हनुमान द्वारा सीता को राम की अंगूठी देना

अशोक वाटिका में सीता का पता लगाने के बाद, हनुमान विनम्र भाव से उनके समीप जाते हैं। वे अपना परिचय देते हैं, राम की कुशलता बताते हैं और विश्वास दिलाने के लिए राम की अंगूठी सीता को सौंपते हैं। सीता अंगूठी देखकर अत्यंत प्रसन्न होती हैं और हनुमान को आशीर्वाद देती हैं।

विवरण

हनुमान जी ने सीता को अशोक वाटिका में खोज लिया। अकेले में उनसे बात करने का अवसर पाकर वे अत्यंत विनम्रता और सावधानी से सीता के समीप जाते हैं। वे सीता को आश्वस्त करते हैं कि वे राम के दूत हैं और उनका कल्याण चाहते हैं। सीता पहले हनुमान को राक्षस समझकर भयभीत होती हैं, किंतु जब हनुमान राम के गुणों और उनके सुख-दुःख का वर्णन करते हैं, तो उन्हें विश्वास होने लगता है। अंत में हनुमान राम की अंगूठी प्रस्तुत करते हैं, जिसे देखकर सीता का हृदय गद्गद हो जाता है। वे हनुमान को आशीर्वाद देती हैं और राम के कुशलक्षेम के समाचार सुनकर धैर्य बंधाती हैं। हनुमान सीता को सांत्वना देते हैं और राम के आने का आश्वासन देकर विदा होते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ३६

(हनुमान द्वारा सीता को राम की अंगूठी प्रदान करना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षट्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने अशोक वाटिका में सीता को खोज लिया। अब वे उनसे बातचीत करना चाहते हैं, किन्तु सीता के भय को दूर करते हुए अपना परिचय देना आवश्यक है। इस सर्ग में हनुमान अत्यंत विनम्रता और कुशलता से सीता का विश्वास जीतते हैं और राम की अंगूठी देकर अपनी सत्यता सिद्ध करते हैं।

🌿 अशोक वाटिका में हनुमान-सीता संवाद (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रववृते वाक्यं वैदेही प्रति हर्षयन् ।
हनूमान् मारुतिर्वीरो रामस्य प्रियकाम्यया ॥
स तु दृष्ट्वा तथा सीतां राक्षसीभिः समावृताम् ।
अशोकवनिकामध्ये शोकसागरसंप्लुताम् ॥
उपसर्पत धर्मज्ञो हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा वचनं चेदमब्रवीत् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रववृते = प्रारंभ किया; वाक्यम् = वचन; वैदेहीम् = वैदेही सीता के प्रति; हर्षयन् = हर्षित करते हुए; हनूमान् = हनुमान; मारुतिः = मारुति; वीरः = वीर; रामस्य = राम के; प्रियकाम्यया = प्रिय करने की इच्छा से; सः = वे; तु = तो; दृष्ट्वा = देखकर; तथा = उस प्रकार; सीताम् = सीता को; राक्षसीभिः = राक्षसियों द्वारा; समावृताम् = घिरी हुई; अशोकवनिकामध्ये = अशोक वाटिका के बीच; शोकसागरसंप्लुताम् = शोकसागर में डूबी हुई; उपसर्पत = समीप गए; धर्मज्ञः = धर्मज्ञ; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; प्रयतः = विनम्र; भूत्वा = होकर; वचनम् = वचन; च = और; इदम् = यह; अब्रवीत् = बोले।
📖 भावार्थ : तब वीर पवनपुत्र हनुमान ने राम का प्रिय करने की इच्छा से सीता को हर्षित करने वाला वचन कहना प्रारंभ किया। उन्होंने सीता को राक्षसियों से घिरी, अशोक वाटिका के बीच शोकसागर में डूबी देखकर, धर्मज्ञ हनुमान हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक उनके समीप गए और यह वचन बोले।
🔍 व्याख्या : हनुमान सीता की दयनीय दशा देखकर अत्यंत द्रवित हुए, किन्तु धैर्य रखते हुए उनसे बातचीत आरंभ की।
॥ श्लोक ५-१० ॥
या त्वं शोचसि कल्याणि रामं दशरथात्मजम् ।
स त्वां शोचति वैदेहि सभार्य इति मे मतिः ॥
तस्य त्वमसि कल्याणि ध्रुवं प्राणैः प्रियेति च ।
न हि त्वां प्राप्य वैदेहि रामः शोचितुमर्हति ॥
📖 भावार्थ : हे कल्याणि! तुम जिस राम के लिए शोक कर रही हो, वे दशरथ के पुत्र तुम्हारे लिए शोक कर रहे हैं। मेरी समझ में वे सभार्य (तुम्हारे सहित) हैं। हे वैदेहि! तुम निश्चय ही उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय हो। हे वैदेहि! तुम्हें पाकर राम को शोक नहीं करना चाहिए।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने सीता को आश्वस्त किया कि राम उनके वियोग में दुखी हैं, और वे उनसे अत्यंत प्रेम करते हैं।

💍 हनुमान का आत्म-परिचय और अंगूठी प्रदान (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१६ ॥
रामस्याहं हरीशस्य सचिवो मारुतात्मजः ।
हनूमान्नाम विक्रान्तः समुद्रं पर्वतं यथा ॥
तेन दूतो ऽहमुक्तस्त्वं यत्र क्वचन वर्तसे ।
त्वां च द्रक्ष्यामि वैदेहि रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
इदं च रामाङ्गुलीयं सुप्रीत्यर्थं प्रदीयताम् ।
जीवितेशो हि ते रामः स्निग्धं प्रोवाच लक्ष्मणम् ॥
📖 भावार्थ : "मैं राम का दूत हूँ, जो वानरराज सुग्रीव के मंत्री और पवनपुत्र हनुमान नाम से प्रसिद्ध हूँ। राम ने मुझसे कहा कि तुम जहाँ कहीं भी रहोगी, मैं तुम्हें खोजूँगा। और हे वैदेहि! राम की प्रिय महिषी तुम्हें मैंने पा लिया। यह राम की अंगूठी है, इसे प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करो। तुम्हारे प्राणेश राम ने लक्ष्मण से स्नेहपूर्वक कहा था..."
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अपना परिचय देते हुए राम की अंगूठी सीता को सौंपी, जो उनकी पहचान और सत्यता का प्रमाण थी।
॥ श्लोक १७-२५ ॥
तदङ्गुलीयकं दृष्ट्वा सीता हर्षसमन्विता ।
प्रत्यभिज्ञाय रामस्य हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥
स्वागतं ते महाबाहो धन्यास्मि यदहं त्वया ।
रामदूतेन संप्राप्ता यथा कालेन संगता ॥
अहं हि रामं जानामि धर्मज्ञं सत्यवादिनम् ।
राक्षसीभिः परिक्षिप्ता न च मे भयमस्ति ते ॥
📖 भावार्थ : उस अंगूठी को देखकर सीता हर्षित हो उठीं। राम की अंगूठी पहचानकर वे हनुमान से बोलीं: "हे महाबाहो! तुम्हारा स्वागत है। मैं धन्य हूँ कि तुम रामदूत के रूप में मुझसे मिले, मानो समय ने ही मुझे तुमसे मिलवा दिया। मैं राम को जानती हूँ, वे धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं। राक्षसियों से घिरी होने पर भी तुमसे मुझे कोई भय नहीं है।"

🙏 सीता का आशीर्वाद और हनुमान का विदा होना (श्लोक २६-३८)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
ततो हनूमतः प्रीता सीता शोकपरिप्लुता ।
उवाच परमोदारं वचनं भर्तृवत्सला ॥
अहं धन्या यदि रामो जीवति च न संशयः ।
त्वया दूतेन संप्राप्ता यदि रामः सलक्ष्मणः ॥
सुग्रीवं सह वैदेहि वानरेन्द्रमरिन्दमम् ।
ब्रूयाः प्रीतिसमायुक्तं रामं च सहलक्ष्मणम् ॥
📖 भावार्थ : तब सीता हनुमान से अत्यंत प्रसन्न हुईं, यद्यपि शोक में डूबी थीं। पति में अनुराग रखने वाली सीता ने अत्यंत उदार वचन कहे: "यदि राम जीवित हैं, और लक्ष्मण सहित सुग्रीव से मिल चुके हैं, और तुम जैसा दूत मिला है, तो मैं धन्य हूँ। हे वैदेहि! तुम वानरेन्द्र सुग्रीव और लक्ष्मण सहित राम से प्रीतिपूर्वक कहना..."
॥ श्लोक ३३-३८ ॥
इति सीतावचः श्रुत्वा हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा प्रत्युवाच महामतिः ॥
यथावदहमाख्यास्ये रामायाक्लिष्टकर्मणे ।
त्वया च निर्दिष्टमिदं सुग्रीवाय महात्मने ॥
ततो हनूमान् सीतायाः समाश्वास्य यथाविधि ।
प्रणम्य शिरसा देवीं प्रतस्थे राक्षसालयात् ॥
📖 भावार्थ : सीता के इन वचनों को सुनकर हनुमान, मारुतिपुत्र, हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक बोले: "मैं राम से सब कुछ यथावत् कहूँगा। और तुम्हारा संदेश महात्मा सुग्रीव तक पहुँचाऊँगा।" फिर हनुमान ने सीता को यथाविधि आश्वस्त किया, देवी सीता को सिर झुकाकर प्रणाम किया और राक्षसों के नगर से प्रस्थान किया।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने सीता से विदा ली और अब वे लंका दहन की योजना बनाने के लिए आगे बढ़े।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙏 विश्वास का प्रतीक

राम की अंगूठी सीता के लिए विश्वास और आशा की कुंजी बनकर आती है। यह दर्शाता है कि कैसे एक छोटी-सी निशानी भी कठिन समय में धैर्य बंधा सकती है।

🧘 हनुमान की कूटनीति

हनुमान ने पहले सीता का विश्वास जीता, फिर अंगूठी दी। उनकी वाणी और व्यवहार में अद्भुत विनम्रता और समझदारी थी, जो एक आदर्श दूत के गुण हैं।

💖 सीता का हृदय

सीता का हर्ष और आशीर्वाद यह दर्शाता है कि वे राम से कितना प्रेम करती हैं और उनके कल्याण की कामना करती हैं। उनका धैर्य और सतीत्व इस अवसर पर और निखर उठता है।

🌉 सेतु का निर्माण

यह सर्ग राम और सीता के मिलन की ओर पहला ठोस कदम है। हनुमान की सफलता आगे की कार्रवाई (लंका दहन, सेतु निर्माण, युद्ध) का मार्ग प्रशस्त करती है।

🎯 शिक्षा : सच्चा संवाद और विश्वास किसी भी संकट में सहारा बनता है। हनुमान ने सीता को केवल अंगूठी ही नहीं दी, बल्कि आशा और साहस भी प्रदान किया। हमें भी अपने जीवन में दूसरों के दुःख में संवेदना और विश्वास का सहारा बनना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे षट्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।