लंका में प्रवेश और सीता की खोज
सुन्दरकाण्ड के तृतीय सर्ग में हनुमान रात्रि के समय लंका में प्रवेश करते हैं। वे रावण के भवन, नगर की शोभा और विभिन्न स्थानों का निरीक्षण करते हुए अन्ततः अशोक वाटिका में जाते हैं, जहाँ उन्हें सीता के दर्शन होते हैं।
विवरण
हनुमान, लंका के उत्तरी द्वार पर खड़े होकर, रात्रि के समय नगर में प्रवेश करने का निर्णय लेते हैं। वे अपने शरीर को अत्यन्त सूक्ष्म रूप में परिवर्तित कर लेते हैं और परकोटा लाँघकर लंका में प्रवेश कर जाते हैं। भव्य लंका नगरी को देखकर वे चकित रह जाते हैं। वहाँ की सुन्दर वास्तुकला, सोने-चाँदी के महल, विशाल द्वार और भव्य सड़कें उनका ध्यान आकर्षित करती हैं। वे विचरण करते हुए रावण के अन्तःपुर (रनिवास) में पहुँचते हैं, जहाँ रावण सोया हुआ है। उसे देखकर हनुमान क्षण भर के लिए उसे ही रावण समझने की भूल कर बैठते हैं। लेकिन फिर उन्हें याद आता है कि वे सीता की खोज में हैं, रावण की नहीं। रनिवास में सोई हुई रानियों के बीच उन्हें सीता नहीं मिलतीं। निराश होकर वे आगे बढ़ते हैं और अन्त में एक अलग वृक्ष के नीचे, मलिन वस्त्र धारण किए, ध्यानमग्न सीता को देखते हैं। वे एक पेड़ की डाल पर छिपकर उनका निरीक्षण करने लगते हैं।
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ३
(लंका में प्रवेश और सीता की खोज)
🔆 प्रस्तावना : सौ योजन का समुद्र पार करने के बाद हनुमान अब लंका के द्वार पर खड़े हैं। रात्रि का सन्नाटा है और सामने सोने की लंका अपने पूरे वैभव के साथ विराजमान है। इस सर्ग में हनुमान नगर में प्रवेश करते हैं, रावण के महल का निरीक्षण करते हैं, और अंततः अशोक वाटिका में जनक-नन्दिनी सीता के दर्शन करते हैं।
🏰 लंका प्रवेश और नगर-निरीक्षण (श्लोक १-२०)
न्यवसत्सागरोपान्ते लङ्कादर्शनकाङ्क्षया ॥
ततः सूर्योदये वीरो हनूमान्मारुतात्मजः ।
लङ्कां द्रष्टुं मनश्चक्रे रावणेन सुरक्षिताम् ॥
स प्राकारां पुरीं रम्यां गवाक्षवरशोभिताम् ।
ददर्श हनुमांस्तत्र तोरणेन सुशोभिताम् ॥
विमानैर्विविधाकारैः शुशुभे सा पुरोत्तमा ॥
नानारत्नसमाकीर्णैः प्रासादैरुपशोभिता ।
नानापक्षिगणैर्युक्ता नानापुष्पफलद्रुमैः ॥
राक्षसाधिपतेर्लङ्का रावणस्य महात्मनः ।
इन्द्रस्येवामरावती द्योतते स्म महाप्रभा ॥
👑 रावण का अन्तःपुर और रावण-दर्शन (श्लोक २१-४०)
ददर्श रावणं तत्र शयानं परमासने ॥
दीप्तजिह्वं महानागं पन्नगं भीमदर्शनम् ।
वृतं यक्षसहस्रेण पिशिताशनरक्षसाम् ॥
तं दृष्ट्वा राक्षसपतिं हनूमान्मारुतात्मजः ।
सीतामेवान्वचिन्वानो नात्र चित्रं प्रपद्यते ॥
नापश्यद् जानकीं सीतां हनूमान्मारुतात्मजः ॥
ततो निर्वेदमापन्नो हनूमान्मारुतात्मजः ।
चिन्तयामास धर्मात्मा कच्चित्सीता न दृश्यते ॥
किमहं व्यर्थयात्रः स्यां कच्चित्सीता न दृश्यते ।
इति संचिन्त्य मनसा हनूमान्मारुतात्मजः ॥
🌳 अशोक वाटिका में सीता-दर्शन (श्लोक ४१-५२)
ददर्शाशोकवाटिकाम् ॥
तत्राशोकवनं रम्यं नानाद्रुमलतायुतम् ।
ददर्श हनुमांस्तूर्णं यत्र सीता व्यवस्थिता ॥
तत्रापश्यद्धनुमान् देवीं सीतां जनकात्मजाम् ।
निराशां जीविते राज्ञः सौमित्रिमनुचिन्तयन् ॥
ध्यायन्तीमिव चात्मानं राममेवानुचिन्तयन् ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् वीरो हर्षवेगसमन्वितः ।
अश्रूणि मुमुचे नेत्रैर्दुःखाच्च बहुमानतः ॥
रामस्य महिषीं श्रेष्ठां ध्यायन्तीं राममात्मना ।
राक्षसीमध्यगां दीनां निःश्वसन्तीं पुनः पुनः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🎯 लक्ष्य के प्रति एकनिष्ठा
हनुमान रावण के महल के वैभव और उसके ऐश्वर्य से विचलित नहीं होते। उनका एकमात्र लक्ष्य सीता को खोजना है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता के लिए एकाग्रचित्त होना आवश्यक है।
💔 सीता का धैर्य
अशोक वाटिका में सीता की दशा अत्यंत दयनीय है, फिर भी वे राम का ध्यान कर रही हैं। यह पतिव्रता धर्म और आशा के अटूट स्रोत का प्रतीक है। कष्टों में भी धैर्य न खोना ही सच्ची शक्ति है।
🌑 रात्रि-गमन का महत्त्व
हनुमान द्वारा रात्रि में प्रवेश करना और सूक्ष्म रूप धारण करना यह दर्शाता है कि बुद्धिमान व्यक्ति समय और परिस्थिति के अनुसार अपनी रणनीति बनाता है।
😢 करुणा और सम्मान
हनुमान के अश्रु उनकी मानवीय संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। एक वानर होते हुए भी, वे माता सीता के प्रति अगाध श्रद्धा और करुणा रखते हैं। यही भक्ति की सर्वोच्च अवस्था है।
🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि सच्चा भक्त वह है जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने लक्ष्य पर अडिग रहे। विघ्न आएँगे, निराशा होगी, परन्तु हार नहीं माननी चाहिए। अंततः सफलता अवश्य मिलती है।