रावण द्वारा जम्बुमाली को भेजना

रावण के आदेश पर जम्बुमाली हनुमान से युद्ध करने आता है, किन्तु हनुमान उसे मार डालते हैं।

विवरण

हनुमान द्वारा अशोक वाटिका के विध्वंस के बाद रावण अत्यन्त क्रोधित होता है। वह अपने मंत्रियों से कहता है कि इस वानर को पकड़कर लाया जाए। तब उसका एक मंत्रीपुत्र जम्बुमाली स्वयं युद्ध के लिए आगे आता है। रावण उसे आदेश देता है कि जाकर उस वानर को मार डालो। जम्बुमाली रथ पर सवार होकर हनुमान के सामने प्रकट होता है और उस पर बाणों की वर्षा करता है। हनुमान वृक्ष एवं पर्वत के शिखरों से उसका मुकाबला करते हैं। अन्ततः हनुमान एक विशाल शिला या वृक्ष उठाकर जम्बुमाली पर फेंकते हैं, जिससे वह मारा जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४४

(रावण द्वारा जम्बुमाली को भेजना – हनुमान द्वारा जम्बुमाली वध)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने अशोक वाटिका का विध्वंस कर दिया है। रावण इस समाचार से क्रोधित हो उठता है और अपने योद्धाओं को हनुमान को मारने के लिए भेजता है। इस सर्ग में रावण के आदेश पर जम्बुमाली नामक राक्षस युद्ध के लिए आता है और हनुमान द्वारा मारा जाता है।

🔥 रावण का क्रोध और जम्बुमाली को आदेश (श्लोक १-४)

॥ श्लोक १ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो रावणो राक्षसेश्वरः ।
उवाच वचनं घोरं जम्बुमालिनमन्तिके ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तदनन्तर; क्रोधसमाविष्टः = क्रोध से भरा हुआ; रावणः = रावण; राक्षसेश्वरः = राक्षसों का स्वामी; उवाच = बोला; वचनम् = वचन; घोरम् = भयंकर; जम्बुमालिनम् = जम्बुमाली को; अन्तिके = समीप में।
📖 भावार्थ : तब राक्षसराज रावण क्रोध से भरकर अपने समीप स्थित जम्बुमाली से भयंकर वचन बोला।
॥ श्लोक २ ॥
गच्छ जम्बुमालिन् शीघ्रं तं वानरमधामितम् ।
जहि युद्धेन विक्रम्य मम कोपं प्रशाधि च ॥
🔹 पदच्छेद : गच्छ = जाओ; जम्बुमालिन् = हे जम्बुमाली; शीघ्रम् = शीघ्र; तम् = उस; वानरम् = वानर को; अधामितम् = दुरात्मा को; जहि = मार डालो; युद्धेन = युद्ध से; विक्रम्य = पराक्रम दिखाकर; मम = मेरे; कोपम् = क्रोध को; प्रशाधि = शान्त करो; च = और।
📖 भावार्थ : हे जम्बुमाली! शीघ्र जाओ और उस दुरात्मा वानर को युद्ध में पराक्रम दिखाकर मार डालो तथा मेरे क्रोध को शान्त करो।
॥ श्लोक ३-४ ॥
इत्युक्तः स तदा राज्ञा जम्बुमाली महाबलः ।
प्रत्युवाच महाराज युद्धाय समुपस्थितः ॥
स रथेन महावेगं सम्प्रयातो महाबलः ।
ददर्श हनुमन्तं तं वानरं रणमूर्धनि ॥
🔹 पदच्छेद : इति = इस प्रकार; उक्तः = कहे गये; सः = वह; तदा = तब; राज्ञा = राजा द्वारा; जम्बुमाली = जम्बुमाली; महाबलः = महाबली; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महाराज = हे महाराज; युद्धाय = युद्ध के लिए; समुपस्थितः = तत्पर; सः = वह; रथेन = रथ से; महावेगम् = महान वेग से; सम्प्रयातः = प्रस्थान किया; महाबलः = महाबली; ददर्श = देखा; हनुमन्तम् = हनुमान को; तम् = उस; वानरम् = वानर को; रणमूर्धनि = युद्धभूमि में।
📖 भावार्थ : राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर महाबली जम्बुमाली ने उत्तर दिया, "हे महाराज! मैं युद्ध के लिए तत्पर हूँ।" फिर वह महाबली जम्बुमाली रथ पर सवार होकर महावेग से प्रस्थान कर युद्धभूमि में उस वानर हनुमान को देखा।

🏹 जम्बुमाली का हनुमान पर आक्रमण (श्लोक ५-८)

॥ श्लोक ५-६ ॥
स तं दृष्ट्वा महावीर्यं वानरं क्रोधमूर्छितः ।
ववर्ष शरवर्षेण महता राक्षसाधिपः ॥
ते शरा हनुमद्गात्रे पतिता रुधिराप्लुताः ।
न व्यथां जनयामासुः पुष्पवर्षमिवाचले ॥
🔹 पदच्छेद : सः = उसने; तम् = उस; दृष्ट्वा = देखकर; महावीर्यम् = महावीर्य; वानरम् = वानर को; क्रोधमूर्छितः = क्रोध से मूर्छित होकर; ववर्ष = बरसाया; शरवर्षेण = बाणों की वर्षा से; महता = महान; राक्षसाधिपः = राक्षसराज (जम्बुमाली); ते = वे; शरा = बाण; हनुमद्गात्रे = हनुमान के शरीर पर; पतिता = गिरे; रुधिराप्लुताः = रुधिर से सने हुए; न = नहीं; व्यथाम् = पीड़ा; जनयामासुः = उत्पन्न कर सके; पुष्पवर्षम् = पुष्पवर्षा; इव = जैसे; अचले = पर्वत पर।
📖 भावार्थ : उस महावीर्य वानर को देखकर क्रोध से मूर्छित होकर जम्बुमाली ने बाणों की महान वर्षा की। वे बाण हनुमान के शरीर पर गिरे और रुधिर से सन गए, किन्तु उन्होंने पर्वत पर पुष्पवर्षा के समान कोई पीड़ा उत्पन्न नहीं की।
॥ श्लोक ७-८ ॥
ततः क्रुद्धो हनुमान् वीरः प्रगृह्य विपुलं शिलाम् ।
चिक्षेप तरसा तस्य रथस्योपरि वीर्यवान् ॥
सा शिला निहता तेन रथं साश्वं ससारथिम् ।
पोथयामास वेगेन जम्बुमालिं च राक्षसम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; क्रुद्धः = क्रोधित; हनुमान् = हनुमान; वीरः = वीर; प्रगृह्य = उठाकर; विपुलम् = विशाल; शिलाम् = शिला को; चिक्षेप = फेंका; तरसा = वेग से; तस्य = उसके; रथस्य = रथ के; उपरि = ऊपर; वीर्यवान् = पराक्रमी; सा = वह; शिला = शिला; निहता = फेंकी गयी; तेन = उसके द्वारा; रथम् = रथ को; साश्वम् = घोड़ों सहित; ससारथिम् = सारथि सहित; पोथयामास = चूर-चूर कर दिया; वेगेन = वेग से; जम्बुमालिम् = जम्बुमाली को; च = और; राक्षसम् = राक्षस को।
📖 भावार्थ : तब क्रोधित हुए वीर पराक्रमी हनुमान ने एक विशाल शिला उठाकर वेग से उसके रथ के ऊपर फेंक दी। उनके द्वारा फेंकी गयी वह शिला घोड़ों और सारथि सहित रथ को चूर-चूर कर देती है और जम्बुमाली राक्षस को भी वेग से कुचल डालती है।

💥 हनुमान द्वारा जम्बुमाली का वध (श्लोक ९-१४)

॥ श्लोक ९-१० ॥
हताश्वात् रथात् तूर्णं पपात धरणीतले ।
जम्बुमाली महावीर्यो निहतो वानरेण ह ॥
तं दृष्ट्वा निहतं भूमौ राक्षसा भयमोहिताः ।
प्राद्रवन्त दिशः सर्वा हनुमद्बलपीडिताः ॥
🔹 पदच्छेद : हताश्वात् = मरे हुए घोड़ों वाले; रथात् = रथ से; तूर्णम् = शीघ्र; पपात = गिरा; धरणीतले = भूमि पर; जम्बुमाली = जम्बुमाली; महावीर्यः = महावीर्य; निहतः = मारा गया; वानरेण = वानर द्वारा; ह = निश्चय; तम् = उसको; दृष्ट्वा = देखकर; निहतम् = मारा गया; भूमौ = भूमि पर; राक्षसाः = राक्षस; भयमोहिताः = भय से मोहित; प्राद्रवन्त = भाग गये; दिशः = दिशाओं में; सर्वाः = सभी; हनुमद्बलपीडिताः = हनुमान के बल से पीड़ित हो।
📖 भावार्थ : मरे हुए घोड़ों वाले रथ से महावीर्य जम्बुमाली भूमि पर गिर पड़ा और वानर द्वारा मारा गया। उसे भूमि पर मारा हुआ देखकर भय से मोहित सभी राक्षस हनुमान के बल से पीड़ित होकर चारों दिशाओं में भाग गये।
॥ श्लोक ११-१४ ॥
हते तस्मिन् महावीर्ये जम्बुमालिनि राक्षसे ।
हनुमान् मारुतिर्वीरः पुनश्चिन्तापरोऽभवत् ॥
सीतायाः स दिदृक्षुस्तु रामभार्यां यशस्विनीम् ।
ततः प्रायात् महातेजा यत्र सा जनकात्मजा ॥
🔹 पदच्छेद : हते = मारे जाने पर; तस्मिन् = उस; महावीर्ये = महावीर्य; जम्बुमालिनि = जम्बुमाली; राक्षसे = राक्षस को; हनुमान् = हनुमान; मारुतिः = मारुति; वीरः = वीर; पुनः = फिर; चिन्तापरः = चिन्ता में व्यस्त; अभवत् = हुए; सीतायाः = सीता की; सः = वह; दिदृक्षुः = देखने की इच्छा रखने वाला; तु = तो; रामभार्याम् = राम की पत्नी; यशस्विनीम् = यशस्विनी को; ततः = तदनन्तर; प्रायात् = गये; महातेजाः = महातेजस्वी; यत्र = जहाँ; सा = वह; जनकात्मजा = जनकपुत्री।
📖 भावार्थ : उस महावीर्य राक्षस जम्बुमाली के मारे जाने पर वीर मारुति हनुमान पुनः चिन्ता में व्यस्त हो गये। वे यशस्विनी रामभार्या सीता को देखने की इच्छा रखते थे, अतः महातेजस्वी हनुमान वहाँ से चल पड़े जहाँ जनकपुत्री सीता थीं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 रावण का अहंकार

यह सर्ग रावण के अहंकार और क्रोध को दर्शाता है। वह एक वानर को तुच्छ समझकर अपने योद्धा भेजता है, किन्तु उसकी शक्ति के सामने वे सब असफल हो जाते हैं।

💪 हनुमान की अजेयता

हनुमान का युद्ध में अडिग रहना और शिला से राक्षस का वध उनके असीम बल और साहस को प्रदर्शित करता है। वे भक्ति और शक्ति के अनुपम उदाहरण हैं।

⚔️ युद्ध-कौशल

हनुमान ने न केवल पर्वत-शिला से प्रहार किया, बल्कि उनकी चपलता और बल ने राक्षसों को भयभीत कर दिया। यह उनके असाधारण युद्ध-कौशल को दर्शाता है।

🌺 सीता की खोज में निरन्तरता

युद्ध के बाद भी हनुमान का ध्यान सीता की खोज पर केन्द्रित है, जो उनके समर्पण और लक्ष्य-निष्ठा को दर्शाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि क्रोध और अहंकार में किए गए कार्य विनाशकारी होते हैं, जबकि शान्ति और समर्पण से लक्ष्य की प्राप्ति होती है। हनुमान जैसे निष्ठावान सेवक अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होते।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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