रावण द्वारा अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजना

हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका के विनाश और अनेक राक्षसों के वध से क्रोधित होकर रावण अपने पुत्र अक्षय कुमार को युद्ध के लिए भेजता है। अक्षय कुमार अपनी सेना के साथ हनुमान पर आक्रमण करता है, किन्तु हनुमान उसका वध कर देते हैं। यह सर्ग हनुमान के पराक्रम और अक्षय कुमार की वीरता का वर्णन करता है।

विवरण

अशोक वाटिका का विध्वंस और राक्षसों के वध की सूचना सुनकर रावण अत्यन्त क्रोधित होता है। वह अपने पराक्रमी पुत्र अक्षय कुमार को बुलाकर हनुमान को मारने का आदेश देता है। अक्षय कुमार रथ पर सवार होकर विशाल राक्षसी सेना के साथ प्रस्थान करता है। हनुमान उसे आता देख युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं। दोनों में घोर युद्ध होता है। अक्षय कुमार अनेक अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करता है, किन्तु हनुमान उन सबको विफल कर देते हैं। अन्ततः हनुमान अपने भीमकाय पर्वताकार शरीर से अक्षय कुमार के रथ को चूर-चूर कर देते हैं और उसे मार गिराते हैं। अक्षय कुमार के वध से राक्षस सेना भयभीत होकर भाग जाती है। यह सर्ग हनुमान के अदम्य साहस एवं शक्ति का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४७

(रावण द्वारा अक्षय कुमार को भेजना – हनुमान-अक्षय कुमार युद्ध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका के विध्वंस, राक्षसों के वध और किंकरों के संहार की सूचना पाकर रावण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठता है। वह अपने पराक्रमी पुत्र अक्षय कुमार को युद्ध के लिए भेजता है। यह सर्ग अक्षय कुमार के वध और हनुमान के अपरिमित बल का सुन्दर वर्णन प्रस्तुत करता है।

⚔️ रावण का आदेश और अक्षय कुमार का प्रस्थान (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रविश्य रावणः सभां क्रोधान्वितो भृशम् ।
श्रुत्वा हनूमतः कर्म वानरस्य महात्मनः ॥
उवाच राक्षसान् सर्वान् समीपे समवस्थितान् ।
अद्य तं वानरं हत्वा सुखी भवितुमिच्छवे ॥
अक्षयं कुमारमाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ।
गच्छ त्वं वानरं शीघ्रं जहि मां राक्षसाधिपः ॥
स तु राज्ञः प्रियं श्रुत्वा अक्षयः क्रोधमूर्च्छितः ।
आरुरोह रथं दिव्यं हेमभूषणभूषितम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तदनन्तर; प्रविश्य = प्रवेश करके; रावणः = रावण; सभाम् = सभा में; क्रोधान्वितः = क्रोधयुक्त; भृशम् = अत्यन्त; श्रुत्वा = सुनकर; हनूमतः = हनुमान का; कर्म = कार्य; वानरस्य = वानर का; महात्मनः = महान् आत्मा वाला; उवाच = बोले; राक्षसान् = राक्षसों से; सर्वान् = सभी से; समीपे = पास में; समवस्थितान् = स्थित; अद्य = आज; तम् = उस; वानरम् = वानर को; हत्वा = मारकर; सुखी = सुखी; भवितुम् = होने के लिए; इच्छवे = इच्छा रखने वाला; अक्षयम् = अक्षय को; कुमारम् = कुमार को; आहूय = बुलाकर; वाक्यम् = वचन; एतत् = यह; उवाच = बोले; ह = ही; गच्छ = जाओ; त्वम् = तुम; वानरम् = वानर को; शीघ्रम् = शीघ्र; जहि = मारो; माम् = मुझसे; राक्षसाधिपः = राक्षसराज; सः = वह; तु = तो; राज्ञः = राजा के; प्रियम् = प्रिय; श्रुत्वा = सुनकर; अक्षयः = अक्षय; क्रोधमूर्च्छितः = क्रोध से मूर्छित; आरुरोह = चढ़ गया; रथम् = रथ पर; दिव्यम् = दिव्य; हेमभूषणभूषितम् = सोने के आभूषणों से सुसज्जित।
📖 भावार्थ : तदनन्तर अत्यन्त क्रोधित होकर रावण सभा में आया। उसने हनुमान के कर्म सुन राक्षसों से कहा, आज उस वानर को मारकर ही मैं सुखी होऊँगा। फिर उसने अपने पुत्र अक्षय कुमार को बुलाकर आदेश दिया कि तुम शीघ्र जाकर उस वानर को मार डालो। पिता की यह आज्ञा सुनकर अक्षय कुमार क्रोध से भर गया और स्वर्ण-भूषित दिव्य रथ पर आरूढ़ हो गया।
🔍 व्याख्या : रावण का यह आदेश उसके पुत्र के प्रति स्नेह और युद्ध की त्वरा दोनों को प्रदर्शित करता है। अक्षय कुमार को रथ पर सवार देख राक्षसों को विजय की आशा बँधी।
॥ श्लोक ५-१० ॥
ततः प्रायान्महावेगो राक्षसैः बहुभिर्वृतः ।
शूलपट्टिशहस्तैश्च नानाप्रहरणैर्युतैः ॥
तमापतन्तं वेगेन दृष्ट्वा हनुमान् कपिः ।
नान्तरिक्षे न च भूमौ विव्यथे न चकम्पे च ॥
सिंहनादं विनद्योच्चैः तस्थौ पर्वतमूर्धनि ।
आगच्छन्तं रथं दृष्ट्वा कुमारं च महाबलम् ॥
📖 भावार्थ : तब अक्षय कुमार महावेग से सेना सहित प्रस्थित हुआ, जिसमें अनेक राक्षस शूल, पट्टिश (एक प्रकार का अस्त्र) और नाना प्रकार के शस्त्र लिए हुए थे। उसे वेग से आते देख हनुमान न तो आकाश में विचलित हुए और न पृथ्वी पर काँपे। वे पर्वत के शिखर पर ऊँचा सिंहनाद करते हुए स्थिर रहे और उस रथ को तथा महाबली कुमार को आते देखा।

🔥 हनुमान-अक्षय कुमार घोर युद्ध (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
स कुमारो महातेजा हनूमन्तमवस्थितम् ।
विव्याध निशितैर्बाणैः सर्वमर्मसु वानरम् ॥
हनूमानपि तं दृष्ट्वा राक्षसं युद्धदुर्मदम् ।
गृहीत्वा पर्वतशिखरं चिक्षेप परमाङ्गदे ॥
तदापतद् गिरिशिखरं दृष्ट्वा कुमारोऽतिवेगवान् ।
चिच्छेद बाणैः सङ्क्रुद्धो द्विधा तत् परमाङ्गदः ॥
तदद्भुतं महत् कर्म कुमारस्य महात्मनः ।
दृष्ट्वा हनूमान् सञ्चुकोप तदा वायुसुतः कपिः ॥
📖 भावार्थ : उस महातेजस्वी कुमार ने स्थित हनुमान को तीक्ष्ण बाणों से सब मर्मस्थानों में बींध दिया। हनुमान ने भी उस युद्धोन्मत्त राक्षस को देखकर पर्वत का शिखर उठाकर उस परम पराक्रमी पर फेंक दिया। उस पर्वतशिखर को आते देख कुमार ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर बाणों से उसे दो टुकड़े कर दिया। महात्मा कुमार के उस अद्भुत कर्म को देखकर हनुमान, वायुपुत्र, अत्यन्त क्रुद्ध हो गए।
🔍 व्याख्या : अक्षय कुमार ने अपनी अद्वितीय बाण-कला से हनुमान को विस्मित कर दिया। उसके पर्वत-शिखर के टुकड़े करने की क्षमता ने हनुमान को क्रोधित कर दिया।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
ततः प्रगृह्य महतीं शिलां पर्वतसम्भवाम् ।
चिक्षेप तरसा तस्य राक्षसस्य रथं प्रति ॥
सा शिला रथमासाद्य सहसैव महाबला ।
चूर्णयामास तं रथं साश्वं सध्वजसारथिम् ॥
ततः कुमारः सङ्क्रुद्धो रथाद् भूमिमवातरत् ।
गदां गृहीय वेगेन हनूमन्तमुपाद्रवत् ॥
तमापतन्तं वेगेन गदाहस्तमवस्थितम् ।
हनूमान् मुष्टिना क्रुद्धो जघानोरसि वीर्यवान् ॥
स हनूमत्प्रहारेण भृशं पीडितमानसः ।
पपात धरणीं त्यक्त्वा गदां वै शोणितं वमन् ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने एक विशाल पर्वतीय शिला उठाकर उस राक्षस के रथ पर फेंक दी। वह महाबला शिला रथ पर आकर तुरन्त उसे घोड़ों, ध्वज और सारथी सहित चूर्ण कर दिया। तब कुमार क्रोध में भरकर रथ से उतरा और गदा लेकर वेग से हनुमान पर धावा बोला। उसे गदा हाथ में लिए वेग से आते देख वीर हनुमान ने क्रोध में उसकी छाती पर मुष्टि प्रहार किया। हनुमान के उस प्रहार से वह अत्यन्त पीड़ित हो गया और गदा त्यागकर रक्त वमन करता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा।

💀 अक्षय कुमार का वध और राक्षस सेना का भागना (श्लोक २६-३४)

॥ श्लोक २६-३४ ॥
स भूमौ निहतः शेते मुष्टिनाभिहतो भृशम् ।
अक्षयो राक्षसः श्रीमान् हनूमता बलीयसा ॥
तं दृष्ट्वा निहतं भूमौ कुमारं राक्षसेश्वरम् ।
भयात् समन्तात् प्राद्रावन् राक्षसाः सर्वतो दिशम् ॥
हते तस्मिन् महावीर्ये कुमारे वानरेण ह ।
रावणः पुनरेवान्यान् प्रैक्षत राक्षसाधिपः ॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा हनूमान् मारुतात्मजः ।
सीतायाः सन्निकर्षार्थं चिन्तयामास वीर्यवान् ॥
📖 भावार्थ : वह श्रीमान् राक्षस अक्षय कुमार बलशाली हनुमान की मुष्टि से पीड़ित होकर पृथ्वी पर मृत पड़ा रहा। उसे धराशायी देख राक्षस सेना भयभीत होकर चारों ओर भाग गई। उस महावीर्य कुमार के हनुमान द्वारा मारे जाने पर रावण ने पुनः अन्य राक्षसों को भेजने का विचार किया। तब हनुमान ने मन में सोचा कि सीता के निकट पहुँचने का अवसर अब आया है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार सैंतालीसवें सर्ग में रावण के पुत्र अक्षय कुमार का वध और राक्षस सेना का पलायन वर्णित है। हनुमान अब सीता की खोज में पुनः तत्पर होते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚡ हनुमान का अप्रतिम बल

इस सर्ग में हनुमान के शारीरिक बल एवं आत्मबल का उत्कृष्ट प्रदर्शन है। वे राक्षस कुमार जैसे युवा योद्धा को मात्र मुष्टि प्रहार से परास्त कर देते हैं।

🎯 अक्षय कुमार की वीरता

अक्षय कुमार ने युद्ध में अद्भुत शौर्य दिखाया। उसने पर्वत शिखर को बाणों से चूर-चूर कर दिया और अंत तक डटा रहा। उसका बलिदान राक्षस वंश के गौरव को दर्शाता है।

🧭 रावण का अहंकार

रावण ने अपने पुत्र को भेजकर यह सोचा कि हनुमान सहज ही मारा जाएगा, किन्तु उसके पुत्र के वध से उसका अहंकार चूर-चूर हो जाता है। यह रावण के पतन की दिशा में पहला बड़ा संकेत है।

🌿 सीता की खोज की ओर

युद्ध की समाप्ति पर हनुमान पुनः सीता की खोज में लग जाते हैं, जो उनके ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा को प्रदर्शित करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा वीर वही है जो अपने कर्तव्यपथ पर अडिग रहे। हनुमान ने युद्ध के बाद भी अपने मूल उद्देश्य – सीता की खोज – को नहीं भुलाया। हमें भी जीवन में आने वाली बाधाओं को पार करते हुए अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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