सीता की दशा देखकर हनुमान् का शोक

हनुमान जी अशोक वाटिका में सीता को ढूँढ़ते हैं और उन्हें एक अशोक वृक्ष के नीचे दुःखी अवस्था में देखते हैं। वे सीता की दुर्दशा देखकर अत्यन्त दुःखी होते हैं और राम के प्रति उनके प्रेम और विरह को समझते हैं। यह सर्ग हनुमान के करुणा और भक्ति भाव को दर्शाता है।

विवरण

हनुमान जी रावण के अन्तःपुर से निकलकर अशोक वाटिका की ओर बढ़ते हैं। वहाँ वे घने वृक्षों और सुन्दर उपवन को देखते हैं। अशोक वाटिका के मध्य में एक सिम्शुपा वृक्ष (अशोक वृक्ष) के नीचे वे सीता को देखते हैं। सीता मलिन वस्त्र धारण किए, क्षीणकाय, राक्षसियों से घिरी हुई हैं। वे राम का ध्यान कर रही हैं और करुण विलाप कर रही हैं। हनुमान उनकी दशा देखकर अत्यन्त दुःखी होते हैं। वे सोचते हैं कि राम जैसे भाग्यवान की पत्नी ऐसी दशा में कैसे हो सकती है। वे रावण और राक्षसियों को कोसते हैं। फिर वे सोचते हैं कि यदि वे सीता को यहाँ देखकर दुःखी हो रहे हैं, तो राम कितने दुःखी होंगे। हनुमान अपने आपको सम्भालते हैं और सीता को ढाढ़स बँधाने की योजना बनाते हैं। वे निर्णय करते हैं कि पहले सीता की परीक्षा लें कि वे राम के प्रति कितनी निष्ठावान हैं और फिर उन्हें राम का सन्देश दें।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १६

(सीता की दशा देखकर हनुमान् का शोक)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षोडशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी ने लंका के विभिन्न भवनों में सीता को न पाकर अन्ततः अशोक वाटिका में प्रवेश किया। वहाँ उन्हें माता सीता के दर्शन हुए, पर उनकी दयनीय दशा ने हनुमान के हृदय को विदीर्ण कर दिया। इस सर्ग में हनुमान के शोक, करुणा और रामभक्ति का अद्भुत वर्णन है।

🌿 अशोक वाटिका में प्रवेश और सीता के दर्शन (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १-४ ॥
ततः प्रविश्य हनुमान् अशोकवनिकां शुभाम् ।
ददर्श विविधान् वृक्षान् पुष्पोपगफलधरान् ॥
तस्य मध्ये महावीर्यः शिंशुपां पुष्पशोभिताम् ।
आस्थितां राक्षसीमध्ये सीतां दीनां कृशोदरीम् ॥
तां ददर्श महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ।
मलिनाम्बरसंवीतां राक्षसीभिः समावृताम् ॥
निःश्वसन्तीं मुहुः सीतां चिन्ताव्याकुलमानसाम् ।
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; प्रविश्य = प्रवेश कर; हनुमान्; अशोकवनिकाम् = अशोक वाटिका में; शुभाम् = शुभ; ददर्श = देखा; विविधान् = अनेक प्रकार के; वृक्षान् = वृक्षों को; पुष्पोपगफलधरान् = पुष्पों और फलों से युक्त; तस्य = उसके; मध्ये = मध्य में; महावीर्यः = महापराक्रमी; शिंशुपाम् = शिंशुपा वृक्ष (अशोक) को; पुष्पशोभिताम् = पुष्पों से शोभित; आस्थिताम् = स्थित; राक्षसीमध्ये = राक्षसियों के बीच; सीताम् = सीता को; दीनाम् = दीन; कृशोदरीम् = क्षीण शरीर वाली; ताम् = उनको; ददर्श = देखा; महातेजाः = महातेजस्वी; हनूमान्; मारुतात्मजः = पवनपुत्र; मलिनाम्बरसंवीताम् = मलिन वस्त्र धारण किए हुए; राक्षसीभिः = राक्षसियों से; समावृताम् = घिरी हुई; निःश्वसन्तीम् = सिसकती हुई; मुहुः = बार-बार; सीताम्; चिन्ताव्याकुलमानसाम् = चिन्ता से व्याकुल मन वाली।
📖 भावार्थ : तब हनुमान ने शुभ अशोक वाटिका में प्रवेश किया और अनेक प्रकार के पुष्प-फलों से युक्त वृक्षों को देखा। उस वाटिका के मध्य में महापराक्रमी हनुमान ने पुष्पों से शोभित शिंशुपा वृक्ष के नीचे राक्षसियों से घिरी हुई दीन, क्षीण शरीर वाली सीता को देखा। पवनपुत्र हनुमान ने उन्हें मलिन वस्त्र धारण किए, बार-बार सिसकती हुई और चिन्ता से व्याकुल देखा।
🔍 व्याख्या : सीता की यह दशा उनके राम-विरह और राक्षसियों के आतंक को दर्शाती है। वे निरंतर राम का ध्यान कर रही हैं और उनके वियोग में दुबली हो गई हैं।

😔 सीता की दुर्दशा और राक्षसियों का आतंक (श्लोक ११-२०)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
ततः क्रूराश्च घोराश्च राक्षस्यो भीमदर्शनाः ।
तर्जयन्ति स्म सीतां तां रामचिन्तापरायणाम् ॥
“रामं त्यज मनोज्ञं त्वं रावणं भज सुन्दरि ।
राजा ते दास्यति भोगान् न त्यज स्वामिनं प्रियम् ॥”
इत्युक्त्वा तर्जयन्ति स्म राक्षस्यः क्रूरभाषिणीः ।
सीता तु राममेवैका चिन्तयन्ती निरीक्षते ॥
📖 भावार्थ : वहाँ क्रूर, भयंकर और भीमदर्शना राक्षसियाँ सीता को तर्जना (धमकी) दे रही थीं, जो राम के चिन्तन में लीन थीं। वे कहती थीं, “हे सुन्दरी, राम को त्यागकर रावण को भजो। राजा तुम्हें भोग देंगे, अपने स्वामी को मत त्यागो।” ऐसा कहकर वे क्रूरभाषिणी राक्षसियाँ धमकाती थीं। पर सीता तो अकेली राम का ही चिन्तन करती हुई देखती रहीं।

💔 हनुमान का शोक और विलाप (श्लोक २१-३०)

॥ श्लोक २१-२५ ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् वीरः करुणं पर्यदेवयत् ।
“अहो रामस्य महिषी धर्मपत्नी यशस्विनी ॥
इयमिदानीं दशा प्राप्ता राक्षसीवशमागता ।
यस्याः प्रभावात् त्रैलोक्यं रामो जेष्यति नान्यथा ॥
सा चैवं राक्षसीमध्ये कृशा दीना तपस्विनी ।
नूनं रामोऽपि शोकार्तो वर्तते मद्विधः सदा ॥”
इति संचिन्त्य दुःखार्तो बाष्पपूर्णेक्षणोऽभवत् ।
📖 भावार्थ : उन्हें देखकर वीर हनुमान करुण विलाप करने लगे: “अहो, राम की महिषी, धर्मपत्नी, यशस्विनी सीता आज इस दशा को प्राप्त हो गईं, राक्षसियों के वश में आ गईं। जिनके प्रभाव से राम त्रैलोक्य को जीतेंगे, वही आज राक्षसियों के बीच कृश, दीना, तपस्विनी हैं। निश्चय ही राम भी मेरी तरह शोकार्त हो रहे होंगे।” ऐसा सोचकर दुःखार्त हनुमान के नेत्र अश्रुओं से भर गए।
🔍 व्याख्या : हनुमान का यह विलाप उनकी राम के प्रति गहरी भक्ति और सीता के प्रति आदर को दर्शाता है। वे सीता को राम की सामर्थ्य का आधार मानते हैं।

🤔 हनुमान का आत्मचिन्तन और निर्णय (श्लोक ३१-३५)

॥ श्लोक ३१-३५ ॥
ततः स धीरो हनुमान् आत्मानं प्रत्यबोधयत् ।
“न मे शोकेन कृत्यं हि कार्यमग्रे महत् कपेः ॥
इयं रामप्रिया देवी ध्रुवं साध्वी पतिव्रता ।
प्राणांस्त्यक्ष्यति नान्यं सा भजिष्यति कथंचन ॥
तस्मात् परीक्ष्य सीतां तु रामसंदेशमुत्तमम् ।
दास्यामि यदि साध्वीयं शरण्यं रघुनन्दनम् ॥”
इति निश्चित्य हनुमान् तूष्णीमासीद् व्यवस्थितः ।
📖 भावार्थ : तब उस धीर हनुमान ने स्वयं को सम्भाला: “मुझे शोक से कोई कार्य नहीं, आगे महान कार्य करना है। यह रामप्रिया देवी निश्चय ही साध्वी और पतिव्रता हैं। ये प्राण त्याग देंगी, किन्तु कभी दूसरे को नहीं अपनाएँगी। अतः सीता की परीक्षा करके उन्हें राम का उत्तम संदेश दूँगा, यदि यह साध्वी रघुनन्दन की शरण में हैं।” ऐसा निश्चय करके हनुमान चुपचाप स्थिर हो गए।
🔍 व्याख्या : हनुमान ने अपने मन को समझाया कि शोक न करके सीता की परीक्षा करें और राम का सन्देश दें। यह उनके कूटनीतिक और धैर्यवान चरित्र को दर्शाता है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार सोलहवें सर्ग में हनुमान ने सीता की दुःखद दशा देखी, शोक किया और पुनः धैर्य धारण करके आगे की योजना बनाई। अगले सर्ग में वे सीता को राम की कथा सुनाएँगे और उन्हें अंगूठी देंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💧 करुण रस का साक्षात्कार

इस सर्ग में वाल्मीकि ने करुण रस की अत्यन्त मार्मिक अभिव्यक्ति की है। सीता की दशा और हनुमान का विलाप पाठक के हृदय को द्रवित कर देता है।

🛡️ सीता का धैर्य

राक्षसियों के भयानक तर्जन के बावजूद सीता का राम में मन लगाए रहना उनके अटल पातिव्रत्य और धैर्य का प्रतीक है।

🙏 हनुमान की भक्ति

हनुमान का शोक उनकी राम-सीता के प्रति गहरी आस्था को दर्शाता है। वे स्वयं को उनके दुःख से अभिभूत पाते हैं, फिर भी कार्य को प्राथमिकता देते हैं।

🧘 धैर्य और विवेक

हनुमान ने शोक में बहने के स्थान पर विवेक से काम लिया और सीता की परीक्षा करने तथा राम-संदेश देने का निर्णय किया। यह हमें सिखाता है कि दुःख में भी धैर्य और कर्तव्य का पालन करना चाहिए।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धैर्य और विवेक नहीं खोना चाहिए। हनुमान ने अपने मनोभावों पर नियंत्रण पाकर अपने लक्ष्य को साधा। हमें भी विपत्ति में धैर्यपूर्वक कर्तव्य-पालन करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे षोडशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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