हनुमान् को देखकर सीता का आश्चर्य

हनुमान जी अशोक वाटिका में एक वृक्ष पर छिपकर रामचरित का गान करते हैं। सीता सुनकर चकित हो जाती हैं और वृक्ष की ओर देखती हैं। हनुमान को देखकर वे पहले भयभीत होती हैं, फिर उन्हें विश्वास होता है कि यह राम का दूत है। हनुमान वृक्ष से उतरकर सीता को राम की अंगूठी दिखाते हैं और उनका परिचय देते हैं।

विवरण

हनुमान जी ने रावण के अन्तःपुर और अशोक वाटिका में सीता को देखने के बाद, उनके समीप एक वृक्ष पर आश्रय लिया। वहाँ छिपकर उन्होंने राम के पराक्रम, गुण और उनके वनगमन की कथा को सुन्दर शब्दों में गाना प्रारम्भ किया। सीता माता उस मधुर स्वर को सुनकर आश्चर्यचकित हो गईं। उन्होंने सोचा कि यह कौन है जो राम की कथा इतने प्रेम से सुना रहा है? वे वृक्ष की ओर देखती हैं और हनुमान को देखती हैं – एक वानररूपधारी। पहले तो वे भय से काँप उठीं, उन्हें लगा कि कोई राक्षस ने रूप बदलकर उन्हें धोखा देना चाहता है। किन्तु हनुमान ने धीरे से उन्हें सम्बोधित किया और अपने वानर होने का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि वे राम के दूत हैं और सुग्रीव के मित्र हैं। सीता के मन में संदेह बना रहा, इसलिए उन्होंने हनुमान से राम के गुणों और लक्षणों का वर्णन करने को कहा। हनुमान ने अत्यन्त सुन्दर रीति से राम के रूप, गुण, आचरण और शील का वर्णन किया। उनके मुख से राम की ऐसी मार्मिक झलक पाकर सीता का हृदय पिघल गया। फिर हनुमान ने राम की अंगूठी (मुद्रिका) सीता को दिखाई, जिसे देखकर सीता की सारी शंका समाप्त हो गई। उन्होंने हनुमान को आशीर्वाद दिया और राम का संदेश सुनने की उत्कंठा व्यक्त की।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ३२

(हनुमान् को देखकर सीता का आश्चर्य – सीता-हनुमान संवाद)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वात्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने रावण के अन्तःपुर में सीता को न पाकर अशोक वाटिका में उन्हें खोजा। वहाँ एक वृक्ष पर छिपकर उन्होंने राम की कथा गानी प्रारम्भ की। उस मधुर स्वर को सुनकर सीता आश्चर्यचकित हो उठीं। यह सर्ग उस अद्भुत मिलन और संवाद का वर्णन करता है, जहाँ पहली बार सीता को राम के दूत के दर्शन होते हैं।

🎭 हनुमान का रामगाथा गान – प्रथम दृश्य (श्लोक १-६)

॥ श्लोक १-३ ॥
स तु धीरो महाप्राज्ञो हनूमान् मारुतात्मजः ।
उपास्यतां तु तां रात्रिं सीतायाः पार्श्वतः स्थितः ॥
अथ तस्याः प्रियाख्यानं रामचरितसम्मितम् ।
कथयामास धर्मात्मा हनूमान् पवनात्मजः ॥
सीता तु तस्य तद्वाक्यं श्रुत्वा रामकथामृतम् ।
विस्मयोत्फुल्लनयना हनूमन्तमुदैक्षत ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; तु = तो; धीरः = धैर्यवान्; महाप्राज्ञः = महान बुद्धिमान्; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; उपास्यताम् = बिताने लगा; तु = तो; ताम् = उस; रात्रिम् = रात्रि को; सीतायाः = सीता के; पार्श्वतः = निकट; स्थितः = स्थित होकर; अथ = फिर; तस्याः = उसके लिये; प्रियाख्यानम् = प्रिय समाचार; रामचरितसम्मितम् = राम के चरित्र से युक्त; कथयामास = कहने लगा; धर्मात्मा = धर्मात्मा; हनूमान् = हनुमान; पवनात्मजः = पवनपुत्र; सीता = सीता; तु = तो; तस्य = उसके; तत् = उस; वाक्यम् = वचन को; श्रुत्वा = सुनकर; रामकथामृतम् = रामकथा रूपी अमृत को; विस्मयोत्फुल्लनयना = आश्चर्य से खिले नेत्रों वाली; हनूमन्तम् = हनुमान को; उदैक्षत = देखने लगीं।
📖 भावार्थ : वे धीर, महाप्राज्ञ, पवनपुत्र हनुमान सीता के समीप ही स्थित होकर वह रात्रि बिताने लगे। फिर उन्होंने धर्मात्मा हनुमान सीता के लिये प्रिय समाचार रूप रामचरित का वर्णन प्रारम्भ किया। उनके मुख से रामकथा रूपी अमृत सुनकर सीता के नेत्र आश्चर्य से खिल गये और वे हनुमान को देखने लगीं।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने वृक्ष पर छिपकर इतने सुन्दर ढंग से राम की कथा सुनाई कि सीता का ध्यान उस ओर खिंच गया। यह कथा सुनकर उनके मन में आश्चर्य और कौतूहल उत्पन्न हुआ।
॥ श्लोक ४-६ ॥
सा तु दृष्ट्वा ततः सीता हनूमन्तं महाबलम् ।
वृक्षस्थं वानरं भूत्वा स्वप्नोऽयं नाथ वा भवेत् ॥
इति संचिन्त्य हृदये भयत्रस्ता चमूः स्थिता ।
ददर्श च पुनस्तत्र हनूमन्तं महाबलम् ॥
ततः स रामभक्तः स हनूमान् मारुतात्मजः ।
अवतीर्य तु वृक्षाग्रात् सीतामभ्येत्य दीनवत् ॥
📖 भावार्थ : तब सीता ने महाबलशाली हनुमान को देखा जो वानर रूप धारण कर वृक्ष पर स्थित थे। वे मन में विचार करने लगीं – यह स्वप्न है या वास्तविकता? हृदय में भय से व्याकुल होकर वे चुपचाप खड़ी रहीं। फिर उन्होंने पुनः उस महाबली हनुमान को देखा। तब रामभक्त पवनपुत्र हनुमान वृक्ष के ऊपर से उतरकर दीन के समान सीता के समीप आये।

😨 सीता का भय और हनुमान का परिचय (श्लोक ७-१२)

॥ श्लोक ७-९ ॥
स तु सीतां समासाद्य प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः ।
उवाच वचनं श्लक्ष्णं हनूमान् मारुतात्मजः ॥
का त्वं शोचसि भद्रं ते रामं दशरथात्मजम् ।
कस्य वा त्वं भयाद् राज्ञो वने त्वमिह वर्तसे ॥
कथं च रामो दुःखार्ता त्वया त्यक्तो महावने ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन वद सुन्दरि ॥
📖 भावार्थ : वे हनुमान सीता के पास जाकर हाथ जोड़कर, विनम्र भाव से खड़े हो गये और उनसे मृदुल वचन बोले – “तुम कौन हो, जो शोक कर रही हो? तुम्हारा कल्याण हो। क्या तुम दशरथपुत्र राम के लिये शोक कर रही हो? अथवा किस राजा के भय से इस वन में पड़ी हुई हो? और वे राम तुम दुःखिनी को महावन में छोड़कर कैसे चले गये? यह सब मैं सुनना चाहता हूँ, सुन्दरि! सच-सच बताओ।”
🔍 व्याख्या : हनुमान जानबूझकर ऐसे प्रश्न कर रहे हैं ताकि सीता के मन का संदेह दूर हो और वे अपने आपको प्रकट करें। वे सीता की सुरक्षा का भी आश्वासन देना चाहते हैं।
॥ श्लोक १०-१२ ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सीता दुःखसमन्विता ।
हनूमन्तं ततः प्राह वृक्षस्थं वानरं तदा ॥
कस्त्वं वानर शाखायां स्थितः परमशोभनः ।
रामस्य हृदयं ज्ञात्वा मम चैव हिते रतः ॥
यदि राक्षसराजस्य रावणस्य भयावहः ।
मायया वानरो भूत्वा त्वया सम्पृच्छ्यतेऽनया ॥
📖 भावार्थ : उनके उन वचनों को सुनकर दुःख से भरी सीता ने वृक्ष पर स्थित हनुमान से कहा – “हे वानर! तुम कौन हो जो इस शाखा पर स्थित हो, अत्यन्त सुन्दर दिख रहे हो, राम के हृदय को जानने वाले और मेरे हित में रत हो? यदि तुम राक्षसराज रावण के भय से प्रेरित होकर माया से वानर बनकर मुझसे इस प्रकार पूछ रहे हो, तो यह सर्वथा उचित नहीं।”
🔍 व्याख्या : सीता को संदेह है कि कहीं यह वानर रूपधारी कोई राक्षस तो नहीं जो उन्हें धोखा देने आया है। इसलिए वे सतर्कता से पूछती हैं।

🔍 सीता का प्रश्न और हनुमान द्वारा राम का वर्णन (श्लोक १३-२०)

॥ श्लोक १३-१६ ॥
हनूमान् प्राह वैदेहीं श्रृणु देवि वचो मम ।
न राक्षसोऽहं भीरु त्वं न च माया मयी कृता ॥
रामदूतोऽहमायातस्त्वत्सकाशमनिन्दिते ।
सुग्रीवस्य सखा वीरो हनूमान्नाम वानरः ॥
यदि ते संशयो देवि रामे तस्मिन्महात्मनि ।
वक्ष्यामि ते गुणान् रामो यादृशो यद्गुणश्च सः ॥
श्रुत्वा तु हनुमद्वाक्यं सीता विस्मयमागता ।
उवाच चैनं धर्मज्ञा वद रामस्य लक्षणम् ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने वैदेही से कहा – “हे देवि! मेरा वचन सुनो। मैं राक्षस नहीं हूँ, भीरु! और न ही मैंने कोई माया रची है। हे अनिन्दिते! मैं राम का दूत बनकर तुम्हारे पास आया हूँ। मैं सुग्रीव का मित्र हूँ, नाम हनुमान और वानर हूँ। हे देवि! यदि तुम्हें उन महात्मा राम के विषय में संदेह है, तो मैं तुम्हें बताऊँगा कि राम कैसे हैं और उनमें कौन-कौन से गुण हैं।” हनुमान के वचन सुनकर सीता आश्चर्य में पड़ गईं और उनसे बोलीं – “हे धर्मज्ञ! राम के लक्षण बताओ।”
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अपना परिचय देकर सीता के संदेह को शांत करने का प्रयास किया। अब वे राम के गुणों का वर्णन करेंगे, जिससे सीता का विश्वास और दृढ़ हो।
॥ श्लोक १७-२० ॥
ततः स रामं संस्मृत्य सीतायाः समुपस्थितः ।
हनूमान् वक्तुमारेभे रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥
रामो दशरथो राजा तस्य पुत्रो महायशाः ।
ज्येष्ठः श्रीमान् धनुर्धरः सीते रामो महाबलः ॥
पद्मपत्रेक्षणः श्रीमान् पीनायतमहाभुजः ।
सर्वलक्षणसम्पन्नः सीते रामो महाबलः ॥
धर्मज्ञः सत्यवादी च प्रजाकामश्च धार्मिकः ।
सीतायाः प्रियकृद् रामः सीता प्राणैर्गरीयसी ॥
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने सीता के समक्ष राम का स्मरण किया और उन अक्लिष्टकर्मा (जिनके कार्यों में कभी क्लेश नहीं होता) राम का वर्णन करना प्रारम्भ किया – “हे सीते! राजा दशरथ थे, उनके ज्येष्ठ पुत्र, महायशस्वी, श्रीमान्, धनुर्धर, महाबली राम हैं। उनके नेत्र कमलदल के समान हैं, वे श्रीसम्पन्न हैं, उनकी भुजाएँ लम्बी और मांसल हैं, वे समस्त लक्षणों से सम्पन्न हैं। वे धर्मज्ञ, सत्यवादी, प्रजा के हितैषी और धार्मिक हैं। सीता के प्रिय करने वाले राम के लिए सीता स्वयं प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं।”
🔍 व्याख्या : हनुमान ने राम के स्वरूप का सजीव चित्र खींचा, जिसे सुनकर सीता का हृदय पिघल गया। यह वर्णन अत्यन्त मार्मिक है।

💍 अंगूठी का प्रदर्शन और सीता का विश्वास (श्लोक २१-२४)

॥ श्लोक २१-२४ ॥
इत्युक्त्वा हनुमान् वीरो मुद्रिकां रघुनन्दनः ।
दर्शयामास वैदेह्यै रामदत्तां महात्मना ॥
तां मुद्रिकां समालोक्य सीता हर्षसमन्विता ।
मेने यथा रामदूतं हनूमन्तं महाबलम् ॥
प्रहर्षमतुलं लेभे सीता दुःखातिगा तदा ।
हनूमन्तं समालिङ्ग्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥
अहो धन्योऽसि विक्रान्त यस्त्वं रामप्रियः सखा ।
रामाद् दूतः समायातो मम शोकविनाशनः ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर वीर हनुमान ने वैदेही सीता को वह अंगूठी दिखाई जो महात्मा राम ने उन्हें दी थी। उस अंगूठी को देखकर सीता हर्ष से भर गईं और उन्होंने हनुमान को सच्चा रामदूत माना। तब उन्हें असीम आनन्द प्राप्त हुआ, वे दुःख से पार हो गईं। उन्होंने हनुमान को गले लगाकर यह वचन कहे – “अहो! तुम धन्य हो, हे विक्रान्त! जो राम के प्रिय सखा हो और राम के दूत बनकर मेरे शोक का नाश करने आये हो।”
🔍 व्याख्या : अंगूठी देखते ही सीता का सारा संदेह दूर हो गया। अब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि यह वास्तव में राम का भेजा हुआ दूत है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार बत्तीसवें सर्ग में सीता और हनुमान का प्रथम साक्षात्कार तथा अंगूठी के माध्यम से विश्वास स्थापित हुआ। अब सीता उत्सुक हैं राम का संदेश सुनने को।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🧘 सीता का संदेह – एक विवेकपूर्ण सतर्कता

सीता ने हनुमान को देखकर पहले भय और संदेह किया। यह उनकी बुद्धिमत्ता और सतर्कता को दर्शाता है। रावण के अधीन होने के कारण वे किसी पर भी आसानी से विश्वास नहीं कर सकती थीं।

💬 हनुमान का वाक्चातुर्य

हनुमान ने पहले रामकथा गाकर सीता का ध्यान आकर्षित किया, फिर विनम्रतापूर्वक परिचय दिया और अंत में अंगूठी से विश्वास जमाया। उनकी वाणी में माधुर्य, तर्क और भक्ति का अद्भुत सम्मिश्रण था।

💞 राम का सजीव चित्रण

हनुमान ने राम के रूप, गुण और स्वभाव का जो वर्णन किया, वह सीता के लिए अमृतवत् था। यह वर्णन रामभक्ति की अनन्यता को उजागर करता है।

🔐 अंगूठी – प्रतीक विश्वास का

राम की अंगूठी न केवल पहचान का माध्यम बनी, बल्कि यह राम के अटूट प्रेम और अपनेपन का प्रतीक भी थी। इसने सीता के सभी संदेहों को दूर कर दिया।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चाई और सद्भावना के साथ किया गया संवाद हर संदेह को दूर कर सकता है। साथ ही, जब हम किसी के प्रति प्रेम और निष्ठा रखते हैं, तो उसका वर्णन भी उतना ही प्रभावशाली होता है। हनुमान ने राम के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और वाणी के बल पर सीता का विश्वास जीत लिया।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
इस अध्याय में अभी कोई श्लोक उपलब्ध नहीं है।