लंका का रात्रि में दर्शन
हनुमान जी रात के समय लंका में प्रवेश करते हैं और समुद्र, पर्वतों एवं नगर की सुन्दरता का वर्णन करते हैं। वे लंकिनी नामक राक्षसी से युद्ध करके उसे परास्त करते हैं और फिर लंका नगरी का अवलोकन करते हुए राक्षसों के भवनों, विमानों एवं वैभव को देखते हैं।
विवरण
समुद्र का उल्लंघन करने के बाद हनुमान जी लंका की सीमा में प्रवेश करते हैं। रात्रि का समय होने के कारण चारों ओर अंधेरा छाया हुआ है, किन्तु हनुमान जी अपने दिव्य ज्ञान से लंका नगरी का अवलोकन करते हैं। वे सर्वप्रथम लंका के रक्षक एवं द्वारपाल का कार्य करने वाली भयंकर राक्षसी लंकिनी से भिड़ते हैं। हनुमान जी उसे घूंसा मारकर परास्त कर देते हैं, जिससे लंका का द्वार खुल जाता है। लंकिनी उन्हें आशीर्वाद देती है कि अब वे सफलतापूर्वक लंका में प्रवेश कर सकते हैं। तत्पश्चात हनुमान जी लंका नगरी का भ्रमण करते हैं। वे रावण के भव्य महल, सोने-चाँदी के मण्डप, सुन्दर उद्यान, विचित्र यंत्र और राक्षसों के विशाल भवन देखते हैं। वे रावण के निजी महल पुष्पक विमान को भी देखते हैं, जो उसकी समृद्धि का प्रतीक है। इस भ्रमण के दौरान वे रावण को भी देखते हैं, जो अपनी पत्नियों के साथ निद्रा में लीन है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ५
(लंका का रात्रि में दर्शन – लंकिनी का वध)
🔆 प्रस्तावना : सौ योजन विस्तीर्ण समुद्र को लाँघकर हनुमान जी लंका के तट पर उतर चुके हैं। अब रात्रि का समय है। सामने सोने की लंका नगरी अपने ऐश्वर्य के साथ खड़ी है। इस सर्ग में हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं, उसके द्वारपाल लंकिनी नामक राक्षसी को परास्त करते हैं और फिर नगर का भव्य दृश्य देखते हुए रावण के महल एवं पुष्पक विमान का अवलोकन करते हैं।
🗝️ लंकिनी का दमन (श्लोक १-१३)
लङ्कामेवाभिदुद्राव पुरीं रावणपालिताम् ॥
ततो रात्र्यामतीतायां हनूमान् मारुतात्मजः ।
ददर्श लङ्कां विपुलां रम्यां रावणपालिताम् ॥
तामपश्यन्निशीथे तु हनूमान् मारुतात्मजः ।
राक्षसैर्बहुभिर्गुप्तां दुराधर्षां सुरैरपि ॥
तस्यास्तु द्वारमासाद्य हनूमान् मारुतात्मजः ।
अपश्यद्राक्षसीं घोरां लङ्किनीं नाम नामतः ॥
तामुवाच हनूमांस्तु सान्त्वपूर्वमरिन्दमः ।
का त्वं केन च भावेन तिष्ठसे द्वारि संस्थिता ॥
इत्युक्ता सा तदा तेन लङ्किनी राक्षसी तदा ।
क्रोधमाहारयत्तीव्रं हनूमन्तमभाषत ॥
एषाहं लङ्किनी नाम राक्षसी द्वारपालिका ।
रक्षामि द्वारमेतत्तु रावणस्य जनक्षये ॥
प्राञ्जलिः पुनरेवैनामुवाच वचनं हितम् ॥
दिदृक्षया सम्प्रविष्टो लङ्कां रावणपालिताम् ।
रामस्य दूतः काकुत्स्थ प्रवेष्टुमभिकाङ्क्षति ॥
तच्छ्रुत्वा लङ्किनी वाक्यं हनूमन्तमथाब्रवीत् ।
न शक्यस्त्वत्प्रवेशोऽत्र मदनुज्ञामृतेऽनघ ॥
एवमुक्तस्तु हनुमान् क्रोधसंरक्तलोचनः ।
तर्जयित्वा महानादं ननाद गगनं प्रति ॥
सा तु तस्य महानादं श्रुत्वा लङ्किन्यथाब्रवीत् ।
हनूमन्तं राक्षसेन्द्रं रावणं प्रति नार्हसि ॥
ततस्तेन प्रहारेण विनिर्भिन्ना तु सा भृशम् ।
प्रापतद्धरणीं वीरा वातरुग्णेव वल्लरी ॥
🏙️ लंका नगरी का रात्रि-सौन्दर्य (श्लोक १४-२८)
उवाच परमप्रीता हनूमन्तमरिन्दमम् ॥
तुष्टास्मि तव वीर्येण धैर्येण च महाबल ।
प्रविशस्व पुरीं लङ्कां कुरु कार्यं यथेप्सितम् ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां राक्षसाधिपतिपालिताम् ॥
स प्रविश्य पुरीं लङ्कां रात्रौ राक्षसमालिनीम् ।
ददर्श विविधान् देशान् गृहांश्चापि समन्ततः ॥
राजमार्गांश्च विपुलान् सुविभक्तान् सुनिर्मलान् ।
राक्षसैर्बहुभिर्गुप्तान् ददर्श स महाबलः ॥
स ददर्श ततः शुभ्रां लङ्कां रत्नसमन्विताम् ।
द्वाराणि च सतोरणानि वैदूर्यमणिवेदिकाम् ॥
तोरणानि च चित्राणि जाम्बूनदपरिच्छदान् ।
ददर्श सर्वतो लङ्कां विमानैरुपशोभिताम् ॥
नानारत्नसमाकीर्णां नानापण्योपशोभिताम् ।
ददर्श हनुमांस्तत्र लङ्कां रावणपालिताम् ॥
रावणस्य गृहं रम्यं पुष्पकं नाम नामतः ॥
तदद्भुततमं लोके विमानं कामगामि च ।
सर्वरत्नसमाकीर्णं नानावृक्षोपशोभितम् ॥
तत्र वैश्रवणस्याग्रे ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ।
स्वयम्भुवा महातेजा रावणाय निवेदितम् ॥
तस्मिन् विमानवरे रम्ये राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।
राक्षसैर्बहुभिः सार्धं स्थितः प्रहरणैः सह ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां हनूमान् मारुतात्मजः ।
ददर्श विमलं चन्द्रं ग्रहैः परिवृतं दिवि ॥
ततः प्रभाते विमले हनूमान् मारुतात्मजः ।
चिन्तयामास किं कार्यं सीतायाः परिमार्गणे ॥
🌅 प्रभात एवं खोज की तैयारी
लङ्कां सागरनद्धां तां ददर्श विविधां तदा ॥
स तु दृष्ट्वा पुरीं लङ्कां हनूमान् मारुतात्मजः ।
हर्षेण महता युक्तो रामस्य प्रियकाम्यया ॥
इति श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🚪 लंकिनी का प्रतीकात्मक दमन
लंकिनी केवल एक द्वारपाल नहीं, अपितु लंका की समस्त नकारात्मक शक्तियों का प्रतीक है। उसका दमन हनुमान के आत्मिक बल एवं साहस को दर्शाता है। यह घटना यह भी सिद्ध करती है कि सत्पुरुषों के मार्ग में आने वाली बाधाएँ अन्ततः उनका पथ प्रशस्त करती हैं।
🌕 रात्रि में लंका-दर्शन
रात्रि के समय लंका का वर्णन उसके वैभव को और अधिक उभारता है। ज्योतिर्मय नगरी, चन्द्रमा की रोशनी में दमकते स्वर्ण-महल, मणियों से जड़े द्वार - यह सब रावण की समृद्धि का परिचायक है। साथ ही, रात्रि में ही खोज करना हनुमान की चतुराई को भी दर्शाता है।
✈️ पुष्पक विमान
पुष्पक विमान का यहाँ विस्तार से वर्णन आने वाले समय में उसके महत्व को रेखांकित करता है। यह विमान अन्त में राम एवं सीता की अयोध्या वापसी का माध्यम बनता है। इस प्रकार वाल्मीकि जी भविष्य की घटनाओं का संकेत अपने वर्णनों में दे देते हैं।
🧘 हनुमान का संयम
इतना वैभव देखने के बाद भी हनुमान अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होते। अन्तिम श्लोक में वे सीता की खोज की योजना बनाते हैं। यह उनके अटूट समर्पण एवं एकाग्रता को दर्शाता है। वे केवल राम के कार्य के लिए ही लंका आए हैं, भोग-विलास के लिए नहीं।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि साहस और विनम्रता का समन्वय आवश्यक है। हनुमान ने पहले सान्त्वनापूर्वक लंकिनी से बात की, फिर आवश्यकता पड़ने पर बल का प्रयोग किया। साथ ही, कितनी भी भव्य परिस्थितियाँ क्यों न हों, हमें अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होना चाहिए। हनुमान का लंका दर्शन मात्र एक अवलोकन है, उनका ध्यान सदा सीता एवं राम पर केन्द्रित है।