हनुमान् द्वारा स्वयं को राम का दूत बताना

हनुमान जी अशोक वाटिका में सीता के समीप पहुँचते हैं और उन्हें राम का दूत होने का परिचय देते हैं। सीता के संदेह करने पर वे राम की अंगूठी दिखाते हैं, जिससे सीता आश्वस्त हो जाती हैं और हनुमान से राम का समाचार पूछती हैं।

विवरण

अशोक वाटिका में सीता को खोजने के बाद, हनुमान जी एक पेड़ की शाखा पर छिपकर सीता की दशा देख रहे थे। राक्षसियों के चले जाने पर, जब सीता अकेली होती हैं, तब हनुमान एक साधु वानर का रूप धारण कर उनके समीप आते हैं। वे मधुर एवं सौम्य वाणी में सीता को संबोधित करते हैं। सीता प्रसन्न तो होती हैं, परन्तु उन्हें संदेह होता है कि कहीं यह रावण का कोई छल तो नहीं। तब हनुमान राम की अंगूठी सीता को दिखाते हैं। अंगूठी देखते ही सीता का हृदय गद्गद् हो जाता है। वे हनुमान का आदर-सत्कार करती हैं और राम-लक्ष्मण के कुशल-क्षेम की बात पूछती हैं। हनुमान उन्हें राम का दुःख, सुग्रीव से मित्रता, वानर सेना और आने वाली योजना से अवगत कराते हैं। सीता को विश्वास हो जाता है कि राम शीघ्र ही उन्हें बचाने आएँगे।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ३४

(हनुमान् द्वारा स्वयं को राम का दूत बताना – सीता से प्रथम भेंट)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : अशोक वाटिका में सीता को देखने के बाद हनुमान् एक वृक्ष की शाखा पर छिपे हुए थे। राक्षसियों के चले जाने पर, जब सीता अकेली रह गईं, हनुमान् उनके समीप आए। अब वे अपना परिचय देते हैं और राम के दूत होने का संदेश सुनाते हैं। यह सर्ग सीता-हनुमान के मधुर संवाद से भरा है, जिसमें आशा और विश्वास का संचार होता है।

🙏 हनुमान का सीता के पास आना और परिचय देना (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः सीतां समासाद्य हनूमान् मारुतात्मजः ।
उवाच वचनं धीमान् प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ॥
रामदूतोऽहमायातः सुग्रीवसचिवः कपिः ।
हनूमान् नाम भद्रं ते रामं द्रष्टुमिहागतः ॥
रामस्य त्वां प्रियां भार्यां सीते जानाति राघवः ।
तेन दुःखेन दुःखार्तस्त्वामन्वेषति सर्वतः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तदनन्तर; सीताम् = सीता को; समासाद्य = पास जाकर; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; उवाच = बोले; वचनम् = वचन; धीमान् = बुद्धिमान; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़े; प्रणतः = झुके हुए; स्थितः = खड़े होकर; रामदूतः = राम का दूत; अहम् = मैं; आयातः = आया हूँ; सुग्रीवसचिवः = सुग्रीव का मंत्री; कपिः = वानर; हनूमान् = हनुमान; नाम = नाम; भद्रम् = कल्याण हो; ते = तुम्हारा; रामम् = राम को; द्रष्टुम् = देखने; इह = यहाँ; आगतः = आया हूँ; रामस्य = राम की; त्वाम् = तुम; प्रियाम् = प्रिया; भार्याम् = पत्नी; सीते = हे सीता; जानाति = जानते हैं; राघवः = राघव; तेन = उसी; दुःखेन = दुःख से; दुःखार्तः = दुःखी; त्वाम् = तुम्हें; अन्वेषति = खोज रहे हैं; सर्वतः = सब ओर।
📖 भावार्थ : तब पवनपुत्र बुद्धिमान हनुमान सीता के पास जाकर हाथ जोड़कर, झुककर खड़े हो गए और बोले। "हे सीता, मैं राम का दूत हूँ। सुग्रीव का मंत्री वानर हनुमान नाम से विख्यात हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। मैं यहाँ राम को देखने आया हूँ। राघव तुम्हें अपनी प्रिय भार्या के रूप में जानते हैं। उसी दुःख से दुःखी होकर वे तुम्हें सब ओर खोज रहे हैं।"
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अपना परिचय स्पष्ट रूप से देते हुए सीता को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि वे राम के दूत हैं और सुग्रीव के मंत्री हैं। यह सुनकर सीता को थोड़ा विश्वास हुआ, पर फिर भी संदेह बना रहा।
॥ श्लोक ५-१० ॥
सीतोवाच –
कथं त्वं वानरो भूत्वा रामस्य प्रियमिच्छसि ।
कथं चास्य सखित्वं ते सुग्रीवेण महात्मना ॥
हनूमानुवाच –
आख्यास्यामि यथा वृत्तं रामस्यास्य महात्मनः ।
सुग्रीवेण समागमं यथा च सख्यमुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : सीता ने पूछा – "तुम वानर होकर राम का हित कैसे चाहते हो? और महात्मा सुग्रीव से तुम्हारी मित्रता कैसे हुई?" हनुमान ने उत्तर दिया – "मैं बताता हूँ कि इस महात्मा राम के साथ क्या वृत्तांत हुआ, तथा सुग्रीव से उनका समागम और उत्तम मैत्री कैसे हुई।"

💍 अंगूठी का प्रदान और सीता का विश्वास (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः स राममुद्रां वै ददौ तस्यै महाकपिः ।
अङ्गुलीयकं चेदं रामस्य विदितं तव ।
प्रत्यभिज्ञानं भद्रं ते ददामि वरवर्णिनि ॥
तदङ्गुलीयकं दृष्ट्वा सीता हर्षसमन्विता ।
अभवत् सुप्रसन्ना च विस्मयं परमं गता ॥
📖 भावार्थ : फिर महावानर हनुमान ने उन्हें राम की अंगूठी दी और कहा – "हे वरवर्णिनि, यह राम की अंगूठी है, जिसे तुम जानती हो। यह तुम्हारे लिए प्रत्यभिज्ञान (पहचान) का चिह्न है, मैं तुम्हें दे रहा हूँ। तुम्हारा कल्याण हो।" उस अंगूठी को देखकर सीता हर्ष से भर गईं, अत्यंत प्रसन्न हुईं और परम विस्मय को प्राप्त हुईं।
🔍 व्याख्या : राम की अंगूठी को देखकर सीता के सारे संदेह दूर हो गए। यह वही अंगूठी थी जो राम धारण करते थे। सीता ने पहचान लिया और हनुमान का सत्कार किया।
॥ श्लोक १६-२० ॥
सीता हनूमन्तं दृष्ट्वा प्रीत्या परमया युता ।
प्रशशंस तदा रामं सुग्रीवं च महाबलम् ॥
उवाच चैनं धर्मज्ञा रामस्य प्रियकाम्यया ।
कच्चित् कुशलमाख्याहि रामस्य विदितात्मनः ॥
📖 भावार्थ : हनुमान को देखकर सीता परम प्रेम से युक्त हो गईं और उन्होंने राम तथा महाबली सुग्रीव की प्रशंसा की। धर्मज्ञ सीता ने राम के प्रिय की इच्छा से हनुमान से कहा – "क्या विदितात्मा राम कुशल से हैं, यह बताओ।"

📜 हनुमान द्वारा राम का समाचार और सीता को आश्वस्त करना (श्लोक २१-३७)

॥ श्लोक २१-३० ॥
हनूमानुवाच –
रामः कुशली सुग्रीवो लक्ष्मणश्च महाबलः ।
त्वदर्थे प्रेषिताश्चान्ये वानराः सर्वतो दिशम् ॥
सुग्रीवसहितो रामस्त्वामन्वेषति राघवः ।
वैदेहि मा विषादं त्वं कुरु देवि सुमध्यमे ॥
न चिरादेव द्रक्ष्यसि त्वं रामं दशरथात्मजम् ।
हत्वा रावणमासाद्य सह लक्ष्मणपूर्वजम् ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने कहा – "राम, सुग्रीव और महाबली लक्ष्मण सब कुशल हैं। तुम्हारे लिए ही अन्य वानर सब दिशाओं में भेजे गए हैं। सुग्रीव सहित राघव तुम्हें खोज रहे हैं। हे वैदेही, हे देवि, तुम विषाद मत करो। शीघ्र ही तुम रावण को मारकर राम को प्राप्त करोगी, जो लक्ष्मण सहित हैं।"
॥ श्लोक ३१-३७ ॥
सीतोवाच –
स एव रामः काकुत्स्थो दाशरथिर्महाबलः ।
कच्चित् स्मरति मां देवीं पितृवच्चास्ति वर्तते ॥
हनूमानुवाच –
कथं न स्मरते रामस्त्वामनन्यपरायणः ।
त्वया हीनो हि देवि त्वं न जीवितुमिच्छति ॥
तव शोकाभिसंतप्तो दिवा रात्रौ च सुव्रते ।
प्रायश्चरति धर्मात्मा रामः सत्यपराक्रमः ॥
📖 भावार्थ : सीता ने पूछा – "क्या वे काकुत्स्थ, महाबली दाशरथि राम मुझ देवी को स्मरण करते हैं और पिता की भाँति मेरी रक्षा करते हैं?" हनुमान ने कहा – "हे देवि, जो तुम्हारे सिवा अन्य किसी में आस्था नहीं रखते, वे राम तुम्हें कैसे नहीं स्मरण करेंगे? तुम्हारे बिना वे जीना नहीं चाहते। हे सुव्रते, तुम्हारे शोक से संतप्त होकर दिन-रात धर्मात्मा सत्यपराक्रम राम घूमते हैं।"
🔍 व्याख्या : हनुमान ने राम की दशा का वर्णन कर सीता को यह विश्वास दिलाया कि राम उनके वियोग में व्याकुल हैं और शीघ्र ही उन्हें छुड़ाने आएँगे।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार हनुमान ने सीता को राम का संदेश सुनाया, उन्हें अंगूठी देकर आश्वस्त किया। सीता ने भी हनुमान के माध्यम से राम के लिए एक संदेश भेजा (जो अगले सर्ग में वर्णित है)। हनुमान अब वापसी की तैयारी करते हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💞 विश्वास और सन्देश

यह सर्ग सीता के मन में पुनः आशा का संचार करता है। हनुमान के माध्यम से राम का संदेश उनके प्रेम और निष्ठा को दर्शाता है।

🧘 हनुमान का कूटनीतिक कौशल

हनुमान ने पहले संदेह दूर करने के लिए अंगूठी दिखाई, फिर राम की दशा का मार्मिक वर्णन किया। उनका संवाद कूटनीति और करुणा का अद्भुत मिश्रण है।

📿 राम-नाम की महिमा

इस सर्ग में बार-बार राम का नाम आता है, जो सीता के लिए अमृत समान है। यह नाम ही उनका एकमात्र सहारा है।

⚓ धैर्य और आशा

सीता ने धैर्य नहीं छोड़ा; हनुमान के आगमन से उनकी आशा और दृढ़ हो गई। यह सिखाता है कि कठिन से कठिन समय में भी आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

🎯 शिक्षा : सच्चा प्रेम और धैर्य अंततः मिलन की ओर ले जाते हैं। हनुमान जैसा सेवक मिले तो कोई कार्य असंभव नहीं। सीता के समान विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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