हनुमान् द्वारा सुसज्जित रावण का दर्शन
राक्षसों द्वारा बंदी बनाकर लाए गए हनुमान को रावण के दरबार में प्रस्तुत किया जाता है। हनुमान वहाँ अलंकारों से सुसज्जित, तेजस्वी एवं दस मुखों वाले रावण को देखते हैं और उसके ऐश्वर्य एवं पराक्रम का मूल्यांकन करते हैं। वे रावण के दिव्य आसन, उसके मुकुट, कुण्डल एवं अस्त्र-शस्त्रों का वर्णन करते हैं। इस सर्ग में रावण के भव्य दरबार और उसकी वैभवशाली उपस्थिति का सजीव चित्रण है।
विवरण
हनुमान जी ने अशोक वाटिका में सीता जी को राम का संदेश दे दिया और उनका समाचार लेकर लौटने की योजना बना रहे थे, तभी उन्होंने वाटिका को उजाड़ना शुरू कर दिया। इससे क्रोधित होकर राक्षस योद्धा उन पर टूट पड़े। हनुमान ने अनेक राक्षसों का वध किया, अंततः रावण के पुत्र इन्द्रजित ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके उन्हें बंदी बना लिया। राक्षस हनुमान को रस्सियों से बाँधकर रावण के दरबार में ले गए। वहाँ हनुमान ने प्रथम बार रावण को उसके समस्त वैभव एवं सिंहासन पर विराजमान देखा। रावण दस मुखों वाला, नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषित, अग्नि के समान तेजस्वी और विशालकाय था। हनुमान ने उसके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट, कानों में कुण्डल, भुजाओं में बाजूबन्द और कंठ में हार देखे। उसकी सभा देवताओं, गन्धर्वों और ऋषियों से भरी हुई थी। हनुमान मन-ही-मन रावण के ऐश्वर्य की प्रशंसा करते हैं, किन्तु साथ ही यह भी सोचते हैं कि यह सब वैभव अधर्म के कारण नष्ट होने वाला है। वे रावण को देखकर विस्मित तो होते हैं, परन्तु भयभीत नहीं होते। इसके बाद रावण हनुमान से उनका परिचय पूछता है, जिसका उत्तर अगले सर्ग में मिलता है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४९
(हनुमान् द्वारा सुसज्जित रावण का दर्शन)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी अशोक वाटिका में सीता से मिल चुके हैं और संदेश दे चुके हैं। अब वे जानबूझकर वाटिका का विध्वंस करते हैं, जिससे राक्षस योद्धा उन पर आक्रमण करते हैं। अनेक योद्धाओं को परास्त करने के बाद अन्ततः इन्द्रजित के ब्रह्मास्त्र से वे बंदी बना लिये जाते हैं और राक्षस उन्हें रावण के दरबार में लाते हैं। यहाँ हनुमान प्रथम बार उस महापराक्रमी रावण को उसके समस्त वैभव के साथ देखते हैं।
🏛️ हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश (श्लोक १-८)
बद्ध्वा रज्जुभिरायम्य रावणाय न्यवेदयन् ॥
राक्षसेन्द्रसभां प्राप्य ददर्श हरियूथपः ।
रावणं दीप्तवपुषं पावकं ज्वलितं यथा ॥
दशग्रीवं महातेजं वज्रसंहननं दृढम् ।
विराजमानं वपुषा शक्रं त्रिदशपूजितम् ॥
👑 रावण के आभूषण एवं दिव्य आसन (श्लोक ९-२२)
कुण्डलाभ्यां च रुचिरैः शोभितं चारुदर्शनम् ॥
केयूरवलयैर्दिव्यैः शोभितं चन्दनोक्षितम् ।
रत्नसूत्रैश्च विविधैर्हारैश्चापि विभूषितम् ॥
उपविष्टं महार्हेण दिव्यास्तरणसंवृते ।
आसने परमोदारे शक्रस्येवामरावतीम् ॥
महाबलान् महाकायान् दुर्धर्षान् कामरूपिणः ॥
गन्धर्वाप्सरसो देवानृषींश्च सह चारणैः ।
यक्षराक्षसभूतांश्च वरदानेन मोहितान् ॥
सेवमानान् महात्मानं ददर्श हरियूथपः ।
विस्मयं परमं गत्वा रावणं समपूजयत् ॥
💭 हनुमान के मनोभाव और रावण के विनाश की आशंका (श्लोक २३-४५)
अहो राक्षसराजस्य यस्यैवं भक्तवत्सलाः ॥
नूनं तपसा महता वरदानेन चानघाः ।
प्राप्तं राज्यमिदं सर्वं त्रैलोक्यं वशमानतम् ॥
ध्रुवं विनाशमापन्नो दुष्टात्मा नियतं हि सः ।
यस्य मे रामभक्तस्य दर्शयन्ति बलात्कृतम् ॥
अपि सीतापहरणात्कोपो मेऽद्य प्रवर्तते ।
हनिष्ये रावणं क्रुद्धः ससैन्यं सानुगं रणे ॥
सोढव्यं किं नु कार्यं मे सीतायाः सन्निधानतः ।
प्रतीक्षे राममेवाहं यथेष्टं चर दानव ॥
📌 सर्गान्त : इस प्रकार चउवनवें सर्ग में हनुमान रावण के दरबार में उसे सुसज्जित देखते हैं, उसके वैभव का वर्णन करते हैं और अन्त में राम के आने तक धैर्य धारण करने का निश्चय करते हैं। अगले सर्ग में रावण हनुमान से पूछताछ करेगा।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 रावण का अद्वितीय ऐश्वर्य
इस सर्ग में रावण के दरबार, आभूषण, वस्त्र, आसन और उपस्थित देवताओं तथा ऋषियों का वर्णन उसकी असाधारण शक्ति और वैभव को प्रकट करता है। यह वर्णन राम-रावण युद्ध की पृष्ठभूमि को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
🛡️ हनुमान का धैर्य एवं संयम
हनुमान के मन में क्रोध के बावजूद वे सीता की प्रतिज्ञा और राम के आने तक धैर्य रखने का निर्णय लेते हैं। यह उनकी दूरदर्शिता और भक्ति के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
⚖️ अधर्म पर धर्म की विजय का संकेत
रावण के वैभव का विस्तार से वर्णन करने के बाद भी हनुमान उसे दुष्टात्मा कहते हैं और उसके विनाश की आशंका व्यक्त करते हैं। यह संकेत है कि चाहे अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अन्त निश्चित है।
🔱 रामभक्त हनुमान का चरित्र
बंदी बनाकर लाए जाने पर भी हनुमान न तो भयभीत होते हैं और न ही अपनी गरिमा खोते हैं। वे रावण का यथोचित मूल्यांकन करते हैं और अपने स्वामी राम के प्रति अटल निष्ठा बनाए रखते हैं।
🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि बाहरी वैभव और ऐश्वर्य देखकर मोहित नहीं होना चाहिए। सच्चा बल धर्म और सत्य में निहित है। हनुमान की तरह हमें भी विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और विवेक नहीं खोना चाहिए, बल्कि अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहना चाहिए।