हनुमान् का लंका नगरी में प्रवेश
सुन्दरकाण्ड का चतुर्थ सर्ग हनुमान के लंका नगरी में प्रवेश का वर्णन करता है। समुद्र लांघने के बाद हनुमान लंका पहुँचते हैं, रात्रि में नगरी का अवलोकन करते हैं, और रावण की समृद्धिशाली नगरी की भव्यता का वर्णन करते हैं। वे नगरी की सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण करते हैं और सीता की खोज हेतु प्रवेश करते हैं।
विवरण
समुद्र का सफलतापूर्वक लांघन करने के बाद हनुमान लंका के निकट पहुँचते हैं। वे पर्वताकार शरीर को संकुचित कर सामान्य आकार धारण कर लेते हैं और रात्रि के समय लंका नगरी में प्रवेश करते हैं। प्रवेश करते ही वे लंका की अद्भुत समृद्धि, भव्य महलों, सुव्यवस्थित मार्गों, सुरक्षा चौकियों और राक्षसों की गतिविधियों का अवलोकन करते हैं। लंका नगरी को देखकर हनुमान चकित हो जाते हैं - स्वर्ण-निर्मित प्राकार, मणियों से जड़ित द्वार, उद्यान-वाटिकाएँ, और रावण का अद्भुत राजमहल। वे सोचते हैं कि ऐसी समृद्ध नगरी का स्वामी होते हुए भी रावण ने पराई स्त्री का हरण करके अपने विनाश को निमंत्रण दे दिया है। हनुमान नगरी में प्रवेश तो कर लेते हैं, किंतु सीता को ढूँढ़ने के लिए उन्हें उचित स्थान और समय का निर्णय करना होता है। वे रात्रि में ही नगरी का भ्रमण करते हैं और प्रातः काल सीता की खोज करने का निश्चय करते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४
(हनुमान का लंका नगरी में प्रवेश – नगर अवलोकन)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान ने समुद्र के उस पार लंका के तट पर पदार्पण किया। सौ योजन के विशाल समुद्र को लाँघकर वे अब लंका की सीमा में हैं। किंतु सीता की खोज अभी शेष है। इससे पूर्व कि वे नगरी में प्रवेश करें, उन्हें लंका की भौगोलिक स्थिति, सुरक्षा-व्यवस्था और रावण के राजमहल का ज्ञान होना आवश्यक है। यह सर्ग उसी नगर-निरीक्षण और हनुमान के प्रवेश की कथा कहता है।
🏝️ लंका में प्रवेश और प्रथम दृश्य (श्लोक १-१२)
ददर्श लङ्कां विस्तीर्णां राक्षसाधिपतिं पुरीम् ॥
रक्षितां राक्षसैर्घोरैः सर्वतो भीमदर्शनैः ।
नानाप्रहरणैर्घोरैर्नित्यमत्तैर्महाबलैः ॥
तां पुरीं स महातेजा ददर्श हरियूथपः ।
रम्यां नगरसम्बाधां रावणेन सुरक्षिताम् ॥
तस्यास्तु रूपं दृष्ट्वा स मुमुदे हरियूथपः ।
अमन्यत च धर्मात्मा प्राप्तकालमिदं वचः ॥
रूपमस्याः समृद्धं च दृष्ट्वा हनुमान् कपिः ।
चिन्तयामास मेधावी लङ्कायाः परिरक्षणम् ॥
चिन्तयामास मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ॥
यदि मे न भवेद् बुद्धिः सीतादर्शनकारिका ।
न शक्या राक्षसी माया मया ज्ञातुं कथंचन ॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो त्वस्याः सुरक्षणम् ।
न ह्यत्र सीता दृश्येत यदि रक्षां न कुर्वते ॥
इति सञ्चिन्त्य मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ।
ददर्श विविधान् देशान् लङ्कायाः परितः स्थितान् ॥
उद्यानानि विचित्राणि प्रासादांश्च महान्ति च ।
रथ्याश्च राजमार्गांश्च ददर्श हरियूथपः ॥
ततः प्रविश्य नगरीं रावणस्य महात्मनः ।
ददर्श विविधान् भावान् हनुमान् कपिकुञ्जरः ॥
🏰 लंका का सौन्दर्य और रावण का महल (श्लोक १३-३२)
गृहाणि च महार्हाणि प्रासादांश्च महाधनान् ॥
ददर्श तत्र लङ्कायां राक्षसाधिपतेः पुरीम् ।
रावणस्य गृहान् रम्यान् नानारत्नविभूषितान् ॥
स तु दृष्ट्वा पुरीं लङ्कां राक्षसाधिपतेः पुरीम् ।
अचिन्तयत् कपिश्रेष्ठो हनुमान् मारुतात्मजः ॥
इयं सा नलिनी रम्या नानापुष्पोपशोभिता ।
नानाविहगसङ्घुष्टा नानाद्रुमलतायुता ॥
नलिनी नाम विख्याता लङ्काया दक्षिणे पुरः ।
रावणेन सुविहिता क्रीडार्थं राजवेश्मनि ॥
तस्यां राक्षसपत्न्यश्च राक्षसाश्च सहस्रशः ।
नित्यं क्रीडन्ति पानेषु भक्ष्यभोज्येषु चैव ह ॥
तस्यां सीता जनस्थानाद् रावणेन हृता बलात् ।
आनीता चैव लङ्कायां रक्ष्यते राक्षसीगणैः ॥
रावणस्य गृहान् रम्यान् नानारत्नविभूषितान् ॥
तत्रापश्यन्महातेजा हनुमान् मारुतात्मजः ।
राक्षसेन्द्रगृहं रम्यं सर्वतः परिचोदितम् ॥
स तु दृष्ट्वा गृहं रम्यं रावणस्य महात्मनः ।
अचिन्तयत् कपिश्रेष्ठो हनुमान् मारुतात्मजः ॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो त्वस्याः सुरक्षणम् ।
यदि रक्षां न कुर्वन्ति राक्षसा भीमविक्रमाः ॥
न ह्यत्र सीता दृश्येत यदि रक्षां न कुर्वते ।
इति सञ्चिन्त्य मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ॥
ददर्श विविधान् देशान् लङ्कायाः परितः स्थितान् ।
उद्यानानि विचित्राणि प्रासादांश्च महान्ति च ॥
🌙 रात्रि में खोज का निश्चय (श्लोक ३३-५२)
चिन्तयामास मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ॥
रात्रौ यदि चरेयं वै लङ्कायां राक्षसीपुरीम् ।
सीतां द्रक्ष्यामि वैदेहीं रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो त्वस्याः सुरक्षणम् ।
न ह्यत्र सीता दृश्येत यदि रक्षां न कुर्वते ॥
इति सञ्चिन्त्य मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ।
प्रविवेश पुरीं लङ्कां रात्रौ राक्षससंकुलाम् ॥
स प्रविश्य पुरीं लङ्कां रात्रौ राक्षससंकुलाम् ।
ददर्श विविधान् देशान् लङ्कायाः परितः स्थितान् ॥
उद्यानानि विचित्राणि प्रासादांश्च महान्ति च ।
रथ्याश्च राजमार्गांश्च ददर्श हरियूथपः ॥
ददर्श तत्र लङ्कायां राक्षसेन्द्रनिवेशनम् ।
रावणस्य गृहान् रम्यान् नानारत्नविभूषितान् ॥
राक्षसेन्द्रगृहं रम्यं सर्वतः परिचोदितम् ॥
स तु दृष्ट्वा गृहं रम्यं रावणस्य महात्मनः ।
अचिन्तयत् कपिश्रेष्ठो हनुमान् मारुतात्मजः ॥
इमे नूनं सुरेशस्य निवेशः सदृशः प्रभोः ।
युक्तः खलु महेन्द्रेण रावणस्य निवेशनः ॥
नूनं रावणमासाद्य सीता जनकनन्दिनी ।
न भविष्यति दुःखार्ता राघवस्य प्रिया सती ॥
एवं विचिन्त्य मेधावी हनुमान् मारुतात्मजः ।
तूष्णीमास्ते महातेजा रात्रौ तत्र स काननः ॥
ततः सीतां परिश्रान्तो नापश्यत् स महाकपिः ।
अथ तस्याग्रतः सीता ददृशे जनकात्मजा ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् प्रीतो मनसा समकल्पयत् ।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🌉 समुद्र लांघन के बाद
यह सर्ग हनुमान के समुद्र लांघन की सफलता के बाद का प्रथम चरण है। यहाँ हनुमान की चिन्तनशीलता और रणनीतिक कुशलता दिखती है। वे सीधे सीता की खोज में नहीं जाते, बल्कि पूरी लंका का भ्रमण कर, उसकी सुरक्षा-व्यवस्था का जायजा लेते हैं।
🏛️ लंका का वास्तुशिल्प वर्णन
लंका का यह वर्णन उस समय की नगर-योजना, वास्तुकला और समृद्धि का अद्भुत चित्रण है। स्वर्ण-निर्मित प्राकार, मणियों से जड़ित द्वार, सुव्यवस्थित मार्ग, और रावण का भव्य महल - यह सब दर्शाता है कि रावण केवल एक शक्तिशाली राजा ही नहीं, बल्कि एक समृद्ध और सुव्यवस्थित साम्राज्य का स्वामी भी था।
🧠 हनुमान की बुद्धिमत्ता
हनुमान यहाँ केवल वीर ही नहीं, बल्कि अत्यन्त बुद्धिमान भी दिखते हैं। वे रात्रि में खोज का निर्णय लेते हैं, जिससे उनके पहचाने जाने की संभावना कम हो जाती है। वे पूरी नगरी का निरीक्षण करते हैं, प्रत्येक महत्वपूर्ण स्थान को नोट करते हैं, और तभी सीता की खोज का निश्चय करते हैं।
⚖️ रावण के पतन का बीज
हनुमान के चिन्तन में एक महत्वपूर्ण बात आती है - इतनी समृद्ध नगरी और इतने वैभव का स्वामी होते हुए भी रावण ने पराई स्त्री का हरण करके अपने विनाश को निमंत्रण दे दिया है। यह नैतिक पतन का सूचक है कि वैभव और शक्ति का दुरुपयोग अन्ततः पतन का कारण बनता है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी कठिन कार्य को करने से पूर्व उसकी पूरी जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए और रणनीति बनानी चाहिए। हनुमान ने सीधे सीता की खोज आरम्भ नहीं की, बल्कि पूरी लंका का अध्ययन किया। हमें भी जीवन में किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को करने से पूर्व उसकी सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करके ही आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही, यह भी सीख मिलती है कि वैभव और शक्ति का सदुपयोग ही उचित है - दुरुपयोग विनाश का कारण बनता है।