हनुमान् द्वारा सीता का दर्शन

अशोक वाटिका में भ्रमण करते हुए हनुमान जी को अंततः सीता माता के दर्शन होते हैं। वे उन्हें अशोक वृक्ष के नीचे, मलिन वस्त्र धारण किए, राक्षसियों से घिरी हुई, ध्यानमग्न और अत्यंत दुःखी अवस्था में देखते हैं। हनुमान सीता के रूप-सौन्दर्य और उनके पतिव्रता धर्म का वर्णन करते हुए उनकी दशा पर शोक करते हैं।

विवरण

हनुमान जी रावण के अन्तःपुर में सीता को न पाकर लंका के अन्य भागों, विशेषकर अशोक वाटिका में उनकी खोज करते हैं। वाटिका की अद्भुत शोभा का वर्णन करते हुए वे भीतर प्रवेश करते हैं। वहाँ उन्हें एक सिम्शपा वृक्ष के नीचे, मलिन वस्त्र धारण किए, राक्षसियों से घिरी हुई एक स्त्री दिखाई देती है। वह अत्यंत कृश, दुःखी और ध्यानमग्न है। हनुमान के मन में संदेह होता है कि कहीं यह माया तो नहीं, परंतु उनके मुख पर दिव्य तेज और उनके रूप के लक्षणों (अनवद्य अंग, सुन्दर केश आदि) से वे निश्चय कर लेते हैं कि यही जानकी हैं। वे देखते हैं कि वह लगातार राम-राम का जाप कर रही हैं और उनके सामने राम की दी हुई अंगूठी रखी है, जिसे देखकर वे विलाप करती हैं। हनुमान उनके इस कष्ट को देखकर अत्यंत व्यथित होते हैं और उनके दुःख का कारण समझ जाते हैं।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १५

(हनुमान् द्वारा सीता के दर्शन – खोज की सफलता)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चदशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : रावण के महल के भीतरी भागों में सीता को न पाकर हनुमान ने लंका के अन्य स्थानों में खोज जारी रखी। अब वे अशोक वाटिका में प्रवेश कर चुके हैं। यह सर्ग उस अद्भुत क्षण का वर्णन करता है जब हनुमान को अंततः वैदेही के दर्शन होते हैं। यह खोज का चरम बिंदु है और किष्किन्धा से चला अभियान अब सफलता की ओर अग्रसर है।

🌳 अशोक वाटिका का मनोहारी वर्णन (श्लोक १-९)

॥ श्लोक १-५ ॥
स तु पर्वतसङ्काशां लङ्कां दृष्ट्वा महाकपिः ।
अशोकवनिकां रम्यां ददर्श मनसः प्रियाम् ॥
तस्यां नानाविधा वृक्षाः पुष्पिताः फलशालिनः ।
पनसाः सालतालाश्च चूताः सप्तच्छदास्तथा ॥
केसराः कोविदाराश्च कर्णिकाराः सचन्दनाः ।
अशोकाः सप्तपर्णाश्च केतक्यश्च सह श्रिया ॥
🔹 पदच्छेद : सः = उसने; तु = तब; पर्वतसङ्काशाम् = पर्वत के समान दिखने वाली; लङ्काम् = लंका को; दृष्ट्वा = देखकर; महाकपिः = महान वानर; अशोकवनिकाम् = अशोक वाटिका को; रम्याम् = रमणीय; ददर्श = देखा; मनसः प्रियाम् = मन को प्रिय लगने वाली; तस्याम् = उसमें; नानाविधाः = अनेक प्रकार के; वृक्षाः = वृक्ष; पुष्पिताः = पुष्पित; फलशालिनः = फलों से युक्त; पनसाः = कटहल; सालतालाश्च = साल, ताड़; चूताः = आम; सप्तच्छदाः = सप्तपर्ण; तथा = तथा; केसराः = केसर; कोविदाराः = कोविदार; कर्णिकाराः = कणिकार; सचन्दनाः = चन्दन सहित; अशोकाः = अशोक; सप्तपर्णाश्च = सप्तपर्ण; केतक्यः = केतकी; च = और; सह श्रिया = शोभा के साथ।
📖 भावार्थ : पर्वत के समान ऊँची लंका को देखने के बाद महावानर हनुमान ने मन को प्रिय लगने वाली रमणीय अशोक वाटिका देखी। उसमें अनेक प्रकार के पुष्पित-फलित वृक्ष थे—कटहल, साल, ताड़, आम, सप्तपर्ण, केसर, कोविदार, कणिकार, चन्दन, अशोक और केतकी आदि अपनी सम्पूर्ण शोभा के साथ सुशोभित थे।
🔍 व्याख्या : हनुमान जब अशोक वाटिका में प्रवेश करते हैं, तो वहाँ की प्राकृतिक छटा देखते ही बनती है। यह वर्णन केवल सौन्दर्य-बोध के लिए नहीं है, बल्कि इससे सीता के कष्ट और वाटिका के वैभव के बीच अद्भुत विरोधाभास भी उभरकर सामने आता है।
॥ श्लोक ६-९ ॥
तत्र सा रमते नित्यं राक्षसेन्द्रस्य सम्मता ।
विद्याधरीसहस्रैश्च सेव्यमाना समन्ततः ॥
तां तु दृष्ट्वा हनूमान् वै चिन्तयामास वानरः ।
का न्वियं रूपसम्पन्ना देवी वा यदि वाप्सराः ॥
📖 भावार्थ : उस वाटिका में राक्षसेन्द्र की प्रिय रानियाँ नित्य विहार किया करती थीं, और वह स्थान हजारों विद्याधरियों से सेवित था। उस वाटिका को देखकर हनुमान विचार करने लगे कि यह रूपसम्पन्ना स्त्री कौन है? कोई देवी या अप्सरा? (हनुमान को अभी सीता के दर्शन नहीं हुए हैं, वे वाटिका के वैभव का वर्णन कर रहे हैं।)

🙏 सीता के दर्शन – खोज की सफलता (श्लोक १०-२५)

॥ श्लोक १०-१५ ॥
ततोऽपश्यन्महातेजा हनूमान् मारुतात्मजः ।
सीतां पद्मपलाशाक्षीं शोकसागरसंप्लुताम् ॥
राक्षसीभिः परिवृतां कृशां दीनामनाथवत् ।
नित्यं रामानुचिन्ताभिः तप्यमानां तपस्विनीम् ॥
मलिनाम्बरसंवीतां ध्यानमास्थाय भामिनीम् ।
भूमौ विवर्णवदनां रुदतीं रामलालसाम् ॥
📖 भावार्थ : तब महातेजस्वी मारुतात्मज हनुमान ने कमलदल के समान नेत्रों वाली सीता को देखा, जो शोक के सागर में डूबी हुई थीं। वे राक्षसियों से घिरी हुई थीं, कृश हो गई थीं, दीन और अनाथ के समान दिख रही थीं। वे तपस्विनी निरन्तर राम का चिन्तन करती हुई तप रही थीं। उन्होंने मलिन वस्त्र धारण किए थे, ध्यान में लीन थीं, उनका मुख विवर्ण हो गया था और वे राम के लिए तरसती हुई रो रही थीं।
🔍 व्याख्या : यह सीता की उस दयनीय अवस्था का प्रथम दर्शन है। हनुमान उन्हें उसी वैभवशाली वाटिका में बिल्कुल विपरीत स्थिति में पाते हैं। "शोकसागरसंप्लुताम्" से सीता के दुःख की गहराई प्रकट होती है।
॥ श्लोक १६-२५ ॥
इमां तु दृष्ट्वा हनुमान् चिन्तयामास वानरः ।
एषा सा जानकी देवी रामपत्नी यशस्विनी ॥
यस्यार्थे राघवो दुःखं सीताविरहितो वने ।
भ्रात्रा सह मुनिवेषो ध्रुवमेषा तपस्विनी ॥
अनवद्याङ्गी सुश्रोणी मध्यक्षामा यशस्विनी ।
देवी वा नागकन्या वा गन्धर्वी यदि वाप्सराः ॥
रामस्य महिषी साध्वी नियता धर्मचारिणी ।
सीतेति विदिता सेयं सर्वलक्षणलक्षिता ॥
📖 भावार्थ : उन्हें देखकर हनुमान ने विचार किया: "निश्चय ही यह वही यशस्विनी देवी जानकी हैं, जो राम की पत्नी हैं। जिनके वियोग में राघव वन में भाई के साथ मुनि का वेष धारण किए दुःख भोग रहे हैं, निश्चय ही यह वही तपस्विनी हैं। निर्दोष अंगों वाली, सुन्दर नितम्बों वाली, कृश मध्य भाग वाली, यशस्विनी—चाहे यह देवी हों, नागकन्या हों, गन्धर्वी हों या अप्सरा हों, पर यह नियत रूप से राम की महिषी, साध्वी और धर्मचारिणी हैं। यह वही सीता हैं, जो सभी लक्षणों से युक्त हैं।"
🔍 व्याख्या : हनुमान का यह निश्चय अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे सीता के रूप, उनके आभूषणों और उनकी स्थिति से उन्हें पहचान लेते हैं। यहाँ हनुमान की सूक्ष्म बुद्धि और स्मरणशक्ति प्रकट होती है।

😢 हनुमान का शोक और सीता का विलाप (श्लोक २६-४५)

॥ श्लोक २६-३५ ॥
इमां तु दृष्ट्वा हनुमान् बाष्पपूर्णेक्षणोऽभवत् ।
प्रणम्य शिरसा देवीं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ॥
अहो दुःखमहो कष्टं या देवी रामलालसा ।
राक्षसीवशमापन्ना ध्रुवं नाशं गमिष्यति ॥
यदि नोपैति काकुत्स्थः श्रुत्वा वैदेहिदर्शनम् ।
विनाशं यास्यते लङ्का सरावणपुरी द्रुतम् ॥
📖 भावार्थ : सीता को देखकर हनुमान के नेत्र बाष्प (आँसुओं) से भर गए। उन्होंने देवी को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके समक्ष खड़े हो गए। उन्होंने सोचा: "अहो, कितना दुःख! कितना कष्ट! जो देवी राम के लिए तरस रही हैं, वे राक्षसी के वश में आ गई हैं। निश्चय ही उनका नाश होगा। यदि वैदेही के दर्शन का समाचार सुनकर काकुत्स्थ (राम) यहाँ नहीं आए, तो लंका और रावण सहित यह पुरी शीघ्र ही विनाश को प्राप्त होगी।"
🔍 व्याख्या : हनुमान का हृदय सीता की दशा देखकर द्रवित हो जाता है। साथ ही वे यह भी अनुभव करते हैं कि यह दुःख लंका के विनाश का कारण बनेगा।
॥ श्लोक ३६-४५ ॥
ततः सा राक्षसीमध्ये सीता शोकपरायणा ।
विलप्य बहुधा दीना निद्रया मृदितेक्षणा ॥
ताड्यमाना तु राक्षस्या धर्ष्यमाणा मुहुर्मुहुः ।
न प्रकम्पे महाभागा धैर्येण महता युता ॥
रामं ध्यायति वैदेही भर्तारं अमितौजसम् ।
आश्वासयति चात्मानं रामः साधु भविष्यति ॥
📖 भावार्थ : फिर वह सीता, राक्षसियों के मध्य, शोक में डूबी हुई, अत्यन्त दीन होकर बारम्बार विलाप करती हैं और उनके नेत्र निद्रा से भारी हो जाते हैं। राक्षसियों द्वारा बार-बार ताड़ित और धृष्टतापूर्ण व्यवहार किए जाने पर भी वह महाभागा सीता अपने महान धैर्य से विचलित नहीं होतीं। वे अपने अमित तेजस्वी पति राम का ही ध्यान करती हैं और स्वयं को यह कहकर आश्वस्त करती हैं कि "राम अवश्य साधु (भला) करेंगे।"
🔍 व्याख्या : यहाँ सीता के धैर्य की पराकाष्ठा दिखाई गई है। वे न केवल शारीरिक कष्ट सह रही हैं, बल्कि मानसिक रूप से भी दृढ़ हैं। उनका विश्वास राम पर अटल है।

📌 सर्गान्त : इस प्रकार पन्द्रहवें सर्ग में हनुमान को अशोक वाटिका में सीता के दर्शन होते हैं, जो एक चरम भावुक क्षण है। अगले सर्ग में हनुमान सीता के समक्ष स्वयं को प्रकट करने और उन्हें राम का संदेश सुनाने की योजना बनाएंगे।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

💔 करुण रस का साक्षात्कार

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण में करुण रस का उत्कृष्ट उदाहरण है। सीता की दीन दशा, उनका मलिन वस्त्र, कृश शरीर, और राक्षसियों का आतंक—सब मिलकर अत्यंत हृदयविदारक चित्र प्रस्तुत करते हैं।

🛡️ सीता का धैर्य और पतिव्रता धर्म

भयंकर यातनाओं के बीच भी सीता का राम में अटूट विश्वास और धैर्य नारी शक्ति का उच्चतम आदर्श प्रस्तुत करता है। वे न केवल दुःख सहती हैं, बल्कि आश्वस्त भी रहती हैं।

🐒 हनुमान का करुण हृदय

हनुमान केवल वीर और बुद्धिमान ही नहीं, बल्कि अत्यंत संवेदनशील भी हैं। सीता का दुःख देखकर उनके नेत्रों में आँसू आ जाते हैं। यह उनके चरित्र की एक महत्वपूर्ण परत को उजागर करता है।

⚔️ युद्ध की अनिवार्यता

हनुमान के विचार "विनाशं यास्यते लङ्का" से यह स्पष्ट हो जाता है कि अब राम और रावण के बीच युद्ध अटल है। यह सर्ग आगामी संघर्ष की पृष्ठभूमि को और अधिक सशक्त बनाता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और सत्य पर विश्वास ही मनुष्य का सबसे बड़ा आधार होता है। सीता का राम पर अटूट विश्वास और हनुमान की करुणा हमें मानवीय मूल्यों का स्मरण कराती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे सुन्दरकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥
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