रावण द्वारा सीता को समय सीमा देना

रावण अशोक वाटिका में आता है और सीता को अन्तिम बार धमकी देता है। वह उन्हें दो महीने की समय सीमा देता है, जिसके बाद वह उनका वध कर देगा। सीता इस धमकी से विचलित हुए बिना राम पर अटूट विश्वास रखती हैं।

विवरण

रावण, काम-मद से पीड़ित होकर, अपने भव्य वस्त्र और आभूषण धारण करता है और अशोक वाटिका में सीता के पास आता है। वह अपनी सम्पत्ति, ऐश्वर्य और शक्ति का प्रदर्शन करते हुए सीता को बहकाने का अन्तिम प्रयास करता है। वह सीता को रानी बनने का प्रस्ताव देता है। जब सीता उसकी बातों को अनसुना कर देती हैं और केवल राम के प्रति अपनी भक्ति दोहराती हैं, तो रावण क्रोधित हो जाता है। वह सीता को दो महीने की समय सीमा देता है। वह कहता है कि यदि उसने इस अवधि के भीतर राम का सहारा छोड़कर उसकी बात नहीं मानी, तो वह उसके टुकड़े-टुकड़े करवा देगा और अपने नाश्ते में खा जाएगा। यह धमकी देकर रावण चला जाता है, और सीता पुनः राम का ध्यान करने लगती हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग २२

(रावण द्वारा सीता को समय सीमा देना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्वाविंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : सीता के दृढ़ इनकार के बावजूद, रावण अब भी आशा छोड़ने को तैयार नहीं है। काम-वासना से पीड़ित होकर वह अशोक वाटिका में पुनः प्रकट होता है। इस बार वह न केवल प्रलोभन देता है, बल्कि अन्तिम चेतावनी भी। यह सर्ग रावण के अहंकार और सीता के अटल धैर्य का अद्भुत चित्रण है।

👑 रावण का आगमन और सीता को अन्तिम प्रलोभन (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-६ ॥
ततः स रजनीं सर्वामुषित्वा रजनीचरः ।
विवेश भवनं श्रीमान् सीतायाः पुनरागतः ॥
स तां ददर्श वैदेहीं दीनां शोकपरायणाम् ।
राक्षसीभिः परिवृतां मातङ्गीमिव कुञ्जराः ॥
उवाच च महातेजा रावणो राक्षसेश्वरः ।
सीतां परमसङ्क्रुद्धः सान्त्वपूर्वमिदं वचः ॥
अलं शोकेन वैदेहि मयि प्रीतिरस्तु ते ।
पतिं मां वरयस्वाद्य सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = फिर; सः = वह; रजनीम् = रात्रि; सर्वाम् = पूरी; उषित्वा = बिताकर; रजनीचरः = रात्रिचर राक्षस; विवेश = प्रवेश किया; भवनम् = निवास स्थान में; श्रीमान् = श्रीमान्; सीतायाः = सीता के; पुनः आगतः = फिर से आकर; सः = उसने; ताम् = उस; ददर्श = देखा; वैदेहीम् = वैदेही को; दीनाम् = दीन; शोकपरायणाम् = शोक में डूबी हुई; राक्षसीभिः = राक्षसियों से; परिवृताम् = घिरी हुई; मातङ्गीम् = हथिनी को; इव = जैसे; कुञ्जराः = हाथी; उवाच = बोला; च = और; महातेजाः = महातेजस्वी; रावणः = रावण; राक्षसेश्वरः = राक्षसराज; सीताम् = सीता से; परमसङ्क्रुद्धः = अत्यन्त क्रोधित होकर; सान्त्वपूर्वम् = पहले सान्त्वना देते हुए; इदम् = यह; वचः = वचन।
📖 भावार्थ : फिर उस रात्रिचर राक्षस ने पूरी रात बिताकर सीता के निवास स्थान में प्रवेश किया। उस श्रीमान् रावण ने वैदेही सीता को देखा, जो दीन और शोक में डूबी हुई थीं, और राक्षसियों से घिरी हुई थीं, ठीक वैसे ही जैसे हाथियों से घिरी हथिनी होती है। फिर महातेजस्वी राक्षसराज रावण, अत्यन्त क्रोधित होते हुए भी, पहले सान्त्वना देते हुए सीता से यह वचन बोला: "हे वैदेही, शोक छोड़ो और मुझमें प्रीति रखो। मुझे, जो समस्त लोकेश्वरों का भी ईश्वर हूँ, आज अपना पति स्वीकार कर लो।"
॥ श्लोक ७-१२ ॥
का त्वं मूढे न जानासि मां त्रैलोक्येश्वरेश्वरम् ।
अहं हि राक्षसश्रेष्ठो रावणो नाम विश्रुतः ॥
मम विक्रममासाद्य देवा अपि सवासवाः ।
न प्रसहन्ति वैदेहि किं पुनर्मानुषं क्षितौ ॥
त्वदर्थमहमिच्छामि त्वामनन्यपरां सतीम् ।
भजस्व मां वरारोहे भजन्तं प्रियकाम्यया ॥
📖 भावार्थ : "अरी मूर्ख, क्या तू मुझे नहीं जानती जो त्रिलोक के ईश्वरों का भी ईश्वर हूँ? मैं प्रसिद्ध राक्षसश्रेष्ठ रावण हूँ। हे वैदेही, मेरे पराक्रम के आगे इन्द्र सहित सभी देवता भी टिक नहीं पाते, फिर पृथ्वी पर मनुष्यों की तो बात ही क्या है? हे वरारोहे, मैं तुम्हें चाहता हूँ। तुम अनन्य भाव से पतिव्रता हो, फिर भी मैं प्रेमपूर्वक तुम्हें भज रहा हूँ, तुम भी मेरा आश्रय लो।"
🔍 व्याख्या : रावण अपने बल और ऐश्वर्य का घमंड करते हुए सीता को समझाने का प्रयास करता है, किन्तु उसकी बातों में कामुकता और अहंकार का मिश्रण है।

🙅 सीता का दृढ़ उत्तर और रावण का क्रोध (श्लोक १३-२४)

॥ श्लोक १३-२० ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वैदेही जनकात्मजा ।
बाष्पपूर्णमुखी खिन्ना रावणं प्रत्युवाच ह ॥
अलं वाचालतां गन्तुं रावणान्यत्र गम्यताम् ।
नाहं त्वां पतिमिच्छामि रामपत्नी स्थिरव्रता ॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
दशग्रीवो महातेजाः पुनः सीतामुवाच ह ॥
यस्मान्मे प्रतिकूलं त्वमकार्षीर्वरवर्णिनि ।
तस्मात्ते दर्शयिष्यामि यमदण्डमहं शुभे ॥
📖 भावार्थ : उसके उस वचन को सुनकर जनकात्मजा वैदेही, खिन्न होकर और आँसुओं से भरे मुख से रावण से बोलीं: "रावण, बहुत बकवास मत करो। कहीं और चले जाओ। मैं तुम्हें पति नहीं बनाना चाहती। मैं राम की पत्नी हूँ और अपने व्रत में स्थिर हूँ।" उसके इन वचनों को सुनकर क्रोध से मूर्च्छित होकर महातेजस्वी दशग्रीव रावण फिर सीता से बोला: "हे सुन्दर वर्ण वाली, तूने मेरे प्रतिकूल आचरण किया है, इसलिए हे शुभे, मैं तुझे अब यमदण्ड (मृत्यु का दण्ड) दिखाऊँगा।"
॥ श्लोक २१-२४ ॥
द्वौ मासौ त्वामहं सीते नयामि परमं वचः ।
ततः प्राप्स्यसि मे कोपं राक्षसीभिः प्रधर्षिता ॥
ऊर्ध्वं मासाद्वरारोहे यदि मां न भजिष्यसि ।
प्रातराशे मम स्निग्धे करिष्यामि त्वया क्षयम् ॥
इत्युक्त्वा राक्षसश्रेष्ठः सीतां मूढेन चेतसा ।
राक्षसीभिः परिवृतां त्रासयित्वा निवर्त्य च ॥
📖 भावार्थ : "हे सीते, मैं तुझे दो माह की समय सीमा देता हूँ। यह मेरा अन्तिम वचन है। उसके बाद तू मेरे क्रोध का शिकार होगी और राक्षसियों द्वारा सताई जाएगी। हे वरारोहे, दो मास के ऊपर यदि तूने मुझे नहीं माना, तो मैं तुझे अपने प्रातःकाल के भोजन के रूप में समाप्त कर दूंगा।" ऐसा कहकर राक्षसश्रेष्ठ रावण, मूढ़ चित्त से, राक्षसियों से घिरी हुई सीता को और भयभीत करके वहाँ से लौट गया।
🔍 व्याख्या : यह सर्ग का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है। रावण प्रलोभन से हटकर खुली धमकी पर आ जाता है। दो माह की यह समय सीमा कथा की समय-रेखा को आगे बढ़ाने में सहायक होती है।

🌪️ रावण का प्रस्थान और सीता का धैर्य (श्लोक २५-३२)

॥ श्लोक २५-३२ ॥
गते तु राक्षसेन्द्रे तु सीता शोकसमन्विता ।
दध्यौ चिन्तापरा दीना राममेवान्वचिन्तयत् ॥
हा राम नाथ कान्तेति विललाप सुदुःखिता ।
भर्तृदर्शनसंहृष्टा बाष्पगद्गदया गिरा ॥
सा तु दृष्ट्वा दशग्रीवं क्रोधसंरक्तलोचनम् ।
न चचाल महाभागा धैर्येण धृतमानसा ॥
एवं सा राक्षसीमध्ये सीता शोकपरायणा ।
राममेवानुशोचन्ती तस्थौ दीनासने गता ॥
📖 भार्थ : राक्षसेन्द्र के चले जाने पर शोक से व्याकुल सीता, चिन्ता में डूबी हुई, केवल राम का ही चिन्तन करने लगीं। वे अत्यन्त दुःखी होकर "हा राम, नाथ, कान्त!" कहकर विलाप करने लगीं। भर्ता (पति) के दर्शन की लालसा से व्याकुल, उनकी वाणी आँसुओं से गद्गद् हो गई। क्रोध से लाल-लाल आँखों वाले दशग्रीव को देखकर भी वह महाभागा स्त्री अपने धैर्य के बल पर विचलित नहीं हुई। इस प्रकार वह सीता, राक्षसियों के बीच, शोक में डूबी हुई, केवल राम का ही शोक करती हुई, दीन भाव से उस आसन पर बैठी रहीं।
🔍 व्याख्या : भयानक से भयानक परिस्थिति में भी सीता ने अपना धैर्य और राम के प्रति समर्पण नहीं खोया। यही उनका सबसे बड़ा आभूषण है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

⚖️ सीता का धैर्य

यह सर्ग सीता के असीम धैर्य और आत्मबल का प्रतीक है। मृत्यु का भय होते हुए भी वे अपने सतीत्व और राम-भक्ति पर अडिग रहती हैं।

😤 रावण का अहंकार और क्रोध

रावण का अहंकार अस्वीकार किए जाने पर क्रोध में बदल जाता है। उसका प्रेम-प्रस्ताव वास्तव में उसके स्वार्थ और अधिकार-भावना का ही विस्तार था, जिसके न रहने पर वह हिंसक हो जाता है।

⏳ समय-सीमा का महत्त्व

रावण द्वारा दी गई दो माह की यह समय-सीमा कथा को गति प्रदान करती है। इसी अवधि के भीतर हनुमान का आगमन होता है, जो सीता के लिए आशा की किरण लेकर आता है।

🛡️ नारी-शक्ति का आदर्श

सीता का यह चरित्र नारी-शक्ति का सर्वोच्च उदाहरण है। वे अकेली हैं, असहाय हैं, लेकिन अपने सिद्धान्तों और नैतिक बल से वे सम्पूर्ण राक्षस-सेना और रावण के ऐश्वर्य को चुनौती देती हैं।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा बल बाहरी शक्ति में नहीं, आन्तरिक धैर्य और सत्य के प्रति अडिग निष्ठा में है। विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास ही मनुष्य का सबसे बड़ा आधार होते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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