रावण द्वारा अपने पुत्र इंद्रजीत को भेजना

रावण हनुमान की वीरता से क्रोधित होकर अपने पुत्र इंद्रजीत को उसे पकड़ने के लिए भेजता है। इंद्रजीत ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर हनुमान को बांध लेता है।

विवरण

हनुमान जी ने अशोक वाटिका उजाड़ दी, अनेक राक्षसों को मार डाला और रावण के भेजे हुए योद्धाओं को परास्त कर दिया। यह सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित होता है। वह पहले अनेक राक्षसों को हनुमान के पास भेजता है, किंतु हनुमान उन सबको मार भगाते हैं। अंत में रावण अपने पुत्र इंद्रजीत (मेघनाद) को बुलाता है और उसे हनुमान को पकड़ने का आदेश देता है। इंद्रजीत रथ पर सवार होकर युद्धक्षेत्र में पहुँचता है। वह हनुमान पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा करता है। हनुमान उनका सामना करते हैं, किंतु इंद्रजीत ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है, जिससे हनुमान बंध जाते हैं। इस सर्ग में इंद्रजीत के युद्ध कौशल और हनुमान के पराक्रम का सजीव वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४८

(रावण द्वारा इंद्रजीत को भेजना – हनुमान का ब्रह्मास्त्र से बंधन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ अष्टाचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने अशोक वाटिका का विध्वंस कर दिया और अनेक राक्षस योद्धाओं को मार गिराया। रावण यह सुनकर क्रोध से तमतमा उठता है। वह अपने पुत्र इंद्रजीत को बुलाता है और उसे आदेश देता है कि वह इस वानर को बंदी बना लाए। इस सर्ग में इंद्रजीत और हनुमान के मध्य भीषण युद्ध का वर्णन है, जिसके अंत में इंद्रजीत ब्रह्मास्त्र चलाकर हनुमान को बाँध लेता है।

🔥 रावण का क्रोध और इंद्रजीत को बुलाना (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रहस्तमुख्यास्तु राक्षसाः प्राप्य संयुगे ।
हनूमता विनिहताः शेषास्ते प्राद्रवन्भयात् ॥
तान्दृष्ट्वा भग्नसङ्कल्पान् रावणः क्रोधमूर्छितः ।
उवाच परमामर्षी पुत्रमिन्द्रजितं तदा ॥
मम सेना हता युद्धे वानरेण त्वयानघ ।
तं जहि क्षिप्रमास्थाय न हि मे जीविते स्पृहा ॥
इति श्रुत्वा महातेजा इन्द्रजिद्राक्षसेश्वरः ।
प्रत्युवाच महाराज निश्चयं परमं युधि ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रहस्तमुख्याः = प्रहस्त आदि प्रधान; तु = तो; राक्षसाः = राक्षस; प्राप्य = पाकर; संयुगे = युद्ध में; हनूमता = हनुमान द्वारा; विनिहताः = मारे गए; शेषाः = शेष; ते = वे; प्राद्रवन् = भाग गए; भयात् = भय से; तान् = उनको; दृष्ट्वा = देखकर; भग्नसङ्कल्पान् = टूटे हुए संकल्प वाले; रावणः = रावण; क्रोधमूर्छितः = क्रोध से मूर्छित; उवाच = बोला; परमामर्षी = परम अमर्ष से भरा; पुत्रम् = पुत्र को; इन्द्रजितम् = इंद्रजीत को; तदा = तब; मम = मेरी; सेना = सेना; हता = मारी गई; युद्धे = युद्ध में; वानरेण = वानर द्वारा; त्वया = तुमसे; अनघ = निष्पाप; तम् = उसे; जहि = मारो; क्षिप्रम् = शीघ्र; आस्थाय = आक्रमण कर; न हि = नहीं; मे = मुझे; जीविते = जीवन में; स्पृहा = इच्छा; इति = ऐसा; श्रुत्वा = सुनकर; महातेजाः = महातेजस्वी; इन्द्रजित् = इंद्रजीत; राक्षसेश्वरः = राक्षसराज को; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महाराज = हे महाराज; निश्चयम् = निश्चय; परमम् = उत्तम; युधि = युद्ध में।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात प्रहस्त आदि प्रमुख राक्षस हनुमान के हाथों युद्ध में मारे गए और शेष राक्षस भय से भाग गए। उनको टूटे हुए संकल्प वाला देखकर रावण अत्यंत क्रोधित हो उठा और उसने परम अमर्ष से भरे हुए अपने पुत्र इंद्रजीत से कहा – "हे अनघ! युद्ध में मेरी सेना उस वानर द्वारा मारी गई है। तुम शीघ्र जाकर उसे मार डालो, मुझे जीने की इच्छा नहीं है।" यह सुनकर महातेजस्वी इंद्रजीत ने राक्षसराज को उत्तर दिया – "हे महाराज! युद्ध में मैं आपका निश्चय पूर्ण करूँगा।"
🔍 व्याख्या : रावण की सेना के पराजय से वह क्रोध में आकर अपने पुत्र को आदेश देता है। इंद्रजीत आश्वासन देता है कि वह हनुमान को परास्त करेगा।
॥ श्लोक ५-८ ॥
आज्ञप्तस्तु ततो राज्ञा रथमास्थाय वीर्यवान् ।
प्रययौ यत्र हनुमान् वानरो मारुतात्मजः ॥
ददर्श स महाबाहुं शैलाभं वानरर्षभम् ।
तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्क्रोधादिन्द्रजित्तदा ॥
तच्छ्रुत्वा हनुमान्वाक्यं प्रहस्य मारुतात्मजः ।
उवाच परमप्रीतो युद्धोत्सुकमना हरिः ॥
📖 भावार्थ : तब राजा द्वारा आज्ञप्त होकर वीर्यवान इंद्रजीत रथ पर आरूढ़ होकर वहाँ गया जहाँ हनुमान (मारुतिपुत्र) थे। उसने पर्वत के समान उस महाबाहु वानरश्रेष्ठ को देखा और क्रोध से "ठहर, ठहर" कहकर उसे ललकारा। यह वचन सुनकर मारुतिपुत्र हनुमान ने प्रसन्न होकर कहा, वे युद्ध की उत्सुकता से भर गए।
🔍 व्याख्या : इंद्रजीत हनुमान को युद्ध के लिए ललकारता है। हनुमान प्रसन्नतापूर्वक युद्ध स्वीकार करते हैं।

⚔️ हनुमान और इंद्रजीत का घोर युद्ध (श्लोक ९-२५)

॥ श्लोक ९-१६ ॥
ततः शस्त्राणि मुक्तानि राक्षसेन्द्रेण धीमता ।
हनूमांस्तानि सर्वाणि प्रतिजग्राह लाघवात् ॥
न च तं पीडयामासुर्ब्रह्मदत्तवराद्बली ।
ततः क्रुद्धो महातेजा इन्द्रजित्समरे कपिम् ॥
विव्याध निशितैर्बाणैः सर्वगात्रेषु वीर्यवान् ।
तथापि न चुकोपासौ हनूमान्मारुतात्मजः ॥
प्रहस्य च महाबाहुः प्लवगेन्द्रो महाबलः ।
ताडयामास वेगेन राक्षसं रथिनां वरम् ॥
📖 भावार्थ : तब बुद्धिमान राक्षसेन्द्र इंद्रजीत ने अनेक शस्त्र छोड़े, किन्तु हनुमान ने अपनी फुर्ती से उन सबको ग्रहण कर लिया। ब्रह्मा के वरदान के कारण वे बलवान शस्त्रों से पीड़ित नहीं हुए। तब क्रोधित होकर महातेजस्वी इंद्रजीत ने युद्ध में कपि को तीक्ष्ण बाणों से सब अंगों में बींध दिया, फिर भी मारुतिपुत्र हनुमान क्रोधित नहीं हुए। बल्कि हँसकर महाबाहु महाबलशाली वानरेन्द्र ने वेग से उस श्रेष्ठ रथी राक्षस को प्रहार किया।
🔍 व्याख्या : इंद्रजीत के सभी अस्त्र-शस्त्र हनुमान पर निष्फल होते हैं। हनुमान ब्रह्मा के वरदान से अवध्य हैं। वे हँसते हुए इंद्रजीत पर आक्रमण करते हैं।
॥ श्लोक १७-२५ ॥
ततो युद्धं महाघोरं बभूव रजनीचरे ।
कपीन्द्रेण सुसंरब्धं रोमहर्षणमुत्तमम् ॥
निर्विण्णस्तु ततो युद्धे राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।
जग्राह परमास्त्रं तद्ब्राह्मं परमदुर्जयम् ॥
चिक्षेप च तदा तस्मिन् हनूमति महाबले ।
तेन बद्धस्तदा वीरो हनूमानभवत्कपिः ॥
पपात च महीपृष्ठे ब्रह्मास्त्रेणाभिपीडितः ।
न तु तस्याभवद्भङ्गः स्वस्थ एव महाकपिः ॥
📖 भावार्थ : तब राक्षस और कपीन्द्र के बीच घोर युद्ध हुआ, जो रोमांचकारी था। युद्ध में निराश होकर प्रतापी राक्षसेन्द्र ने परम दुर्जय ब्रह्मास्त्र ग्रहण किया और उसे महाबली हनुमान पर छोड़ दिया। उससे बंधकर वह वीर कपि हनुमान पृथ्वी पर गिर पड़े। ब्रह्मास्त्र से पीड़ित होने पर भी उनका साहस नहीं टूटा, वे स्वस्थ ही रहे।
🔍 व्याख्या : इंद्रजीत अंततः ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है, जिससे हनुमान बंध जाते हैं और भूमि पर गिर जाते हैं, किंतु वरदान के कारण उन्हें अधिक पीड़ा नहीं होती।

🔗 हनुमान का बंधन और राक्षसों का हर्ष (श्लोक २६-३५)

॥ श्लोक २६-३० ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ राक्षसाः पर्यवारयन् ।
हर्षेण महता युक्ता ननन्दुश्च पुनः पुनः ॥
ततो निश्चित्य रावणः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
आनयध्वमिमं क्षिप्रमिति होवाच राक्षसान् ॥
त एनं बद्ध्वा रज्जुभिर्हनूमन्तं महाबलम् ।
जहृषुर्भृशमत्यर्थं राक्षसाः कामरूपिणः ॥
हनूमानपि तद्बन्धं न मेने मारुतात्मजः ।
स्वस्थ एव महाप्राज्ञश्चिन्तयामास राघवम् ॥
📖 भावार्थ : उसे भूमि पर गिरा देख राक्षसों ने घेर लिया और बड़े हर्ष से बार-बार आनंद मनाया। तब रावण ने प्रसन्न अन्तःकरण से निश्चय करके राक्षसों से कहा – "इसे शीघ्र लाओ।" उन कामरूपी राक्षसों ने महाबली हनुमान को रस्सियों से बाँध दिया और अत्यधिक हर्षित हुए। परंतु मारुतिपुत्र हनुमान ने उस बंधन की चिंता नहीं की। वे महाप्राज्ञ स्वस्थ भाव से राघव का चिंतन करने लगे।
🔍 व्याख्या : राक्षस हनुमान को बाँधकर प्रसन्न होते हैं, पर हनुमान ब्रह्मास्त्र के बंधन में भी मानसिक रूप से स्थिर हैं और राम का स्मरण कर रहे हैं।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततस्ते राक्षसाः सर्वे हनूमन्तमुपागतम् ।
रावणाय ददुर्हृष्टा वध्यमानाः स्वयंप्रभम् ॥
रावणोऽपि महातेजा दृष्ट्वा हनूमन्तं तदा ।
पप्रच्छ कस्त्वमित्येवं रामदूत इति श्रुतम् ॥
हनूमानपि तं प्राह रामस्याहं हिते रतः ।
दूतोऽहं कपिराजस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥
इत्युक्त्वा विररामासौ हनूमान्मारुतात्मजः ।
📖 भावार्थ : तब वे सब राक्षस हनुमान को लेकर रावण के पास पहुँचे और प्रसन्न होकर उन्हें रावण को सौंप दिया। रावण ने हनुमान को देखकर पूछा – "तू कौन है?" तब रामदूत होने की बात सुनकर वह जान गया। हनुमान ने उत्तर दिया – "मैं राम का हित चाहने वाला दूत हूँ और महात्मा कपिराज सुग्रीव का सेवक हूँ।" ऐसा कहकर मारुतिपुत्र हनुमान चुप हो गए।
🔍 व्याख्या : राक्षस हनुमान को रावण के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। रावण पूछता है और हनुमान अपना परिचय देते हैं। अगले सर्ग में हनुमान का रावण दरबार में वार्तालाप होगा।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚡ इंद्रजीत का प्रथम प्रदर्शन

इस सर्ग में इंद्रजीत का युद्ध कौशल और ब्रह्मास्त्र का ज्ञान दिखाया गया है। वह अकेला ही हनुमान जैसे वीर को बंदी बना लेता है।

🙏 हनुमान का धैर्य

हनुमान ब्रह्मास्त्र से बँधने पर भी विचलित नहीं होते। वे राम का स्मरण करते हैं और अपने कर्तव्य में स्थिर रहते हैं। यह उनकी दृढ़ भक्ति का प्रतीक है।

🎯 ब्रह्मास्त्र का प्रभाव

ब्रह्मास्त्र द्वारा बँधने के बाद भी हनुमान को अधिक कष्ट नहीं होता, क्योंकि ब्रह्मा के वरदान से वे अमोघ अस्त्रों से मुक्त थे। यह उनकी दिव्यता को दर्शाता है।

🌍 आगे की कथा का आधार

हनुमान का रावण दरबार में जाना और वहाँ का संवाद अगले सर्गों की रीढ़ है। यह बंधन ही अगले घटनाक्रम का कारण बनता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और भगवन्नाम का स्मरण ही हमारा सच्चा आधार है। हनुमान ने बंधन में भी राम को नहीं भुलाया। हमें भी जीवन के कष्टों में ईश्वर का स्मरण करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे अष्टाचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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