राक्षसियों द्वारा सीता को भय दिखाना

हनुमान जी की गुप्त उपस्थिति में, रावण सीता के पास आता है और उन्हें समझाने का प्रयास करता है। सीता के दृढ़ इनकार पर क्रोधित होकर रावण चला जाता है। उसके जाने के बाद राक्षसियाँ सीता को घेर कर तरह-तरह से भय दिखाती हैं और रावण की बात मानने के लिए धमकाती हैं। किंतु सीता अटल रहती हैं और राम के प्रति अपनी निष्ठा दोहराती हैं। यह सर्ग सीता के अदम्य साहस और पतिव्रता धर्म को उजागर करता है।

विवरण

हनुमान जी अशोक वाटिका में वृक्ष पर छिपकर सीता को देख रहे थे। तभी वहाँ रावण अपने भव्य वस्त्राभूषणों से सज्जित होकर आता है। वह सीता को अपनी शक्ति और ऐश्वर्य का प्रलोभन देता है, और उनसे रानी बनने का आग्रह करता है। सीता धैर्यपूर्वक उसकी बात सुनती हैं, किंतु उसे दृढ़ता से अस्वीकार कर देती हैं और राम के प्रति अपनी अविचल निष्ठा प्रकट करती हैं। सीता का यह उत्तर सुनकर रावण क्रोध से तिलमिला उठता है। वह अपनी राक्षसियों को आदेश देता है कि वे सीता को कठोरता से समझाएँ या डराएँ, और स्वयं वहाँ से चला जाता है। रावण के जाने के बाद भयंकर विकराल राक्षसियाँ सीता के चारों ओर खड़ी हो जाती हैं और उन्हें डराने लगती हैं। वे अनेक प्रकार के भयानक रूप धारण करती हैं और सीता को मारने, खाने, या टुकड़े-टुकड़े कर देने की धमकियाँ देती हैं। सीता इन सबके बीच भी अडिग रहती हैं। वे अपने मन में राम का स्मरण करती हैं और राक्षसियों की बातों की उपेक्षा करती हैं। उनका धैर्य और साहस हनुमान को अत्यंत प्रभावित करता है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग २३

(राक्षसियों द्वारा सीता को भय दिखाना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ त्रयोविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी अशोक वाटिका के वृक्ष पर छिपे हुए सीता की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तभी वहाँ रावण अपने परिवार सहित आता है और सीता को प्रलोभन देता है। इस सर्ग में रावण के असफल प्रयास और राक्षसियों द्वारा सीता को भय दिखाने का मार्मिक वर्णन है।

👑 रावण का आगमन और सीता को प्रलोभन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः स रावणो राजा सीतामासाद्य मैथिलीम् ।
उवाच परमप्रीतो मदनार्तो रघुसत्तमम् ॥
किमिदं सुन्दरि शुभे न मां प्रत्यभिभाषसे ।
त्वयि सक्तं हि मे चित्तं विकिरत्यपि वाग्यतः ॥
नानारत्नपरिपूर्णां लङ्कां पश्य सुलोचने ।
ममेंद्रभवनप्रख्यां स्त्रीरत्नैश्च समन्विताम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; सः = वह; रावणः = रावण; राजा = राजा; सीताम् = सीता को; आसाद्य = पाकर; मैथिलीम् = मैथिली को; उवाच = बोला; परमप्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न होकर; मदनार्तः = कामपीड़ित; रघुसत्तमम् = रघुश्रेष्ठ (राम) की पत्नी से; किम् इदम् = यह क्या; सुन्दरि = सुन्दरी; शुभे = पवित्र; न = नहीं; माम् = मुझसे; प्रति अभिभाषसे = उत्तर देती हो; त्वयि = तुममें; सक्तम् = आसक्त; हि = ही; मे = मेरा; चित्तम् = मन; विकिरति = बिखर जाता है; अपि = भी; वाग्यतः = वाक्य कहते हुए; नानारत्नपरिपूर्णाम् = अनेक रत्नों से भरी हुई; लङ्काम् = लंका को; पश्य = देखो; सुलोचने = सुन्दर नेत्रों वाली; मम इंद्रभवनप्रख्याम् = मेरे इन्द्र के भवन के समान; स्त्रीरत्नैः = सुन्दर स्त्रियों से; समन्विताम् = युक्त।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् राजा रावण सीता के पास आकर अत्यन्त प्रसन्न होकर बोला, वह काम से पीड़ित था। उसने कहा – हे सुन्दरी! हे पवित्र सीते! यह क्या कि तुम मुझसे उत्तर नहीं देतीं? तुममें आसक्त मेरा चित्त विकारग्रस्त हो रहा है। हे सुलोचने! तुम अनेक रत्नों से परिपूर्ण लंका को देखो, जो इन्द्र के भवन के समान है और उत्तम स्त्रियों से युक्त है।
🔍 व्याख्या : रावण सीता को अपने ऐश्वर्य और वैभव का प्रलोभन देता है, किन्तु सीता उसकी ओर उपेक्षा से देखती हैं।
॥ श्लोक ५-१० ॥
इयं हि लङ्का रम्या मे रावणस्य निवेशनम् ।
त्वया सह मया भुक्ता भविष्यति न संशयः ॥
यदि मां त्वं न मन्यसे भर्तारं शुभलोचने ।
अद्य त्वां भक्षयिष्यन्ति राक्षस्यो मांसगृद्धिनीः ॥
📖 भावार्थ : "यह मेरी रमणीय लंका है, रावण का निवास। तुम्हारे साथ भोगी हुई यह मुझे अत्यन्त सुख देगी। हे सुन्दर नेत्रों वाली! यदि तुम मुझे पति के रूप में स्वीकार नहीं करोगी तो आज ही ये मांसभक्षिणी राक्षसियाँ तुम्हें खा जाएँगी।"

🛡️ सीता का अटल उत्तर और रावण का क्रोध (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१४ ॥
ततः सीता दृढं कृत्वा हृदयं रामचिन्तया ।
उवाच परमक्रुद्धं रावणं रजनीचरम् ॥
नाहं त्वां कामये राजन् रामादन्यं कथंचन ।
राम एव गतिर्मेऽस्तु सत्येनैव शपे तव ॥
सूर्याचन्द्रमसौ वायुः पृथिवी सागरास्तथा ।
जानन्ति मन्मथं यच्च रामं चान्यं न कामये ॥
📖 भावार्थ : तब सीता ने राम के चिन्तन से अपने हृदय को दृढ़ करके उस परम क्रोधित रावण से कहा – हे राक्षसराज! मैं तुझे कभी नहीं चाहती। राम के अतिरिक्त मेरा कोई नहीं है। राम ही मेरे स्वामी हैं। मैं सत्य कहती हूँ। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथ्वी और समुद्र सब जानते हैं कि मैं राम के अतिरिक्त किसी और को नहीं चाहती।
🔍 व्याख्या : सीता का यह दृढ़ निश्चय रावण के अहंकार को चकनाचूर कर देता है। वह क्रोध से उबलने लगता है।
॥ श्लोक १५-२० ॥
तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधाद्विवृत्तो राक्षसेश्वरः ।
राक्षसीः सम्परिष्वज्य सीतामाह च दारुणम् ॥
यस्मान्न मन्यसे भर्तारं मां त्वं शुभलोचने ।
तस्मात्त्वामद्य राक्षस्यो भक्षयिष्यन्ति सत्वरम् ॥
इत्युक्त्वा राक्षसीः सर्वाः समादिश्य निशाचरः ।
प्रतस्थे रावणो राजा स्वमेव भवनं प्रति ॥
📖 भावार्थ : यह सुनकर राक्षसराज रावण अत्यन्त क्रोधित हो गया। उसने राक्षसियों को आदेश दिया कि वे सीता को भय दिखाएँ और उससे कहा – हे सुलोचने! तूने मुझे पति नहीं माना, इसलिए आज ये राक्षसियाँ तुझे खा जाएँगी। ऐसा कहकर रावण अपने महल को लौट गया।

😱 राक्षसियों का भयानक रूप और सीता की अडिगता (श्लोक २१-३५)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
ततः ताः क्रोधताम्राक्ष्यो राक्षस्यो विकृताननाः ।
सीतां परिवार्य स्थित्वा तर्जयामासुरुल्बणाः ॥
किं त्वया नः कृतं पापे यदर्थे राक्षसाधिपः ।
क्रोधितो नः प्रहस्यैवं प्रस्थितो भवनं प्रति ॥
अद्य त्वां भक्षयिष्यामो मांसशोणितभोजनाः ।
भर्तुर्वचनमाज्ञाय भविष्यसि न संशयः ॥
एवं बहुविधं घोरं तर्जयित्वा तु राक्षसीः ।
सीता शोकपरीताङ्गी न चचाल पतिव्रता ॥
📖 भावार्थ : तब वे क्रोध से लाल आँखों वाली, विकृत मुखों वाली राक्षसियाँ सीता को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गईं और उन्हें डराने लगीं। वे बोलीं – हे पापिन! तूने हमारे साथ ऐसा क्या किया है कि राक्षसराज हम पर क्रोधित होकर चले गए? आज हम तुझे खा जाएँगी, मांस और रक्त हमारा भोजन है। स्वामी के आदेश का पालन करते हुए हम निश्चय ही ऐसा करेंगी। इस प्रकार अनेक प्रकार से भय दिखाने पर भी शोक से पीड़ित अंगों वाली पतिव्रता सीता विचलित नहीं हुईं।
🔍 व्याख्या : राक्षसियाँ विकराल रूप दिखाकर, भयानक ध्वनियाँ निकालकर सीता को आतंकित करने का प्रयास करती हैं, किन्तु सीता राम का ध्यान करती हुई निडर रहती हैं।
॥ श्लोक २६-३० ॥
सीता तु धैर्यमालम्ब्य रामं ध्यात्वा महाबलम् ।
निर्दहन्तीव रक्षस्यः क्रोधेन परिदह्यते ॥
न भयं विद्यते मह्यं रामादन्यत्र कुत्रचित् ।
सत्येन च शपे वः सीता रामं न त्यक्ष्यति ॥
📖 भावार्थ : सीता ने धैर्य धारण करके महाबली राम का ध्यान किया। वे मन ही मन क्रोध से राक्षसियों को जला रही थीं। उन्होंने कहा – मुझे किसी का भय नहीं है, केवल राम ही मेरे रक्षक हैं। मैं सत्य से प्रतिज्ञा करती हूँ कि सीता राम को कभी नहीं त्यागेगी।
॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततस्ता राक्षसीः सर्वा निराशाः प्रेक्ष्य रावणम् ।
सीतायाश्च दृढं भावं हनूमान् समचिन्तयत् ॥
अहो सीता महाभागा पतिव्रता यशस्विनी ।
यामेवं तर्जयन्त्येताः स्थिता धैर्येण शोभना ॥
इति संचिन्त्य हनुमान् प्रहृष्टो रामकर्मणि ।
प्रतीक्षते स्म सीतायाः शुभं दर्शनमुत्तमम् ॥
📖 भावार्थ : तब रावण के चले जाने पर वे राक्षसियाँ निराश हो गईं। हनुमान ने सीता का दृढ़ भाव देखा और सोचा – अहो! सीता महाभागा, पतिव्रता, यशस्विनी हैं। इतना डरावना दृश्य सहकर भी यह धैर्य से स्थिर हैं। ऐसा सोचकर हनुमान राम के कार्य में आनन्दित हुए और सीता के दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार राक्षसियों के भय दिखाने पर भी सीता अडिग रहीं। हनुमान ने यह सब देखा और सीता के चरित्र की प्रशंसा की। अगले सर्ग में वे सीता को सांत्वना देने का प्रयास करेंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💪 सीता का धैर्य

यह सर्ग सीता के असीम धैर्य और साहस का प्रतीक है। भयंकर राक्षसियों के बीच भी वह राम के प्रति अपने प्रेम और निष्ठा पर अटल रहती हैं।

👁️ हनुमान का दृष्टिकोण

हनुमान इस दृश्य से सीता की महानता को और गहराई से समझते हैं। वे यह भी देखते हैं कि सीता का धैर्य ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।

🔥 रावण का अहंकार

रावण का क्रोध और अहंकार उसे अन्धा बना देता है। वह सीता के सतीत्व को नहीं समझ पाता और बल प्रयोग का आदेश देता है, जो उसके पतन का कारण बनता है।

📖 पतिव्रता धर्म

इस सर्ग में पतिव्रता धर्म की महिमा का वर्णन है। सीता का राम के प्रति समर्पण ही उन्हें राक्षसियों के भय से बचाता है।

🎯 शिक्षा : यह सर्ग हमें सिखाता है कि सच्चे धैर्य और विश्वास के आगे कोई भी भय टिक नहीं सकता। सीता ने जिस प्रकार राक्षसियों के आतंक के बीच भी राम का स्मरण किया, वैसे ही हमें भी संकटों में ईश्वर का स्मरण करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे त्रयोविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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