्रह्मास्त्र का प्रभाव उन पर केवल औपचारिक था, क्योंकि उन्हें ब्रह्मा का वरदान था। वे चाहते तो तुरंत मुक्त हो सकते थे, पर उन्होंने रावण से मिलने के लिए स्वयं को बँधने दिया।

🕊️ विभीषण का हस्तक्षेप और धर्मोपदेश (श्लोक ३१-३८)

॥ श्लोक ३१-३४ ॥
ततः श्रीमान् विभीषणो धर्मात्मा सत्यवाक् शुचिः ।
उवाच रावणं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ॥
न वध्यते सुहृन्नाम दूतो राज्ञा कथञ्चन ।
सर्वेषामेव दूतानां वधः स्यादधमः स्मृतः ॥
अयं च कपिदूतस्ते रामस्य विदितात्मनः ।
न ह्येनं मर्हसि हन्तुं धर्ममार्गानुसारतः ॥
तस्मात् प्रसादयेथैनं मोक्षयेथा न संशयः ।
एवं धर्मं समास्थाय यशः प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
📖 भावार्थ : तब धर्मात्मा, सत्यवादी, शुद्ध विभीषण ने रावण से धर्म और अर्थ से युक्त हितकारी वचन कहे: “हे राजन! किसी भी प्रकार से दूत का वध नहीं करना चाहिए। सभी दूतों के लिए वध को अधम कहा गया है। यह कपि राम का दूत है, जो ज्ञानी हैं। धर्म के अनुसार तुम्हें इसे नहीं मारना चाहिए। अतः इसे प्रसन्न करो और मुक्त करो। इस प्रकार धर्म का आश्रय लेकर तुम शाश्वत यश प्राप्त करोगे।”
॥ श्लोक ३५-३८ ॥
रावणः प्राह विभीषणं सत्यवाक्यं निशम्य तु ।
यदि दूतो न हन्तव्यः किं कार्यं मे तदुच्यताम् ॥
विभीषणोऽब्रवीद्वाक्यं पुनरेव महामतिः ।
लाञ्छयैनं यथान्यायं येन संत्रासमेष्यति ॥
ततः स रावणः प्राह धर्मेणैतद्युतं वचः ।
दीप्यतां कपिलाङ्गूलं वासांसि क्रियतां तथा ॥
इत्याज्ञप्य दशग्रीवो विभीषणमपूजयत् ।
हनूमांश्चापि तच्छ्रुत्वा न विव्यथे कपीश्वरः ॥
📖 भावार्थ : विभीषण का सत्य वचन सुनकर रावण ने कहा, “यदि दूत को नहीं मारना है, तो मुझे क्या करना चाहिए?” तब महामति विभीषण ने फिर कहा, “इसे उचित दण्ड दो, जिससे यह भयभीत हो।” तब रावण ने कहा, “यह धर्मयुक्त वचन है। इस कपि की पूँछ में आग लगा दो और इसे वस्त्रों से लपेट दो।” इस प्रकार आज्ञा देकर रावण ने विभीषण का सम्मान किया। यह सुनकर भी हनुमान विचलित नहीं हुए।
🔍 व्याख्या : विभीषण ने दूत-वध के विरोध में धर्म का उपदेश दिया, पर रावण ने उनकी बात मानते हुए भी हनुमान को दण्ड देने का निश्चय किया – पूँछ में आग लगाने का। यह अगले सर्ग का विषय है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार ५२वें सर्ग में रावण ने हनुमान को मारने का आदेश दिया, किन्तु विभीषण के धर्मोपदेश से उसने आदेश बदलकर पूँछ में आग लगाने का निर्देश दिया। अगले सर्ग में हनुमान की पूँछ में आग लगाने और उनके द्वारा लंका दहन का वर्णन होगा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का अहंकार

रावण का क्रोध और हनुमान को तुरन्त मार डालने का आदेश उसके अहंकार और उच्छृंखल स्वभाव को दर्शाता है। वह धर्म की बात नहीं सुनना चाहता, केवल अपने बल पर अभिमान करता है।

🕊️ विभीषण की धर्मनिष्ठा

विभीषण ने इस कठिन समय में भी धर्म का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने रावण को दूत-वध के पाप से बचाया। यह उनके उच्च चरित्र का परिचायक है।

🧘 हनुमान का धैर्य

मृत्यु के सामने भी हनुमान अडिग रहे। उन्होंने न तो रावण से क्षमा माँगी, न ही भय दिखाया। यह उनके अटूट साहस और राम-भक्ति का प्रतीक है।

📜 धर्म का महत्त्व

यह सर्ग दिखाता है कि अधर्मी रावण को भी अंततः धर्म की बात माननी पड़ी, भले ही उसने आगे चलकर हनुमान को दण्ड दिया। धर्म की शक्ति सबको झुका लेती है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए हमेशा आवाज उठानी चाहिए, भले ही सामने कोई अत्याचारी ही क्यों न हो। विभीषण ने अपने भाई के सामने धर्म की बात कही, और हनुमान ने मृत्यु का सामना भी धैर्यपूर्वक किया। हमें भी विपरीत परिस्थितियों में धर्म और सत्य पर दृढ़ रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे द्विपञ्चाशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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