सीता का विलाप

हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका में सीता का पता लगाने के बाद, वे एक पेड़ की डाल पर छिपकर सीता की दशा देखते हैं। सीता राक्षसियों से घिरी हुई अत्यंत दुःखी अवस्था में हैं और राम का ध्यान करते हुए विलाप कर रही हैं। वे अपनी विपत्ति का वर्णन करती हैं और राम से प्रार्थना करती हैं।

विवरण

अशोक वाटिका में प्रवेश कर हनुमान जी एक वृक्ष की शाखा पर छिपकर सीता माता को देखते हैं। सीता मलीन वस्त्रों में, भूमि पर बैठी हुई, राक्षसियों से घिरी हुई हैं। वे निरंतर राम का ध्यान कर रही हैं और करुण विलाप कर रही हैं। हनुमान उनके विलाप को सुनते हैं, जिसमें सीता अपने जन्म, विवाह, वनवास, सीता हरण और रावण के प्रलोभनों का स्मरण करती हैं। वे राम के पराक्रम का गुणगान करती हैं और उनसे शीघ्र आकर उन्हें बचाने की प्रार्थना करती हैं। हनुमान इस दृश्य को देखकर अत्यंत व्यथित होते हैं, परंतु स्वयं को प्रकट नहीं करते, क्योंकि वे पहले स्थिति को समझना चाहते हैं। वे सीता के धैर्य और राम के प्रति अटूट प्रेम को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग २५

(सीता का विलाप – हनुमान द्वारा सीता का दर्शन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने रात्रि में लंका का भ्रमण करते हुए अशोक वाटिका में प्रवेश किया। वहाँ एक विशाल शिंशपा वृक्ष पर आश्रय लेकर उन्होंने देखा कि राक्षसियों से घिरी हुई सीता माता भूमि पर बैठी करुण विलाप कर रही हैं। यह सर्ग उनके विलाप और राम के प्रति अटूट प्रेम का अत्यन्त मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है।

🌿 सीता की दशा – अशोक वाटिका में (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-५ ॥
स तत्र सीतां ददर्श हनूमान् मारुतात्मजः ।
अशोकवनिकामध्ये नानावृक्षैरलंकृताम् ॥
राक्षसीभिः परिवृतां कृशां दीनां तपस्विनीम् ।
मलिनाम्बरसंवीतां निःश्वसन्तीं पुनः पुनः ॥
तां दृष्ट्वा जनकात्मजां रामबाणसमाहिताम् ।
हनूमान् मारुतिस्तस्थौ चिन्तयानः परंतपः ॥
🔹 पदच्छेद : सः = वह; तत्र = वहाँ; सीताम् = सीता को; ददर्श = देखा; हनूमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; अशोकवनिकामध्ये = अशोक वाटिका के मध्य; नानावृक्षैः = अनेक वृक्षों से; अलंकृताम् = सुशोभित; राक्षसीभिः = राक्षसियों से; परिवृताम् = घिरी हुई; कृशाम् = कृश; दीनाम् = दीन; तपस्विनीम् = तपस्विनी; मलिनाम्बरसंवीताम् = मलिन वस्त्र पहने हुए; निःश्वसन्तीम् = निःश्वास लेती हुई; पुनः पुनः = बार-बार; ताम् = उसे; दृष्ट्वा = देखकर; जनकात्मजाम् = जनकपुत्री को; रामबाणसमाहिताम् = राम के वाणों के समान तीक्ष्ण; हनूमान् = हनुमान; मारुतिः = मारुति; तस्थौ = ठहर गए; चिन्तयानः = चिंता करते हुए; परंतपः = शत्रुतापन।
📖 भावार्थ : वहाँ उस अशोक वाटिका के मध्य में, अनेक प्रकार के वृक्षों से सुशोभित स्थान पर, पवनपुत्र हनुमान ने सीता को देखा। वह राक्षसियों से घिरी हुई, अत्यन्त कृश और दीन थीं, मलिन वस्त्र पहने हुए बार-बार निःश्वास ले रही थीं। उस जनकपुत्री को देखकर हनुमान चिंता में पड़ गए और सोचने लगे।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने पहली बार सीता को उस विकट अवस्था में देखा। राक्षसियों का कड़ा पहरा, मलिन वस्त्र, क्षीण शरीर – यह सब देखकर उनका हृदय द्रवित हो गया।
॥ श्लोक ६-१० ॥
राक्षस्यश्चात्र विविधाः स्थूलाः स्थूलनिभेक्षणाः ।
नानाप्रहरणाः क्रूराः सीतां परिचरन्ति ताः ॥
तास्तु सीतां परिवृतां राक्षस्यः क्रूरविक्रमाः ।
नर्दन्त्यः सम्प्रधावन्ति भक्षयन्त्य इवानिशम् ॥
तां दृष्ट्वा दीनवदनां निःश्वसन्तीं पुनः पुनः ।
हनूमान् मारुतिस्तस्थौ चिन्तयानः परंतपः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ अनेक प्रकार की राक्षसियाँ थीं – स्थूल शरीर वाली, स्थूल नेत्रों वाली, नाना प्रकार के शस्त्र धारण करने वाली, क्रूर – वे सीता की परिचर्या (पहरा) कर रही थीं। वे क्रूरकर्मा राक्षसियाँ सीता को घेरे हुए, निरन्तर चिल्लाती हुई, उन्हें खा जाने की इच्छा से दौड़ती थीं। उस दीनवदना सीता को बार-बार निःश्वास लेते देख हनुमान चिन्ता में पड़ गए।

💔 सीता का विलाप और राम-ध्यान (श्लोक ११-२५)

॥ श्लोक ११-१८ ॥
सा तु रामे मनः कृत्वा चिन्तयन्ती सुदुःखिता ।
आर्ता विलपते दीना सीता जनकनन्दिनी ॥
अहो राम महाबाहो सर्वलोकनमस्कृत ।
त्वया हीना वरारोहा कथं यास्याम्यहं दिवम् ॥
हा नाथ हा महाप्राज्ञ हा राम जगदीश्वर ।
त्वया हीना वरारोहा न जीवितुमिहोत्सहे ॥
स्मरन्ती राघवं वीरं सिंहसंहननं प्रियम् ।
अशोकवनिकामध्ये राक्षसीवशमागता ॥
📖 भावार्थ : वह जनकनन्दिनी सीता, मन को राम में लगाकर अत्यन्त दुःख से चिन्ता करती हुई, आर्त और दीन होकर विलाप करने लगीं – "अहो ! महाबाहो ! समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत राम ! आपसे बिछुड़ी हुई मैं सुन्दर नारी कैसे स्वर्ग को जाऊँगी? हे नाथ! हे महाप्राज्ञ! हे जगदीश्वर राम! आपसे बिछुड़कर मैं यहाँ जीवित नहीं रह सकती।" सिंह के समान पराक्रमी, प्रिय राघव को स्मरण करती हुई, वह अशोक वाटिका में राक्षसियों के वश में आई हुई थीं।
🔍 व्याख्या : सीता के विलाप के ये शब्द अत्यन्त मार्मिक हैं। वे राम के गुणों का स्मरण करती हैं और उनके बिना जीवन को व्यर्थ बताती हैं। यहाँ "दिवम्" का अर्थ स्वर्ग या मृत्यु के पश्चात् गति हो सकता है, अर्थात् वे मृत्यु की कामना कर रही हैं।
॥ श्लोक १९-२५ ॥
त्वं हि नाथः सखा चैव गतिश्च परमा मम ।
रावणाद् भयमापन्नां त्रातुमर्हसि राघव ॥
अद्य मासो दशमो'यमितो राम तव प्रिये ।
राक्षसीभिः परिवृतां न च पश्यसि मामितः ॥
अथवा ज्ञायते राम मम दुःखमनन्तकम् ।
न हि मे वेत्सि दुःखानि मुनिवेश्मनिवासिनि ॥
इति विलपतीं दीना सीतां जनकनन्दिनीम् ।
शुश्राव हनुमान् वाक्यं रामार्तां तां वराननाम् ॥
📖 भावार्थ : "हे राघव ! आप ही मेरे नाथ, सखा और परम गति हैं। रावण से भयभीत मेरी रक्षा करने के योग्य आप ही हैं। हे राम! आपकी प्रिया मुझे यहाँ हुए आज दस मास बीत गए। राक्षसियों से घिरी मुझे आप यहाँ से नहीं देख पा रहे हैं। अथवा, हे राम! आप मेरे अनन्त दुःखों को जानते ही हैं। मुनि के आश्रम में रहने वाली मेरी दुःखों को आप नहीं जानते?" इस प्रकार विलाप करती हुई दीन सीता के उन वचनों को हनुमान ने सुना।

🧘 हनुमान का संयम और निर्णय (श्लोक २६-३९)

॥ श्लोक २६-३२ ॥
तस्यास्तद् विलपित्वं तु श्रुत्वा हनुमान् कपिः ।
बाष्पपूर्णेक्षणो दीनश्चिन्तयामास वानरः ॥
या राममनुपश्यन्ती न मुह्यति न शोचति ।
तामहं किं नु वक्ष्यामि रामसंदेशमद्भुतम् ॥
यदि वक्ष्यामि संदेशं रामस्य विदितात्मनः ।
प्रत्ययो जनकेन्द्रस्य कथं स्यान्मम चिन्तितम् ॥
अभिज्ञानं च मे दद्याद् रामो दशरथात्मजः ।
तद् ददानि यथावच्च रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् धीमान् मारुतनन्दनः ।
तस्थौ ध्यानपरो भूत्वा किं करोमीति चिन्तयन् ॥
📖 भावार्थ : उसके उस विलाप को सुनकर हनुमान की आँखें अश्रुओं से भर गईं और वे दीन होकर विचार करने लगे: "जो राम का ध्यान करते हुए न तो मोहित होती है और न शोक करती है, उससे मैं राम का अद्भुत संदेश कैसे कहूँ? यदि मैं राम का संदेश कहूँगा तो जनकनन्दिनी को मेरे पर विश्वास कैसे होगा? राम ने मुझे अभिज्ञान (पहचान-चिह्न) दिया है, वह उनकी प्रिय महिषी को दे दूँ।" ऐसा विचार करके बुद्धिमान हनुमान ध्यान में लीन हो गए कि मैं क्या करूँ।
🔍 व्याख्या : हनुमान सीता के धैर्य और राम-निष्ठा से अत्यन्त प्रभावित होते हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सीता उन पर विश्वास करें, इसलिए राम की अंगूठी दिखाने की योजना बनाते हैं।
॥ श्लोक ३३-३९ ॥
ततो बुद्ध्वा महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ।
प्रत्यपद्यत धर्मात्मा वचनं नयवर्त्मनि ॥
अवतीर्य ततः शाखाः शिंशपाया महाकपिः ।
अभ्यगच्छत वैदेहीं रामार्तां राक्षसीवृताम् ॥
ततस्तु धीरो हनुमान् सीतामुपजगाम ह ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा रामप्रियहिते रतः ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी धर्मात्मा हनुमान ने निश्चय किया और शिंशपा वृक्ष की शाखाओं से उतरकर वे राक्षसियों से घिरी हुई राम की प्रिया वैदेही के पास पहुँचे। तत्पश्चात् धीर हनुमान, राम के प्रिय और हित में तत्पर होकर, प्राञ्जलि होकर सीता के समीप जा बैठे।
🔍 व्याख्या : अन्ततः हनुमान सीता के पास जाने का निर्णय लेते हैं। अगले सर्ग में वे राम की मुद्रिका दिखाकर अपना परिचय देंगे।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार पच्चीसवें सर्ग में सीता के करुण विलाप का वर्णन किया गया, साथ ही हनुमान की मनःस्थिति और उनके द्वारा सीता के पास जाने का निर्णय। अगले सर्ग में हनुमान सीता को राम का संदेश सुनाएँगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 सीता का आदर्श

यह सर्ग सीता के पातिव्रत्य, धैर्य और राम के प्रति अनन्य प्रेम का अद्वितीय उदाहरण है। विपरीत परिस्थितियों में भी वे राम को ही अपना सर्वस्व मानती हैं।

🧘 हनुमान की सहानुभूति

हनुमान का अश्रुपूरित नेत्र और सीता के प्रति करुणा दर्शाती है कि वे केवल वीर ही नहीं, बल्कि भावनाओं से भरे हुए भक्त भी हैं।

⏳ दस मास का काल

सीता द्वारा उल्लेख किया गया दस मास का समय दर्शाता है कि रावण द्वारा हरण किये जाने के बाद से इतना लम्बा समय बीत चुका था, फिर भी सीता ने आत्मसमर्पण नहीं किया।

🌀 हनुमान का संयम

हनुमान ने तुरंत प्रकट न होकर सीता की परीक्षा ली, जो उनकी दूरदर्शिता और विवेक को प्रदर्शित करता है।

🎯 शिक्षा : विपत्ति में भी धैर्य और प्रभु-भक्ति नहीं छोड़नी चाहिए। सीता ने इस सर्ग में सिखाया कि किस प्रकार ईश्वर का स्मरण ही सबसे बड़ा सहारा है। हनुमान से हम सीखते हैं कि कार्य को पूरा करने के लिए संयम और सही अवसर की प्रतीक्षा आवश्यक है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे पञ्चविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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