हनुमान् की दुविधा
हनुमान जी सीता से भेंट करने के बाद वापस लौटने की दुविधा में पड़ जाते हैं। वे समुद्र पार करने के लिए शक्ति संचय हेतु अरिष्ट पर्वत पर चढ़ते हैं और विशाल रूप धारण कर लौटने का निश्चय करते हैं।
विवरण
हनुमान जी ने सीता जी को अशोक वाटिका में खोज लिया, उन्हें राम की मुद्रिका दी और उनका समाचार सुना। अब वे वापस लौटने की तैयारी कर रहे थे। किन्तु उनके मन में एक दुविधा उत्पन्न हुई – क्या वे सीधे समुद्र लाँघकर चले जाएँ या पहले लंका का और अधिक निरीक्षण करें? क्या उन्हें रावण से युद्ध करना चाहिए? उन्होंने सोचा कि यदि वे बिना किसी पराक्रम के लौट गए, तो कहीं ऐसा न हो कि वानर सेना समुद्र पार करने में असमर्थ हो। अतः उन्होंने निश्चय किया कि वे एक बार फिर समुद्र पार करने का अभ्यास करें और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करें। वे अरिष्ट पर्वत पर चढ़े और विशाल रूप धारण कर समुद्र लाँघने के लिए तैयार हुए। इस प्रकार इस सर्ग में हनुमान के आत्म-संघर्ष और उनके अटल संकल्प का वर्णन है।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ३०
(हनुमान् की दुविधा – समुद्र लाँघने की तैयारी)
🔆 प्रस्तावना : सीता से भेंट करने के पश्चात् हनुमान जी के मन में विचार उठता है कि अब क्या किया जाए। वे समुद्र लाँघकर वापस लौट सकते हैं, किन्तु उन्हें यह भी सोचना है कि कहीं उनकी शक्ति क्षीण तो नहीं हो गई। यह सर्ग हनुमान के आत्म-मंथन और पुनः समुद्र लाँघने के संकल्प का वर्णन करता है।
🤔 हनुमान का चिन्तन – दुविधा (श्लोक १-१०)
चिन्तयामास धर्मात्मा किं करोमीति वानरः ॥
अहं तु समुद्रं लङ्घयित्वा लङ्कां समागतः ।
सीतां च दृष्टवान् देवीं रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
इदानीं तु कथं वीरः समुद्रं पुनरुत्सहे ।
शक्तिर्मे न परीक्षेत यथा स्यात् सुसमाहिता ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् गिरिमारुह्य चोत्तमम् ।
अरिष्टं नाम विख्यातं योजनानां शतं समम् ॥
⛰️ अरिष्ट पर्वत पर चढ़ना और विशाल रूप धारण (श्लोक ११-२५)
बभूव महतीं संध्यां प्रतीक्षन् हरियूथपः ॥
स तु वेगेन महता संनिविश्य महाबलः ।
अरिष्टं पर्वतश्रेष्ठं पदा संचूर्ण्य लीलया ॥
ततस्तु वेगमास्थाय हनूमान् मारुतात्मजः ।
चकार रूपमात्मानं महदद्भुतदर्शनम् ॥
तस्य रूपस्य महतो वेगवान् मारुतात्मजः ।
ननाद सुमहानादं दिशः शब्देन पूरयन् ॥
🚀 संकल्प और समुद्र की ओर प्रस्थान (श्लोक २६-३८)
उत्पपात महावेगो दिशं वरुणपालिताम् ॥
तस्य वेगेन महता वृक्षाः पर्वतसानवः ।
चेरुर्विक्षोभिताः सर्वे यथा वात्यासमीरिताः ॥
तं वेगवन्तं सम्प्रेक्ष्य हनूमन्तं महाकपिम् ।
प्रहृष्टमनसो देवाः सम्प्रशंसन्त सर्वशः ॥
इति संकल्प्य हनुमान् लङ्कां प्रति महायशाः ।
प्रतस्थे स महातेजाः पुनरेव महोदधिम् ॥
📌 सर्गान्त : इस प्रकार तीसवें सर्ग में हनुमान ने अपनी दुविधा का समाधान किया, अरिष्ट पर्वत पर चढ़कर विशाल रूप धारण किया और पुनः समुद्र लाँघने के लिए प्रस्थान किया। अगले सर्ग में वे समुद्र पार करके सुग्रीव और राम के पास जाएँगे।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🧠 आत्म-विश्वास और परीक्षण
हनुमान अपनी शक्ति पर संदेह नहीं करते, पर वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वे अपने कर्तव्य को पूरी क्षमता से निभा सकें। यह आत्म-परीक्षण का भाव उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है।
🌉 समुद्र लाँघने का प्रतीक
समुद्र लाँघना केवल भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि कठिनाइयों को पार करने के संकल्प का प्रतीक है। हनुमान का यह प्रयास हमें सिखाता है कि हर बाधा को पार करने के लिए मानसिक तैयारी आवश्यक है।
🙏 देवताओं की प्रशंसा
देवताओं द्वारा हनुमान की प्रशंसा यह दर्शाती है कि सच्चे भक्त और वीर को सदैव दैवीय सहायता और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
⚡ संकल्प की शक्ति
हनुमान का दृढ़ संकल्प ही उन्हें असंभव को संभव करने की शक्ति देता है। यह सर्ग हमें प्रेरित करता है कि हम भी अपने लक्ष्य के प्रति अटल रहें।
🎯 शिक्षा : जीवन में कठिन निर्णयों के समय हमें अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखना चाहिए, लेकिन उन्हें परखना भी आवश्यक है। हनुमान की तरह हमें अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।