राक्षसियों द्वारा सीता से हनुमान् के बारे में पूछताछ
हनुमान जी के विशाल रूप को देखकर और वाटिका का विध्वंस सुनकर राक्षसियाँ भयभीत होती हैं। वे सीता जी के पास आकर हनुमान के बारे में पूछताछ करती हैं और उन्हें धमकाती हैं। सीता जी उनके प्रश्नों का उत्तर देती हैं और हनुमान को राक्षस या ब्रह्मराक्षस बताकर राक्षसियों को भ्रमित करती हैं।
विवरण
अशोक वाटिका में हनुमान का विशाल रूप देखकर और वृक्षों के विनाश को देखकर राक्षसियाँ भयभीत हो जाती हैं। वे तुरंत सीता जी के पास जाती हैं और उनसे उस अद्भुत वानर (हनुमान) के बारे में पूछती हैं। राक्षसियाँ सीता जी पर आरोप लगाती हैं कि यह वानर उनके कहने पर आया है। वे सीता को डराती हैं कि यदि उन्होंने सच नहीं बताया, तो वे रावण को बता देंगी। सीता जी अत्यंत बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए उन्हें उत्तर देती हैं। वह कहती हैं कि वह नहीं जानती कि यह कौन है। हो सकता है कि यह रावण का कोई भेजा हुआ राक्षस या ब्रह्मराक्षस हो, जिसने उनकी रक्षा के लिए यह रूप धारण किया है और राक्षसियों का भ्रम दूर करने का प्रयास करती हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४२
(राक्षसियों द्वारा सीता से पूछताछ और सीता का चातुर्य)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने अशोक वाटिका का विध्वंस कर दिया है और राक्षसों का वध कर दिया है। उनके विशाल रूप को देखकर सभी राक्षसियाँ भयभीत होकर सीता जी के पास दौड़ी आती हैं। अब वे सीता जी से उस अद्भुत प्राणी के बारे में पूछेंगी, और सीता जी अपनी बुद्धि से इस संकटपूर्ण स्थिति का सामना करेंगी।
🗣️ राक्षसियों का सीता के पास आना और प्रश्न (श्लोक १-८)
विस्मिता राक्षस्यः सर्वाः सम्पेतुस्तत्र भामिनीः ॥
ताः समेत्य तु तां देवीं सीतां प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ।
का त्वं रूपेण वपुषा देवी वा यदि वा युवा ॥
किमर्थं चासि सम्प्राप्ता वनं राक्षससेवितम् ।
कस्य वा त्वं महाभागे कथयस्व यथातथम् ॥
राक्षसानां वधः केन कृतोऽयं वदतां वर ॥
तासां तद्वचनं श्रुत्वा सीता धर्मपरायणा ।
उवाच वाक्यं तत्त्वज्ञा प्रश्रितं सान्त्वपूर्वकम् ॥
नाहं जानामि तं वीरं वानरं वनचारिणम् ।
राक्षसा वा पिशाचा वा यक्षा वा भीमविक्रमाः ॥
🛡️ सीता का चातुर्य और राक्षसियों का आरोप (श्लोक ९-१८)
येनाहं परितुष्टा स्यां स वै ब्रह्मा स्वयम्भुवः ॥
एवं ब्रुवन्त्यां वैदेह्यां राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः ।
ऊचुः परुषया वाचा सीतां धर्मपरायणाम् ॥
कथं त्वं नाभिजानासि वानरं कामरूपिणम् ।
त्वया प्रेषित एवायं राक्षसान्निहतस्तव ॥
रावणाय निवेद्यैनां वक्ष्यामस्तव यत्कृतम् ॥
श्रुत्वा तासां वचः सीता भयत्रस्ता चुकोप ह ।
उवाच चैनाः संत्रस्ता धर्मज्ञा धर्मसंहितम् ॥
यदि वा वानरो ह्येष यदि वा राक्षसोऽपि वा ।
न मे दोषोऽत्र भविता धर्मो ह्यत्र विदुष्यति ॥
⚖️ सीता की धर्मनिष्ठा और राक्षसियों का निर्णय (श्लोक १९-२३)
रामेण प्रहितो वीरो ज्ञातिर्वा सचिवोऽपि वा ॥
इति संचिन्त्य मनसा सीता दुःखपरिप्लुता ।
नोवाच किंचिद्राक्षस्यः प्रतिभयानि चक्रिरे ॥
ततः सीतां परित्यज्य राक्षस्यः क्रोधमूर्च्छिताः ।
जग्मू रावणसंकाशं वक्तुं तस्य महत्कृतम् ॥
📌 सर्गान्त : इस प्रकार बयालीसवें सर्ग में सीता जी ने अपनी बुद्धि और धर्मनिष्ठा से राक्षसियों के प्रश्नों का उत्तर दिया और उन्हें भ्रमित किया। राक्षसियाँ अब रावण को सब कुछ बताने जा रही हैं, जिससे अगले सर्ग में हनुमान और रावण की भेंट का मार्ग प्रशस्त होता है।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🧠 सीता का चातुर्य (Buddhi)
इस सर्ग में सीता केवल एक धैर्यवान नारी नहीं, बल्कि एक कुशल वार्ताकार और राजनीतिज्ञ के रूप में दिखाई देती हैं। वह न तो सच छुपाती हैं और न ही झूठ बोलती हैं; वह केवल संभावनाएँ व्यक्त करके शत्रु को भ्रमित करती हैं।
📜 धर्म की रक्षा
सीता का कथन "धर्मो ह्यत्र विदुष्यति" अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह संकेत देती हैं कि किसी संकट में रक्षा पाना धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह उनकी आध्यात्मिक परिपक्वता को दर्शाता है।
👹 राक्षसियों का भय
राक्षसियों का भय और क्रोध यह दर्शाता है कि अधर्म पर धर्म की विजय का आभास होने लगा है। हनुमान के रूप ने उनके मन में असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया है।
⏭️ आगत शंका (Foreshadowing)
राक्षसियों का रावण के पास जाना आगामी संघर्ष की सूचना है। यह सर्ग हनुमान के अद्भुत कार्य और रावण के क्रोध के बीच की कड़ी है, जो अगले सर्ग में रावण-हनुमान मुठभेड़ का आधार बनता है।
🎯 शिक्षा : संकट के समय केवल शारीरिक बल ही नहीं, बुद्धि और धैर्य का प्रयोग भी आवश्यक है। सीता ने सिखाया कि कैसे वाक्चातुर्य और धर्म के प्रति अडिग आस्था से शत्रुओं को परास्त किया जा सकता है।