हनुमान् का राक्षसों के पवित्र स्थान को नष्ट करने का विचार

सीता जी से भेंट करने के पश्चात् हनुमान जी विचार करते हैं कि अब उन्हें राक्षसों की शक्ति का परीक्षण भी करना चाहिए और सीता से पुनः भेंट का अवसर बनाना चाहिए। वे रावण के प्रिय अशोक वाटिका को नष्ट करने का निर्णय लेते हैं, जिससे राक्षस उन पर आक्रमण करें और वे उनका सामना कर सकें। यह सर्ग हनुमान की रणनीति और पराक्रम का परिचायक है।

विवरण

सीता जी से भेंट करके उन्हें राम की मुद्रिका देने और उनका समाचार लेने के बाद हनुमान जी अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु उन्होंने सोचा कि मात्र सीता का पता लगा लेना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें राक्षसों की सेना की शक्ति का भी आकलन करना था तथा रावण का सामना करने का अवसर भी चाहिए था। सीता जी ने उनसे पुनः आने का आग्रह किया था, अतः उन्होंने ऐसा कुछ करने का निश्चय किया जिससे राक्षस उनकी ओर आकर्षित हों। उन्होंने रावण की प्रिय अशोक वाटिका को उजाड़ने का विचार किया, जो राक्षसों के लिए अत्यन्त पवित्र एवं प्रिय स्थान था। हनुमान ने सोचा कि इस वाटिका के नष्ट होने से राक्षस क्रोधित होकर अवश्य आक्रमण करेंगे, जिससे वह उनकी शक्ति का मूल्यांकन कर सकेंगे और साथ ही सीता से पुनः भेंट का अवसर भी प्राप्त हो सकता है। तदनन्तर हनुमान ने विशाल रूप धारण करके वाटिका में स्थित वृक्षों, लताओं और पर्वतों को उखाड़ना और नष्ट करना प्रारम्भ कर दिया। इससे वहाँ उपस्थित राक्षसियाँ और राक्षस भयभीत हो उठे। कुछ राक्षसों ने हनुमान पर आक्रमण किया, किन्तु हनुमान ने उन्हें मार गिराया। यह समाचार जब रावण तक पहुँचा तो उसने अगले सर्गों में वर्णित युद्ध की तैयारी की। इस प्रकार इस सर्ग में हनुमान के निर्णय और उनके द्वारा वाटिका विध्वंस के प्रारम्भिक चरण का वर्णन है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४३

(हनुमान् का राक्षसों के पवित्र स्थान को नष्ट करने का विचार)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने सीता जी को खोज लिया, उन्हें राम की मुद्रिका दे दी और उनका सन्देश प्राप्त कर लिया। अब वे विचार कर रहे हैं कि आगे क्या किया जाए। वे केवल सन्देशवाहक बनकर नहीं लौटना चाहते, बल्कि राक्षसों की शक्ति का भी आकलन करना चाहते हैं और साथ ही सीता से पुनः भेंट का अवसर बनाना चाहते हैं। इसी विचार से वे रावण की प्रिय अशोक वाटिका को नष्ट करने का निश्चय करते हैं।

🤔 हनुमान का मन में विचार – निर्णय (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
सीतां दृष्ट्वा तु हनुमान् हृष्टो रामस्य वानरः ।
चिन्तयामास किं कुर्यात् किं वा कार्यमतः परम् ॥
अहं तु सीतां सम्प्राप्य रामसंदेशमेव च ।
करिष्ये किं पुनः कर्म येन स्यात्कार्यसिद्धये ॥
इयं सुरम्या रक्षोभिः पालिता नन्दनोपमा ।
वाटिका रावणस्येष्टा तां विनाश्य महाबलः ॥
ततो राक्षसमुख्यानां बलं वीर्यं च दर्शये ।
संग्रामं चापि कर्तव्यं रावणस्य बलेन ह ॥
इति संचिन्त्य हनूमान् कपिराजो महाबलः ।
प्रासादमवरुह्याशु वाटिकां प्रविवेश ह ॥
🔹 पदच्छेद : सीताम् = सीता को; दृष्ट्वा = देखकर; तु = तो; हनुमान् = हनुमान; हृष्टः = प्रसन्न; रामस्य = राम के; वानरः = वानर; चिन्तयामास = विचार करने लगे; किम् = क्या; कुर्यात् = करें; किम् = क्या; वा = अथवा; कार्यम् = करने योग्य; अतः = इसके; परम् = बाद; अहम् = मैं; तु = तो; सीताम् = सीता को; सम्प्राप्य = प्राप्त करके; रामसंदेशम् = राम का संदेश; एव = ही; च = और; करिष्ये = करूँगा; किम् = क्या; पुनः = फिर; कर्म = कार्य; येन = जिससे; स्यात् = हो; कार्यसिद्धये = कार्य की सिद्धि के लिए; इयम् = यह; सुरम्या = सुन्दर; रक्षोभिः = राक्षसों द्वारा; पालिता = पालित; नन्दनोपमा = नन्दनवन के समान; वाटिका = बगीचा; रावणस्य = रावण का; इष्टा = प्रिय; ताम् = उसे; विनाश्य = नष्ट करके; महाबलः = महाबली; ततः = तब; राक्षसमुख्यानाम् = राक्षस प्रधानों का; बलम् = बल; वीर्यम् = पराक्रम; च = भी; दर्शये = दिखाऊँ; संग्रामम् = युद्ध; च = भी; अपि = ही; कर्तव्यम् = करना चाहिए; रावणस्य = रावण के; बलेन = बल के साथ; ह = निश्चय ही; इति = इस प्रकार; संचिन्त्य = विचार करके; हनूमान् = हनुमान; कपिराजः = वानरश्रेष्ठ; महाबलः = महाबली; प्रासादम् = प्रासाद से; अवरुह्य = उतरकर; आशु = शीघ्र; वाटिकाम् = बगीचे में; प्रविवेश = प्रवेश किया; ह = ही।
📖 भावार्थ : सीता को देखकर हनुमान अत्यन्त प्रसन्न हुए, किन्तु उन्होंने विचार किया कि अब आगे क्या करना चाहिए। "मैंने सीता को ढूँढ लिया और राम का संदेश भी दे दिया। अब मुझे ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे मेरा कार्य पूर्णतः सिद्ध हो। यह सुन्दर, नन्दनवन के समान, राक्षसों द्वारा पालित यह वाटिका रावण को अत्यन्त प्रिय है। इसे नष्ट करके मैं राक्षसों के बल और पराक्रम को देखूँ, और रावण की सेना से युद्ध भी करूँ।" ऐसा विचार करके महाबली हनुमान प्रासाद से उतरे और शीघ्र ही उस वाटिका में प्रवेश कर गए।
🔍 व्याख्या : हनुमान के इस विचार में उनकी दूरदर्शिता और वीरता प्रकट होती है। वे केवल सीता का पता लगाकर संतुष्ट नहीं होना चाहते, बल्कि राक्षसों की शक्ति का भी आकलन करना चाहते हैं, जिससे आगे की रणनीति बनाने में सहायता मिले।
॥ श्लोक ७-१२ ॥
प्रविश्य च महातेजा ददर्श विविधान् द्रुमान् ।
पुष्पितान् फलसंयुक्तान् नानापक्षिगणान्वितान् ॥
ततः स वृक्षान् पातयन् गुल्मान् संचूर्णयन् बली ।
चचार स महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ॥
तेन तत्र हता रक्षः स्त्रियश्च बहवस्तदा ।
क्षणेन च विनाशाय वाटिका समपद्यत ॥
📖 भावार्थ : महातेजस्वी हनुमान ने वाटिका में प्रवेश करके अनेक प्रकार के पुष्पित-फलित वृक्षों को देखा, जो नाना प्रकार के पक्षियों से युक्त थे। तब उन्होंने वृक्षों को गिराना, झाड़ियों को तोड़ना प्रारम्भ कर दिया। उस समय वहाँ उपस्थित बहुत-सी राक्षसियाँ और राक्षस मारे गए। क्षण भर में ही वह वाटिका नष्ट होने लगी।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अपने विशाल रूप में वाटिका का विध्वंस आरम्भ किया। वृक्षों के गिरने से वहाँ उपस्थित राक्षस और राक्षसियाँ भी कुचली गईं। यह दृश्य देखकर अन्य राक्षस भयभीत होकर भागे।

💥 वाटिका विध्वंस और राक्षसों का प्रतिरोध (श्लोक १३-२७)

॥ श्लोक १३-२० ॥
ततः प्रववृते युद्धं हनूमन्तं महाबलम् ।
राक्षसाः क्रोधताम्राक्षाः परिवार्य समन्ततः ॥
केचित्तं पादपैर्जघ्नुः केचित्पर्वतमुष्टिभिः ।
केचित्तलैः प्रहारांश्च चक्रुस्ते राक्षसर्षभाः ॥
हनूमांस्तु बलोदग्रो निजघान महाबलः ।
राक्षसान् बहुसाहस्रान् वज्रेणेव महागिरीन् ॥
ते हन्यमाना हनुमता पेतुर्भूतले ।
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा विनेदुश्च सुदारुणम् ॥
📖 भावार्थ : तब महाबली हनुमान को चारों ओर से घेरकर क्रोध से लाल-लाल आँखों वाले राक्षसों ने युद्ध आरम्भ किया। कुछ ने वृक्षों से, कुछ ने पर्वत की चोटियों से, कुछ ने ताड़ों से प्रहार किया। किन्तु बल में उदग्र महाबली हनुमान ने उन हजारों राक्षसों को ऐसे मार गिराया जैसे वज्र बड़े-बड़े पर्वतों को चूर-चूर कर देता है। हनुमान द्वारा मारे जाने पर वे रुधिर से लथपथ होकर भूमि पर गिरे और भयंकर चीत्कार किया।
🔍 व्याख्या : यहाँ हनुमान के अदम्य पराक्रम का वर्णन है। वे अकेले ही सैकड़ों राक्षसों को मार गिराते हैं, जिससे शेष राक्षस भयभीत हो जाते हैं।
॥ श्लोक २१-२७ ॥
तेषां तु निहतानां तु शब्देन महता तदा ।
प्रबुद्धा राक्षसाः सर्वे रावणस्य च पालयः ॥
ते दृष्ट्वा वानरं तत्र विक्रान्तं राक्षसेश्वराः ।
प्रेषयामासुरव्यग्राः सैन्यानि च बहूनि च ॥
हनूमांस्तु महातेजा निहत्य बलिनां वरः ।
वाटिकां च विनाश्याशु चिन्तयामास वीर्यवान् ॥
अहं निहत्य रक्षांसि वाटिकां च विनाश्य च ।
रामस्य प्रियमन्विच्छन् कृतकृत्यो भवाम्यहम् ॥
📖 भावार्थ : उन मारे गए राक्षसों के भयंकर चीत्कार से रावण के सब पहरेदार और राक्षस जाग गए। उन राक्षसों ने उस विक्रान्त वानर को देखकर तुरन्त अनेक सेनाएँ भेजीं। तब महातेजस्वी हनुमान, जो बलवानों में श्रेष्ठ थे, ने बहुत-से राक्षसों को मार डाला और वाटिका को शीघ्र ही नष्ट कर दिया। फिर वीरवर हनुमान विचार करने लगे: "राक्षसों को मारकर और वाटिका को नष्ट करके मैं राम का प्रिय करने में सफल हो गया हूँ।"

✅ हनुमान का संतोष और आगे की रणनीति (श्लोक २८-३७)

॥ श्लोक २८-३७ ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् हर्षयुक्तो वनौकसाम् ।
चकार राक्षसान् हत्वा वाटिकां च विनाश्य च ॥
ततः स रावणं द्रष्टुं कृतबुद्धिर्महाकपिः ।
प्रायाद्येनैव मार्गेण राक्षसेन्द्र निवेशनम् ॥
अन्तरिक्षचरः श्रीमान् हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्रासादमगमद् द्रष्टुं रावणं राक्षसाधिपम् ॥
इति निश्चित्य मनसा वानरो मारुतात्मजः ।
राक्षसानां बलं द्रष्टुं रावणं च महाबलः ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार विचार करके हनुमान हर्षित हुए और राक्षसों को मारकर तथा वाटिका को नष्ट करके वे अब रावण को देखने की इच्छा से, राक्षसेन्द्र के निवास स्थान की ओर चल पड़े। आकाशचारी श्रीमान् मारुतात्मज हनुमान राक्षसाधिपति रावण को देखने के लिए उसके प्रासाद की ओर गए। इस प्रकार मन में निश्चय करके वे राक्षसों के बल और रावण को देखना चाहते थे।
🔍 व्याख्या : हनुमान अब रावण से साक्षात्कार करना चाहते हैं, या कम से कम उसकी शक्ति और सैन्य सज्जा को देखना चाहते हैं। यह उनके साहस और निडरता को दर्शाता है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार तैंतालीसवें सर्ग में हनुमान ने अशोक वाटिका को नष्ट करने का निर्णय लिया, उसे क्रियान्वित किया, राक्षसों का वध किया, और अब वे रावण को देखने के लिए उत्सुक हैं। अगले सर्ग में वे रावण के दरबार में प्रवेश करेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🦸 हनुमान की रणनीति

हनुमान केवल एक सन्देशवाहक नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार भी हैं। वे जानते हैं कि शत्रु की शक्ति का आकलन किए बिना विजय संभव नहीं। इसलिए वे जानबूझकर उकसावे की कार्रवाई करते हैं।

🌳 अशोक वाटिका का प्रतीकात्मक महत्त्व

अशोक वाटिका रावण के ऐश्वर्य और अहंकार का प्रतीक है। उसका नष्ट होना रावण के पतन का सूचक है। हनुमान इस विध्वंस से राक्षसों के मनोबल को तोड़ते हैं।

⚔️ पराक्रम और धैर्य

हनुमान अकेले ही हजारों राक्षसों का सामना करते हैं और उन्हें परास्त करते हैं। यह उनके असाधारण पराक्रम और अटूट धैर्य का प्रमाण है।

🙏 सीता से पुनः भेंट की आशा

हनुमान ने यह कार्य इसलिए भी किया कि सीता ने उनसे पुनः आने का आग्रह किया था। इस प्रकार वे अपने वचन को पूरा करना चाहते हैं और सीता को आश्वस्त करना चाहते हैं कि वे सुरक्षित हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सफलता के बाद भी निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। हनुमान ने सीता को खोज लिया, किन्तु यहीं नहीं रुके। उन्होंने शत्रु की शक्ति को परखने और अपने कार्य को पूर्ण करने के लिए अतिरिक्त प्रयास किए। हमें भी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के बाद उसे सुदृढ़ करने के लिए सक्रिय रहना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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