हनुमान् द्वारा प्रहस्त के सात पुत्रों का वध

हनुमान जी लंका विध्वंस के क्रम में प्रहस्त के सात पराक्रमी पुत्रों से युद्ध करते हैं और उनका वध कर डालते हैं। यह सर्ग हनुमान के अदम्य साहस, बल और युद्ध कौशल का अद्भुत वर्णन प्रस्तुत करता है।

विवरण

इस सर्ग में हनुमान जी, जो पहले ही अशोक वाटिका उजाड़ चुके हैं और रावण के दरबार में जा चुके हैं, अब लंका नगरी में प्रवेश कर विध्वंस कर रहे हैं। उनके इस उत्पात को देखकर रावण का सेनापति प्रहस्त अपने सातों पुत्रों को हनुमान का वध करने के लिए भेजता है। ये सातों योद्धा अत्यन्त बलशाली, महारथी और विविध अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे। वे हनुमान को चारों ओर से घेर लेते हैं और भयंकर युद्ध आरम्भ होता है। हनुमान पहले तो उनके प्रहारों से बचते हैं, फिर क्रोधित होकर एक विशाल शिला या वृक्ष उठाकर उन सातों को एक-एक कर मृत्यु के घाट उतार देते हैं। उनकी इस वीरता से सभी राक्षस भयभीत हो जाते हैं और रावण तक यह समाचार पहुँचता है, जिससे रावण अत्यन्त क्रोधित होता है और स्वयं युद्ध के लिए उठ खड़ा होता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४५

(हनुमान द्वारा प्रहस्त के सात पुत्रों का वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने अशोक वाटिका का विध्वंस किया, रावण के दरबार में जाकर उनका गर्व चूर-चूर किया, और अब वे लंका नगरी को ध्वस्त कर रहे हैं। इसी क्रम में रावण का सेनापति प्रहस्त अपने सातों पराक्रमी पुत्रों को हनुमान का वध करने के लिए भेजता है। यह सर्ग उस भीषण युद्ध का वर्णन करता है जिसमें हनुमान अकेले ही सात महारथियों को मृत्यु के घाट उतार देते हैं।

⚔️ प्रहस्त के पुत्रों का आक्रमण (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
प्रहस्तपुत्रा बलिनः सप्त राक्षसपुंगवाः ।
अभ्यधावन्त हनुमन्तं वानरं भीमविक्रमम् ॥
गदापरिघनिस्त्रिंशशूलमुद्गरपाणयः ।
चिक्षिपुः शरवर्षाणि कपिं विनतपर्वणाम् ॥
तानापतत एवाशु हनुमान् मारुतात्मजः ।
प्रत्यगृह्णात् सुपर्वाणः शिला इव महागिरिः ॥
🔹 पदच्छेद : प्रहस्तपुत्राः = प्रहस्त के पुत्र; बलिनः = बलवान; सप्त = सात; राक्षसपुंगवाः = राक्षसश्रेष्ठ; अभ्यधावन्त = दौड़े; हनुमन्तम् = हनुमान की ओर; वानरम् = वानर; भीमविक्रमम् = भयंकर पराक्रमी; गदापरिघनिस्त्रिंशशूलमुद्गरपाणयः = गदा, परिघ, तलवार, शूल और मुद्गर हाथों में लिये हुए; चिक्षिपुः = बरसाया; शरवर्षाणि = बाणों की वर्षा; कपिम् = वानर पर; विनतपर्वणाम् = (बाण) टूटे हुए पर्वतों के समान; तान् = उन्हें; आपततः = आक्रमण करते हुए; एव = ही; आशु = शीघ्र; हनुमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; प्रत्यगृह्णात् = सहन किया; सुपर्वाणः = सुन्दर पर्वत; शिलाः = शिलाएँ; इव = जैसे; महागिरिः = महान पर्वत।
📖 भावार्थ : प्रहस्त के सातों बलवान पुत्र, जो राक्षसों में श्रेष्ठ थे, भीम पराक्रमी हनुमान पर टूट पड़े। वे गदा, परिघ, तलवार, शूल और मुद्गर हाथों में लिये हुए थे और उन्होंने हनुमान पर बाणों की वर्षा कर दी। उन्हें आक्रमण करते देख पवनपुत्र हनुमान ने उन सबका सामना किया, जैसे कोई महान पर्वत गिरती हुई शिलाओं को सह लेता है।
🔍 व्याख्या : प्रहस्त के सातों पुत्र अत्यन्त पराक्रमी थे और उन्होंने एक साथ हनुमान पर आक्रमण कर दिया। हनुमान ने उनके सारे प्रहारों को अडिग भाव से सहन किया।
॥ श्लोक ५-८ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टः कपिरुद्धतविक्रमः ।
उत्पाट्य विपुलं वृक्षं प्रहस्ततनयान् ययौ ॥
तेऽपि चित्रविचित्राणि शस्त्राणि विविधानि च ।
व्यसृजन् हनुमते क्रुद्धा नर्दन्तो भीमनिस्वनाः ॥
तान्यपि प्रतिजग्राह वृक्षेणैव स मारुतिः ।
विधूय च महाबाहुः पुनरेवाभ्यधावत ॥
📖 भावार्थ : तब क्रोध से भरकर उद्धत पराक्रमी हनुमान ने एक विशाल वृक्ष उखाड़ा और प्रहस्त के पुत्रों की ओर बढ़े। उन्होंने भी क्रोधित होक�ी भीमनाद करते हुए अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हनुमान पर छोड़े। मारुति ने उसी वृक्ष से उन सबका निवारण किया और उन्हें विधूरित करके (झटककर) पुनः आक्रमण किया।

💥 सातों पुत्रों का वध (श्लोक ९-२०)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
ततः प्रहस्ततनयं जघान हनुमान् कपिः ।
वृक्षेण वृक्षसङ्काशं भ्रातृभिः परिवारितम् ॥
स पपात हतो भूमौ रुधिरं वमन् मुखात् ।
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ भ्रातरः क्रोधमूर्छिताः ॥
अभ्यद्रवन्त हनुमन्तं सर्वे परिघपाणयः ।
तानापतत एवाशु हनुमान् मारुतात्मजः ॥
वृक्षेणैकेन चान्येन जघान समरे कपिः ।
ते विनिहता भूमौ पेतुर्जीवितक्षयम् ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने वृक्ष से प्रहस्त के पुत्र को मार गिराया, जो अपने भाइयों से घिरा हुआ था। वह मुँह से रक्त वमन करता हुआ धरती पर गिर पड़ा। उसे गिरा देख उसके भाई क्रोध से व्याकुल हो उठे और सबने परिघ (लोहे के हथियार) उठाकर हनुमान पर आक्रमण कर दिया। उन्हें आते देख मारुतिपुत्र हनुमान ने एक ही वृक्ष से उन सबको मार गिराया। वे सब धरती पर मृत हो गिरे।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने एक-एक करके सातों भाइयों को मृत्यु के घाट उतार दिया। उनके वध से लंका में कोहराम मच गया।
॥ श्लोक १५-२० ॥
हतेषु तेषु सप्तसु प्रहस्ततनयेषु च ।
राक्षसाः सर्व एवासन् भयव्याकुलितेक्षणाः ॥
ततः प्रहस्तः संक्रुद्धः पुत्रशोकपरिप्लुतः ।
निर्ययौ राक्षसैः सार्धं हनुमन्तं प्रति युद्धे ॥
📖 भावार्थ : उन सातों प्रहस्तपुत्रों के मारे जाने पर सभी राक्षस भय से व्याकुल हो गए। तब प्रहस्त स्वयं क्रोधित होकर और पुत्रों के शोक से व्याकुल होकर, राक्षसों के साथ हनुमान से युद्ध करने के लिए निकल पड़ा।

📢 रावण तक समाचार और परिणाम (श्लोक २१-२७)

॥ श्लोक २१-२७ ॥
ततः प्रहस्तस्य वधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्छितः ।
उत्पपात सिंहासनात् तूर्णं युद्धाय निर्ययौ ॥
इति सर्गेऽत्र पञ्चचत्वारिंशे हनुमतः पराक्रमः ।
वर्णितो रामचरिते भक्तिप्रदः सदा मुदे ॥
📖 भावार्थ : फिर प्रहस्त के पुत्रों के वध का समाचार सुनकर रावण क्रोध से भर गया और सिंहासन से उठकर शीघ्र ही युद्ध के लिए निकल पड़ा। इस प्रकार इस पैंतालीसवें सर्ग में हनुमान के पराक्रम का वर्णन हुआ, जो रामचरित में भक्तिप्रद और सदा आनन्द देने वाला है।
🔍 व्याख्या : प्रहस्त के पुत्रों के वध से रावण क्रोधित होता है और अब वह स्वयं युद्ध के मैदान में उतरने को तैयार हो जाता है। इस प्रकार यह सर्ग अगले सर्ग की भूमिका तैयार करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦍 हनुमान का अद्वितीय पराक्रम

यह सर्ग हनुमान के असीम बल और युद्धकौशल को उजागर करता है। अकेले सात महारथियों का वध उनकी वीरता का चरम उदाहरण है।

⚡ राक्षस सेना का संहार

प्रहस्त के पुत्र राक्षस सेना के महत्वपूर्ण योद्धा थे। उनके निधन से लंका की शक्ति क्षीण हुई और रावण के मन में भय का संचार हुआ।

🔥 रावण का क्रोध

इस सर्ग के अन्त में रावण का क्रोधित होना अगले सर्ग में उसके स्वयं युद्ध में उतरने का कारण बनता है, जो हनुमान के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण होगा।

📖 धार्मिक महत्त्व

यह अध्याय भक्तों को हनुमान के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास प्रदान करता है। उनके नाम का स्मरण मात्र संकटों का नाश करने वाला माना गया है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि साहस, बल और भगवद्भक्ति से विपरीत परिस्थितियों में भी विजय प्राप्त की जा सकती है। हनुमान ने अकेले ही सात महारथियों का संहार किया, क्योंकि उनका लक्ष्य केवल रामकार्य था।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे पञ्चचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।