हनुमान् द्वारा सीता को राक्षसियों के बीच देखना

हनुमान् जी अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं और वहाँ राक्षसियों से घिरी हुई सीता जी को देखते हैं। वे एक वृक्ष पर छिपकर सीता जी की दशा का अवलोकन करते हैं और उनके शोक एवं पतिव्रता धर्म पर विचार करते हैं।

विवरण

हनुमान् जी रावण के अन्तःपुर में सीता को न पाकर आगे खोज करते हैं। वे लंका के विभिन्न भवनों और उद्यानों का निरीक्षण करते हुए अशोक वाटिका में पहुँचते हैं। वहाँ वे एक विशाल शिंशपा वृक्ष पर चढ़ जाते हैं। अशोक वाटिका अत्यन्त सुन्दर है, जिसमें नाना प्रकार के वृक्ष, लताएँ और पुष्प हैं। वहाँ वे देखते हैं कि एक स्थान पर भयंकर राक्षसियाँ चारों ओर से घेरे हुए हैं। उनके मध्य में एक देवी सीता बैठी हैं, जो मलिन वस्त्र धारण किए हुए, शोक से व्याकुल और कृशकाय हो गई हैं। हनुमान् उन्हें पहचान जाते हैं। वे राम की ध्यान करती हुई सीता को देखकर अत्यन्त दुःखी होते हैं। वे सोचते हैं कि किस प्रकार सीता तक पहुँचा जाए और उन्हें राम का सन्देश दिया जाए। वे राक्षसियों के भयानक रूपों को देखते हैं, जो माँस और रक्त का भोजन करती हैं। सीता उनके बीच में अकेली, निडर और धैर्यवान बैठी हैं। हनुमान् उनकी वन्दना करते हैं और अवसर की प्रतीक्षा करते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १७

(हनुमान् द्वारा सीता को राक्षसियों के बीच देखना)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान् जी ने लंका के अन्तःपुर में सीता को न पाकर नगर के अन्य भागों में खोज की। अन्त में वे अशोक वाटिका में पहुँचे, जहाँ उन्हें राक्षसियों के मध्य सीता के दर्शन हुए। यह सर्ग उस मिलन के प्रथम क्षण का वर्णन करता है।

🌳 अशोक वाटिका में प्रवेश और सीता के दर्शन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-२ ॥
ततः प्रववृते वीरो हनुमान् मारुतात्मजः ।
ददर्श च वरारोहां सीतां रामस्य वल्लभाम् ॥
मलिनाम्बरसंवीतां निरानन्दां निराश्रयाम् ।
शोकसागरमध्यस्थां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तदनन्तर; प्रववृते = प्रवेश किया; वीरः = वीर; हनुमान् = हनुमान; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; ददर्श = देखा; च = और; वरारोहाम् = सुन्दर नितम्बों वाली; सीताम् = सीता को; रामस्य = राम की; वल्लभाम् = प्रिय पत्नी; मलिनाम्बरसंवीताम् = मलिन वस्त्रों से ढकी हुई; निरानन्दाम् = आनन्दहीन; निराश्रयाम् = आश्रयहीन; शोकसागरमध्यस्थाम् = शोक रूपी सागर के मध्य में स्थित; भर्तृदर्शनलालसाम् = पति के दर्शन के लिए लालायित।
📖 भावार्थ : तब वीर पवनपुत्र हनुमान अशोक वाटिका में प्रविष्ट हुए और उन्होंने राम की प्रिय पत्नी सीता को देखा, जो मलिन वस्त्र पहने, आनन्दहीन, आश्रयविहीन, शोक-सागर में डूबी हुई और पति के दर्शनों के लिए व्याकुल थीं।
॥ श्लोक ३-४ ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् वीरः सीतां शोकपरायणाम् ।
रामस्य महिषीं दीनां चिन्तयामास वानरः ॥
इयम् सा जनकस्य सुता देवी रामस्य वल्लभा ।
यस्या हेतोः समुद्रान्तो वानरैः शोध्यते जगत् ॥
📖 भावार्थ : उस शोकाकुल सीता को देखकर वीर हनुमान ने सोचा – यही वह जनकपुत्री देवी हैं, जो राम की प्रिया हैं और जिनके कारण समुद्र-तट तक की सम्पूर्ण भूमि वानरों द्वारा खोजी जा रही है।

😔 सीता की दयनीय दशा का वर्णन (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१२ ॥
अश्रुपूर्णमुखी दीना केशसंस्कारवर्जिता ।
भर्तृचिन्तापरा नित्यं क्षीणपुण्येव रूपिणी ॥
तां राक्षसीभिः परिवृतां घोराभिः कामरूपिभिः ।
भक्षयिष्यन्तीभिरिव दीप्ताभिरिव पावकैः ॥
📖 भावार्थ : सीता का मुख अश्रुओं से भरा हुआ था, केश बिखरे हुए थे, वे नित्य पति की चिन्ता में लीन थीं, मानो पुण्य क्षीण हो गया हो। उन्हें चारों ओर से भयंकर राक्षसियों ने घेर रखा था, जो मानो उन्हें भक्षण करने को उद्यत प्रज्वलित अग्नि के समान थीं।
॥ श्लोक १७-१८ ॥
निरानन्दां निरालम्बां नित्यशोकपरायणाम् ।
ध्यायन्तीं राममेवैका मनसा चक्षुषा तथा ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् वीरश्चिन्तयामास वानरः ।
कथमेतामुपेयाम यथा रामो महाबलः ॥
📖 भावार्थ : आनन्दहीन, आलम्बहीन, नित्य शोक में लीन, एकमात्र मन और आँखों से राम का ही ध्यान करती हुई सीता को देखकर वीर हनुमान ने सोचा – किस प्रकार मैं इनके पास जाऊँ, ताकि महाबली राम को इनका पता चल सके?

👹 राक्षसियों का भयानक स्वरूप (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२३ ॥
काश्चिदेकेन नेत्रेण काश्चिदेकेन कर्णेन ।
ह्रस्वा दीर्घाश्च राक्षस्यो विकटाः कामरूपिणीः ॥
काश्चिद् विकृतवक्त्राश्च लम्बोदर्यो महाभुजाः ।
काश्चिन्महाप्रमाणाश्च भीमा भीमपराक्रमाः ॥
तासां मध्ये तु सुश्रोणी सीता तारेव नक्षत्रैः ।
शुशुभे शोकसन्तप्ता रामचिन्तापरायणा ॥
📖 भावार्थ : कोई राक्षसी एक आँख वाली, कोई एक कान वाली, कोई छोटी, कोई लम्बी, विकराल मुख वाली, लम्बे उदर वाली, बड़ी भुजाओं वाली, भीमकाय और भीषण पराक्रम वाली थीं। उन राक्षसियों के बीच में शोक से सन्तप्त, राम-चिन्ता में लीन सीता ऐसी शोभित हो रही थीं, जैसे नक्षत्रों के मध्य चन्द्रमा।

🧘 हनुमान के विचार और सीता की स्तुति (श्लोक ३१-३५)

॥ श्लोक ३१-३२ ॥
धन्येयं जनकस्य सुता यस्याः प्रियार्थं राघवः ।
वनं प्रविष्टो धर्मात्मा त्यक्त्वा राज्यं महद्यशः ॥
इमां तु राक्षसीमध्ये शोकसागरमध्यगाम् ।
आश्वासयिष्ये वैदेहीं यदि मामभिभाषते ॥
📖 भावार्थ : हनुमान ने सोचा – धन्य है जनक की यह पुत्री, जिसके प्रेम में धर्मात्मा राघव ने महान यशस्वी राज्य त्यागकर वन प्रवेश किया। अब मैं राक्षसियों के बीच शोक-सागर में डूबी इस वैदेही को सान्त्वना दूँगा, यदि यह मुझसे बात करें।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार सप्तदश सर्ग में हनुमान ने राक्षसियों से घिरी सीता के दर्शन किये और उनकी दशा पर चिन्तन करते हुए उनसे वार्तालाप का अवसर ढूँढ़ने लगे। अगले सर्ग में हनुमान सीता को राम की अंगूठी दिखाकर अपना परिचय देंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 सीता का धैर्य

यह सर्ग सीता के अटूट धैर्य और पतिव्रता धर्म का उत्कृष्ट चित्रण है। राक्षसियों के मध्य भी वे राम का ध्यान करती हैं, उनका तेज क्षीण नहीं होता।

🙏 हनुमान की भक्ति

हनुमान सीता के दर्शन मात्र से भाव-विभोर हो जाते हैं। उनका समर्पण और राम-कार्य के प्रति निष्ठा यहाँ स्पष्ट होती है।

🌺 अशोक वाटिका का प्रतीकात्मकता

अशोक वाटिका (शोक-रहित उद्यान) में सीता का होना विडम्बना है, परन्तु यहाँ उनका शोक ही उन्हें अशोक (शोक-रहित) बनाता है – क्योंकि वे राम में लीन हैं।

⚔️ राक्षसियों का प्रतिरूप

राक्षसियाँ अधर्म, काम, क्रोध आदि का प्रतीक हैं। सीता इनके बीच भी अविचलित रहती हैं, जो आत्मबल का प्रमाण है।

🎯 शिक्षा : संकटों के बीच भी धैर्य और भगवन्निष्ठा ही मनुष्य को पारंगत करती है। सीता का चरित्र हमें सिखाता है कि शोक में भी हमें अपने लक्ष्य और आराध्य से विमुख नहीं होना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे सप्तदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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