त्रिजटा का स्वप्न

हनुमान के चले जाने के बाद राक्षस्याँ सीता को धमकाती हैं। तब बुजुर्ग राक्षसी त्रिजटा अपना स्वप्न सुनाती है जिसमें राम की विजय और रावण के विनाश की भविष्यवाणी होती है। इससे सीता को आश्वासन मिलता है।

विवरण

हनुमान द्वारा सीता को राम की मुद्रिका देकर आश्वस्त करने और लंका दहन करने के बाद, वे वानरों से मिलने चले जाते हैं। सीता पुनः अशोक वाटिका में अकेली रह जाती हैं। राक्षस्याँ उन्हें और अधिक डराने-धमकाने लगती हैं। उनमें से कुछ सीता को मारने की भी बात करती हैं। उसी समय वृद्ध राक्षसी त्रिजटा, जो सीता पर दया रखती थी, उनके बीच आती है। वह अपना स्वप्न सुनाती है: उसने एक भव्य दिव्य रथ पर श्वेत वस्त्र धारण किए राम और लक्ष्मण को देखा, जो चार भुजाओं वाले विष्णु के समान प्रतीत हो रहे थे। वे चन्द्रमा और सूर्य के समान तेजस्वी थे। उसने रावण को मुण्डित (गंजा), लाल वस्त्र पहने, दक्षिण दिशा की ओर जाते देखा, और लंका के राक्षसों का संहार होता देखा। स्वप्न में विभीषण को चन्द्र-सूर्य के समान तेजस्वी और चार ब्राह्मणों द्वारा अभिषिक्त होते देखा। त्रिजटा कहती है कि यह स्वप्न निश्चित रूप से राम की विजय और रावण के विनाश का सूचक है। वह अन्य राक्षसियों को समझाती है कि वे सीता को कष्ट न दें, क्योंकि यह स्वप्न बताता है कि सीता जल्द ही राम को प्राप्त करेंगी और राक्षसों का कुल नष्ट होगा। त्रिजटा के स्वप्न से सीता को बहुत सांत्वना मिलती है और उनका धैर्य और दृढ़ हो जाता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग २७

(त्रिजटा का स्वप्न – राम-विजय का शुभ संकेत)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान द्वारा सीता को राम की मुद्रिका देकर आश्वासन देने और लंका दहन के बाद वे चले गए। अशोक वाटिका में सीता पुनः राक्षसियों के बीच अकेली पड़ गईं। राक्षस्याँ उन्हें डराने लगीं। तभे वृद्ध राक्षसी त्रिजटा ने एक अद्भुत स्वप्न देखा, जो राम की विजय और रावण के विनाश का द्योतक था। इस सर्ग में उस स्वप्न का मार्मिक वर्णन है।

👹 राक्षसियों का आतंक – त्रिजटा का प्रवेश (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-५ ॥
ततः प्रभाते विमले राक्षस्यः क्रूरदर्शनाः ।
सीतामभ्यद्रवन् सर्वाः क्रोधसंरक्तलोचनाः ॥
ताः शूलमुद्गरहस्ताः खड्गशक्तिपरश्वधाः ।
सीतां परिवृता रौद्रा वाक्यमूचुरभीषणम् ॥
एनां हत्वा नयामोऽद्य रावणस्य समीपतः ।
यदस्यामनुरक्तः स राजा राजीवलोचनः ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रभाते = प्रभात होने पर; विमले = निर्मल; राक्षस्यः = राक्षसियाँ; क्रूरदर्शनाः = क्रूर दिखने वाली; सीताम् = सीता को; अभ्यद्रवन् = दौड़कर आईं; सर्वाः = सभी; क्रोधसंरक्तलोचनाः = क्रोध से लाल-लोचन वाली; ताः = वे; शूलमुद्गरहस्ताः = हाथों में शूल और मुद्गर लिए; खड्गशक्तिपरश्वधाः = खड्ग, शक्ति और परश्वध लिए; सीताम् = सीता को; परिवृता = घेरकर; रौद्राः = भयंकर; वाक्यम् = वचन; ऊचुः = बोलीं; अभीषणम् = भयानक; एनाम् = इसको; हत्वा = मारकर; नयामः = ले चलें; अद्य = आज; रावणस्य = रावण के; समीपतः = पास; यः = जो; अस्याम् = इस पर; अनुरक्तः = अनुरक्त है; सः = वह; राजा = राजा; राजीवलोचनः = कमलनयन।
📖 भावार्थ : उसके बाद निर्मल प्रभात होने पर क्रूर दिखने वाली सभी राक्षसियाँ क्रोध से लाल-लोचन होकर सीता के पास दौड़ीं। वे हाथों में शूल, मुद्गर, खड्ग, शक्ति और परश्वध लिए भयंकर रूप धारण किए सीता को घेरकर भयानक वचन बोलीं, "इस कमलनयन राजा (रावण) की अनुरक्त सीता को आज मारकर रावण के पास ले चलें।"
🔍 व्याख्या : राक्षसियाँ सीता को धमकाती हैं, परंतु तभी बुजुर्ग त्रिजटा वहाँ आती है।

💭 त्रिजटा का स्वप्न – विजय का शुभ संकेत (श्लोक ६-२२)

॥ श्लोक ६-२२ ॥
तासां तद्वचनं श्रुत्वा त्रिजटा नाम राक्षसी ।
उवाच वचनं प्राज्ञा सीताया हितकाम्यया ॥
न हि वोऽस्ति मतिर्बालाः सीतामाहर्तुमीदृशीम् ।
शृणुत स्वप्नमाख्यास्ये यथा दृष्टो मया निशि ॥
ददर्शाहं रथं दिव्यं विमानप्रतिमं महत् ।
आस्थितौ रामलक्ष्मणौ श्वेताभ्रघनवाससौ ॥
चतुर्भुजौ शङ्खचक्रगदापद्मधरौ शुभौ ।
विष्णुसूर्यसमौ दृष्ट्वा विस्मिताहं तदाभवम् ॥
ततोऽपश्यं दशग्रीवं मुण्डं काषायवाससम् ।
दक्षिणाभिमुखं यान्तं क्षीबं माल्यविभूषितम् ॥
विभीषणं च चतुरं श्वेतचामरधारिणम् ।
चतुर्भिर्ब्राह्मणैः सार्धं यान्तमारोपितं रथम् ॥
इदं स्वप्नं मया दृष्टं रात्र्यन्ते रजनीचरे ।
अवश्यमेव सिद्ध्यन्ति यथादृष्टं न संशयः ॥
तस्मान्न बाधितव्या वै सीता रामस्य वल्लभा ।
साधु साध्वीं प्रपन्नां वै कल्याणीमसितेक्षणाम् ॥
📖 भावार्थ : उन राक्षसियों के वचन सुनकर त्रिजटा नाम की प्राज्ञ राक्षसी, जो सीता का हित चाहती थी, बोली, "बालाओ! तुम्हारी बुद्धि ऐसी नहीं है कि तुम सीता का हरण कर सको। मैं अपना स्वप्न सुनाती हूँ जो आज रात देखा। मैंने एक दिव्य रथ देखा, जो विमान के समान महान था। उस पर राम और लक्ष्मण श्वेत मेघ के समान वस्त्र धारण किए हुए थे। वे चार भुजाओं वाले, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए शुभ, विष्णु और सूर्य के समान तेजस्वी थे। उन्हें देखकर मैं चकित हो गई। फिर मैंने दशग्रीव रावण को देखा, जो मुण्डित (गंजा), काषाय वस्त्र पहने, मालाओं से विभूषित, मद में चूर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा था। और विभीषण को चतुर, श्वेत चामर धारण किए चार ब्राह्मणों के साथ रथ पर आरूढ़ देखा। हे रजनीचरो! यह स्वप्न मैंने रात्रि के अंत में देखा है। जैसा देखा है वैसा ही अवश्य सिद्ध होगा, इसमें संशय नहीं। अतः राम की वल्लभा सीता को नहीं सताना चाहिए। साधु, साध्वी, कल्याणी और सुनेत्रा सीता की रक्षा करनी चाहिए।"
🔍 व्याख्या : त्रिजटा अपने स्वप्न का वर्णन करती है, जिसमें राम-लक्ष्मण दिव्य रूप में दिखते हैं, रावण का पतन स्पष्ट होता है, और विभीषण का राज्याभिषेक। यह सीता के लिए आशा की किरण है।

🕊️ सीता का आश्वासन और राक्षसियों का शांत होना (श्लोक २३-३३)

॥ श्लोक २३-३३ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या राक्षस्या हितकारकम् ।
सीता प्रीतिमना देवी त्रिजटामिदमब्रवीत् ॥
स्वप्नस्त्वया यथादृष्टस्तथैवैतद्भविष्यति ।
राघवो हि महेष्वासो लोकैकपुरुषर्षभः ॥
ततः सा त्रिजटा प्रीता सीतामामन्त्र्य मैथिलीम् ।
उवाच राक्षसीः सर्वाः सीता नैषा वधार्हणा ॥
अहमेव प्रमाणं वो भर्तव्या भवतीरिति ।
सीता मया परित्राता न च कर्तव्यमन्यथा ॥
ताः श्रुत्वा त्रिजटावाक्यं राक्षस्यो भयमोहिताः ।
निवृत्तास्ताः सीतां हन्तुं प्रशशंसुस्त्रिजटाम् तदा ॥
📖 भावार्थ : उस राक्षसी के हितकारक वचन सुनकर देवी सीता प्रसन्न हुईं और त्रिजटा से बोलीं, "तुमने जैसा स्वप्न देखा है वैसा ही होगा, क्योंकि राघव महाधनुर्धर, लोक के एकमात्र पुरुषोत्तम हैं।" तब प्रसन्न त्रिजटा ने मैथिली सीता को आशीर्वाद देकर सभी राक्षसियों से कहा, "यह सीता वध के योग्य नहीं है। मैं ही तुम लोगों का प्रमाण हूँ। मेरे द्वारा सीता की रक्षा की गई है। तुम लोग अन्यथा न करो।" राक्षस्याँ त्रिजटा के वचन सुनकर भय और मोह में पड़ गईं और सीता को मारने के विचार से निवृत्त होकर त्रिजटा की प्रशंसा करने लगीं।
🔍 व्याख्या : त्रिजटा के स्वप्न और उसके अधिकार से सीता को शांति मिलती है, और अन्य राक्षसियाँ भी उसे सताने से डरने लगती हैं।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार त्रिजटा के स्वप्न के माध्यम से सीता को आशा का संचार होता है और वे धैर्यपूर्वक राम के आगमन की प्रतीक्षा करती हैं। यह सर्ग राम की विजयश्री का पूर्वाभास देता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌟 त्रिजटा की दूरदर्शिता

त्रिजटा एक राक्षसी होते हुए भी धर्मपरायण और बुद्धिमान है। उसका स्वप्न केवल संयोग नहीं, बल्कि दैवी संकेत है कि अधर्म का नाश निश्चित है।

🛡️ सीता की रक्षा

त्रिजटा के कारण सीता को शारीरिक और मानसिक पीड़ा से कुछ राहत मिलती है। यह दर्शाता है कि सज्जनों की रक्षा का भार स्वयं भगवान उठाते हैं, कभी किसी अप्रत्याशित माध्यम से।

🌅 स्वप्न का प्रतीकात्मक अर्थ

राम-लक्ष्मण का चतुर्भुज विष्णु रूप में दिखना उनकी दिव्यता को प्रकट करता है। रावण का मुण्डित होना और दक्षिणाभिमुख जाना मृत्यु और यमलोक गमन का सूचक है। विभीषण का राज्याभिषेक उसके धर्मपरायणता का फल है।

📖 काव्यगत विशेषता

वाल्मीकि ने त्रिजटा के स्वप्न का वर्णन अत्यंत कलात्मक ढंग से किया है। यह आने वाले युद्ध और राम की विजय की भूमिका तैयार करता है, साथ ही पाठकों को आश्वस्त करता है कि सीता का दुःख जल्द समाप्त होगा।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि आपत्तिकाल में भी धैर्य न खोएं। दुष्टों की योजनाएँ अंततः निष्फल होती हैं, और ईश्वर का विधान हमेशा सत्य की रक्षा करता है। त्रिजटा जैसा सहृदय मित्र कभी भी किसी रूप में सहायता कर सकता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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