हनुमान् द्वारा सीता को सांत्वना देना और उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान

हनुमान जी सीता जी को राम का संदेश सुनाकर उन्हें सांत्वना देते हैं। सीता जी को आश्वस्त करने के बाद हनुमान विदाई लेते हैं और लंका दहन से पूर्व उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं।

विवरण

हनुमान जी ने सीता जी को राम की अंगूठी देकर अपनी पहचान स्थापित की और उन्हें राम का संदेश सुनाया कि वे शीघ्र ही उन्हें लेने आएंगे। सीता जी ने हनुमान को चूड़ामणि देकर राम के लिए संदेश भेजा। अब हनुमान सीता जी को आशीर्वाद देकर विदा लेते हैं। वे सोचते हैं कि लंका दहन से पूर्व उन्हें रावण की शक्ति का पता लगाना है और फिर वापस जाना है। इसलिए वे उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं जहाँ उन्हें रावण के भाई विभीषण का आश्रम मिलता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४०

(हनुमान् द्वारा सीता को सांत्वना देना और उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चत्वारिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने सीता जी से भेंट कर ली है। राम की अंगूठी देखकर और हनुमान का संदेश सुनकर सीता जी को विश्वास हो गया है कि राम शीघ्र ही उन्हें लेने आएंगे। अब हनुमान वापस लौटने की तैयारी करते हैं। इस सर्ग में हनुमान सीता जी से विदा लेते हैं और उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं।

💫 हनुमान का सीता को सांत्वना देना (श्लोक १-८)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः सीतां समाश्वास्य हनूमान् मारुतात्मजः ।
वचनं च यथान्यायं सर्वं निवेद्य च प्रभोः ॥
प्रतिपूज्य च वैदेहीं कृतकृत्यो महाकपिः ।
चकार मतिं दक्षोऽसौ प्रतिगन्तुं महाबलः ॥
सीतापि च महाभागा हनूमन्तं महाबलम् ।
उवाच वचनं काले प्राञ्जलिः प्रणता सती ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सीताम् = सीता को; समाश्वास्य = सांत्वना देकर; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; वचनम् = वचन; च = और; यथान्यायम् = यथोचित; सर्वम् = सब कुछ; निवेद्य = निवेदन करके; प्रभोः = प्रभु का; प्रतिपूज्य = सम्मान करके; च = तथा; वैदेहीम् = वैदेही का; कृतकृत्यः = कृतार्थ; महाकपिः = महान वानर; चकार = किया; मतिम् = मन; दक्षः = चतुर; असौ = वह; प्रतिगन्तुम् = लौटने की; महाबलः = महाबली; सीतापि = सीता भी; च = और; महाभागा = महाभागा; हनूमन्तम् = हनुमान को; महाबलम् = महाबली; उवाच = बोलीं; वचनम् = वचन; काले = समय पर; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; प्रणता = नम्र होकर; सती = पतिव्रता।
📖 भावार्थ : उसके बाद पवनपुत्र हनुमान ने सीता को सांत्वना दी और प्रभु राम का सब संदेश यथोचित रूप से सुना दिया। वैदेही का सम्मान करके वे कृतार्थ हो गए। तब उस चतुर महाबली हनुमान ने वापस लौटने का विचार किया। उस समय महाभागा पतिव्रता सीता भी हाथ जोड़कर महाबली हनुमान से बोलीं।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने सफलतापूर्वक अपना कार्य पूरा कर लिया था। उन्होंने सीता को राम का संदेश सुना दिया था। अब वे वापस लौटने की तैयारी कर रहे थे।
॥ श्लोक ५-८ ॥
कच्चित् ते कुशलं वीर रामे सह महाबले ।
लक्ष्मणे च महाबाहो भरते च महाबले ॥
शत्रुघ्ने च महातेजः सुग्रीवे च महाबले ।
वानरेन्द्रे महाप्राज्ञ हनूमन् वद मे प्रियम् ॥
एवमुक्तस्तु हनुमान् सीतया दीनया कपिः ।
प्रत्युवाच ततो वाक्यं सीतां प्रियहितं वचः ॥
📖 भावार्थ : "हे वीर! हे महाबाहो! क्या तुम्हारा, महाबली राम का, लक्ष्मण का, महाबली भरत का, महातेजस्वी शत्रुघ्न का, महाबली सुग्रीव का और वानरेन्द्र का कुशल तो है? हे महाप्राज्ञ हनुमन! मुझे प्रिय समाचार बताओ।" दीन सीता के ऐसा कहने पर हनुमान ने सीता को प्रिय और हितकारी वचन उत्तर में कहे।

💎 हनुमान का उत्तर और चूड़ामणि (श्लोक ९-१८)

॥ श्लोक ९-१४ ॥
कुशलं वीर सर्वेषां येषां त्वं परिपृच्छसि ।
रामस्य च विशेषेण लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥
त्वत्कृते च महाभागे राजपुत्रि यशस्विनि ।
वर्तते कुशलं सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥
इदं चूडामणिं दिव्यं भर्तुः स्नेहकृतं प्रिये ।
प्रतीच्छ वरनारीणां श्रेष्ठे भर्तुर्यशस्विनि ॥
सा तु तं प्रतिजग्राह चूडामणिमनुत्तमम् ।
हनूमता दत्तमथो सीता दीनस्वरा तदा ॥
📖 भावार्थ : "हे वीर! तुम जिनके बारे में पूछ रही हो, उन सबका कुशल है। विशेष रूप से बुद्धिमान राम और लक्ष्मण का कुशल है। हे महाभागे! हे यशस्विनी राजपुत्रि! तुम्हारे कारण सब कुशल है, इसमें संदेह नहीं। हे प्रिये! यह दिव्य चूड़ामणि पति के स्नेह से भेजी हुई है। हे वरनारियों में श्रेष्ठ! हे यशस्विनि! इसे ग्रहण करो।" तब दीन स्वर वाली सीता ने हनुमान द्वारा दिए गए उस उत्तम चूड़ामणि को ग्रहण किया।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने सीता को आश्वस्त किया कि सब कुशल है। फिर उन्होंने राम की ओर से भेजी गई चूड़ामणि सीता को सौंपी। यह वही चूड़ामणि थी जो राम ने हनुमान को पहचान के लिए दी थी।
॥ श्लोक १५-१८ ॥
तमादाय तु वैदेही मूर्ध्नि चार्थाय चैव ह ।
स्मृत्वा रामं महात्मानं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥
बाष्पसंरुद्धकण्ठी सा हनूमन्तमभाषत ।
प्रियं सर्वस्य लोकस्य पूजितं देवदानवैः ॥
प्रतिगृह्य तु तां दिव्यां सीता हृष्टा च सा तदा ।
हनूमन्तं महाप्राज्ञं पुनरेवाभ्यभाषत ॥
📖 भावार्थ : उस चूड़ामणि को लेकर वैदेही ने उसे सिर पर चढ़ाया और महात्मा राम तथा महाबली लक्ष्मण का स्मरण किया। उनके स्मरण से उनका कंठ बाष्प से भर गया। फिर वे सब लोकों के प्रिय, देव-दानवों द्वारा पूजित हनुमान से बोलीं। उस दिव्य चूड़ामणि को ग्रहण करके सीता हर्षित हुईं और फिर महाप्राज्ञ हनुमान से बोलीं।

📜 सीता का संदेश और हनुमान की विदाई (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२४ ॥
हनूमन् राममगत्वा त्वं कुशलं वद मे प्रभोः ।
सलक्ष्मणस्य वीरस्य सुग्रीवस्य च धीमतः ॥
यथा च मामिह प्राप्तां राक्षसीभिः सुरक्षिताम् ।
रावणेन हृतां दृष्ट्वा न तथा शोकमर्हति ॥
इति सीतावचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्रतस्थे उत्तरां दिशं यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥
स गत्वा ददृशे तत्र रम्यमाश्रममण्डलम् ।
विभीषणस्य धर्मात्मा यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥
📖 भावार्थ : "हे हनुमन! राम के पास जाकर तुम मेरे प्रभु को, लक्ष्मण सहित उस वीर को और बुद्धिमान सुग्रीव को मेरा कुशल समाचार कहना। और यह भी कहना कि मुझे यहाँ राक्षसियों द्वारा सुरक्षित देखकर और रावण द्वारा हरा लिए जाने पर वे उतना शोक न करें।" सीता के ये वचन सुनकर पवनपुत्र हनुमान उत्तर दिशा की ओर प्रस्थित हुए, जिधर राम और लक्ष्मण थे। आगे जाकर उन्होंने वहाँ विभीषण के रम्य आश्रममण्डल को देखा, जहाँ राम और लक्ष्मण थे।
🔍 व्याख्या : सीता ने हनुमान के माध्यम से राम को संदेश भेजा कि वे शोक न करें। हनुमान ने सीता से विदा ली और उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में उन्हें विभीषण का आश्रम मिला।
॥ श्लोक २५-२८ ॥
ततः सीतां नमस्कृत्य हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्रदक्षिणं च कृत्वा च प्रतस्थे उत्तरां दिशम् ॥
सीतापि च महाभागा हनूमन्तं महाबलम् ।
दृष्ट्वा यान्तं महाप्राज्ञा पुनः शोकमुपागमत् ॥
हनूमानपि धर्मात्मा सीतायाः प्रियकाम्यया ।
चिन्तयामास मेधावी प्रस्थितः सागरं प्रति ॥
📖 भावार्थ : तब पवनपुत्र हनुमान ने सीता को नमस्कार किया और प्रदक्षिणा करके उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान किया। महाभागा सीता ने महाबली हनुमान को जाते देखकर पुनः शोक प्राप्त किया। धर्मात्मा हनुमान भी सीता के प्रिय की कामना से, समुद्र की ओर प्रस्थित होकर, मेधावी होकर विचार करने लगे।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार चालीसवें सर्ग में हनुमान सीता से विदा लेकर उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं। अगले सर्ग में वे लंका का दहन करेंगे और फिर वापस लौटेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💝 प्रेम का प्रतीक चूड़ामणि

चूड़ामणि का आदान-प्रदान राम-सीता के अटूट प्रेम का प्रतीक है। राम ने हनुमान को यह चूड़ामणि पहचान के लिए दी थी और अब सीता इसे देखकर राम के स्नेह से सराबोर हो जाती हैं।

🙏 सीता का विश्वास

सीता का हनुमान पर पूर्ण विश्वास इस बात का प्रमाण है कि हनुमान ने अपने व्यवहार और वचनों से उनका विश्वास जीत लिया था। वे उनके माध्यम से राम को संदेश भेजती हैं।

🧭 उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान

हनुमान का उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान यह दर्शाता है कि वे सीधे वापस नहीं जा रहे, बल्कि रास्ते में विभीषण से मिलने और लंका का निरीक्षण करने की योजना बना रहे हैं।

😢 सीता का पुनः शोक

हनुमान के जाने पर सीता का पुनः शोकग्रस्त होना उनकी मानवीय भावनाओं को दर्शाता है। थोड़ी देर के लिए उन्हें सुख का अनुभव हुआ था, परंतु हनुमान के जाते ही पुनः उनका दुःख लौट आता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा सेवक वही है जो न केवल अपने स्वामी का कार्य करे, बल्कि उन सभी का ध्यान रखे जो स्वामी को प्रिय हैं। हनुमान ने सीता की भावनाओं को समझा, उन्हें सांत्वना दी और उनका संदेश राम तक पहुंचाने का वचन दिया। हमें भी दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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